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जिसने की शर्म उसके फूटे कर्म

जिसने की शर्म उसके फूटे कर्म

शर्म नाम की चीजें हमारे देश से लुप्त होती जा रही है। यह तो अच्छा लक्षण है। राजनीति के लोगों के लिए तो यह बहुत अच्छी चीज है। यदि राजनीति के लोग जरा-जरा सी बात पर दु:खी और शर्मिंदा होने लगेंगे तो काम कैसे चलेगा।  अगर छोटी-छोटी बात पर हमारे राजनीति के महारथी मुंह छुपा कर घर की चारदीवारी में ही अपने आप को स्वयं ही घर में बंदी बनाने लगे तो हो गयी समाजसेवा और देशभक्ति।

यदि कोई नेता छोटी-छोटी बात पर दु:खी होने लगेगा तो वह देश सेवा क्या खाक करेगा? राजनीति में गाली दी भी बहुत जाती है और खाई भी बहुत। इसलिए बड़ा दिल रखना पड़ता है। गाली को तो ऐसे डकारना चाहिए जैसे अपनी फेवरेट दाल भाजी। लोग काले झंडे दिखाएंगे। फूलमाला के स्थान पर आप पर टमाटर, अण्डे फेंकेंगे। कई तो जूते भी फेंकने लगे हैं। जूतों का हार पहनाने का प्रयास करते हैं। इसलिए राजनीतिज्ञ को तो बड़ा दिल रखना होगा। उदारवादी बनना होगा। विरोधियों का हर मोर्चे पर मुकाबला करना होगा, कुछ भी हो जाये उनपर विजय तो हर सूरत में पानी ही होगी ,हर बड़ी से बड़ी कुर्बानी देकर भी।

अब वह दिन दूर हुए जब नेता लोग मात्र संदेह या किसी द्वारा आरोप लगाने पर ही पद त्याग देते थे हालांकि अभी कोई जांच भी न हुई होती, आरोप तो साबित होना दूर की बात थी। तब कहते थे कि वह नैतिकता के आधार पर और अपनी अंतरात्मा की आवाज पर ऐसा कर रहे हैं। कहां लिखा है कि राजनीति में नैतिकता नाम की भी कोई चीज होती है? आत्मा तो हर प्राणी में होती है पर यह अंतरात्मा क्या होती है? राजनीति में तो यह वस्तु पाई नहीं जाती। या यूं कहा जा सकता है कि ज्यों ही कोई व्यक्ति राजनीति में प्रवेश करता है, उसकी आत्मा तो रहती है पर अंतरात्मा बाई-बाई कर जाती है। अब तो राजनीतिज्ञ यह कहते हैं कि अभी तक तो केवल आरोप हैं जो सिद्ध नहीं हुए हैं। जब तक कोई अदालत उन्हें दोषी नहीं ठहराती तब तक वह निर्दोष हैं। जब कोई अदालत उन पर आरोप लगा देती है तो कहते हैं अभी फैसला नहीं सुनाया। जब निचली अदालत उन्हें दोषी करार दे कर सजा सुना देती है तो कहते हैं, अभी उच्चतम न्यायालय पड़ा है। वह जब निर्णय देगा तभी अंतिम होगा। यदि वह भी दोष और सजा बनाये रखे तो कहते हैं कि वह जनता की अदालत में जायेंगे जो सबसे बड़ी होती है।

शर्म नाम की बात तो राजनीतिक नेता को भूल ही जानी चाहिए। ठीक ही तो लोग कहते हैं, विशेषकर पंजाब में कि जिसने की शर्म, उसके फूटे कर्म (भाग्य)। यह भी कहते हैं कि शर्म तो आने-जाने  वाली चीज है, आदमी को बेशर्म होना चाहिए।

