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स्वास्तिक के विरोध को आखिर क्या कहा जाए?

स्वास्तिक के विरोध को आखिर क्या कहा जाए?

By शिरीष सप्रे

महाशिवरात्री से एक दिन पहले प्रवासियों का देश कहे जाने वाले अमेरिका के वाशिंगटन सिएटल में वहां के सबसे बड़े शिव मंदिर पर धर्माधारित हमला एवं तोड़-फोड़ के बाद पेंट से स्वास्तिक बनाकर लिख दिया गया कि ‘गेट आउट’। मंदिर को इस प्रकार से अपवित्र करने के कारण वहां का हिंदू समुदाय स्तब्ध है। इस प्रकार की धार्मिक असहिष्णुता का प्रदर्शन कोई पहली बार नहीं हुआ है। यह अमेरिका ही नहीं, अमेरिका के हमदर्द और साथी यूरोप के देशों में भी लंबे अरसे से जारी है। स्वास्तिक को ही लें तो एक लंबे अरसे से स्वास्तिक की महत्ता से, जो हिंदुओं में शांति-सुख-समृद्धि का प्रतीक है, नावाफिक होने के कारण इन देशों में असहिष्णुता का प्रदर्शन करते हुए स्वास्तिक पर प्रतिबंध की मांग उठती रहती है।

वस्तुत: स्वास्तिक का शुभ के प्रतीक चिन्ह के रुप में पूजन आज से ही नहीं, बहुत प्राचीन काल से ही मांगलिक कार्यों में प्रचलित है। यह बात इतिहास सिद्ध है। सिंधु घाटी की सभ्यता में इसका उल्लेख मिलता है। वे लोग सूर्य पूजक थे और स्वास्तिक सूर्य का प्रतीक माना जाता रहा है। मोहनजोदड़ो की एक मुद्रा पर एक हाथी स्वास्तिक के आगे झुका हुआ दिखाया गया है। यह भी धारणा है कि यह वेदों से भी प्राचीन है। ‘पद्म पुराण’ में वर्णित 16 चिन्हों में स्वास्तिक प्रमुख है। ई.पू. पहली शताब्दी की खण्डगिरी-उदयगिरी की रानी की गुफा में भी स्वास्तिक चिन्ह मिले हैं। ‘मत्स्य पुराण’ में मांगलिक प्रतीक के रुप में स्वास्तिक की चर्चा की गई है। पाणिनी के व्याकरण में भी स्वास्तिक का उल्लेख है। वेदों में प्रकाश, कल्याण, दीर्घायु आदि शब्दों के सूचक रुप में यह चिन्ह उल्लेखित है। वाल्मिकी रामायण में झंडे के वर्णन में स्वास्तिक का उल्लेख पाया जाता है।

पाली भाषा में स्वास्तिक को साक्षियों के नाम से पुकारा गया है। जो बाद में साखी या साकी कहलाए जाने लगे। जैन धर्म में स्वीकृत चौबीस चिन्हों में स्वास्तिक एक प्रधान चिन्ह है। स्वास्तिक चिन्ह की चार रेखाओं को चार प्रकार के मंगल का प्रतीक माना जाता है। वे हैं – अरहन्त मंगल, सिद्ध मंगल, साहू मंगल और केवलि पण्णतों धम्मो मंगल। यह नवकार मंत्र का बोध कराता है। महात्मा बुद्ध की मूर्तियों पर उनके चित्रों पर भी प्राय: स्वास्तिक चिन्ह मिलते हैं। इस प्रकार से स्वास्तिक को हिंदू यानी सनातनी, जैन एवं बौद्ध धर्मानुयायियों में समान रुप से अपनाया गया है। विदेशों में इस मंगल प्रतीक के प्रचार-प्रसार में बौद्ध धर्म प्रचारकों का बहुत बड़ा योगदान रहा है।
स्वास्तिक की उपस्थिति विभिन्न सभ्यताओं जैसे कि इजीप्शियन, मयान, एझटेक, इंका, नेटिव्ह अमेरिकन्स, रोमन्स, ग्रीक, चीनी, प्राचीन ट्रॉय में भी मिलती है और यह उन्होंने आर्यन भारत के वैदिक धर्म से प्राप्त किया है। रोमन स्वास्तिक से भली-भांति परिचित थे और उसे वह उनके सुप्रीम गॉड ज्यूपिटर का प्रतीक समझते थे। उसे वे असीमित रुप से मोजेक फ्लोर और समारोहों में मंदिरों की दीवारों, घरेलु उपयोग की वस्तुओं पर उपयोग में लाते थे। ग्रीक इसे पवित्र मानकर उनके सूर्य देवता अपोलो से इसे जोड़ते हैं। वियना स्थित ऐतिहासिक म्यूजियम में अपोलो देवता की रथारुढ़ मूर्ति की छाती पर स्वास्तिक अंकित है। स्वास्तिक को वे गैमेडियन व टेट्रास्केलियन कहते हैं। साइप्रस में देवताओं की मूर्तियों पर स्वास्तिक मिलता है। यहीं से यह मिस्र में आया।

