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एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट…

एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट…

By नीलाभ कृष्ण

पैसा एंटरटेनमेंट से आता है। सिल्क स्मिता बनीं विद्या बालन ने डर्टी पिक्चर में समझाया है कि एंटरटेनमेंट होता क्या है? एंटरटेनमेंट का ये नया मतलब फिल्म निर्माताओं  ने खुद निकाला है, नहीं तो ऐसा एंटरटेनमेंट तो पहले भी बड़े परदे पर होता रहा है। सिनेमा में सेक्स का तड़का लगाने के लिए राज कपूर ने पहले-पहल मेरा नाम जोकर में सिमी ग्रेवाल के सहारे, फिर सत्यम् शिवम् सुंदरम् में जीनत अमान के सहारे और राम तेरी गंगा मैली में मंदाकिनी के सहारे खुलेआम कोशिशें कीं। नारी सौंदर्य के बहाने हुई इन कोशिशों को कलात्मकता की सफेद,लेकिन भीगी साड़ी में ढंकने की वो कोशिशें अब तक जारी हैं।

हमारे देश में क्रिकेट की तरह सिनेमा भी एक धर्म है और सिनेमा के सितारे चाहने वालों के लिए भगवान हैं। सिनेमा के प्रति यह जुनून आज से नहीं है, यह तभी से है जब सिनेमा तक हर तबके की पहुंच नहीं होती थी। आज तो सिनेमा टेलीविजन, वीसीडी और इंटरनेट के जरिए घर-घर में पहुंच गया है। बड़े शहरों ही नहीं, छोटे शहरों और कस्बों में भी मल्टीप्लेक्स की भरमार हो गई है।

आज सिनेमा के बाजार का व्यापक विस्तार हुआ है। यहां तक कि यह बाजार घरों में आ गया है। आज सिनेमा बनाने और बेचने का ही नहीं बल्कि सिनेमा देखने का तरीका भी बदल गया है। आज की पीढ़ी को मनचाही फिल्म देखने के लिए किसी तरह की जद्दोजहद करने की जरूरत नहीं होती है। आज फिल्म देखने के लिए न किसी इंतजार की जरूरत है, न माता-पिता की मेहरबानी की और न ही टिकट खरीदने के लिए घंटों लाइन में खड़े होने की और न ही सिनेमा हॉल में घुसने के लिए धक्का-मुक्की करने की, लेकिन एक समय था जब फिल्म देखना युद्ध जीतने के समान होता था और फिल्म देखकर आना एक उपलब्धि हासिल करने की तरह होता था। आज जो सिनेमा है वह ढेर सारे बदलावों से गुजरते हुए यहां तक पहुंचा है। नयी सदी के शुरुआती वर्षों में विश्व जगत में भारतीय सिनेमा की लोकप्रियता बढ़ी। इन वर्षों में सिनेमा निर्माण पर होने वाले खर्च और उससे होने वाली आमदनी में कई गुना इजाफा हो गया। टेलीविजन, इंटरनेट और मोबाइल फोन जैसे संचार माध्यमों के अंधाधुंध विकास की बदौलत आमदनी बढ़ाने के कई रास्ते खुल गए। इस दौरान फिल्म निर्माण की गुणवत्ता, सिनेमेटोग्राफी, एनिमेशन और स्पेशल इफेक्ट्स आदि में काफी सुधार आया।