हमारे नेतागण ने भी यही अच्छी आदर्शवादी सीख ले ली है। चाहे उनके घर पुलिस आये, चाहे उनके घर आयकर  विभाग छापा मारे, प्रवर्तन निदेशालय संपत्ति  को जब्त कर ले, वह तो पुलिस की हिरासत में सीना तान कर  हँसते-मुस्कराते , दो उंगलियों से विजय का संकेत इस प्रकार देते जाते हैं मानो  कोई फौजी अफसर दुश्मन पर विजय प्राप्त कर लौटा हो और अब वह दूसरे मोर्चे पर विजय के लिए जा रहे हों।

जब पत्रकार उनसे प्रश्न करते हैं तो वह तो बड़े दम-खम से कह देते हैं कि यह सब उनके सत्तासीन विरोधियों की चाल है। हमने कुछ नहीं किया है। हम निर्दोष हैं। हमें न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास है। हम उनके मंसूबे विफल कर निकलेंगे। उनके सारे षड्यंत्रों को विफल कर रख देंगे। यह सब मामले राजनीति से प्रेरित है। चरित्रहरण का एक भौंडा प्रयास। उनके विरुद्ध आरोप झूठे और निराधार हैं।  अभिमन्यु तो कौरवों द्वारा बिछाए गए चक्रव्यूह से नहीं निकल पाया था, पर हम कर के दिखा देंगे। चाहे वह हिमाचल के पूर्व मुख्य मंत्री राजा वीरभद्र सिंह या बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री व पूर्व केंद्रीय मंत्री लालू प्रसाद यादव, उनके भाषा और तर्क एक ही हैं। लालू जी ने तो 70 के दशक में जाननायक जयप्रकाश नारायण के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया था। क्या विडंबना है कि आज लालूजी को भ्रष्टाचार के आरोपों में ही अब तक चारा घोटाले के तीन मुकदमों में 13 साल और छह महीनों व लाखों रुपये का जुर्माना हो चुका है। अभी और कुछ मामले अदालत के विचाराधीन हैं।

यही नहीं। भारत एक है और उसके नेता भी एक हैं। नेता कोई भी हो, किसी पार्टी का हो, किसी प्रदेश का हो। उसकी भाषा अलग हो सकती है, पर जब उस पर कोई मामला बनता है तो सब की भाषा एक हो जाती है। कोई नहीं मानता कि उसने कोई गलती की है। कोई अपना कसूर नहीं मानता कि उसने जाने-अनजाने में कोई कसूर किया है। सारा दोष सब अपने विरोधियों, विशेषकर सत्ताधारी दल के सिर मढ़ देते हैं। यही उदगार आजकल पूर्व केंद्रीय मंत्री पी सी  चिदंबरम बोल रहे हैं। वह कहते हैं कि उनपर और उनके पुत्र पर सरकार की सारी कारवाई उनकी जुबान बंद करने के लिये हैं, सरकार के विरुद्ध लिखने पर उनकी कलम को रोकने के लिए की जा रही हैं। उन्होंने जोर देकर दोहराया कि कोई उनकी जुुबान पर रोक लगा सकता है और न उनकी लेखनी पर ही।

लालूजी ने कब स्वीकार किया था कि उन्होंने कोई अपराध किया हैं पर फिर भी अदालत ने उनको तीन मामलों में सजा सुना दी।

वैसे ऐसे दलेर लोग केवल राजनीति में ही नहीं होते। अन्य व्यवसायों में भी पाए जाते हैं। एक महानुभाव ऐसे थे कि कभी अफसर नाराज भी हो जाये तो वह कभी नहीं कहते थे कि वह नाराज होकर उसे भला-बुरा सुना रहा था। उलटे कमरे से हंसते हुये निकलते और कहते कि अफसर उसकी बड़ी तारीफ कर रहा था। मुझे और देर बैठने को कह रहा था। कह रहा था कि बैठ दोनों इक_े चाय पीते हैं। मैंने कहा, सर इस समय रहने दीजिये फिर कभी। इस समय आपके पास काम भी बहुत हैं और कुछ लोग आपसे  मिलने को भी बैठे हैं। फिर कभी फुर्सत में सही।

