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दुनिया फिर से संतुलन चाहती है

दुनिया फिर से संतुलन चाहती है

By डॉ. मोहनराव भागवत

पांच हजार 151 वर्ष भगवदगीता के पूरे हुए और हमारे विदेशी दिनदर्शिका में प्रतिवर्ष गीता जयंती है। आज भी सर्वत्र अपने देश में ऐसे लोग हैं जिनको गीता के 18 अध्याय मुखोग्य हैं। पढऩे वाले लोग हैं, देखने वाले लोग हैं, उस पर बोलने वाले लोग हैं। इतनी सुदीर्घ परम्परा में समय के अनेक फेरों में श्रीमदभगवत गीता को लेकर अनेक टीकायें, अनेक भाष्य बने और आगे भी बनते रहेंगे। जब-जब कभी किसी समाज को संकट से उबारने की, समाज के पुरुषार्थ को जगाने की आवश्यकता पड़ी है, तब-तब गीता पर भाष्य लिखा गया। भारत की इस आध्यात्मिक विरासत को जानने का यत्न करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को जिस प्रस्थानप्रयी का अध्ययन आवश्यक होता है, उसका एक अविभाज्य अंग है श्रीमदभगवदगीता।

भगवदगीता वैश्विक ग्रंथ है, सबके लिये है। जब भगवान ने भगवदगीता कही तब हिन्दू शब्द नहीं था। उस समय दुनिया में ये भेद नहीं थे। जिन भेदों की संकरी गलियों में घुसकर हम अपने साथ-साथ सारी दुनिया का नुकसान करते रहते हैं, यह सारे भेद उस समय नहीं थे। युद्ध के लिए वहां एकत्र हुए बंधु सौ कौरव और पांच पांडवों को छोड़ दिया जाय तो बाकी सब लोग आपसी रंजिश उतारने के लिये नहीं आये थे। एक निर्णय करना था कि क्या होना चाहिये। निर्णय के अन्य सब रास्ते बंद हो चुके थे। सिर्फ एक ही रास्ता रह गया था, लड़ाई का। इसलिये लडऩे वे आये थे। चीन देश की सेना भी आयी थी, यवन देश की सेना भी आयी थी। इस प्रश्र से उनका कोई सम्बन्ध नहीं था कि कौरवों को राज्य मिले या पांडवों को। लेकिन, मूल्य दांव पर लगे थे। ऐसे प्रसंग के प्रकाश में मोहग्रस्त अर्जुन को मोह से निकालने के लिये इसका उपदेश हुआ है। आप उस अर्जुन की स्थिति देखिये…। वो कोई अंजान, अनभिज्ञ हो ऐसा व्यक्ति नहीं है। समाज में ज्ञान के बारे में, कृतत्व के बारे में, वैभव के बारे में एक व्यक्ति का जितना उत्कर्ष हो सकता है उतना उत्कर्ष अर्जुन का हुआ है। लेकिन, उसके सामने परिस्थिति ऐसी है कि एक तरफ उसको यह मान्यता सता रही है कि हिंसा गलत है। यह सत्य है कि हिंसा गलत है और अहिंसा ही सत्य है। अहिंसा ही सब कुछ होना चाहिये। लेकिन, वह हिंसा करने भी जा रहा है तो किसके साथ – अपने गुरु, अपने रिश्तेदार के साथ। केन्द्र बात है तो सिर्फ राज्य की। आखिर यह राज्य साथ कौन ले जाता है? जीवन का यह वैभव साथ जाता है क्या? साथ तो वो नहीं जाता। साथ रहने वाले सत्य की अवमानना करते हुए जो साथ नहीं रहने वाला, उसके लिये मैं लड़ रहा हूं यह सही है क्या, यही प्रश्न था उसके सामने।

