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जनतंत्र के भूले बिसरे पक्ष

जनतंत्र के भूले बिसरे पक्ष

By जगमोहन सिंह राजपूत

मुम्बई की मेयर ने साफ कह दिया कि उन्हें लालबत्ती चाहिए, उसके बिना वे महत्वपूर्ण/अतिमहत्वपूर्ण लोगों की अगवानी तथा आवभगत कैसे करेंगी? यदि मुख्यमंत्री को लालबत्ती मिलती है तो मेयर को क्यों नहीं? जब यह खबर मैं पढ़ रहा था तभी प्रोफेसर मुरारीलाल आ गये। मेरे पूछने पर कि इस राजहठ पर  उनका क्या विचार है, वे बोले – ”मेरे और आपके विचारों से क्या फर्क पड़ता है, फर्क तो नेताओं के विचारों और दृष्टिकोणों से पड़ता है।’’ प्रधानमंत्री ने स्वच्छता पर जोर दिया है, 2019 के 2 अक्तूबर तक महात्मा गांधी की स्मृति में ‘स्वच्छ भारत’ प्रस्तुत करने का वचन दिया है। सफाई, कूड़ा-करकट का निस्तारण जनहित के लिये क्या-क्या नहीं कर सकता है, इसे न समझ पाने के परिणाम के उदाहरण लगातार प्रतिदिन हमारे सामने भयावह रूप में प्रकट होते हैं। पर वे हमारा दृष्टिकोण नहीं बदल पाते हैं। मुम्बई की जिस मेयर को लालबत्ती की चिंता है, क्या उन्होंने इस तथ्य पर ध्यान दिया है कि बरसात के मौसम में प्रतिवर्ष कई दिन मुम्बईवासियों का जल-भराव के कारण निकलना दूभर हो जाता है। यही नहीं, वर्ष 2005 में इस कारण कई मौतें भी हुई थीं। जब नेतागण लोगों को भूल जाते हैं, पद का अहम हावी हो जाता है, तब स्वार्थ उभरता है और हास्यास्पद स्थितियां निर्मित होती हैं। ऐसे में हमारे चयनित प्रतिनिधियों का सही चेहरा सामने आ जाता है। इसके बाद हमारी चर्चा मुम्बई के मेयर को उनकी लालबत्ती गाड़ी में छोड़कर आगे बढ़ी। हमने साथ-साथ याद किया कि उपहार में मिला सोने का हार गांधी जी ने कस्तूरबा को अपने पास नहीं रखने दिया था। जनता के लिये किये गये कार्य के कारण जो भी मिले, वह जनता के हित में ही लगाया जाना चाहिये, वह व्यक्ति का तो हो ही नहीं सकता है। हमने यह भी याद किया कि लालबहादुर शास्त्री कांग्रेस कार्यालय से केवल 40 रूपये प्रतिमाह लेते थे। एक बार महावीर त्यागी उनसे उधार मांगने आये, वे बड़े व्यक्ति थे मगर शास्त्री जी के पास देने को पैसे कहां से आते? उस स्थिति में श्रीमती ललिता शास्त्री ने कुछ रूपये वहां लाकर रख दिये। वे हर माह उन 40 रूपयों में से कुछ रूपये बचा लेती थीं, क्योंकि परिवार को, बच्चों को, कब आवश्यकता पड़ जाये। शास्त्री जी भी अचम्भित रह गये, ललिताजी ने उन्हें तब स्पष्ट बता दिया। लालबहादुर शास्त्री ने बचत के सारे पैसे कांग्रेस कार्यालय में जमा कर दिए – मुझे तो केवल गृहखर्च के लिये रूपये लेने का अधिकार है, बचत करने का नहीं। आगे से मैं कांगे्रस कार्यालय से कम पैसे लूंगा।  हम दोनों के जीवन काल के प्रारम्भ में ऐसे लोग थे। हमने बदलाव का वर्तमान स्वरूप भी देखा है।

