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हुस्न की अदायगी में अश्लीलता का बीज

हुस्न की अदायगी में अश्लीलता का बीज

By सुधीर गहलोत

दर्शकों का मानना है कि जो उनके सामने परोसा जाएगा, खाने का विकल्प भी उसी में से चुनना होगा। एक समय बाद वही चीजें पसंद बन जाती हैं।झिनी सफेद साड़ी में झरने में नहाती नायिका के सौंदर्य को मर्डर में मल्लिका सेहरावत के थरथराते बदन की कंपन तक बढ़ाया गया और अंतत: सनी लियोन तक लाकर, एक खास वर्ग के दर्शकों की पूरी फौज तैयार कर ली गई।

मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए… के कानफोड़ू संगीत पर युवा थिरक रहे थे। धुएं से भरे कमरे का दमघोंटू माहौल में लहराती हुईं युवतियों में मलाईका अरोड़ा को पछाडऩे की होड़-सी लगी थीं। मरियल-सा एक युवक बांस के डंडे जैसे अपने शरीर में टंगी टी-शर्ट में चश्मा फंसाकर सलमान बनने का असफल प्रयास कर रहा था। उससे कुछ कदम की दूरी पर अभी-अभी महानगर में कदम रखने वाला ग्रामीण पृष्ठभूमि का एक युवक बाम को कमर पर मलने के बजाय नागिन-डांस को ज्यादा तरजीह दे रहा था। हर कोई एक-दूसरे के सानिध्य में होकर भी खुद में मस्त था। कुल मिलाकर वातावरण मादकता से भरपूर, लेकिन भीड़ के बावजूद तन्हाई से लबरेज था। एक के बाद एक उत्तेजक गीतों का सफर जारी था।

यह किसी फिल्मी सेट की कहानी नहीं, हाईस्कूल से अभी-अभी कॉलेज पहुंचे युवाओं की कहानी है। कॉलेज ज्वॉइन करने की खुशी में आयोजित की गई पहली पार्टी की यह शाम थी। इसे नशीली शाम कहना ज्यादा उचित होगा। कॉलेज को मस्ती की पाठशाला कहने वाले युवाओं के गीत-संगीत कार्यक्रम में आईटम नंबर और हनी सिंह के गाए गीतों का वांछित चयन तो था, लेकिन ‘आधुनिक’ भारत की इस नई पौध के पास भी चुनाव का सीमित विकल्प था, क्योंकि जो इन्होंने अब तक की अवस्था तक देखा-सुना था, उसे उनकी पसंद में स्वभाविक रूप से शामिल होना लाजिमी था। और…. यही गीत और संगीत हमें फिल्मों के जरिए दिखाए और सुनाए जाते रहे हैं।

संवाद के बजाय दृश्यों का मन:मस्तिष्क पर गहरा और ज्यादा देर तक रहने वाला प्रभाव पड़ता है, इसलिए फिल्मों को संवाद का सबसे बड़ा माध्यम कहा जाता है। फिल्मों की कहानियां, उनके गीत-संगीत, संवाद, संवाद अदायगी से लेकर अभिनेता-अभिनेत्री के पहनावे तक युवाओं को प्रभावित करते हैं और युवा उसी के अनुरूप दिखने का प्रयास करते हैं। यही कारण है कि व्यस्क फिल्मों में काम करने सनी लियोन जैसी ‘विश्ववधू’, भारतीय फिल्म उद्योग में आकर अभिनेत्री का तमगा पा जाती हैं और युवाओं के होठों की मुस्कान तो युवतियों की रोल-मॉडल बन जाती हैं।

20-12-2014

कभी जीनत अमान और सिमी ग्रेवाल की फिल्मों को देखने की बात तो दूर, उनकी सार्वजनिक तौर पर लोग बात करने से कतराते थे, ताकि कोई उनके ‘टेस्ट’ का अंदाजा न लगा सके। आज सनी लियोन की प्रसिद्धि के बाद शांति डायनामईट जैसी अश्लील फिल्मों की किरदार को भारतीय फिल्मों में स्थापित करने की कवायद होने लगी है और महानगरों से लेकर दूर के कस्बों तक के युवा उनके आगमन की बाट जोह रहे हैं। यह भारतीय फिल्मों द्वारा धन कमाने के लिए सामाजिक और नैतिक लक्ष्मणरेखा लांघने की कहानी है।

फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों का अक्सर यही कहना होता है कि वे वही बातें दिखाते हैं जो समाज में घटित हो रही हैं या जो समाज देखना चाहता है। लेकिन, समाज में रहने वाले लोगों का मानना है कि जो उनके सामने परोसा जाएगा, खाने का विकल्प भी उसी में से उन्हें चुनना होगा। एक समय बाद वही चीजें पसंद में शामिल हो जाती हैं। झिनी सफेद साड़ी में झरने में नहाती नायिका के सौंदर्य को मर्डर फिल्म में उसके थरथराते बदन की कंपन तक बढ़ाया गया और अंतत: सनी लियोन तक लाकर एक खास वर्ग के दर्शकों की पूरी फौज तैयार कर ली गई।