5151 वर्ष के बाद भी हम यहां बैठे हैं और भगवदगीता का स्मरण कर रहे हैं। गीता के अनुसार जीवन जीने की अथक अविशांत परम्परा अपने देश में विद्यमान है, चलती आई है, उसको समाज व्यापी होने की आवष्यकता है, इसलिये यह उत्सव है। और… वह गीता जीवन जीने की गीता है। गीता में क्या है इसके बारे में बोलने के अधिकारी संत ज्यादा हैं। उन्होंने बताया और जीने के लिये कहा। परन्तु जब जीने को जाते हैं अच्छी बातों का तो प्रश्न सामने आता ही है। जैसे जियो गीता जीने के लिये जाओ तो मेरा ही जीवन समाप्त होने लगे तो क्या करना? जियो गीता करने के लिये जाऊं, लेकिन लगता है कि उस ओर उसका बड़ा विरोध है तो क्या करूं? इसका जो सीधा जवाब है, उसको देखते हुए लगता है कि यह सही है कि गलत है, क्योंकि आखिर गीता का उपदेश इस तथ्य पर आधारित है वो सत्य गूढ़ है। वह साधना के बाद ही अनुभूति करके समझ लेने का सत्य है। उसके प्रकाश में क्या उचित है, क्या अनुचित है, इसका विवेक कैसे करना है? हर व्यक्ति को जीवन में अर्नुन जैसे होने का प्रसंग कभी न कभी आता है। भगवान ने स्वयं भगवदगीता में कहा है कि कभी-कभी धर्म, अधर्म का स्वरूप लेकर आता है, जैसे अर्जुन के सामने उस समय लडऩे का धर्म था। उसे भगवान ने बताया था। लेकिन, वह अधर्म का स्वरूप देख रहा है। हिंसा होने वाली है। समाज की व्यवस्थाओं का उच्छेदन होने वाला है। अपने ही रिश्तेदारों को मारने वाले हैं और जिस भौतिक सुख-संपदा को हम नश्वर मानते हैं, उसके लिये हम यह सब करने वाले हैं। कभी-कभी अधर्म, धर्म का रूप लेकर आता है।

युद्ध शुरू होने के पहले धृतराष्ट्र ने संजय को भेजा। संजय ने आते ही युधिष्ठिर महाराज को कहा कि यह कौरव तो महापापी हैं, किसी की सुनते नहीं। वे अज्ञानी भी हैं। वो ऐसा कर रहे हैं, अड़ रहे हैं इसमें तो कोई बड़ी बात नहीं  है। वो तो ऐसे ही करेंगे और नरक भोगेंगे, लेकिन आप पांचों भाई तो धर्मज्ञ हैं, समझदार हैं। आप क्यों लड़ाई क्यों मोल ले रहे हैं?  छोड़ दीजिए। काहे को इतनी सारी बातें करनी, जिससे हिंसा फैले। इससे क्रूरता होगी, जिसके कारण विनाश होगा। आप इससे भली-भांति परिचित हैं। धर्म का स्मरण कर, आप ही थोड़ा नरम हो जाएं। क्षण भर के लिये तो युधिष्ठिर को भी यह उचित लगा, क्योंकि यह भी तर्क हमारे शास्त्रों का ही है। सत्य-अहिंसा की रक्षा सब कुछ खोकर भी करनी है तो हिंसा का रास्ता क्यों चुनना! युधिष्ठिर क्षुब्ध होने लगे। उस समय राज्यसभा में खड़े हुए भगवान कृष्ण। उन्होंने ऐसे कड़े शब्दों में संजय को डांटा कि उन्हें वापस जाना पड़ा।

उस समय धर्म का रूप लेकर अधर्म आया था युधिष्ठिर के सामने। हम सबको अपने जीवन में व्यक्तिश: और प्रत्येक समाज को समूहत: इस प्रसंग का सामना करना ही पड़ता है, क्योंकि परिस्थिति हमेशा समान नहीं रहती। परिस्थिति की अनुकूलता का, प्रतिकूलता का खेल चलता रहता है। अनुकूल परिस्थिति में हर्षित होना और प्रतिकूल परिस्थिति में निराशावश बैठ जाना प्रवृत्ति है। इस खेल से दूर रहकर हर परिस्थिति में समान रहना, यह कैसे करना, भगवान ने यही बताया है।

