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गांव गरीब और किसान का बजट

गांव गरीब और किसान का बजट

देश के गणतंत्र घोषित होने के 68 साल के इतिहास में सरकारों को आकने और उनके कामकाज के अनुमान लगाने का एक निश्चित ढर्रा बन गया है। लेकिन नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं, जिनके अगले कदम का अंदाजा लगाना आसान नहीं है। अपनी सरकार के आखिरी पूर्णकालिक बजट के संसद में पेश होने के पहले उन्होंने एक टेलीविजन इंटरव्यू में कहा था कि 2018 का आम बजट लोकलुभावन नहीं होगा। इससे एक धारणा यह बनी कि आने वाले बजट में लोगों को कठिन फैसलों से जूझने के लिए तैयार रहना होगा। लेकिन जब वित्त मंत्री अरूण जेटली के पिटारे से जब बजट के प्रस्ताव निकले तो वे कुछ और ही थे। खासकर ग्रामीण, गरीब और किसान परिवारों के लिए उन्होंने एक तरह से राहतों की बारिश कर दी। हालांकि सदा की तरह राहत की उम्मीद लगाए बैठे वेतनभोगी वर्ग को उन्होंने लॉलीपाप के अलावा कुछ नहीं दिया।

हाल के गुजरात चुनावों में जिस तरह भारतीय जनता पार्टी को ग्रामीण इलाकों में झटके मिले हैं, उससे लगता है कि पार्टी ने सबक सीखा है। मौजूदा बजट प्रस्तावों में जिस तरह गांव, गरीब और किसान का ध्यान रखा गया है, उससे तो यही लगता है। वित्त मंत्री अरूण जेटली के प्रस्तावों में सबसे महत्वपूर्ण ने देश के करीब दस करोड़ बीपीएल परिवारों को प्रति परिवार पांच लाख रूपए तक के सालाना स्वास्थ्य बीमा का फायदा देने का ऐलान किया है।

इसे सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना नाम दिया है। जिसे दुनिया की सबसे बड़ी बीमा योजना बताया जा रहा है। हालांकि जानकार इसमें एक खामी बता रहे हैं। उनका कहना है कि सामान्य तौर पर पांच व्यक्ति के परिवार को भी जोड़ दें तो पचास करोड़ लोगों के बीमा का सामान्य सालाना प्रीमियम 13 हजार करोड़ बैठता है, जबकि वित्त मंत्री ने इस मद में सिर्फ दो हजार करोड़ का ही प्रावधान किया है। दूसरी बात यह है कि इस योजना को लागू करने के लिए पारदर्शी व्यवस्था और लूट-खसोट का केंद्र बन रहे निजी अस्पतालों पर निगाहबानी की जरूरत होगी। क्योंकि ऐसी ही योजनाएं बिहार समेत कुछ राज्यों ने अपने यहां चला रखी हैं। जिनके दुरुपयोग की खबरें आती रही हैं। बिहार के कुछ अस्पतालों ने बीमा की रकम हासिल करने के लिए महिलाओं की बच्चेदानी निकालकर पैसे ऐंठ लिए। इसलिए इस योजना को लागू करते वक्त बिहार जैसे अनुभवों को भी देखा जाना होगा। वैसे तो टीवी का इलाज और जांच मुफ्त है। अब टीबी रोगियों को पांच सौ रूपए प्रति महीने पुष्टाहार भत्ता भी देने का प्रस्ताव किया गया है।

