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कहीं गुम न हो जाए हाशिम की पहल

कहीं गुम न हो जाए हाशिम की पहल

By रंजना

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के मुख्य मुद्दई हाशिम अंसारी उदारमना हैं, लेकिन उनकी आंखों में मौजूदा सामाजिक ताने-बाने को लेकर बढ़ी कट्टर राजनीतिक सोच का दर्द देखा जा सकता है। 1950 से मुकदमा लड़ रहे अंसारी ने 64 साल की लड़ाई के बाद इससे तौबा करने की ठान ली है, लेकिन एक दर्द की टीस यह भी है कि कहीं सियायत के भंवर में उनकी यह अपील गुम न हो जाए। राम और रहीम के नाम पर हो रही राजनीति ने हाशिम को इसके लिए मजबूर किया है। पूरे मामले को गंभीरता से जानने वालों को पता है कि मुकदमे के पहले मुद्दई हाशिम ही हैं। वह बाबरी मस्जिद का प्रतिनिधि बनकर कभी राम मंदिर की लड़ाई लड़ रहे हिन्दू साधुओं के साथ मुकदमा लडऩे अदालत में जाते थे, लेकिन भाईचारे के बीच में घुले जहर ने उन्हें विचलित कर दिया और अब वे इस मामले की पैरवी नहीं करना चाहते।

हाशिम चाहते हैं कि ‘राम लला आजाद हो जाएं।’ अब वह (राम लला) तिरपाल के नीचें न रहें, बल्कि वहां एक भव्य राम मंदिर का निर्माण हो। लेकिन, हिन्दू-मुसलमान को बांटने तथा राम-रहीम की राजनीति करने वाले ठेकेदारों को अंसारी की यह मुहिम नागवार गुजरी है।

कोई हाशिम को अलग-थलग करने में जुटा है तो कोई ‘हाशिम के मुकदमे की पैरवी न करने से कोई फर्क नहीं पडऩे वाला’ का संदेश देने में जुटा है। इस मुद्दे पर राजनीति करने वाले भी अपनी रोटी सेंक रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में इस विवाद के कई रंग देखने को मिल सकते हैं। खुद हाशिम के शब्दों में, ‘बाबरी मस्जिद हो या रामजन्म भूमि, यह राजनीति का अखाड़ा है। मैं हिन्दुओं या मुसलमानों को बेवकूफ बनाना नहीं चाहता। अब हम किसी कीमत पर बाबरी मस्जिद मुकदमे की पैरवी नहीं करेंगे।’ हाशिम यही नहीं रूके। उन्होंने कहा कि वह छह दिसंबर को कोई कार्यक्रम नहीं करेंगे और न ही काला दिवस मनाने के कार्यक्रम में शामिल होंगे। अंसारी के इस बयान के बाद हिन्दू और मुसलमान नेताओं में खलबली मच गई है। दोनों पक्ष के ठेकेदारों में इस बयान को लेकर खासी चर्चा है। इस बयान के सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश के अपर महाधिवक्ता और बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जिलानी ने हाशिम अंसारी को मना लेने का दावा किया है। इन सबके बीच यह सोचने वाली बात यह है कि आखिर 95 साल के हाशिम ने ऐसा बयान क्यों दिया। हाशिम बूढ़े हो चले हैं। सोच से उदार हैं। 1949 में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवादित ढांचे से मूर्तियां बरामद होने के बाद जिन लोगों को गिरफ्तार किया था उनमें अंसारी भी थे। 1961 में वक्फ बोर्ड ने जब मुकदमा दायर किया तो हाशिम बाबरी मस्जिद के प्रतिनिधि के तौर पर मुख्य पक्षकार थे। लेकिन अब वह ऊब चुके हैं, क्योंकि हाशिम ने इतने सालों मे राजनीति का घिनौना चेहरा देखा है। जिस आजम खां को बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमेटी का संयोजक बनाया गया, वह बाद में मुलायम सिंह यादव के साथ चले गए। मौजूदा समय में उ.प्र. सरकार के वरिष्ठ कबीना मंत्री हैं और आए दिन भड़काऊ बयान देते रहते हैं। हाशिम अंसारी ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि मुकदमा वह लड़ें और इसका राजनीतिक फायदा आजम खां उठाएं। अब वही आजम इसकी पैरवी भी करें।

