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तुम नहीं तो कोई और सही…

तुम नहीं तो कोई और सही…

By प्रेमपाल सिंह वाल्यान

यूरोप के एक शहर से एक आशाहीन लड़की आधी रात में नई दिल्ली के इन्दिरा गांधी हवाई अड्डे पर पहुंचने वाली है। वहां उसका स्वागत करने के लिए उसके भाई मौजूद हैं, जो उसे हरियाणा के अपने शहर में ले जायेंगे। वहां उनके द्वारा तैयार किया एक दूल्हा उस लड़की का इंतजार कर रहा है जिससे वो कभी नहीं मिली। आखिरी समय में गुप्त रूप से वह अपने ब्वॉयफ्रेंड के पास दिल्ली में खबर पहुंचाती है। उसका दोस्त कुछ खास प्रभावकारी पत्रकारों के पास जाता है जो यह पुख्ता करते हैं कि उसके भाई कहां पर हैं। जब वह यान से उतरती है तो उसका ब्वॉयफ्रेंड उसे एक गुप्त रास्ते से बाहर निकाल ले जाता है। पत्रकारों द्वारा सुबह को ही लड़की व लड़के को तेजी से एक बरसाती में भेज दिया जाता है, जहां वो सब अपनी चिंताओं को बांटते हैं। बाद में उन्हें आर्य समाज मन्दिर में ले जाया जाता है, जहां वे एक दूसरे को वरमाला पहनाते हैं और फिर छिप कर वहां से निकल जाते हैं।

आपको यह कहानी बिल्कुल फिल्मी लगी होगी? डरी हुई दुल्हन, बुरी तरह पिटा हुआ दूल्हा, आधी रात का बचाव कार्यक्रम, भागकर शादी, यह सब कुछ बॉलीवुड प्रेम कहानी का भाग लगता है। लेकिन, मैं यहां आपको बता रहा हूं कि ये सब हुआ, क्योंकि मैं एक उत्साही अकेला बराती-घराती वहां था।

मैं उन वर्षों की सोच को याद करता हूं जब भागने की प्रक्रिया में एक भयंकर बॉलीवुड कहानी बनती थी। उसमें सब कुछ होता था। सिर से पांव तक प्रेम में डूबे प्रेमी, भयंकर विरोध, दर्दनाक जुदाई व आनंदमय दोबारा जुड़ाव। भले ही हम सब वो लड़की या लड़का ना हों, जो भागकर मिले, लेकिन हम उन्हें जानते हैं, क्योंकि हमने उन्हें या उनके जैसों को स्क्रीन पर देखा है। पिछले हफ्ते एक बीस साल के युवक ने मुझे बताया कि उसने जो किया उसे बदला नहीं जा सकता। ये बहुत अविश्वसनीय है।

प्यार अविश्वसनीय होता है। यह पागल व गहरी भावनाओं ये जुड़े प्रेमियों को बहाती है और बॉलीवुड के रोमांस को व्यापार में लाती है। क्या हिन्दी फिल्म नि20-12-2014र्माता क्लासिक प्रेम कहानियां बनानी भूल गए हैं या फिर ये फिल्में सौदाबाजी नहीं कर पाती, क्योंकि कोई भी अब इन फिल्मों को नहीं देखना चाहता है?

ये सभी सबूत केवल दिखावा करते हैं, लेकिन इनसे अनुमान सिद्ध करना मुश्किल है। पिछले दशक के बारे में सोचो व किसी भी एक नन रोमांटिक फिल्म का नाम बताओ जिसमें युवा प्रेमियों ने आग ना लगा दी हो। इसके केवल इतने चांस हैं कि मैं या आप केवल अंगुलियों पर इनके नाम या सीन बता पायेंगे। देव डी में अभय धूल भरे रास्तों में रहते हैं, बहुत सारा वोदका पीते हैं और अपने प्यार में खोए रहते हैं। ऐसे ही चित्रांगदा शाइनी व के.के. के लिए बारी-2 से तड़पती है, हजारों ख्वाहिशें ऐसी में। जब वी मेट में शाहिद अपनी प्रेमिका का नाम लेता है, याद करता है, दावा करता है, करीना को छोड़ देता है। निश्चित रूप से आपको कुछ और भी फिल्में याद होंगी, लेकिन ये सब वो फिल्में हैं जो भावनाओं को जगाते हैं, तड़पाते हैं, मुंह सूखा देते हैं, दिल की धड़कन बढ़ा देते हैं, घुटनों को आपस में रगड़वा देते हैं – मतलब वो सब कुछ, जिससे दो लोग प्यार में पड़ते हैं व सदा एक दूसरे के साथ रहना चाहते हैं।

