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राजस्थान में ‘महारानी’ की नाक कटी

राजस्थान में ‘महारानी’ की नाक कटी

राजस्थान से कांग्रेस मुक्त संसद की तस्वीर का सपना संजोये सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को अजमेर, अलवर लोकसभा एवं भीलवाड़ा जिले की माण्डलगढ़ विधानसभा सीट के लिए सम्पन्न उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशियों की भारी भरकम जीत से करारा धक्का लगा है। राजनीतिक क्षेत्र में इस उपचुनाव के नतीजों को साल के आखिर में पन्द्रहवीं विधानसभा के होने वाले चुनाव के संदर्भ में सत्ता का सेमीफाइनल माना गया है। इसी का नतीजा है कि भले ही इस उपचुनाव का दायरा अजमेर, अलवर जिले तथा भीलवाड़ा जिले के माण्डलगढ़ तक सीमित था, लेकिन कांग्रेस राजस्थान में जश्न में डूब गई तो भाजपा इस अप्रत्याशित पराजय को लेकर आत्मचिंतन की मुद्रा में है। अब तो सत्ता के फाइनल की चर्चा शुरू हो गई है।

लोकसभा की यह दोनों ही सीटें तथा विधानसभा की एक सीट भाजपा के पास थी। अजमेर लोकसभा क्षेत्र से निर्वाचित सांवर लाल जाट अलवर से चुने गये महंत चांदनाथ और माण्डलगढ़ की विधायक कीर्ति कुमारी के निधन के कारण उपचुनाव के लिए 29 जनवरी को मतदान एवं एक फरवरी को मतगणना हुई। वर्ष 2014 के चुनाव में राज्य की सभी 25 लोकसभा सीटें भाजपा की झोली में गई थी। मार्च 2018 में राज्यसभा में कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी और नरेन्द्र बुढ़ानिया का कार्यकाल खत्म होने और विधानसभा में भाजपा के प्रचण्ड बहुमत के चलते संसद के दोनों सदनों में राजस्थान से कांग्रेस का प्रतिनिधित्व समाप्त हो जाता। लेकिन अलवर, अजमेर से निर्वाचित संासदो के निधन से रिक्त स्थानों के उपचुनाव में चौकाने वाले नतीजों के साथ भाजपा का यह सपना टूट गया। अजमेर से कांग्रेस के डॉ. रघु शर्मा ने भाजपा के रामस्वरूप लाम्बा को 84 हजार से अधिक मतों से अलवर में कांग्रेस के करण सिंह यादव ने श्रम मंत्री जसवंत सिंह को एक लाख 96 हजार से ज्यादा वोटों से पराजित किया। माण्डलगढ़ से कांग्रेस के विवेक धाकड़ विजयी हुए।

33पिछले साल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के जयपुर संगठनात्मक प्रवास में ”बूथ जीता तो चुनाव जीताÓÓ के मूल मंत्र को अंगीकार करते हुए दौ सौ सदस्यीय विधानसभा में 180 सीटें और लोकसभा की सभी 25 सीटें जीतने का संकल्प तथा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के कुशल नेतृत्व में राज्य के चहुंमुंखी विकास के दावे के साथ चुनावी सफर के लिए निकली भाजपा उपचुनाव की बाधा दौड़ जीतने में नाकामयाब रही। पिछले विधानसभा चुनाव में 163 सीटों के प्रचण्ड बहुमत से दुबारा सत्ता में लौटी वसुंधरा राजे को जोर का झटका धीरे से तब लगा जब लोकसभा चुनाव में भाजपा के चार विधायकों के निर्वाचन से रिक्त हुई सीटों में से कांग्रेस ने तीन स्थान झटक लिये। धौलपुर से निर्वाचित बसपा विधायक को एक प्रकरण में जेल होने से वसुंधरा राजे ने उनकी पत्नी शोभारानी को भाजपा से चुनाव लड़ाकर उपचुनाव जीतने के साथ कांग्रेस के मंसूबो पर पानी फेरा और अपने विरोधी खेमे की बोलती बंद कर दी। और अब सत्ता की चुनावी दौड़ से पहले ही प्रमुख प्रतिपक्ष कांग्रेस ने भाजपा के समक्ष कड़ी चुनौती के साथ खतरे की घंटी बजा दी है। उपचुनाव में मिली जीत से सत्ता की दौड़ में मनोवैज्ञानिक बढ़त का गणित कांग्रेस के पक्ष में है। वसुंधरा मंत्रिमण्डल में श्रम मंत्री डॉ. जसवंत सिंह अलवर संसदीय क्षेत्र में अपने निर्वाचन क्षेत्र बहरोड़ से भी बहुमत नहीं जुटा सके। अलवर, अजमेर तथा मांडलगढ़ के सभी 17 विधानसभा क्षेत्रों में जीत के लिए मंत्रियों को जिम्मेदारी सौंपी गई थी। नतीजों के गणित ने मंत्रियों की कुर्सी के साथ विधायकों के टिकट पर भी तलवार लटक गई है। सत्तारूढ़ भाजपा अब हार के कारणों का विश्लेषण करेगी लेकिन उसे फिलहाल पांच फरवरी से आरम्भ होने वाले विधानसभा के बजट सत्र में कांग्रेस के नये तेवर से जूझना होगा। वसुुंधरा राजे के नेतृत्व को सीधी चुनौती देने वाले भाजपा के वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवारी दीनदयाल वाहिनी के मंच पर उपचुनाव में भाजपा की पराजय को लेकर वसुध्ंारा राजे को बधाई दे चुके है। वह नई पार्टी बनाने की जुगत में है और इसके लिए निर्वाचन आयोग में आवेदन किया गया है।