उन्हें एकदम चुप हो जाते देखकर मैंने कहा, आज की पीढ़ी तो इस सबसे अनभिज्ञ है। लालबहादुर शास्त्री का सारा जीवन मूल्यों तथा सिद्धांतों की साधना का अप्रतिम उदाहरण रहा है। नई पीढ़ी को स्कूलों-विश्वविद्यालयों में उनके सम्बंध में कितनी जानकारी दी जाती है? इसे सुनकर प्रोफेसर साहब बोले – ”शास्त्री जी यदि दस वर्ष प्रधानमंत्री रहते तो देश का स्वरूप बदल जाता।’’ उनकी सादगी ही नहीं, उनकी दृढ़ता भी लोगों ने देखी थी। पद पाकर भी ‘प्रभुता’ से जो अपने को दूर रख सके उसका पर्याय बन गये थे लालबहादुर शास्त्री। हमने साथ मिलकर अनेक प्रकरण याद किये, जिन्हें यदि बच्चों को सही ढंग से प्रस्तुत किया जाये तो उन्हें मानवीय मूल्यों और जनतांत्रिक मूल्यों को अन्तर्निहित करना कितना आसान हो जायेगा। हमारी व्यवस्था ने जिन्हें भुला दिया, उनमें एक थे आचार्य जे.बी. कृपलानी। वे तथा उनकी पत्नी सुचेता कृपलानी संविधान सभा के सदस्य चुने गये थे उत्तर प्रदेश से। दोनों दिल्ली रहने आये। तब सांसदों को वेतन नहीं मिलता था। आज खूब पैसा मिलता है और सांसद जब चाहें उसे बढ़ा लेते हैं। तब सदन की कार्यवाही में भाग लेने के लिये रोज 45 रूपये मिलते थे। दोनों कृपलानी केवल पन्द्रह रूपये लेते थे। सुचेता कृपलानी देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की मुख्यमत्री बनीं तो छोटे से मकान में रहना ही उन्हें भाया। अपनी सादगी तथा सिद्धांत-प्रियता के लिये विख्यात लालबहादुर शास्त्री जब प्रधानमंत्री के रूप में उनके घर गये तो उन्हें भी आश्चर्य हुआ: इतने बड़े राज्य के मुख्यमंत्री का इतना छोटा घर! आज हर पूर्व मुख्यमंत्री को बंगला, नौकर-चाकर, कार्यालय सहायक और न जाने क्या-क्या नहीं मिलता है। पूर्व प्रधानमंत्रियों तथा राष्ट्रपतियों की सेवा सुरक्षा तथा देखभाल भी जनता के मत्थे चढ़ती है। प्रोफेसर मुरारीलाल ने याद दिलाया कि उत्तर प्रदेश में जोड़-तोड़ कर कुछ घंटे के लिये मुख्यमंत्री बने एक नेता जी की नियुक्ति को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अवैध घोषित कर उन्हें पदमुक्त कर दिया था। कुछ वर्ष बाद उन्होंने न्यायालय जाकर यह वाद दायर किया कि उन्हें ‘भूतपूर्व मुख्यमंत्री’ माना जाय। न्यायालय ने उन्हें उपकृत नहीं किया। गांधी के समय उनके लिये काम करने आगे आये लालबहादुर शास्त्री, जे.बी. कृपलानी जैसे अनेकानेक अनुकरणीय व्यक्तित्व वाले लोग आज कहां ढंढे जायेंगे? एक तरफ हमने उन्हें देखा, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होकर भी पेंशन नहीं ली। दूसरी तरफ  भूतपूर्व होने के लिये कोर्ट-कचहरी!

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लोकतंत्र में सत्ता में वे पहुंचते हैं जिनके साथ बहुमत हो। अपेक्षा तो यह है कि बहुमत पचास प्रतिशत से काफी ऊपर हो। वर्तमान प्रावधानों तथा परिस्थितियों में ऐसा नहीं हो रहा है। जो सत्ता में पहुंच जाते हैं उनके कर्तव्य तथा अधिकार सर्वजन की सेवा के लिये ही निश्चित हो जाते हैं। तब अल्पमत, बहुमत, विजेता या पराजित का अंतर समाप्त हो जाने की अपेक्षा करता है जनतंत्र। यानि पूर्ण सहमति प्राप्त करने का अनवरत प्रयास जनतंत्र का आवश्यक अंग बनता है। चयनित प्रतिनधि की अपने लिये सबसे बड़ी आवश्यकता होती है – अपने पर नियंत्रण, अपनों पर नियंत्रण। उन नेताओं पर अब सामान्य जन को तरस आने लगा है, जो चुनाव जीत कर केवल ‘संग्रह’ में जुट जाते हैं, अपने लिये ऊंची सुरक्षा की मांग करते हैं, अपनी विशिष्ठता का प्रदर्शन करने को हर समय उद्धत रहते हैं। वे अधिकांशत: भूल जाते हैं कि लोकतंत्र एक जीवन पद्धति है और यह भी जीवन की नैतिक पद्धति है। इसको महात्मा गांधी ने अपने साथियों व अनुयायियों को सिखाया तथा इसकी व्यवहारिकता लालबहादुर शास्त्री, जे.बी. कृपलानी, सुचेता कृपलानी जैसे अनेक मनीषियों ने सादा और संयत जीवन जीकर स्थापित की। भारत के राष्ट्रपति चुने जाने पर डॉ. जाकिर हुसैन ने अपने संदेश में कहा था – ”मैं यहीं कहूंगा कि हम उत्तम, भरे-पूरे सम्मानित समाज की संरचना के लिये प्राण-प्रण से जुट जाएं। हमें कम बोलना चाहिये। कम झगडऩा चाहिए और अधिक परिश्रम से काम करना तथा मिल-जुलकर रहना चाहिये।’’ जाकिर साहब ने अनुकरणीय जीवन जिया। प्रोफेसर मुरारीलाल ने याद दिलाया कि जाकिर साहब से एक बार पूछा गया कि अच्छा और सफल जीवन कैसा होना चाहिये? उनका उत्तर था – ”जीवन में सबसे अधिक संतोषप्रद बात यह है कि आदमी अपने साथी इंसानों की सेवा कर सके और उसके हृदय में यह विश्वास हो कि वह घटिया काम नहीं कर रहा है।’’

नेताओं की साख अब लालबत्ती से नहीं बनती या बढ़ती है। जनता अब जनतंत्र समझती है। यदि सब नेता जाकिर साहब की राय मानें तो जनता उनकी साख पर अस्वीकृति का लाल निशान नहीं लगायेगी।

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