अमेरिका में यूरोपीय लोगों के प्रवेश के पूर्व से ही स्वास्तिक प्रचलित था। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की कुछ आदिम जातियां स्वास्तिक को शुभ प्रतीक मानती हैं। जापानी इसे एक प्राचीन देवता मनजी के नाम से पुकारते हैं। यह वहां के बड़े मंदिरों और मठों में भी पाया जाता है। चीनी स्वास्तिक को ‘वान’ कहते हैं। प्राचीन चीनी फालन डाफा या गांग पांच स्वास्तिक प्रतीक रुप में उनके संगठन में आदर का पात्र है। श्रीलंका की प्राचीन मुद्राओं पर भी स्वास्तिक उत्कीर्ण है। प्राचीन पर्शिया (ईरान) में इस्लाम के आने के पूर्व स्वास्तिक चिन्ह का प्रयोग बहुत बड़े पैमाने पर होता था। आपको आश्चर्य होगा कि यह अहिंसक, परोपकारी प्रतीक इस्लामी मस्जिदों में भी पाया जाता है। ईरान की सफाह स्थित शुक्रवार मस्जिद में बहुतायत से सुंदर मोजेक प्रतीक विभिन्न स्थानों पर है और उनमें से कई सुंदर व रंगीन स्वास्तिक के डिजाईन वाले भी हैं।

लोग यह सोचते होंगे क्रिश्चिनिटी में स्वास्तिक के लिए कोई स्थान नहीं होगा। परंतु, स्वास्तिक एक लंबे समय तक क्राइस्ट के प्रतीक के रुप में रहा है। शुरुआती तीन ए.डी. में कहा जाता था कि स्वास्तिक क्रॉस का ही एक रुप है और जिन पर अत्याचार हुए उनकी एकता का प्रतीक है। रोम में इसे  Cru & Dissimulata कहते थे। क्यूंकि, उस समय ईसाई समाज अपने आपको गुप्त रखता था। उस समय तक जब छठी शताब्दी में रोम ने ईसाइयत को अपना अधिकारिक धर्म नहीं मान लिया। स्वास्तिक रोम में चर्च के गुम्बदों में सजावट के रुप में देखा जा सकता है।

स्वास्तिक अनेक संस्कृतियों, वंशों और धर्मों में व्यापक रुप से माइग्रेट होकर वैश्विक प्रतीक बन गया है। द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व लोगों का कम ध्यान आकर्षित करने वाला स्वास्तिक पश्चिमी देशों में सकारात्मक था और बहुतायत से शुभ कामना देने वाले ग्रीटिंग कार्डस पर कंपनियों द्वारा ‘लोगो’ के रुप में एवं प्रचार के लिए उपयोग में लाया जाता था। विश्व प्रसिद्ध कोका-कोला कंपनी ने 1925 में स्वास्तिक की आकृति वाली भाग्यशाली चेन वाली घड़ी बनाई थी। इस बात के भी प्रमाण मिलते हैं कि गुडलक के लिए जादुई शक्ति वाली वस्तु के रुप में ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोप के बहुत बड़े भाग में स्वास्तिक उपयोग में लाया जाता था। स्वास्तिक के पश्चिमी देशों में व्यापक उपयोग के कई उदाहरण दिए जा सकते हैं, जो स्थानाभाव के कारण मैं दे नहीं रहा हूं।

जूडाइज्म यानी यहुदीयत में भी स्वास्तिक उपस्थित है और उनके प्रार्थना स्थल ‘सायनागॉग’ में असीमित रुप से डेविड के स्टार जो यहूदियत का पवित्र चिन्ह है, के साथ उपयोग में लाया जाता है। पॅलेस्टाईन की खुदाई में स्वास्तिक कई वस्तुओं पर और गैलिली एवं सीरिया के प्राचीन सायनागॉग के गुम्बदों पर एवं रोम में भी पाया गया है। निष्कर्ष यह निकलता है कि स्वास्तिक को चाहने और उसकी पूजा करने वाले पूरी दुनिया में मिलते हैं। तो, फिर सवाल यह उठता है कि अमेरिका और यूरोप में स्वास्तिक का यह विरोध क्यों हो रहा है और कब से प्रारंभ हुआ, क्यों हुआ?