जेटली के बजट के पिटारे से किसानों के लिए भी बड़ी घोषणा निकली। सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य से किसी जीन्स को कम कीमत बाजार से मिलने की दशा में किसानों की भरपाई करने का ऐलान किया है। इस योजना के तहत जेटली ने खरीफ की फसलों को शामिल कर लिया है और उनकी फसलों के लिए डेढ़ गुना कीमत देने का ऐलान किया। वैसे इसकी सिफारिश स्वामीनाथन आयोग पहले ही कर चुका था। इसके साथ ही 11 लाख करोड़ का कृषि कर्ज किसान क्रेडिट कार्डों के जरिए देने का भी ऐलान किया गया। किसानों पर करम की फेहरिश्त में कई और योजनाएं भी हैं, जिसमें हर गांव को कृषि बाजार से जोडऩे के लिए बेहतर सड़कों का जाल और 2000 करोड़ रुपये से कृषि बाजार और संरचना कोष बनाने का प्रस्ताव भी शामिल है। इसके साथ ही ऑपरेशन ग्रीन्स के लिए 500 करोड़ रुपये का प्रस्ताव के साथ ही मछली पालन, पशु पालन के लिए 2 नए फंड बनाने का भी ऐलान किया गया है। इसके साथ ही कृषि प्रोसेसिंग सेक्टर को 1400 करोड़ रुपए दिए गए हैं। सिंचाई की सुविधाओं के निर्माण के लिए नाबार्ड में दीर्घावधिक सिंचाई कोष बनाने का भी जेटली ने प्रस्ताव किया। इसके साथ ही जेटली ने 1500 करोड़ रूपए बांस के विकास के लिए दिए है। इसके साथ ही बांस को पेड़ों की श्रेणी से निकालकर घास की श्रेणी में डालने की तैयारी है। जिससे बांस का कागज बनाने, काठी बनाने आदि में इस्तेमाल किया जा सकेगा। यह सुझाव नितिन गडकरी की ओर से दिए गए थे।

जेटली के बजट में गरीबों पर बहुत इनायत बरती गई है। प्रधानमंत्री उज्जवला योजना को आठ करोड़ महिलाओं तक पहुंचाने का लक्ष्य हो या चार करोड़ गरीब घरों को मुफ्त बिजली देने का ऐलान हो या फिर गांवों के बुनियादी विकास के लिए 14.34 लाख करोड़ का प्रावधान हो, गरीब केंद्रित ही है। हालांकि जानकारों का मानना है कि अगर ये कार्यक्रम एक-दो साल पहले आए होते तो जमीनी स्तर पर इसका असर दिखता, जिसका भारतीय जनता पार्टी को चुनावों में फायदा हो सकता था। वैसे बजट को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दावा किया कि यह किसानों, आम लोगों और विकास के अनुकूल है। जो देश के 125 करोड़ लोगों की उम्मीदों और अपेक्षाओं को पूरा करने वाला है। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष की नजर में यह बजट सिर्फ लॉलीपाप है। उन्होंने कहा कि चार साल बीतने के बाद भी किसानों को सही दाम मिलने का वादा ही किया जा रहा है।

अरुण जेटली ने साल 2017-18 के लिए आम बजट पेश करते हुए घोषणा की कि बेघरों के लिए 2019 तक एक करोड़ मकान बनाने का लक्ष्य रखा गया है. वैसे वित्त मंत्री ने कहा कि 2019 तक एक करोड़ परिवारों को गरीबी से बाहर निकाला जाएगा और 50,000 ग्राम पंचायतों को भी गरीबी मुक्त किया जाएगा। अब सवाल उठता है कि सांसद तक अपने गोद लिये गांवों को विकसित नहीं कर सके, फिर ऐसे माहौल में किस तरह 50000 ग्राम पंचायतों को गरीबी मुक्त करने का सपना पूरा होगा। वैसे इस बजट में एक विरोधाभाष भी दिखा। गांव के लोगों को काम देने की मनरेगा योजना में वर्ष 2017-18 में 48,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। जबकि इससे पिछले वित्त वर्ष यानी 2016-17 में इसके लिए 38,500 करोड़ रुपये रखे गए थे और 10,000 करोड़ का बैगलॉग पिछले साल ही था। इस लिहाज से देखें तो मनरेगा के मद में जेटली ने मामूली बढ़ोतरी ही की है।

