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गुजरात में विकास ही जीता !

गुजरात में विकास ही जीता !

पहली बार कांग्रेस को इतनी सीटों पर विजय से जाहिर है कि भाजपा के लिए गुजरात मॉडल पर अब दांव लगाना आसान नहीं रहेगा

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कहना वाजिब है कि गुजरात चुनाव विकास पर ही लड़ा गया। यह बात अलग है कि गुजरात का जनादेश भाजपा सरकार के विकास पर जितना मुहर लगाता है, लगभग उसी या उससे थोड़े कम अनुपात में उस विकास पर प्रश्नचिन्ह भी खड़ा करता है। भाजपा जिस तरह इस बार 99 के फेर में फंसी, वह भी यही बताता है कि विकास पर प्रश्नचिन्ह कम बड़े नहीं थे। यह भाजपा का 22 साल में सबसे कम आंकड़ा तो है ही, कांग्रेस को 77 और सहयोगियों के साथ 80 सीटें भी इसके पहले नहीं मिली थी। यह कहना तो आसान लगता है कि कांग्रेस ने जातिवाद को हवा देकर बाजी पलटने की कोशिश की थी। लेकिन सवाल है कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की लंबे समय से इस प्रयोगशाला में कांग्रेस ऐसा करने में कैसे कामयाब हो गई कि प्रधानमंत्री को अपने निजी मान-अपमान पर दांव लगाना पड़ा।

दरअसल गुजरात का जनादेश कई तरह के संकेत देता है। भाजपा की सिर्फ सीटें ही नहीं घटी हैं। उसकी वोट हिस्सेदारी भी 2014 के लोकसभा चुनावों से करीब 8 प्रतिशत घट गया है। पाटीदारों में नाराजगी और उनका वोट बंटने से उसका सौराष्ट्र-कच्छ का गढ़ भी पहली बार संदिग्ध  हो गया और कांग्रेस वहां हुए पहले दौर के मतदान में अपनी सीटें 2012 में 22 सीटों से इस बार 41 सीटों पर पहुंच गई। हालांकि भाजपा के लिए राहत की बात है कि उसे पहली बार उत्तर और मध्य गुजरात में बड़ा फायदा हुआ है। भाजपा के लिए राहत की बात यह भी है कि शहर उसके लिए अभी भी सुरक्षित हैं पर गांव पूरी तरह कांग्रेस की ओर चले गए हैं। यही विकास पर प्रश्नचिन्ह लगने का सबसे बड़ा उदाहरण हैं।

दरअसल जिस गुजरात मॉडल पर भाजपा इतना भरोसा करती है, वह गांवों में राहत नहीं दे पाया है। इसके लिए जातिवाद को दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि भाजपा के टिकट बंटवारे पर गौर करें तो उसने भी वही हिसाब लगाया था। भाजपा ने राज्य की आबादी में करीब 14 फीसदी पाटीदारों में एक वर्ग की नाराजगी की भरपाई के लिए ओबीसी तबकों में प्रजापति, लुहार, कोली जैसी जातियों को ज्यादा टिकट दिया। मोटे तौर पर राज्य में करीब 44 फीसदी ओबीसी आबादी में इनकी हिस्सेदारी करीब आधी बताई जाती है। भाजपा ने इस बार इन जातियों को 55 के आसपास टिकट दिए। इसका फायदा भी उसे भरपूर मिला।

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शायद पिछड़ी जातियों पर ज्यादा भरोसा जताने का ही यह भी उदाहरण था कि प्रधानमंत्री ने कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की नीच टिप्पणी को मुद्दा बनाया और उसे निचली जातियों का अपमान बताया। दरअसल विकास पर सवाल उठे तो भाजपा और खुद प्रधानमंत्री ने उसे पीछे छोड़कर उपेक्षा, अपमान, और पाकिस्तान को अपना हथियार बनाना ज्यादा माकूल समझा। मामला इतना ही नहीं था। अशालीन टिप्पणियों और तरह-तरह की सीडी और सोशल मीडिया अभियानों ने ऐसा माहौल बना दिया, जिससे सबसे बदरंग होली खेलने वाले भी शरमा जाएं।