स्वास्तिक में एक दूसरे को काटती हुई दो साथी रेखाएं होती हैं, जो आगे चलकर फिर से मुड़ जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएं अपने सिरों पर थोड़ी सी मुड़ी हुई होती हैं। स्वास्तिक की यह आकृति दक्षिणावर्त कहलाती हैं और शुभ एवं प्रगति की द्योतक होती हैं। इसमें रेखाएं आगे की ओर इंगित करती हुई हमारी दायीं ओर मुड़ती हैं। वामावर्त स्वास्तिक में रेखाएं पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बांयी ओर मुड़ती हैं। इसे अशुभ समझा जाता है तथा इसी वामावर्त स्वास्तिक को हिटलर ने स्वयं एवं जर्मनों को असली आर्य बतलाकर अपनी नाजी पार्टी के झंडे पर (7 अगस्त 1920) अंकित किया था। इसका भी कारण था वह यह कि 1871 तक तो जर्मन एक देश के रुप में नहीं था और इसी अनुभूति को समाप्त करने के लिए जर्मन राष्ट्रवादियों ने 19वीं सदी में स्वास्तिक को उपयोग में लाना प्रारंभ किया।

इसी नाजी स्वास्तिक का विरोध नाजी आक्रमकता बतलाते हुए पश्चिमी देशों में जर्मनी के नेतृत्व में किया जा रहा है। इसकी पहल सन् 2005 और 2007 में भी यूरोपीय संघ कर चूका है, यह जानते हुए भी कि स्वास्तिक एक हिंदू शुभ चिन्ह है। लेकिन वहां के हिंदुओं के प्रबल विरोध के चलते वे इसे प्रतिबंधित करने में सफल नहीं हो सके हैं। वहां के हिंदुओं का कहना है कि स्वास्तिक को प्रतिबंधित करना ठीक वैसा ही है जैसा कि क्रॉस को प्रतिबंधित कर दिया जाए। इस संबंध में ब्रिटेन की दक्षिणपंथी पार्टी के नेता जेमी हंटमैन ने तर्क दिया था कि वे जानते हैं कि यह एक शुभ हिंदू चिन्ह है परंतु, एसेक्स कस्बे में चेम्सफोर्ड के कांउटी हॉल की दीवारों पर जहां उकेरा गया है वह कोई हिंदू मंदिर नहीं। यह उन लोगों की धार्मिक असहिष्णुता को नहीं तो और किस चीज को दर्शाता है।

अब हम अमेरिका पर आते हैं, तो अमेरिका में भी इसी असहिष्णुता का प्रदर्शन शिवरात्री के एक दिन पूर्व किया गया। इसके पूर्व भी हिंदू देवी-देवताओं के चित्र कभी जूतों पर तो कभी अंडरगारमेंट्स या कपड़ों आदि के अवांछित स्थानों पर चिन्हित कर उनका अपमान करने के प्रयत्न अमेरिका एवं पश्चिमी देशों में कई बार किए जा चूके हैं, जिसका विरोध वहां के हिंदू समुदाय के लोग समय-समय पर करते रहते हैं। 9/11 के समय भी निर्दोष भारतीय सिखों को अरब समझ कर उन पर बेवजह हमले किए गए थे। गुरुद्वारों को भी कई बार अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया आदि में निशाने पर लिया जा चूका है।

रंगभेद के मसले पर अभी हाल ही में कुछ माह पूर्व बोस्टन में हिंसा हो चूकी है। अश्वेत हिंसा की चपेट में शिकागो, न्यूयार्क, लास एंजिल्स आदि भी आ चूके हैं। नस्लीय भेदभाव तो आज भी वहां नजर आ जाना सामान्य बात है, जिसके शिकार हमारे कई सेलेब्रिटिज भी हो चूके हैं। इसके समाचार भी समाचार पत्रों में कई बार छप चूके हैं। अमेरिका में अश्वेतों के नागरिक अधिकारों के लिए मार्टिन ल्यूथर किंग को 12 वर्ष तक आंदोलन चलाना पड़ा जो उनकी हत्या 1968 में होने तक सतत चलता रहा, जबकि भारत ने तो समानता एवं धार्मिक सहिष्णुता के सिद्धांत को सन् 1952 में ही संविधान द्वारा स्वीकार लिया था। धार्मिक सहिष्णुता तो हमारे आचरण में प्रारंभ से ही है और इसकी सीख हिंदुओं को किसी ने देने की आवश्यकता तो कतई नहीं है। आश्चर्य की बात है कि इतना सब होने पर भी अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा हमें ही सहिष्णुता का पाठ पढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

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