उपचुनाव के नतीजो पर व्यंग्यात्मक शैली में कहा गया कि रघुकरण ने धाकड़ चुनाव जीता। यानि अजमेर से डॉ. रघु शर्मा, अलवर से डॉ. करण सिंह और मांडलगढ़ से विवेक धाकड़ विजयी हुए। यह भी कहा गया कि अशोक गहलोत की गुगली ने भाजपा को उलझा दिया तो कांग्रेस के धाराशायी विमान को ‘पायलटÓ ने उड़ा दिया। कांग्रेस ने भाजपा को क्लीन बोल्ड कर दिया। भाजपा की जाजम हवा में उड़ गई। पार्टी और सरकार के नेतृत्व पर सवालिया निशान खड़े होने लगे है।

राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि धौलपुर उपचुनाव को भाजपा सरकार  के प्रति जनमत संग्रह का प्रतीक मानने वाले सचिन पायलट ने पार्टी संगठन की मजबूती के साथ कांग्रेसजनों को सरकार की घेराबंदी के लिए सड़कों पर उतारने में जी जान लगा दी। कांग्रेस के प्रभारी महासचिव अविनाश पांडेय ने खेमेंबाजी में बटी कांग्रेस को एकजुट किया। कांग्रेस प्रत्याशियों के नामांकन के समय प्रदेश कांग्रेस से जुड़े सभी बड़े छोटे नेताओं को एक मंच पर लाने से कार्यकर्ताओं को संदेश मिला। पड़ोसी राज्य गुजरात विधानसभा में कांग्रेस को मिली सफलता से उत्साहित कांग्रेस को उपचुनाव की जीत से प्रदेश मे संजीवनी मिल गई है और वह सत्ता में लौटने के मंसूबे पाल रही है। अजमेर में भाजपा को सहानुभूति लहर का फायदा नहीं मिल पाया। दिवंगत सासंद सांवरलाल के पुत्र रामस्वरूप लांबा को कांग्रेस के रघु शर्मा ने 84 हजार से अधिक मतों से पराजित किया। पिछले चुनाव में तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री और अभी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट एक लाख 71 हजार से अधिक मतों से पराजित हुए थे। संसदीय क्षेत्र में केकड़ी विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित रघु शर्मा गहलोत सरकार के सरकारी मुख्य सचेतक रहे थे। वह विधानसभा का पिछला चुनाव हार गये थे लेकिन इस बार उन्होंनें इसी क्षेत्र से सबसे अधिक बढ़त ली है। वर्ष 1952 के पहले आम चुनाव में अजमेर दो सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र था। अजमेर उत्तर से कांग्रेस के ज्वाला प्रसाद शर्मा और दक्षिण से मुकुट बिहारी भार्गव 17 हजार से अधिक मतों के अंतर से जीते थे। भाजपा के रासा सिंह रावत पांच बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके है। सचिन पायलट पहली बार जीते और मंत्री बने लेकिन दूसरी बार हार गये। अजमेर क्षेत्र मे पहली बार उपचुनाव हुआ जिसमें जाट एवं ब्र्राहा्रण प्रत्याशी का मुकाबला हुआ।

अलवर में पिछली बार भाजपा के महंत चांदनाथ ने पूर्व केन्द्रीय मंत्री भंवर जितेन्द्र सिंह को 2 लाख 83 हजार से अधिक मतों से पराजित किया। अब कांग्रेस के करण सिंह यादव ने श्रम मंत्री डॉ. जसवंत सिंह यादव को एक लाख 96 हजार से अधिक मतों के अंतर से परास्त किया। दोनो यादव एक-एक बार लोकसभा में अलवर का प्रतिनिधित्व कर चुके हंै। दिलचस्प बात यह रही कि इस उपचुनाव के यादवी संघर्ष में प्रत्याशियों का चेहरा प्रमुख रहा। गहलोत सरकार में बीस सूत्री कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति के उपाध्यक्ष रहे डॉ. किरण सिंह यादव को कांग्रेस ने काफी पहले उम्मीदवार घोषित कर दिया था जिस कारण उन्होंनें प्रचार में बढ़त ले ली थी। जबकि उहापोह में रही भाजपा ने नामांकन की अवधि खत्म होने से महज तीन दिन पहले उम्मीदवार का नाम घोषित किया। प्रथम आम चुनाव से 1972 तक हुए चुनावों में अलवर की सीट पर गैर यादवों का दबदबा रहा। आपातकाल के बाद 1977 से अब तक हुए 11 चुनावों में 8 बार यादव प्रत्याशी विजयी हुए। दो राजपूत व एक ब्राहा्रण प्रत्याशी जीतें।

भीलवाड़ा जिले की मांडलगढ़ सीट का कई बार प्रतिनिधित्व कर चुके पूर्व मुख्यमंत्री स्व. शिवचरण माथुर ने दिवंगत विधायक कीर्तिकुमारी को महज 859 वोटों से हराया था। कांग्रेस के प्रदीप कुमार से वह डेढ़ हजार मतों के अंतर से पराजित हुई। पिछले चुनाव में कीर्ति कुमारी विवेक धाकड़ को 18540 मतों से हराकर पहली बार निर्वाचित हुई। उपचुनाव में कांग्रेस के विवेक धाकड़ ने जिला प्रमुख भाजपा प्रत्याशी शक्तिसिंह हाड़ा को 12 हजार 976 मतों से हराया। कांग्रेस के बागी गोपाल मालवीय ने वोट लेकर मुकाबले को त्रिकोणात्मक बना दिया था। मालवीय को चुनाव मैदान से हटाने की कांग्रेस की सारी कसरत बेकार रही और उनके डटे रहने से भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने से कांग्रेस को फायदा मिला।

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