ब्रेकिंग न्यूज़ 

साख और सरकार

साख और सरकार

आखिरकार मोदी-द्वेषी तथाकथित सेकुलर बिरादरी को क्रिसमस और नए वर्ष की खुशी मनाने का बहाना और कुछ साख का तोहफा मिल गया क्योंकि ये गुजरात को कुछ हद तक जाति, क्षेत्र, धर्म और समुदाय के नाम पर बांटने में सफल हो गए। बेशक, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को झटका लगा है क्योंकि उतनी सीटें नहीं आ पाई, जितनी उम्मीद की जा रही थी। लेकिन यह देखने की फुर्सत कहां है कि इस बार भाजपा की वोट हिस्सेदारी में 7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और सौराष्ट्र को छोड़कर दक्षिण, मध्य और उत्तर गुजरात में भाजपा अच्छी सीटें लाने में सफल रही। अब राजनीतिक विश्लेषक इस बात की चर्चा कर रहे हैं कि शहरी क्षेत्र में भाजपा का प्रदर्शन तो अच्छा रहा, लेकिन  ग्रामीण क्षेत्रों वह किसानों का समर्थन हासिल नहीं कर पाई क्योंकि राज्य सरकार कृषि उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं जारी कर पाई और किसानों तथा कृषि उद्योगों के लिए सुखद माहौल नहीं पैदा कर पाई। यकीनन ग्रामीण क्षेत्रों में समर्थन गंवाना भाजपा के लिए चिंता का विषय है  और पार्टी के रणनीतिकार आगामी बजट में इसका कोई हल निकालने की कोशिश करेंगे  क्योंकि अब कर्नाटक, राजस्थान, मध्य  प्रदेश और छतीसगढ़ के चुनाव होने वाले हैं।

पाटीदार समाज पर डोरे डालने के चक्कर में उतरी हार्दिक पटेल कंपनी को सौराष्ट्र के अलावा बाकी हर जगह मुंह की खानी पड़ी। यही नहीं, सूरत में कांग्रेस को एक ही सीट मिल पाई, इससे साबित होता है कि  जीएसटी और नोटबंदी के नाम पर हुए ये सारे विरोध प्रदर्शन हार्दिक पटेल कंपनी के द्वारा भारी खर्च से उच्छृंखल युवाओं को गुमराह करके आयोजित किए थे।

विधानसभा चुनाव से पहले मेरी गुजरात के कई सरकारी अधिकारियों से जीएसटी और नोटबंदी के असर के बारे में बात हुई थी। सभी का मानना था कि जीएसटी और नोटबंदी के कारण भाजपा को व्यापारी वर्ग की नाराजगी झेलनी होगी, लेकिन सुरत में आये परिणाम ने सबको गलत सिद्ध कर दिया। असल में भाजपा ने कांग्रेस के कई गढ़ों को तोड़ा और सिर्फ सौराष्ट्र में कांग्रेस के हाथों नुकसान झेला। भाजपा को मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से सटे आदिवासी क्षेत्र में भी झटका झेलना पड़ा और कांग्रेस को इसका आगे भी लाभ मिल सकता है। यही नहीं,भाजपा को केशुभाई पटेल, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह जैसे बड़े नेताओं के गृह जिलों में भी हार झेलनी पड़ी। इस बार भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने पुराने कार्यकर्ताओं और नेताओं को सक्रिय करने में नाकाम रही। फिर पार्टी छोड़कर गए नेताओं को भी मुंह की खानी पड़ी। इसका यहीं अर्थ है कि अब मतदाता ज्यादा समझदार, सरकार के कामकाज और नेताओं को परखने के संदर्भ में शिक्षित हो चुके हैं।

गुजरात और हिमाचल के चुनाव परिणाम से यह साफ होता है कि लगातार कई राज्यों में चुनाव हारने के बाद भी राहुल गांधी ने कुछ नहीं सिखा। अपने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने की बजाय, वे आज भी हार्दिक और अन्य दूसरे दलों पर निर्भर हैं। कांग्रेस की बात करें तो इस बार के चुनाव में कांग्रेस को पूरी तरह से हार्दिक और कंपनी ने हथिया लिया और राहुल गांधी ने केवल अपने हिंदूत्व एजेण्डा को ही चुनाव जीतने का मंत्र मान लिया। कांग्रेस को समझना होगा कि यह देश कांग्रेस की अल्पसंख्यक, दलित और विघटनकारी ताकतों को अपनी ओर खिंचने वाली कला से परीचित हैं। राहुल गांधी मतदाताओं को अपनी ओर खिंचने में नाकाम रहे। राहुल गांधी को अभी और मेहनत करने की आवश्यकता है।

दूसरी ओर अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा 2014 के बाद हुए अभी तक के 17 चुनावों में 12 चुनाव जीतने में सफल रही हैं। उनकी सबसे अधिक प्रभावित करने वाली बात यह है कि वे देश भर में जमीनी स्तर तक अपनी पार्टी को मजबूत करने के लिए कार्य करते रहे हैं। अपने राजनीतिक गुरु नरेंद्र मोदी की सहायता से अमित शाह अपने दल को मजबूत कर पार्टी के कार्यकर्ताओं और संघ को खुश करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। राजनीति में सफलता से बड़ी कोई चीज नहीं है और अमित शाह लगातार अपनी पार्टी को जीत दिलाते हुए आज भाजपा को देश की सबसे अधिक विधायकों और सांसदों वाला दल बनाने में सफल रहे हैं। इतने वर्ष गुजरात की सत्ता में रहने के बावजूद भाजपा एक बार फिर सरकार बनाने में सफल रही, जो 27 वर्ष तक लगातार किसी भी दल के लिए किसी राज्य में शासन करने का अपना एक अलग ही किर्तिमान हैं। हिमाचल के लोगों ने भी भाजपा को दो तिहाई बहुमत प्रदान की हैं। नरेंद्र मोदी के समक्ष अब इस हिमालय क्षेत्र के नौजवानों के लिए रोजगार, किसानों के लिए सुरक्षा और विकास को दोहरे अंक में बदलने का एक बड़ा लक्ष्य हैं।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

Leave a Reply

Your email address will not be published.