पहली बोलती फिल्म के रूप में 1931 में आर्देशिर इरानी की आलम आरा से शुरू हुई भारतीय सिनेमा की यात्रा के दौरान मध्यकाल में लुप्त हुई भारत की संगीत और नृत्य की विधा को प्राथमिकता मिली। फिल्मों के जरिए भारत की संगीत और नृत्यकला तथा लोक गीत-संगीत को प्रश्रय देते हुए भारत की हिंदू गौरवगाथा, संस्कृति, भारतीय महापुरूषों की कथाओं के साथ-साथ राष्ट्रवाद को संजोने का प्रयास किया गया। संस्कृत नृत्यकला मंच की परंपरा के माध्यम, जिसमें ड्रामा, ओपरा और बैले शामिल थी, से गीत, संगीत और संवाद को कायम किया गया।

20-12-2014

उसके बाद समय था सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष का। अछूत कन्या जैसी फिल्में इसी दिशा में एक सार्थक प्रयास था। इस फिल्म में एक ब्राह्मण लड़के को एक हरिजन लड़की से प्यार हो जाता है। फिल्म के माध्यम से समाज में समरसता और समानता लाने का प्रयास किया गया है। श्याम बेनेगल ने अपनी फिल्म मंथन के जरिए खेड़ा गांव के किसानों द्वारा श्वेत क्रांति के प्रयास को भी पर्दे पर उतारा गया।

भारतीय सिनेमा के शोमैन कहे जाने राज कपूर ने अपनी फिल्म मेरा नाम जोकर में एक नया प्रयोग किया, सौंदर्यबोध का। दर्शकों को सौंदर्यबोध का अहसास कराने के प्रयास में उन्होंने सिमी ग्रेवाल को बिकनी में झरने में नहाते हुए दिखाया। धर्मभीरू जनता के बीच इस नए प्रयोगधर्मिता पर हलचल मच गई, साथ ही उसे देखने की ललक भी। खजुराहो की मूर्तियों में व्याप्त नग्रता के सौंदर्यबोध का हवाला देकर झरने में नहाती एक कन्या के अंग-प्रदर्शन की अश्लीलता को उसी दायरे में बांधने का प्रयास किया गया। कुछ समीक्षकों ने इसे भारतीय सिनेमा के उत्तरोत्तर विकास में संक्रमण बताया तो कुछ लोगों ने इसे पाश्चात्य संस्कृति और भारतीय कला में नग्रता को आधुनिकता का प्रतिबिंब मानकर समाजिक बदलाव के चित्रण के रूप में परिभाषित किया।

तब तक भारतीय फिल्मों में नजरों से तीर चलाने वाली नायिकाएं और पेड़ों की आड़ में खड़े होकर निहारता नायक इशारों-इशारों में अपनी भावनाएं प्रदर्शित करने लगे थे। राज कपूर, देवानंद, दीलिप कुमार, राजेन्द्र कुमार और राजेश खन्ना जैसे सितारों की नकल उस पीढ़ी के नव-जवान अपना रहे थे। पेड़ के पत्तों के बीच चेहरे को छिपाकर शर्माने वाली नायिकाएं ज्यादा मुखर होने लगीं। वे अपने नायक से मिलने-जुलने, उनसे अपने प्यार को प्रदर्शित करने में संकोचहीन होकर सामने आ चुकी थीं और उसे पाने के लिए अपने परिवार, समाज से विद्रोह करने से भी नहीं हिचक रही थीं। लेकिन गीत, संगीत के हर शब्द के अपने महत्व थे। उनकी अपनी रूमानियत थी। उनमें एक अलग कशिश थी। उनमें एक अलग संदेश था। अंदाज भी जुदा था।  प्रेम रोग और हिना जैसी फिल्मों की पटकथा और संगीत लोगों का मन मोह रहे थे। झरने में नहाती सत्य शिवम सुंदरम की जीनत अमान और नदी में नहाती राम तेरी गंगा मैली की मंदाकिनी से आगे निकलने की यह कहानी थी। लेकिन यह सौंदर्यबोध दो कदम आगे बढ़ चुका था।