मैंने जो बात समझी वह है कि भगवान ने पहली बात बताई कि भाग मत। तुम जिस परिस्थिति में हो उस परिस्थिति से मत भागो, उसका सामना करो। जाने से अपकीर्ति ही होगी और नुकसान भी होगा। लड़ेगा तो ज्यादा क्या होगा, मरेगा। और मरेगा तो स्वर्ग मिलेगा। जीतेगा तो वैभव मिलेगा। इसलिये पहली बात भगवान ने हम सबको यह कहा है कि परिस्थिति चाहे जैसी हो, आपके व्यक्तिगत जीवन में, समाज के जीवन में, दुनिया के जीवन में, भागो मत, खड़े रहो डट कर और अपना काम करो। अपना काम पहचानो क्या है, क्योंकि अपना कर्तव्य करना उसमें श्रेय है। इधर-उधर के दाखिले देकर भागने के लिये किसी महापुरूष का उदाहरण देकर उस रास्ते पर भागोगे तो भी तुम्हारा छुटकारा नहीं है। यह द्वंद्व उपस्थित हुआ है। तुम क्षत्रिय हो तो क्षत्रिय जैसे खड़े हो जाओ।

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विदुर चले गये कि मुझसे देखा नहीं जाता, इसलिए मैं दूर जा रहा हूं। विदुर का ठीक है कि वो इस प्रकार के कर्तव्य के भागी पुरूष नहीं हैं। उनका जितना कर्तव्य था, उन्होंने किया। अब कर्तव्य का समय नहीं है तो दूर चले गये। देश में इतने सारे ऋषि-मुनि थे, वहां कोई नहीं आया। यह उनका कर्तव्य नहीं था। जिनका कर्तव्य था वो रणभूमि में खड़े हो गये।

भागो मत पहली बात यह है। उसके बाद अपना कर्तव्य पहचानो। कर्तव्य पहचानने को हम केवल शब्दार्थ में लेंगे, तो हम भी फंस जायेंगे, क्योंकि अपना कर्तव्य में कर्तव्य तो हम कह सकते हैं, जान सकते हैं, लेकिन यह नहीं जान सकते कि अपना यानि किसका।

मेरे सामने कभी-कभी मिठाई आती है। मैं डायबिटीज वाला हूं। तो, अपना यानि मैं शरीर का मानूं तो शरीर तो कह रहा है कि खा लो। दो-चार क्या होता है, एक गोली ज्यादा ले लेना। मैं कौन हूं, मैं मेरा शरीर हूं। मैं मेरे मन की वासनाओं का विकार हूं। मैं मेरी बुद्धि की विकृति हूं। शरीर, मन, बुद्धि जिस सत्य के प्रकाश में चलने चाहिये वो तुम हो। तुम यह शरीर, मन, बुद्धि नहीं हो। उसके भटकाव में जाओगे, क्योंकि जो तुम हो वो रथ पर बैठे हो। यह बुद्धि, मन, शरीर यह सारे तुम्हारे नौकर हैं। तुम आत्मा हो। उसके प्रकाश में उचित-अनुचित का निर्णय करो। योग करो। तुम भौतिक जगत से जुड़े हो, अपने अहंकार से जुड़े हो, अपनी अव्यवसायिकतात्मा बुद्धि से जुड़े हो, अपने मन की वासना विकारों से जुड़े हो, अपनी इंद्रियों की खींचतान से जुड़े हो। उससे अलग हो जाओ। स्वयं से जुड़ो और स्वधर्म का निर्धारण करो। योगयुक्त बनो। अब  योग क्या है? दो गीता के प्रसिद्ध वाक्य आपको मालूम हैं, उसमें दो का आचरण भी हमने किया तो हमारा और दुनिया का जीवन बदल जायेगा। पहली बात बताई भगवान ने कि योगा: कर्मत: कौशलम्। जो भी काम तुम्हारा है उसको सत्यम, शिवम्, सुन्दरम उत्तम करना। किसी भी कार्य को व्यवस्थित किया जाता है, समय पर किया जाता है। सुन्दर रीति से किया जाता है। सबको अच्छा लगे ऐसे किया जाता है और उसका पूरा परिणाम मिले इतना किया जाता है, वह योग है। योग: कर्मत: कौशलम्।