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इस दौरान भारतीय फिल्मों के बाजार में भारी विस्तार हुआ और विदेशों में भारतीय सिनेमा की मांग बढ़ी और विदेशी दर्शकों को ध्यान में रखकर भी फिल्में बनाई जाने लगीं। इस दौरान रिलीज होने वाली ‘लगान’ (2001) ‘देवदास’ (2002), ‘कोई मिल गया’ (2003), ‘कल हो ना हो’ (2003), ‘वीर जारा’ (2004), ‘रंग दे बसंती’ (2006), ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ (2006), ‘कृष’ (2006), ‘धूम-2’ (2006), ‘चक दे इंडिया’ (2007), ‘ओम शांति ओम’ (2007), ‘रब ने बना दी जोड़ी’ (2008) और ‘गजनी’ (2009) जैसी फिल्मों ने न केवल भारत में बल्कि विदेशों में खूब कमाई की। इन फिल्मों से सलमान खान, शाहरुख खान, आमिर खान, ऋत्विक रोशन और अभिषेक बच्चन जैसे अभिनेताओं, जबकि ऐश्वर्य राय, प्रीति जिंटा, रानी मुखर्जी, प्रियंका चोपड़ा और करीना कपूर जैसी अभिनेत्रियों का उदय हुआ।

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कहते हैं कि सौ साल में हर वो संस्था अपनी पूर्णगति को प्राप्त हो लेती है जिसका जरा सा भी ताल्लुक आम लोगों से रहता है। जिस सिनेमा को विदेशों  में गरीबी, रजवाड़ों, झोपड़पट्टियों और मदारियों के खेल तमाशों से शोहरत मिली, वो हिंदुस्तानी सिनेमा अब रा वन, रोबोट और कोचादईयान की वजह से जाना जा रहा है। पाथेर पांचाली, सुजाता, देवदास, मुगल ए आजम, मदर इंडिया का जमाना अब गया, अब सिनेमा दबंग, वांटेड, सिंघम और सिंह इज किंग हो गया है। और, ये चलन केवल हिंदी सिनेमा का ही नहीं है बल्कि हिंदी सिनेमा में ये चलन दक्षिण की उन फिल्मों से आया है, जिन्हें बनाने वालों को सिनेमा का सिर्फ एक ही मतलब समझ आता है और वो है पैसा।

पैसा एंटरटेनमेंट से आता है और सिल्क स्मिता बनीं विद्या बालन ने डर्टी पिक्चर में समझाया ही था कि एंटरटेनमेंट होता क्या है? एंटरटेनमेंट का ये नया मतलब फिल्म निर्माताओं  ने खुद निकाला है। नहीं तो ऐसा एंटरटेनमेंट तो पहले भी बड़े परदे पर होता रहा है। दक्षिण में श्रीदेवी और कमल हासन की शुरूआती फिल्में अगर कोई  देख ले तो शायद कांतिलाल शाह भी शरमा जाएं। जानकारों की माने तो हिंदी सिनेमा में सुपर स्टार बनने के बाद श्रीदेवी ने अपनी तमाम बी और सी ग्रेड वाली फिल्मों के राइट्स खरीद कर उनके प्रिंट अपने कब्जे में कर लिए थे। ये बात कोई बीस-पचीस साल पहले की है, लेकिन उससे थोड़ा और पीछे जाएं तो सिनेमा में सेक्स का तड़का लगाने के लिए राज कपूर ने पहले पहल मेरा नाम जोकर में सिमी ग्रेवाल के सहारे, फिर सत्यम् शिवम् सुंदरम् में जीनत अमान के सहारे और राम तेरी गंगा मैली में मंदाकिनी के सहारे खुलेआम कोशिशें कीं। नारी सौंदर्य के बहाने हुई इन कोशिशों को कलात्मकता की सफेद लेकिन भीगी साड़ी में ढकने की वो कोशिशें अब तक जारी हैं और साथ ही जारी है सिनेमा और मनोरंजन का वो संघर्ष जो दादा साहेब फाल्के की बनाई पहली हिंदुस्तानी फिल्म राजा हरिश्चंद्र के साथ ही शुरू हो गया था। जाहिर है दूसरे कारोबारों की तरह सिनेमा भी सिर्फ एक कला शुरू से नहीं रहा। इसे कारोबार के लिए ही रचा गया और अब तक कारोबार ही इसे रच रहा है।