फिल्म निर्देशकों का कैमरा नयन मटक्का कर रहे इन नायक-नायिकाओं से हटकर उनके बेडरूम और बाथरूम तक कब पहुंच गया, यह बात न भारतीय दर्शकों को पता चली और न ही फिल्म समीक्षकों के साथ-साथ भारतीय फिल्मों की नियामक संस्था भारतीय सेंसर बोर्ड को। प्रेम संबंधों पर आधारित फिल्मों के बीच दयावान और आस्था जैसी लालसा से गुंथी फिल्में आती रहीं और लोगों को बदलाव के अहसास दिलाते उनकी कामुकता को ललकारती रहीं। फिल्म खलनायक का एक गाना ‘चोली के पीछे क्या है….’ ने कामुकता की इस आंधी को दृश्यों से इतर शब्दों में साक्षात्कार कराया। इस गाने ने कुछ लोगों के जुबान का स्वाद बिगाड़ दिया तो अधिकांश लोगों के बीच यह गाना किसी स्वादिष्ठ चॉकलेट की तरह बैठ गया। लेकिन, जो सबसे ज्यादा बदलाव हुआ, वह था ऐसे द्विअर्थी गानों का समाज में स्वीकृति। यह वही दौर था जब भारत में उदारीकरण, वैश्वीकरण के युग की शुरूआत हो रही थी और इंटरनेट धीरे-धीरे ही सही अपना पांव पसार चुका था।

20-12-2014

ग्लोबल विलेज बनती जा रही धरती में पश्चिम का रहन-सहन और तौर-तरीके आधुनिकता के नाम पर भारतीयों फिल्मों के थीम बनते जा रहे थे। इसमें पहनावे से लेकर लोकेशन तक शामिल थे। इन पटकथा का न ही भारतीय समाज से कोई सरोकार था और न ही भारतीय गीत-संगीत से। सिनेमा में कला के संगम के नाम पर अश्लीलता का जो समागम किया गया, नई सहस्राब्दी में उसकी बानगी है फिल्म उफ्स। इस फिल्म में एक स्कूली ब्वॉय का संबंध अपने सहपाठी की मां के साथ बन जाते हैं। इसका आधार भारतीय पृष्ठभूमि में ढूंढने पर शायद ही कही मिले, लेकिन विवादों के बीच सेंसर से पास इस फिल्म ने पर्दे पर ठीक-ठाक कमाई कर ली। नतीजा यह हुआ कि संभावनाओं के विस्तार के बीच जहां युवाओं को अपने लिए नए रास्ते तलाशने थे, वहीं युवा इन फिल्मों के जरिये कामुकता के बीच एक नया समीकरण खोजने लगे और मौके की तलाश में भेडि़ए की तरह घात लगाए फिल्म-निर्माताओं और निर्देशकों ने उनके लिए चारे फेंकने लगे। ए सर्टिफिकेट पाकर एक निश्चित समय के लिए सिनेमाघरों में लगने वाली सिर्फ ‘व्यस्कों के लिए’ बनने वाली फिल्मों की हर सामग्री अब मुख्यधारा की सिनेमा में मिलने लगी थी। जिस्म, मर्डर, डर्टी पिक्चर जैसी फिल्मों के जरिए युवा और बच्चे उन दृश्यों के प्रति ज्यादा उत्साहित नजर आते हैं जो यौवन में प्रवेश और शरीर में आ रहे बदलाव के दौरान अश्वयंभावी होता है।

जिस माध्यम को आधुनिकता लाने के प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया गया उसके परिणामस्वरूप उभरने वाली स्थितियों में परिस्थितियों से समझौता करने की कहानी फिल्म फैशन में बखूबी दिखाया गया है। इस दौर तक समाज के नायकों, उनके कारनामें, उनके योगदान को पूरी तरह नेपथ्य में डाला जा चुका था, जिसे अग्रिम पंक्ति में आने की संभावना आज भी नजर नहीं आती। फिल्म फैशन ने विकट परिस्थितियों में फंसी एक स्त्री की मजबूर समर्पण की कहानी जरूर बयां करती है, लेकिन इसे एक अवसर के रूप में भी स्थापित किया है। फिल्मों ने स्त्री-देह की यही परिणिति कर डाली है।

अश्लील गाने से गायकी का शुरूआत करने वाले हनी सिंह जैसे गायकों के गाने को युवाओं द्वारा गुनगुनाते हुए और उन पर थिरकते हुए देखा जा सकता है। फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर का संवाद ‘तेरी कहकर लूंगा….’ आज समाज के मुख्यधारा की बातचीत में शामिल तो हो चुकी है। स्कूली बच्चे भी घर से लेकर अपनी मित्र-मंडली में बेझिझक ऐसे संवाद को अपना रहे हैं। परिणाम हुआ कि जिन फिल्मों में इन दृश्यों को स्थापित करने की संभावना नहीं थी, वहां आइटम सॉन्ग के नाम पर इसे जबरदस्ती परोसा जाता रहा है और लोगों को जबरन सिनेमाघरों तक खिंचकर पैसे कमाने की जुगत भिड़ाया जाता रहा। जब रजिया गुंडों के बीच फंस जाती है तो युवामन उसके परिणाम पर सोचकर मुस्कुराते हैं। इसी तरह अपने डार्लिंग के लिए झंडू बाम बनने की कोशिश स्कूल के स्वच्छ मन बालक भी करने लगे और लड़कियों और नवयुवतियां खुद को उपभोग की वस्तु समझकर खुद ही बिकने को तैयार सी दिखने लगी। यह कला पर कारोबार का हावी होना था।