दूसरी बात कही समरतम योग उत्सते। समर रहो, संतुलित रहो, किसी एक ओर मत झुको। क्योंकि… सब तुम्हारे हैं और कोई तुम्हारा नहीं है, वो आत्मा है, सर्वव्यापी है। सब समान हैं और सब में आप हैं। जात-पात, पंथ-सम्प्रदाय, भाषा-प्रांत यह सब छोड़ो। एक ही अनेक बना है। उस एकता के प्रकाश में सबको अपनत्व दो। यह जानकर रहो कि यह सब यहीं रहने वाले हैं। तुम स्वतन्त्र हो, अलग हो, स्वायत्त हो, तुम चले जाने वाले हो, तुम्हारा आना है, तुम्हारा जाना है, इसलिये मोह में मत पड़ो। अनभि: स्नेह, ऐसा शब्द है गीता में। अभी तुमने यहां पर सुना है, विशेष स्नेह। यह विषेश स्नेह मत करो। यह मोह होता है। यह पक्षपात होता है। स्नेह करो, अधिक स्नेह मत करो। अनभिस्नेही बनो।

सबको समान देखते हुए आत्मा सर्वभूतेषु मानते हुए, कर्म करो, कर्तव्य करो। कर्तव्य तुम्हारा लोक-संग्रह के लिये होना चाहिये। ऐसा कर्म करो जो कुछ नहीं जानता अज्ञान है, शरीर मन बुद्धि के पीछे भागने वाला जीवन के सुखों में जितना लालच से रत रहता है, वैसा ही रहो, लेकिन सावधान रहकर, यह जानकर, कि तुम वह लालची नहीं हो। तुम यह प्राप्त कर्तव्य के नाते कर रहे हो। तुम आत्मा से, मन से इससे अलिप्त रहो।

तीसरी बात प्रसिद्ध है कि जो करते हो उसके परिणाम की मत सोचो। सबके साथ समदृष्टि रखकर अपना कर्तव्य तुम कुशलतापूर्वक करते रहो। परिणाम क्या होता है, उसमें से मैंने जो चाहा वह मुझको मिलता है कि नहीं, यह बिलकुल मत सोचो। क्योंकि… यह किसी के हाथ में नहीं है। सब तैयारी योग: कर्मत: कोशलम् करके फ्लाइट जाने के लिये तैयार हो गयी। कोहरा आ गया, एक दो घण्टे के लिये। आप सबको अनुभव होगा इसका। इसमें दोष किसका? सबने अपना काम ठीक किया, लेकिन कोहरा आ गया, यह कौन तय कर सकता है। यह दुनिया का नियम है। दुनिया में यह होता रहता है। सब बातें तुम्हारे हाथ में नहीं रहतीं। तुम क्यों फल की आशा करते हो? कार्य अपने हाथ में है, फल प्रभु हाथ में।