शुरू में तो जरूर ऐसा लग रहा था कि कुछेक अपवादों को छोड़कर विकास और राज्य में भाजपा के 22 साल के राजकाज पर बात होगी। अक्टूबर के मध्य में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने नवसर्जन यात्रा शुरू की और ‘विकास गांडो थयो छे’ यानि ‘विकास पागल हो गया है’ का नारा उछाला तो राज्य की भाजपा सरकार और मोदी ने खुद कई परियोजनाओं की घोषणा करके मानो अपने जवाबी नारे ‘हूं छू विकास, हूं छू गुजरात’ को मजबुत करना चाहा था। लेकिन चुनाव के ऐलान के बाद जब 2015-16 में विभिन्न आंदोलनों के जरिए उभरे तीन युवा नेताओं पाटीदार अनामत आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल, ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर और दलित नेता जिग्नेश मेवाणी ने भाजपा विरोध के नाम पर अपना दांव कांग्रेस की ओर लगा दिया तो भाजपा ने विकास पर दांव लगाना शायद गैर-मुनासिब समझा।

बेशक, गुजरात के विकास पर राहुल भी तीखे सवाल उठा रहे थे और वे गुजरात के विकास को कुछ मुट्ठी भर उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने वाला बता रहे थे। यह कहना तो शायद उलझन वाला है कि उनके इन बयानों से ठीक वैसा ही माहौल बना, जैसा करीब दो साल पहले ‘सूट-बूट की सरकार’ वाले जुमले से बना था। उसके बाद बिहार चुनावों के पहले मोदी सरकार ने अपने भूमि अधिग्रहण संबंधी प्रस्ताव को रद्द कर दिया था। असल में गुजरात मॉडल की तीखी आलोचनाएं तीनों युवा नेताओं हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश की ओर से आई, जो ज्यादा भरोसेमंद लग रही थी और जिसके असर से गुजरात में माहौल बदला-बदला-सा दिखा। उनकी इस आलोचना ने नोटबंदी और माल व सेवा कर (जीएसटी) की खासकर छोटे उद्योगों और कारोबारियों और अनौपचारिक क्षेत्र पर पड़ी मार से त्रस्त माहौल को और गंभीर बना दिया। हालांकि सूरत का जनादेश इस मामले को भाजपा को राहत दे गए कि अब नोटबंदी और जीएसटी पर सवाल कुछ कम उठेंगे।

नतीजा यह हुआ कि पहली बार भाजपा और मोदी के खिलाफ हंसी-मजाक और तरह-तरह के चुटकले चल पड़े। गुजरात की राजनीति के गहरे जानकार वरिष्ठ पत्रकार अजय उमट कहते हैं, ‘पिछले डेढ़ दशक से तो खासकर मोदी के खिलाफ बातों पर गुजराती नाक-भौं सिकोडऩे लगते थे। समाज में उनका जो आभामंडल तैयार हो गया था, उसे तोडऩे में तीनों युवा नेताओं के आंदोलनों के अलावा आर्थिक तंगहाली ने बड़ी भूमिका अदा की।’ हालांकि विकास पर सवाल उठने पर चुनाव प्रचार के बीच के दौर से मोदी को उसी आभामंडल को जगाने के लिए अपने अपमान और ‘राष्ट्रवाद’ को मुद्दा बनाना शायद जरूरी लगा। लेकिन, गुजरात के ही राजनीति विज्ञानी अच्युत याज्ञिक के मुताबिक मोदी यह भूल गए कि वक्त बदल गया है। वे कहते हैं, ‘मोदी का यह आभामंडल 2002 के दंगों के अलावा उद्योगों की चमक-दमक से पैदा हुआ था। दंगों ने उन्हें कट्टर हिंदुत्व का नायक बनाया था तो नए-नए उद्योगों के लगने और शहरीकरण के विस्तार से मोदी एक खास तरह के विकास के पैरोकार भी माने जाने लगे। लेकिन गुजरात दंगों के बाद एक पूरी नई पीढ़ी आ गई है जिसके लिए शिक्षा और रोजगार के मसलों की अहमियत ज्यादा है।’ बढ़ते उद्योगीकरण और बड़े कारोबार को प्रश्रय से शिक्षा और रोजगार दोनों ही मोर्चों पर मुश्किलें काफी बढ़ी हैं।