बॉलीवुड के कुछ पहले कदम

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भारत के पहले डेली सोप और सेंसरशिप की शुरुआत सिनेमा के प्रारंभिक युग में जो भी फिल्में बनती थी, वह पौराणिक और आध्यात्मिक विषयों पर आधारित होती थीं। यही वजह है कि भारत का अपना पहला धारावाहिक जिसका नाम राम वनवास था, भगवान राम के जीवन पर आधारित था। इस धारावाहिक का निर्माण श्रीराम पाटनकर ने किया था। यह सीरियल चार अलग-अलग भागों में बनाया गया था। वर्ष 1918 में ब्रितानी ऐक्ट की तर्ज पर भारत में भी सेंसरशिप की शुरुआत कर फिल्मों के लिए सेंसरशिप और लाइसेंसिंग की व्यवस्था की गई थी।

पहली सामाजिक हास्य फिल्म
यह वह दौर था जब भारत के लोगों पर भी पाश्चात्य संस्कृति हावी हो चुकी थी। ब्रिटिश शासन काल के अंतर्गत रहने के कारण भारतीयों का रहन-सहन पूरी तरह विदेशी हो गया था। भारत की पहली हास्य फिल्म की पटकथा भी इसी विषय पर आधारित थी। द इंगलैंड रिटर्न नाम की इस फिल्म का निर्माण धीरेन गांगुली ने किया था। फिल्म की कहानी एक ऐसे भारतीय पर केंद्रित थी जो बहुत लंबे समय बाद विदेश से अपने देश लौटता है। वापस लौटने के बाद उसके साथ क्या-क्या घटनाएं घटती हंै उसे व्यंग्यात्मक तरीके से दिखाया गया था।

समाज हित में बनी पहली फिल्म
मराठी निर्माता बाबूराव पेंटर ने पहली सोशल फिल्म का निर्माण किया था। ‘सवकारी पाश’ नाम की इस फिल्म की कहानी एक गरीब किसान और धूर्त जमींदार पर आधारित थी। फिल्म में एक लालची जमींदार एक किसान को उसकी जमीन से बेदखल कर देता है। गरीबी से लड़ता उस किसान का परिवार शहर पहुंचकर मजदूरी करने लगता है। इस फिल्म में गरीब किसान का किरदार वी. शांताराम ने निभाया था।

स्वदेशी फिल्म कंपनियों का आगमन और टॉकीज की शुरुआतवर्ष 1929 में वी. शांताराम द्वारा कोल्हापुर में प्रभात कंपनी की स्थापना की गई। इसके अलावा चंदूलाल शाह ने बंबई में रंजीत फिल्म कंपनी का शुभारंभ किया। अपने 27 वर्षों के सफर में प्रभात कंपनी ने 45 फिल्मों का निर्माण किया, वहीं 1970 के दशक तक रंजीत स्टूडियो फिल्मों का निर्माण करता रहा।

फिल्मों में प्लेबैक सिंगिंग की शुरूआत
फिल्मों के शुरुआती चरण में नायक-नायिका स्वयं गीत गाते थे। उन्हें अभिनय के साथ-साथ गायन पर भी ध्यान देना होता था। वर्ष 1935 में पहली बार नितिन बोस ने धूप-छांव फिल्म के जरिए प्लेबैक सिंगिंग की तकनीक विकसित की।

स्वप्न दृश्य को दिखाती पहली फिल्म
राजकपूर और नर्गिस अभिनीत फिल्म आवारा, जिसे वर्ष 1951 में प्रदर्शित किया गया था। इसमें पहली बार नायक और नायिका को स्वप्न में गीत गाते दिखाया गया था। यह अपनी तरह का पहला प्रयोग था। फिल्म का बहुचर्चित गाना घर आया मेरा परदेसी में राज कपूर और नर्गिस सपने में गाते हैं।

फिल्म में पहली बार फ्लैशबैक का प्रयोग
वर्ष 1934 में प्रदर्शित फिल्म रूपलेखा में पहली बार फ्लैशबैक का प्रयोग किया गया था। इस फिल्म में पी.सी. बरुआ और जमुना मुख्य भूमिका में थे। फिल्म के बाद इन दोनों ने विवाह भी कर लिया था। जमुना, पी.सी. बरुआ की फिल्म देवदास में पारो भी बनी थीं।