इनमें से किसी भी फिल्म से हम क्लासिक प्रेम को पूर्णतया नहीं दर्शा सकते (केवल जब वी मेट को छोड़कर, क्योंकि इसमें ऐसा कुछ है), जिससे इसे नायक वाली बात या मध्य में खड़ा किया जा सके और अन्य सब चीजों को अलग किया जा सके। अब तो दो के प्रेम को दर्शाने की बजाए पता नहीं क्यों प्रेम त्रिकोण को दर्शाया जाने लगा है। तीन लड़के जिनके पास तीन लड़कियों का मुकाबले करने को बहुत कुछ है। तीन लड़के जो पुरानी प्रेम कहानियों को बताते हैं, गंदे बाथरूम आपस में शेयर करते हैं, गन्दे चुटकुले सुनाते हैं और भी बहुत कुछ। इन लोगों की तीन बेहतर लाइनें होती हैं। वो चमक में हैं। उनकी महिला मित्र, जिनके साथ इन्होंने एक समय बिताया था, बाद में उन्हें बद दुआ देते हैं। हां ये होता है वहां ‘ब्रो’ होता है। अब ergo और bromance नए तरह के रोमांस हैं। जैसे प्यार का पंचनामा। उन्हें लगता है कि अपनी जिंदगी जीने के लिए सबसे जरूरी है अपनी प्रेमिकाओं को वापस पाना। लेकिन ऐसा लगता है कि वो लोग उन्हें ज्यादा समय देने की बजाए अपने मूड व इच्छा से काम करते थे। वे अपने लक्ष्य के प्रति एकल मस्तिष्क हैं। इनके मुकाबले लड़कियां कुछ बेहतर स्नेह मांगने वाली व जिद्दी खरीददार हैं।

वो तीनों गंदे फ्लैटमेट बॉलीवुड डिजाइनर का बनने का सपना देखते हैं डेल्ही बेली में? केवल एक स्त्री चरित्र, जिसने कुछ ऐक्शन किया है, को छोड़कर लड़के केवल दौड़ रहे हैं। ठीक इसी तरह से जिंदगी ना मिलेगी दोबारा में देखा जा सकता है। इसमें फरहान व रितिक के बीच हल्की-फुल्की हंसी-ठिठोली है, जिसे अभय देखता रहता है, क्योंकि एक की लड़की को दूसरा भगा ले जाता है। लेकिन, दोस्तों के बीच लड़की का क्या काम? यहां वो त्रिकोण बनाने की कोशिश करते हैं। चाहे वो ट्रिप, गंभीर चुंबन हो या सलाद उछालना। इस फिल्म में युवा होते लड़कों को वापस उनके अंदर के लड़के के पास जाते दिखाया है न कि बाहर की लड़की के।

ये तीनों लड़के दस साल पहले बनी फिल्म दिल चाहता है के तीनों लड़कों की तरह हैं। उस फिल्म में रोमांस था, परन्तु उन लड़कियों की तरफ भी देखिए। उनमें से एक चुहिया है जो अपने मंगेतर का इंतजार करती है कि वो उसे बताए कि उसे उठना है या बैठना है। दूसरी बर्ड ब्रेन है, जिसे एक बेवकूफ के साथ जाने में कोई परेशानी नहीं है। एक उम्रदराज महिला जिसका अंत बहुत बुरा होता है परंतु वह अक्षय खन्ना को एक पंक्ति दे जाती है कि वो सदा जाना जायेगा कि वो उसके लिए केक लेने कितनी दूर गया था। उस लड़की को नोट मत कीजिएगा जो उसे रेट्रो बॉलीवुड गाने तक ले गई थी। रेट्रो सच में एक याद रखने लायक चीज है। हिन्दी सिनेमा में ब्रोमांस सामान्य हो। एक राष्ट्र, जिसकी जनता लंबे समय से समूह के रूप में बह रही है या दो व्यक्ति हथियारों के साथ एक दूसरे के कंधे पर हाथ रखकर घूम रहे हैं। बॉलीवुड में सदैव ही एक या दो केन्द्रित डरावने आदमी होते हैं। मनमोहन देसाई ने ऐसा नहीं कहा, परन्तु किसी ने कहा था कि अमर अकबर एन्थोनी हिन्दी सिनेमा का सबसे मशहूर ब्रोमांस नहीं है। मनमोहन देसाई की फिल्मों में सभी पुरूष पात्रों के आस-पास स्त्रियों के प्रति दिखाई गई कॉमेडी यादगार है।