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आजम के साथ-साथ हाशिम अंसारी ने जफरयाब जिलानी को भी कई चरणों में देखा है। जिलानी मुकदमे की वकालत करते हुए काफी समृद्ध हो गए हैं। सूबे के कई नेताओं ने भी बाबरी मस्जिद के नाम जमकर फायदा उठाया है। हिन्दू छुटभैय्ये नेता भी पीछे नहीं रहे। राम मंदिर-बाबरी मस्जिद की छाया में समाजवादी पार्टी और भाजपा दोनों फली-फूली।  रामपुर के नवाब सूबे के बड़े नेता हो गए। अंसारी इसके लिए न केवल आजम खां को कोसते हैं, बल्कि अपनी नाराजगी भी जाहिर करते हैं। हालांकि हाशिम अंसारी के इस मामले से पैरवी न करने का इस मुकदमे पर कोई खास असर नहीं पडऩे वाला। उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जस्टिस वी.एन. खरे के मुताबिक, ‘हाशिम अंसारी मुकदमे में एक पक्ष के प्रतिनिधि थे। इसमें उनके अलावा और भी प्रतिनिधि हैं। रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का मुकदमा रिप्रजेंटेटिव सूट है। इसलिए वैधानिक रूप से कोई दिक्कत नहीं आएगी। मुकदमा चलेगा और अदालत अपना काम करेगी।’ संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का भी यही मानना है। हालांकि कश्यप इसे काफी अच्छा कदम बताते हैं। उनका मानना है कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का हल तलाश लेने की पहल तेज करनी चाहिए। हाशिम अंसारी की पहल अच्छी है और इस मामले का निबटारा अदालत के बाहर आपसी सहमति से होना चाहिए।

अंसारी ने एक बार पहले भी मामले को सुलझाने की पहल की थी। तब महंत ज्ञानदास ने भी कोशिश की थी। दोनों पक्षकार चाहते थे कि हिन्दुओं-मुसलमानों को इकट्ठा करके विवाद का समाधान निकाला जाए, लेकिन बकौल अंसारी, तब हिन्दू महासभा ने अडंग़ा लगा दिया था। एक बार फिर हाशिम अंसारी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अच्छा इंसान बताते हुए इसकी पहल की है। वह प्रधानमंत्री मोदी की प्रतिभा के कायल हैं और इस मुद्दे पर शांतिपूर्ण समाधान के लिए बातचीत को तैयार हैं।

अंसारी की इस पहल का रामजन्मभूमि के मुख्य पक्षकार महंत रामदास ने भी स्वागत किया है। महंत ने कहा कि जीवन की अंतिम बेला में अंसारी ने अच्छा निर्णय लिया है। उनसे मुस्लिम समुदाय को सीख लेनी चाहिए। लेकिन मामले को नया देते हुए जफरयाब जिलानी ने अपना पक्ष रखना शुरू कर दिया है। जिलानी के मुताबिक इस मामले में छह वादी और भी हैं। सुन्नी वक्फ बोर्ड भी वादी है। यह रिप्रजेंटेटिव मुकदमा है। इसलिए पार्टी के हटने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

खैर, हाशिम अंसारी की पहल के पीछे चाहे जो मंशा हो, लेकिन इसके राजनीतिक भंवर में उलझकर रह जाने के पूरे कयास हैं। जबकि हाशिम ने ऐसा कहकर एक बार फिर नई आस जगाई है। संभवत: वह अपने जीते-जीते इस मामले का निबटारा देखना चाहते हैं। न्यायमूर्ति जस्टिस वी.एन. खरे और संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का भी मानना है कि इस मामले का अदालत से हल निकलना आसान नहीं है। हाशिम अंसारी और रामजन्म भूमि के पक्षकार संत रामदास का भी यही मानना है। ऐसे में केन्द्र और राज्य सरकार को भी चाहिए गंगा-जमुनी तहजीब की परंपरा को मजबूती देते हुए एक बार फिर राजनीति से ऊपर उठकर इसकी पहल होनी चाहिए।

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