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सरलता ही जीत है

सरलता ही जीत है

जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ाना उतना आसान नहीं है। कितने ऊपर नीचे कठिनाईओं का सामना करना पड़ता है , इसी कठिनाई से केवल सच्चा और सतचिन्ता रखने वाले व्यक्ति ही खुद को बाहर निकाल पाते हैं। इसी जीवन की गाड़ी को थोड़ा सा भी सुगम रास्ते पर ला सकते हैं। कभी-कभी तो थोड़ी सी लापरवाही से यही गाड़ी उबड़-खाबड़ रास्ते से जाकर सीधा खाई में जा गिरता है। यहां से आसानी से निकलना मुश्किल हो जाता है। अभी तक हम जीवन को जितना जान पाए हैं उसे सरल बनाने के लिए सर्वप्रथम खुद को सरल बनाना पड़ता है। कठिन से कठिन परिस्थितिओं को एक सरल व्यक्ति आसानी से पार कर लेता है उनको कठिन हालातों पर अनेक विद्वानों का दिमाग भी काम नहीं कर पाता है यद्यपि वो अपने पूरी क्षमता लगा लेते  हैं पर वो कार्य मे नहीं लगता है। अधिकांश में यह होता है कि ज्ञानी व्यक्ति थोड़ा बहुत ज्ञान होते हुए भी वह अहंकार के वश में आ जाते हैं। जहां अहंकार आ जाता है वहां आदमी अंधा बन जाता है और सही – गलत में फर्क करना भूल जाता है।

जीवन में हर व्यक्ति के लिए ज्ञान आवश्यक है बगैर ज्ञान की आदमी का कोई अस्तित्व ही नहीं है। ज्ञान के द्वारा ही वह सही – गलत कि पहचान करता है। लेकिन ज्ञान का अर्थ भी हमें समझना चाहिए, केवल पुस्तक पढ़कर उसमें स्थित विषय वस्तु को अपने आयत्त में करना असली ज्ञान नहीं हो सकता है। पुस्तक में लिखित ज्ञान को जब तक कार्य में नहीं लगा पाए तब तक वह ज्ञान नहीं कहला  सकता है। वह व्यक्ति जो केवल ज्ञान को दूसरों को दर्शाने कि एक जरिया मानते हंै, वह व्यक्ति ज्ञानी नहीं होते हैं। जो असल में ज्ञानी होते हैं, वह सही रूप से समझ लेते हैं कि उनके लिए छोटा-बड़ा, धनी-निर्धन और सुख-दु:ख में कोई अंतर नहीं होता है। एक छोटे शिशु की तरह खुद को सरल बना लेते हंै सब कुछ ईश्वर की इच्छा से मानकर अपना कार्य करने लगते हंै। उनके जीवन में अधिक जोश, बहुत अधिक सफलता दृश्यमान नहीं होती है लेकिन उनके जीवन में कुछ भी गलत होना संभव नहीं है। हां कभी भी उनके साथ कोई भी अनहोनी घटती भी है तो वह उन ज्ञानियों को उतना अधिक प्रभावित नहीं कर पाता है। आने वाला परिस्थिति दूर से जितना अधिक उलझा हुआ लगता है जैसे ही वो अपने सरलता से उसका सामना करने लगते है धीर-धीरे वो मुश्किल और मुश्किल नहीं रहती। केवल जटिल हालातों से लडऩा ही जिंदगी नहीं होती। जिन्दगी जीने का अलग सुख भी होता है। लेकिन हम खुद ही हालतों को इतना अधिक जकड़ लेते हैं कि खुुशी को अनुभव भी नहीं कर पाते हैं। सरल बनना हम जितने आसानी से कह लेते हैं उतना ही अधिक मुश्किल होता है। हम बचपन से कुछ इस प्रकार बड़े होते जाते हंै कि हमारे अंदर से मासूमियत और बचपना सम्पूर्ण रूप से खो जाता है। हमारे अंदर पाया जाता है तो केवल हमसे कुछ खोने की डर, दूसरों से जीत पाने की इच्छा, और किसी के उन्नति को देखकर मन में होने वाले दु:ख। हम बाल्यावस्था में सब कुछ अपने माता-पिता के भरोसे  छोड़ कर निश्ंिचत और निडर रहते हैं। हमारे अंदर से खुुशी तब झलकती है। जब हम खुद की जिम्मेदारी खुद ले लेते हैं तो हमारी परेशानी तब से शुरु हो जाती है। परमात्मा के हम सब संतान हैं और हमारे हर सुख-दु:ख उन्हीं के द्वारा निर्णय होता है। यह मानकर यदि हम चलें तो हमारा दु:ख  कम हो जाएगी। हम खुद को इतना अधिक समझ लेते हैं कि परमात्मा को ही भूल जाते हंै। एकबार सरल और सीधा बनकर जिन्दगी जीकर देखें तो जिंदगी आसान हो जाएगी और  ना केवल मुश्किलें दूर हो जाएगी बल्कि जीवन में सफलता भी मिल जाएगी।

 

उपाली अपराजिता रथ

 

 

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