जब आमिर और सलमान कयामत से कयामत तक और मैंने प्यार किया से युवा प्रेम को वापस लाए तब 70-80 दशक की मांसल मूवी का उद्योग नया रोमांस खोज चुका था। जो कुछ भी इन्होंने किया, परन्तु जो भी लड़की इन्होंने ढूंढी वो नई खोज बन गई। जब इस सकारात्मकता में शाहरूख ने नकारात्मकता लाने की कोशिश की तो वो एक नया पल आ गया। उन्होंने दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे में सिर झुकाकर लड़की के पिता से उसका हाथ मांगा। वह एक ऐसे प्रेमी के रूप में दिखे जो अपने प्यार के लिए कुछ भी कर सकता था।

आज के समय में ‘केक के लिए कुछ भी करेगा’ प्रेमियों को गुमान है कि वो ‘मर जाऊंगा मिट जाऊंगा’ टाइप नहीं है। अब समय बदल गया है। प्यार के लिए कोई मरना नहीं चाहता है। ‘तुम नहीं तो कोई और सही’ यही सब आज की रोमांटिक कॉमेडी से नजर आता है, जहां प्रेम की आज्ञा तो है परंतु यह पिंजरे में बंद है। आज का समय काम करने का है जिसमें सभी यह देखते हैं कि वो आराम से है या नहीं। प्यार? क्या प्यार? हाल ही के पुराने चलन पर लोटे एक्शनर पुख्ता करते हैं कि क्लासिक प्रेम कहानियां गहराई में दफन हो गई हैं। रेडी व सिंघम के अजय और सलमान दोनों ही के साथ की लड़कियां उनसे उम्र में आधी हैं। लड़कियां लड़कों से ज्यादा जरूरी नहीं हैं। यह आज भी बॉलीवुड का सच है। एक पूर्ण रोमांस के लिए सिक्स पैक बिल्डअप माचो हीरो की जरूरत है। इससे ज्यादा और क्या चाहिए? आज हम यही देख रहे हैं। पुरूष प्रधान फिल्में हैं। रोमांटिक कॉमेडी में लड़की व लड़का एक ही सेक्सुअलाईज्ड स्पेस में मजाक कर रहे हैं।

इस भागते हुए पैटर्न पर पवित्र भावनाओं का ध्यान कहां रखा गया है, जिसे जानने व पहचानने की जरूरत है। इस समय हमारे सामने कोई रहस्य नहीं है, क्योंकि केवल एक माउस क्लिक करने से हमारे सवालों से भी ज्यादा इतिहास खुल जायेगा। जो अंतरंगता प्रेमी करते हैं उससे लगता है उनके बीच की ऑक्सीजन खत्म होने से उनकी सांस उखड़ रही हैं। यह असामान्य लगती है। मणिरत्नम की दिल से में दो ना भूलने योग्य दृश्य आज भी हैं। एक में जब शाहरूख और मनीषा छत के स्वींग दरवाजे के पीछे हैं व दूसरे में छत के नीचे हैं। इन दो लोगों के लिए संसार धुंधला हो गया है। कुछ पीछे सिलसिला में अमिताभ व रेखा का उबलता हुआ दृश्य। प्यासा में गुरूदत्त वहीदा का हाथों में हाथ डालकर चलना। अब हमारी फिल्मों में से छिपना-छिपाना खत्म हो गया है। टेक्नोलॉजी का दावा करने वाले बस बचने की जगह चाहते हैं और ये नहीं बताते कि इस कूल प्रभाव ने सच्चे प्यार को सदा के लिए कहीं खो दिया है। अब आने वाले समय में शाहिद व सोनम एक दूसरे के लिए तरसते हुए दिखाये जायेंगे। इसलिए मैं कहता हूं कि ऐसी फिल्में बनाओ जिनमें नायक, नायिका के दिल से दिल मिल सकें तथा दर्शकों के दिल धड़क सकें। आखिर फिल्में होती किस लिए हैं।

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