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सांसत में रमन सिंह

सांसत में रमन सिंह

By रंजना

जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सत्ता में आए हैं, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह का कामकाज केन्द्र के लिए नासूर बनता जा रहा है। यह दूसरा मौका है जब केन्द्र सरकार को शर्म से पानी-पानी होना पड़ा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र को मामले को संज्ञान में लेना पड़ा और गृहमंत्री राजनाथ सिंह को केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों की शहादत के साथ हुई लापरवाही की रिपोर्ट तलब करनी पड़ी। सत्ता के गलियारे और भाजपा के अशोक रोड स्थित मुख्यालय में इसे रमन सिंह सरकार पर मंडरा रहे संकट के रूप में देखा जा रहा है।

ऐसा नहीं है कि रमन सिंह के कामकाज पर पहली बार सवाल उठा है। इससे पहले महिलाओं की नसबंदी के मामले में राज्य सरकार कठघरे में आ चुकी है। इस हादसे में 70 से अधिक महिलाओं की मौत हो गई थी। नसबंदी कांड से पहले राज्य सरकार के आंख के इलाज के लिए लगे शिविर में तमाम लोगों को अपनी आंख गंवानी पड़ी। हालांकि राज्य सरकार की जांच में इन सभी का कारण चिकित्सकों की लापरवाही के बजाय गलत दवाओं के इस्तेमाल को रेखांकित किया जा रहा है, लेकिन बड़ा सवाल यह भी है कि दवा कंपनियों से दवाएं मंगा कौन रहा है। उसके गुणवत्ता की जांच का जिम्मा किसका है। आखिर क्यों स्वास्थ्य मंत्री डॉ. अमर अग्रवाल को लेकर राज्य सरकार और पार्टी के भीतर तथा बाहर इतना विरोध हो रहा है?

20-12-2014

सूत्र बताते हैं कि ताजा मामला सामने आने के बाद न केवल गृहमंत्री राजनाथ सिंह, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी ने भी रमण सिंह से बात की है। राजनाथ सिंह ने सीआरपीएफ जवानों की शहादत के साथ हुई लापरवाही की जांच करके दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई तथा पूरे मामले की रिपोर्ट केन्द्र सरकार को भेजने को कहा है। रमन सिंह राजनाथ सिंह खेमे के माने जाते हैं। सूत्र बताते हैं कि इतने भर से ही काम नहीं चलने वाला है। जल्द ही रमन सिंह को दिल्ली तलब किया जा सकता है। इस दौरान मुख्यंमंत्री को सख्त हिदायत दी जा सकती है। दरअसल इसकी कुछ बड़ी वजहें भी हैं। भाजपा का एक तबका राज्य सरकार के काम-काज के तरीके से पहले ही नाखुश है। उसका मानना है कि आदिवासी बहुल राज्य में गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री सबकुछ ‘मैनेजÓ करने की रणनीति पर चल रहे हैं। पेशे से चिकित्सक रमन सिंह के बारे में कहा जा रहा है कि इसकी वजह से जमीनी स्तर पर स्थिति में बदलाव नहीं ला पा रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी का साफ कहना है कि वह किसी का भी दाग अपने ऊपर नहीं लेंगे। वह पहले ही कह चुके हैं कि न तो खाएंगे और न ही खाने देंगे। वीरवार 4 दिसंबर को राज्यसभा में केन्द्रीय खाद्य प्रसंस्करण राज्यमंत्री साध्वी निरंजन ज्योति के बयान पर अपना वक्तव्य देते हुए उन्होंने बहुत कुछ बयां कर दिया है। इतना ही नहीं केन्द्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार में कुछ नेताओं के पर को काटा जाना, कामकाज में लापरवाही करने वालों को कम महत्वपूर्ण विभाग देना भी इसी का हिस्सा है।