ऐसे में पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल का दावा भरोसेमंद लगने लगा कि ‘सर्वे कर लो अगर ज्यादातर पाटीदारों की आर्थिक हालत बेहतर लगी तो मैं आंदोलन वापस ले लूंगा। किसी भी समाज के 10-12 प्रतिशत लोगों की खुशहाली पूरे समाज का आईना नहीं होती।’ इसी तरह कांग्रेस में शामिल होकर चुनाव लडऩे वाले ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर का यह कहना भी बेदम नहीं लगता कि आरक्षण भी विकास का ही हिस्सा है क्योंकि ‘अगर यह मांग संपन्न माने जाने समुदायों से भी उठ रही है तो क्या और कैसा विकास हुआ है, यह साफ हो जाता है।’ जिग्नेश मेवाणी तो धड़ल्ले से दलित और मुसलमान समुदायों पर अत्याचार की बात भी उठा रहे हैं, जिसे उठाने से कांग्रेस ने भी परहेज किया। यही नहीं, राहुल गांधी लगातार मंदिरों में भी गए, जिसकी भाजपा ने काफी आलोचना की। यह भी कहा गया कि उनका नाम सोमनाथ मंदिर में गैर-हिंदू के तौर पर दर्ज है। कांग्रेस ने इसे भाजपा की साजिश ही नहीं बताया, बल्कि उसके प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने राहुल को जनेऊधारी हिंदू बताया। जाहिर है, कांग्रेस अपनी मुस्लिम समर्थक छवि से निजात पाना चाहती थी या फिर भाजपा के आरोपों की काट के लिए उसने अपनी रणनीति बदली।

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लेकिन भाजपा या कहें खुद मोदी ने कांग्रेस को मुस्लिम पैरोकार बताने के अपने पुराने दांव पर भारोसा करना ज्यादा जरूरी समझा। पहले सूरत के खास इलाकों में अहमद भाई (कांग्रेस नेता अहमद पटेल) को मुख्यमंत्री बनाने संबंधी अनाम पोस्टर लगे। कांग्रेस ने खंडन किया। पहले चरण का मतदान के दिन ही दूसरे चरण के प्रचार की सभा में अहमदाबाद से सटे इलाके में मोदी ने खुद कहा कि कांग्रेस पाकिस्तान की शह पर अहमद भाई को मुख्यमंत्री बनाना चाहती है। उसके बाद वे गोधरा और साणंद की सभाओं में तो यहां तक कह गए कि दिल्ली में पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ एक बैठक हुई जिसमें अहमद भाई को मुख्यमंत्री बनाने की योजना बनी। कांग्रेस ने इसे कोरा बकवास बताया। लेकिन याद करें कि 2012 के चुनावों में भी प्रचार के आखिरी दौर में मोदी यही आरोप लगा चुके हैं कि कांग्रेस अहमद भाई को मुख्यमंत्री बनाना चाहती है। इस बार वे कुछ आगे बढ़ गए तो हो सकता है कि वजह पिछले दिनों राज्यसभा चुनावों के दौरान अहमद पटेल को हराने की भाजपा की नाकाम कोशिशें हों।

मोदी इसके पहले कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की टिप्पणी ‘नीच किस्म के आदमी’ को भी मुद्दा बनाया और उन्होंने उसे अपनी जाति और गुजरात का अपमान बताया। हालांकि कांग्रेस मोटे तौर इन आरोपों में नहीं उलझी। अय्यर पार्टी से निलंबित कर दिए गए और राहुल ने कहा, ‘हम प्रधानमंत्री के बारे में गलत शब्दों का इस्तेमाल नहीं करेंगे। हम मोदी जी को प्रेम से हराएंगे।’ कांग्रेस के दूसरे नेता भले कुछ भटके मगर हार्दिक पटेल तो कतई नहीं भटके। उनसे संबंधित कई सेक्स सीडी भी जारी हुई मगर वे उसे भाजपा की साजिश बताकर ही अपनी बात करने लगे।

इसका कांग्रेस को खासा फायदा मिला। यह फायदा भांपकर ही शायद राहुल गांधी की कांग्रेस अध्यक्ष पर ताजपोशी का वक्त भी चुनाव नतीजों से दो दिन पहले रखा गया था। इसमें दो राय नहीं कि कांग्रेस को शह मिली है और इसका असर उसे नए साल में होने वाले विधानसभा चुनावों और 2019 के लोकसभा चुनावों में ऊर्जा प्रदान कर सकता है। भाजपा को मिले सीमित जनादेश का असर भी केंद्र की सियासत और 2019 के लोकसभा चुनावों पर पड़ सकता है। एक बात तो तय है कि गुजरात मॉडल पर आगे दांव लगाना मुश्किल हो सकता है।

 

हरिमोहन मिश्र

 

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