हालांकि इस बजट से करदाता वर्ग निराश हुआ है। जबकि उसे उम्मीद थी कि उसकी टैक्स छूट सीमा ढाई लाख से बढ़ाकर तीन लाख तक तो हो ही जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अलबत्ता वित्त मंत्री ने यात्रा भत्ता और चिकित्साभत्ता  को मिलाकर चालीस हजार रूपए के मानक छूट का ऐलान किया। जिसका फायदा सिर्फ नौकरीपेशा ही नहीं, पेंशनभोगियों को भी मिलेगा। अब तक पेंशनभोगियों को परिवहन और चिकित्सा खर्च पर कोई भत्ता नहीं मिलता है। वित्त मंत्री के मुताबिक सरकारी खजाने पर इस फैसले का 8,000 करोड़ रुपये का असर होगा और इसका 2.5 करोड़ वेतन भोगियों और पेंशनभोगियों को लाभ मिलेगा। पेंशनभोगियों को छोड़ दें तो नौकरीपेशा लोगों को इस राहत से खास फायदा नहीं होने जा रहा। अभी तक यात्रा भत्ता के रूपए में 19200 और चिकित्सा भत्ता के रूप में 15 हजार रूपए यानी कुल 34200 की छूट मिलती रही है। इस लिहाज से देखें तो मानक छूट में सिर्फ 5800 रूपए का ही फायदा हुआ। वैसे वेतनभोगियों के लिहाज से देखें तो अगर कोई 5 प्रतिशत के आयकर टैक्स के दायरे में आता है तो इस कदम से उसका टैक्स महज 290 रुपये ही बचेगा। इसी तरह अगर वह 10 फ़ीसद का टैक्स भर रहा है तो उसे 1160 रुपये का फायदा मिलेगा और वह 30 फ़ीसद टैक्स दे रहा है तो उसकी बचत सिर्फ 1740 रुपये होगी। वैसे यह फायदा भी उनके लिए नहीं होगा, जो बड़े टैक्स स्लैब में आते हैं। क्योंकि सरकार ने एक प्रतिशत का उपकर बढ़ा दिया है। अगर किसी को दो लाख टैक्स देने पड़ते हैं तो उसका एक प्रतिशत उपकर यानी सैस बढ़कर दो हजार रूपए हो जाएगा।

आर्थिक मामलों के जानकार भरत झुनझुनवाला का कहना है कि वित्त मंत्री के सामने राजकोषीय घाटा कम रखने का दबाव है। यह घाटा तीन से साढ़े तीन प्रतिशत ही रखना है। इसलिए मजबूरी में उन्होंने वेतनभोगियों को महज छूट का दिखावा किया है।  सृजन को सरकार की नीति का केंद्र बिंदु  बनाया गया है। इसके साथ ही स्टार्ट-अप इंडिया कार्यक्रम को कामयाब बताया गया। सरकार ने राष्ट्रीय प्रशिक्षु स्कीम के तहत 2020 तक 50 लाख लोगों को वजीफा देने का प्रावधान किया। जबकि आलोचना के घेरे में आई  कौशल विकास योजना के तहत प्रशिक्षण के लिए 306 प्रधानमंत्री कौशल केंद्र खुलने पर जेटली ने संतोष जताया। इसके साथ ही कृत्रिम सूचना क्षेत्र के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू करने का ऐलान किया। रेलवे के समूचे ट्रैक को ब्राड गेज बनाने और उसके आधुनिकीकरण के लिए 1.48 लाख करोड़ के बजट का प्रावधान किया गया। लेकिन बजट ने कुछ सवाल भी उठाए हैं। अगर गंगा सफाई की 47 योजनाएं पूरी हो चुकी हैं तो फिर गंगा गंदी क्यों हैं। कौशल विकास के 306 केंद्र खुल चुके हैं तो फिर उसका फायदा जमीन पर कब नजर आएगा। फिर रोजगार स्रजन पर अब जाकर ध्यान क्यों केंद्रित किया जा रहा है। सवाल यह भी है कि सरकार नारों में ही अब तक क्यों उलझी रही।

लोकतंत्र में विकास होना और विकास का होता दिखना भी जरूरी है। संचार क्रांति के जिस दौर में हमारा समाज पहुंच चुका है, उसमें अब जनता में धैर्य भी नहीं रहा और उसे लंबे वक्त तक टाला भी नहीं जा सकता। राजस्थान के उपचुनावों में भारतीय जनता पार्टी की हार हो या गुजरात के गांवों में भाजपा का खिसका जनाधार। जनता के गुस्से का ही प्रतीक है। इसलिए सरकारों को ध्यान देना होगा कि वे योजनाएं ही न बनाएं, उन्हें जमीन पर उतारने का कारगर तंत्र भी विकसित करें। बजट प्रस्तावों से भी ऐसी ही उम्मीद की जाती है।

यू चंद्रा

 

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