नक्सली तांडव बना नासूर

20-12-2014

छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का तांडव नासूर बन चुका है। साऊथ एशिया टेररिज्म पोर्टल के मुताबिक 2005 से लेकर अब तक (30 नवंबर 2014) राज्य में नक्सली हिंसा में 2,183 लोगों ने जवान गंवाई है। इनमें 603 माओवादी, 814 सुरक्षा बलों के जवान और 666 आम नागरिक हैं। इस तरह से होने वाली हिंसा में सुरक्षा बलों की तादाद अधिक है। अकेले 2014 में 30 नवंबर तक करीब 94 लोग इसका शिकार हुए। इनमें 31 माओवादी, 40 सुरक्षा बल के जवान और 23 नागरिक हैं। राज्य में 2009 और 2010 के दौरान माओवादी हिंसा अपने चरम पर थी। 2010 में 327 (102 माओवादी, 153 सुरक्षा बल, 72 नागरिक) लोग मारे गए। जबकि 2009 में 347 लोगों (137 माओवादी, 121 सुरक्षा बल और 87 नागरिक) के मारे जाने की सूचना है।

प्रधानमंत्री लगातार संदेश दे रहे हैं कि लोगों का काम-काज ही उनके भविष्य का आधार बनेगा। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी इसी के पक्षधर हैं। भाजपा ने राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद जिम्मेदारी देने के मामले में भी यही संदेश दिया है। ऐसे में इसके पूरे कयास लगाए जा रहे हैं कि झारखंड विधानसभा चुनाव का नतीजा आने के बाद पार्टी छत्तीसगढ़ पर विशेष ध्यान देगी। दरअसल छत्तीसगढ़ में रमन सिंह का राजनीतिक विरोध तो काफी समय से हो रहा है, लेकिन अब राज्य सरकार कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर भी ठोस संदेश नहीं दे पा रही है। इसलिए केन्द्र सरकार फूंक-फूंककर कदम रखना चाहती है।

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद बड़ी समस्या है। दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के वाहन पर हुए नक्सली हमले ने पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम की जमीन हिला दी थी। मई 2013 में नक्सलियों ने कांग्रेस नेताओं के काफिले पर हमला बोला था और करीब 27 लोग मारे गए थे। दिसंबर के पहले सप्ताह में हुए हमले 14 जवान मारे गए और इतने करीब घायल हुए। इसमें भी सनसनी फैलाने वाली खबर यह आई कि केन्द्रीय गृहमंत्री के राज्य का दौरा करके लौटने के बाद कूड़ाघर से जवानों की खून से सनी वर्दी मिली। शव के अंश पाए गए। कांग्रेस का आरोप है कि सैनिकों की वर्दी और उनके शवों को कुत्ते नोंच रहे थे। इस मामले ने रायपुर में तूल पकड़ा और इसकी गूंज संसद भवन तक सुनाई दी।

बताते हैं एक दिसंबर को नक्सलियों द्वारा हमला बोले जाने के बाद सीआरपीएफ के जवानों को इलाज के लिए रायपुर लाया गया, लेकिन जिन जवानों की शहादत हो चुकी थी उनके शव का सुकमा के पास डॉ. भीमराव अंबेडकर अस्पताल में पोस्टमार्टम कराया गया। इसके बाद सैनिकों की खून से सनी वर्दी कूड़े घर में फेंक दी गई। इस मामले ने नई सनसनी पैदा कर दी है। इससे पहले दंतेवाड़ा में हमले में मारे गए जवानों के शव कूड़ा गाड़ी से ढोए गए थे।
राज्य सरकार को केन्द्रीय रिजर्व पुलिस भी लगातार कठघरे में खड़ा करती आई है। राज्य में रमन सिंह तीन बार से लगातार मुख्यमंत्री हैं। इस दौरान एक के बाद एक नक्सली हमले हुए हैं, लेकिन केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल का आरोप है कि इसके बाद भी राज्य पुलिस और सुरक्षा बलों से बराबर का सहयोग नहीं मिल पाता। खुफिया सूचनाओं के मामले में भी लूप-होल रहता है और इसके चलते बड़े हादसे हो जा रहे हैं।

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