इसलिये गीता का संदेश है, इन सब बातों को मन में स्थिर रखने के लिये। एकान्त में साधना करो। सत्य की साधना करो। सत्य की साधना करते चले जाओ, करते चले जाओ। और… लोकान्त में यानि जगत में, बाहर के जीवन में परोपकार और सेवा की भावना से, निष्काम पुरुषार्थ करो, फल की अपेक्षा किये बिना। यह जो करने का है वो परिस्थिति के उतार-चढ़ाव में कभी विषम नहीं होता, संतुलन नहीं डिगता। मोह आकर्षणों में, विकृतियों में नहीं भटकता, इधर-उधर नहीं होता, ऐसे धीर पुरुष बनो। इसलिये, लौकिक जीवन में उसको यश मिले न मिले, सारी दुनिया के लिये, रास्ते पर चलने के लिये प्रकाश देने वाला एक दीप स्तम्भ बनकर उसका जीवन रहे। उसके लौकिक जीवन को जन्म-जन्मान्तर तक लोग याद करते रहें।

हमारे देश की स्वतन्त्रता के लिये लडऩे वाले क्रांतिकारियों ने स्वतन्त्रता का प्रयास तो 1857 से भी पहले ही दक्षिण 1833 में शुरु हुआ था, लेकिन सफलता हमें 1947 में मिली। इतने लंबे समय में भगत सिंह को क्या कहेंगे? उनको यश मिला क्या? उनके लौकिक जीवन के यश की स्केल पट्टी लगाकर आप देखेंगे तो उसमें भगत सिंह ने बलिदान दिया, पर यशस्वी नहीं हुए, ऐसा कहेंगे लोग। लेकिन भगत सिंह के लिये यश और अपयश क्या है और हमारे लिये भगत सिंह का यश और अपयश क्या है? उनका जीवन हमारे लिये सब जीवनों को मार्गदर्शन करने वाला एक दीप स्तंभ है। फांसी पर झुलने वाले हमारे इन सब क्रांतिकारियों में से अनेकों के हाथों में गीता थी। प्रदर्शनी में आप उनके चित्रों को देखेंगे तो यही पाएंगे।

प्राप्त परिस्थिति का वीरता के साथ सामना करते हुए, अपने जीवन को सार्थक बनाते हुए, समाज में उस सार्थकता की परंपरा बनाने वाला प्रकाश देने का जीवन जिस भगवदगीता से मिलता है उस गीता की आवश्यकता है।

संतुलन खो चुकी दुनिया फिर से संतुलन चाहती है। संतुलन सत्य के प्रकाश में मिलता है और सत्य गीता में है। उस सत्य का आचरण करने की रीति गीता में बताई गई है। बताने वाला स्वयं योगेश्वर कृष्ण हैं और जिसके लिये बताया गया है वो धनुर्धर पार्थ है। इसलिये कहा गया है उस धनुर्धर पार्थ के कृतनिश्चय से अगर हम इस गीता को ग्रहण करें तो प्रत्यक्ष श्री परमेश्वर के सदैष्वरयुक्त जीवन का अनुभव लेने के लिये अधिकारी बन जाता है वह व्यक्ति और वो समाज। रहती यह गीता है। इसलिये पांच हजार एक सौ इक्यावन वर्र्ष पहले रण में जो गीता बतायी गयी, उस गीता का आचरण करने की परम्परा हमारे देश के ऋषि-मुनियों ने, मनीषियों ने, महापुरुषों ने, सबने सब प्रकार के परिश्रम करके, कष्ट सहन करके डाली है। दुनिया को इस गीता को समय-समय पर जीवंत दिखाने का काम हम भारतवासियों का है, क्योंकि उसका जन्म यहां पर कुरुक्षेत्र में हुआ है। भारतवासियों को उस कर्तव्य की याद दिलाना और उस पथ पर आगे बढ़ाना, ऐसा वातावरण उत्पन्न करने के लिये यह कार्यक्रम है। गीता के ही उस निष्काम पुरुषार्थ के उपदेश को आज से प्रारम्भ करते हुए हम इस सत्ता और सत्ता से आगे चलने वाले सारे कार्यों में अपना पूरा योगदान करें, यह एक आह्वान आपके सामने रखता हूं।

(लेखक आरएसएस के संरसंघचालक है और यह लेख गीता जयंती पर दिल्ली में उनके द्वारा दिए गए उद्बोधन पर आधारित है)

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