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सुख-दुख की पहचान प्रशस्त करे अपूर्व संतुष्टि का मार्ग

सुख-दुख की पहचान प्रशस्त करे  अपूर्व संतुष्टि का मार्ग

जीवन में आने वाली कठिनाईयों से बाहर आने की ईच्छा किसे नहीं होती है। लेकिन यह उतना आसान नहीं होता है। देखा जाये तो अपने जीवन को हम खुद ही जटिल बना देते हैं। यह जीवन भगवान की देन है। जब स्वयं भगवान ने हमें यह जीवन दिया है, वह कभी भी उसे कष्टदायक बना सकते है। एक छोटा शिशु जब जन्म लेता है, उसके लिए जीवन कभी जटिल नहीं होता है। उसके मन में अपना या पराये का भाव नहीं होता है। किसी भी चीज से उसे डर नहीं होता है, केवल अपने उदर पुरण को छोड़कर उसे किसी दूसरी चीज की चाहत नहीं होती है। इसलिए उसके मुखमंडल पर हमेशा खुशी झलकती रहती है, जिससे वह दूसरों को भी खुशी प्रदान कर पाता है। देखा जाये तो एक छोटा शिशु जिसके बस में कुछ भी नहीं होता है वह केवल अपनी सरलता के कारण कितनों का हृदय जीत पाता है। बड़ी-सी-बड़ी कठिनाई में रहने के बावजूद एक छोटे शिशु की हंसी मन को खुशी प्रदान कर पाती है।

हम अपनी परिस्थितियों को गौर से देखें तो यह ज्ञात होता है कि यह सब बेबुनियाद है और यह क्षण अस्थायी है। जो आज हमारे लिए दुख है वह हो सकता है कल हमारे सामने दुखी होकर नहीं रहेगा। जो व्यक्ति अपने दुख के लिए जितना अधिक दुखी बनकर रहता है, वही दुसरे के दुख के लिए  उतना अधिक दुखी होकर नहीं रहता। उसी प्रकार सुख का प्रभाव हमारे जीवन पर होता है। यह सुख और दुख कुछ नहीं केवल एक मानसिक स्थिति है, जोकि पूरी तरह हमारे जीवन को प्रभावित करती है।

खुशी से रहने वाले व्यक्ति अपने जीवन को अलग अंदाज से जीते हैं। उनके जीवन में सब कुछ आसानी से सुलझ जाता हैं, आने वाला दुख भी अधिक समय तक उनके पास नहीं रह पाता है। जो व्यक्ति दुख में रहने लगते हैं, उनके जीवन में परेशानी उनका पीछा नहीं छोड़ती। दुख उनकी काबिलियत खत्म करके रख देता है। धीरे-धीरे दुख उन्हें अनेक व्याधिओं से ग्रसित भी कराता है। यह दोनों मानसिक स्थिति धीरे-धीरे हर व्यक्ति की आदत बन जाती हैं। जो आसानी से छूटती नहीं। हम जिस प्रकार जीना चाहते है, उसी प्रकार अपना वातावरण बना लेते हैं। उसी प्रकार की परिस्थिति भी हमारे सामने आ पहुंचती है। हम जब दूसरों को दोषी मानने लगते हैं तो हम भूल जाते हैं कि इन सभी चीज के लिए हम खुद ही जिम्मेदार हैं। यहां पर हर कोई अपने अंदाज से जीता है। अपने को दूसरे के लिए बदलना  आसान नहीं होता है। जो परिवत्र्तन हमारे हाथ में नहीं होता है उस पर अफसोस करते रहना गलत होगा। सुख-दुख की पहचान करें। उसे अपने जीवन का एक अंश मानें। उसे ही पूरा जीवन ना समझे। हमारा जीवन कुछ और है, जो केवल हमारे अंदर ही जीवित है। उस पर कोई बाहरी भावनाओं का प्रभाव आसानी से नहीं पडऩा चाहिए तभी अंदर ही अंदर एक अपूर्व संतुष्टि से हम रह सकेंगे।

उपाली अपराजिता रथ

 

 

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