फिल्मों को संवाद का वृहद माध्यम जानकर और समझकर कुछ ऐसी फिल्में भी बनीं, जो भारतीय संस्कृति और इसके पारंपरिक मूल्यों को नीचा दिखाने का प्रयास था। आश्चर्य की बात यह है कि ये फिल्में स्वतंत्र भारत में बनीं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इसकी मुखर वकालत भी हुई। इनमें वॉटर, फायर जैसी फिल्में शामिल हैं। जोधा-अकबर जैसी फिल्में भी उसी वर्ग की हैं, जिन्हें बिना शोध के सिर्फ विवाद खड़ा कर पैसे कमाने की महत्वकांक्षा को परिलक्षित करती हैं। कुछ ऐसी फिल्में भी हैं, जिन्हें माना जाता है कि देशद्रोही तत्वों और भारत की सामाजिक संरचना को तहस-नहस करने वाले लोगों द्वारा फियनांस कर बनवाए जाते हैं। कला के नाम पैसे कमाने के लिए राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल होने का इससे विद्रुप चेहरा और क्या हो सकता है। हाल ही में रीलिज हुई विशाल भारद्वाज की फिल्म हैदर में न सिर्फ भारतीय सेना को खलनायक साबित करने की कोशिश की गई, बल्कि कश्मीर में ध्वस्त किए गए हिंदुओं के धार्मिक स्थल पर डांस को परोस कर कथ्य को अपनी सुविधानुसार मोडऩे की चेष्टा भी की गई है।

नारी उत्थान के नाम पर नारी को संभोग और उपभोग की वस्तु बनाकर बाजार में पेश करने का काम यदि फिल्मों ने किया है तो उसके जरिए बालमन को सेक्स का गुलाम बनाकर अपने लिए उपभोक्ताओं की एक जमात भी पैदा करने की तैयारी भी की गई है। इसमें सिर्फ तरूण ही नहीं, युवा और व्यस्क भी अपनी दमित कुंठा को अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता का नाम देकर उसकी हिमायत करते हैं। तो दूसरी तरफ, युवा महिला दर्शकों की एक जमात के लिए नायकों द्वारा शर्ट उतार कर  फेंकने का और शारीरिक पैकों की बढ़ोत्तरी के अंदाज में मांसल शरीर को पेश करने की भी कोशिश की जाती रही है। सौ करोड़ी क्लब को अलग अपने लिए एक अलग खांचा तैयार करने की कोशिश में आमिर खान जैसा तथाकथित ‘परफेक्शनिष्ठ’ व्यक्ति नंगा होकर रेडियो के साथ रेलवे ट्रैक के बीच आत्मघाती कदम उठाने को बेताब दिखता है।

फिल्मों का असर यह है कि आज पांचवीं कक्षा का लड़का या लड़की पढ़ाई के बजाय इस बात की अत्यधिक चिंता करते हैं कि अभी तक उनका ब्वॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड बनी या नहीं। फिल्मों के द्वारा फैलाई गई यौनिक संवेदना की कुंठा से ग्रसित होकर बढ़ते अपराध के आंकड़ों को राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ें बताते हैं। पिछले कुछेक सालों में छेड़छाड़ और बलात्कार के मामलों में नाबालिगों की संलिप्तता में भारी वृद्धि देखी गई है। नायिका से इजहार करने के लिए फिल्मों में अपनाए जाने वाले फॉर्मूले को इस्तेमाल करने की खबरें तो अकसर अखबारों में पढऩे को मिल ही जाती हैं।

फिल्मों ने जहां एक तरफ समाज में बंधनों और बेडिय़ों को तोड़ा है, वहीं स्वच्छंदता और अपराध को अंजाम देने के तौर-तरीके अपनाने की भी भरपूर सहूलियत दी है। सिनेमा के जरिए युवा और बालमन पर पडऩे वाले धीमी जहर वाले प्रभाव आगे चलकर कई तरह की मानसिक जटिलाओं के जाल में जकड़ लेती हैं। पैसों की भूख के व्याकुल भारतीय निर्माता-निर्देशक अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का वहन करते हुए नजर नहीं आते।

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