एक व्यक्ति एक प्रदेश सचिवालय में काम करते थे। अपने काम के लिए एक सीमेंट बनाने वाली कंपनी के एक अधिकारी उसके पास अक्सर आते रहते थे। वह उनका काम तुरंत कर देता था। उसके इस व्यवहार से खुश होकर उसने उस व्यक्ति को उसकी बीवी के नाम पर सीमेंट की एजेंसी दे दी। उस व्यक्ति की किसी ने शिकायत कर दी कि उसने अपने प्रभाव का गलत उपयोग कर अपनी बीवी के नाम एक एजेंसी ले रखी है। उसके अधिकारियों ने उसे नोटिस दे दिया कि वह तुरंत अपनी एजेंसी कैंसिल करवा दे वरना उसके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जाएगी।

वह व्यक्ति भी कोई मुंह छुपाने वाला डरपोक न निकला। उसने  विभाग को अपने स्पष्टीकरण में लिखा कि मेरी बीवी ने मेरी बात मानने से इंकार कर दिया है। वह मुझसे बोली कि वह घर की बेटी हैं। वह कहती है कि मेरा वेतन बहुत थोड़ा है और वह उससे सारे घर कर खर्च नहीं चला सकती। इसलिए एक ही रास्ता है। मैं उसे तलाक दे दूँ। पर मेरी उम्र अभी जवान है। मैं पत्नी के बिना जीवन नहीं बिता सकता, इसलिए मुझे दूसरी शादी करनी पड़ेगी। पर मैं एक गरीब आदमी हूँ जो यहाँ सहायक के रूप में सेवा कर रहा हूँ। इसलिए यदि मेरा विभाग मेरी दूसरी शादी का खर्च वहन करने को तैयार हो जाये तो मैं अपनी बीबी को तलाक देने को तैयार हूँ।

विभाग को ही शर्म आ गयी। उसने उस  व्यक्ति को कोई उत्तर न दिया।  विभाग को ही शर्म आ गयी कि उसने ऐसा नोटिस ही जारी क्यों किया। उसके स्थान पर कोई व्यक्ति होता तो वह दर-दर ठोकरे खाता। मिन्नतें करता कि उसकी नौकरी बचा दो। जगह-जगह नाक रगड़ता फिरता।

इसी प्रकार एक और कर्मचारी था, उसकी पत्नी ने एक प्राइवेट स्कूल चला रखा था पर उसने अपने विभाग को कुछ नहीं बताया था। उसे भी विभाग ने नोटिस भेज दिया कि वह बताये कि उसकी बीवी ने व्यवसाय चला रखा है। उसने विभाग को उत्तर दिया कि वह प्रात: 8 बजे घर से निकल जाता हैं अपनी ड्यूटी से शाम को घर  लौटता है। उसे नहीं पता कि उसकी बीवी उसकी गैरहाजिरी में क्या करती है, मैं उससे पूछ कर बताऊंगा। चार-छ: महीने बीत गए। विभाग ने उसे याद दिलाया तो उसने उत्तर दिया कि उसकी बीवी धार्मिक यात्रा पर चली गयी है। उसके लौटने पर पूछ कर बताऊंगा। छ: महीने बाद भी जब उत्तर न मिला तो विभाग ने उसे सूचना भेजने के लिए याद दिलाया। तब उस कर्मचारी ने उत्तर दिया कि उसकी बीवी उसे कुछ नहीं बताती। विभाग स्वयं ही सीधे उस से जानकारी प्राप्त कर ले। विभाग निरुत्तर हो गया।

ठीक ही तो है। अगर इन  महानुभावों ने भी शर्म की होती तो उनके भी कर्म (भाग्य) फूट ही जाता।

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