पहली सेंसर्ड फिल्म
ऑर्फस ऑफ द स्टॉर्म पहली ऐसी फिल्म थी जिस पर सेंसर की कैंची चलाई गई थी।

20-12-2014

सिनेमा और कारोबार के बीच एक बहुत महीन फासला रहा है। कुछ-कुछ वैसा ही जैसे कि नग्नता और अश्लीलता में होता है। हिंदी समेत सभी दूसरी भाषाओं में सिनेमा ने कुछ बेहतरीन पड़ाव पचास और साठ के दशक में पार किए। तब भी भारत का सिनेमा विदेश जाता था, सराहा जाता था और पुरस्कार भी पाता था। पर तब तक सिनेमा पथभ्रष्ट नहीं हुआ था और तब तक सेंसर बोर्ड में ऐसे लोग भी नहीं आए थे जो ‘कैसे इसकी ले लूं मैं’ जैसे विज्ञापन तो सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए पास कर देते थे, लेकिन फिल्म में तिब्बत के झंडे को लेकर सामाजिक बोध से सजग हो जाते थे। अपने आसपास से कहानियां बटोरने वाला भारतीय सिनेमा कब धीरे-धीरे डीवीडी सिनेमा में बदल गया, लोगों को पता तक नहीं चला।

असल कहानियों का टोटा
ब्लैक फ्राइडे, पांच, देव डी और गुलाल जैसी फिल्मों से मशहूर हुए निर्देशक अनुराग कश्यप की मानी जाए तो, भारतीय सिनेमा की कोई एक पहचान नहीं है। हॉलीवुड फिल्मों की बात चलते ही हम कह देते हैं कि वहां सिनेमा तकनीक से चलता है। हमारे यहां तकनीक अभी उतनी सुलभ नहीं है। हर निर्माता सिर्फ तकनीक को सोचकर सिनेमा नहीं बना सकता। भारतीय सिनेमा की एक पहचान जो पिछले सौ साल में बनी है, उसमें उन्हें जो एक बात समझ आती है और वो है इसकी सच्चाई। सिनेमा और सच्चाई का नाता भारतीय सिनेमा में शुरू से रहा है। बस बदलते दौर के साथ ये सच्चाई भी बदलती रही है और बदलते दौर के सिनेकार जब इस सच्चाई को परदे पर लाने की सच्ची कोशिश करते हैं, तो बवाल शुरू हो जाता है। अनुराग की फिल्मों के सहारे भारतीय सिनेमा के पिछले बीस पचीस साल के विकास को बहुत अच्छे से समझा जा सकता है। अनुराग कश्यप भले ही अपने संघर्ष के दिनों को पीछे छोड़ आए हों और अपनी तरह के सिनेमा की पहचान भी बना चुके हों, लेकिन उनका सिनेमा पारिवारिक मनोरंजन के उस दायरे से बाहर का सिनेमा है, जिसे देखने के लिए कभी हफ्तों पहले से तैयारियां हुआ करती थीं। एडवांस बुकिंग कराई जाती थीं और सिनेमा देखना किसी जश्न से कम नहीं होता था। अब सिनेमा किसी मॉल में शॉपिंग सरीखा हो चला है।

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किसी भी देश के मनोरंजन में उसकी मिट्टी की खुशबू न हो तो बात लोगों के दिलों तक असर कर नहीं पाती है। भले ही कुछ लोगों को लगता हो कि हिंदुस्तान का साहित्य अब ऐसा बचा ही नहीं जिस पर सिनेमा बन सके, पर असल दिक्कत सिनेमा के साथ तकनीशियनों के कष्टों की भी है। भारतीय सिनेमा के उत्थान और पतन जैसी ऐतिहासिक बातों में न पड़ा जाए तो भी ये तो कहा ही जा सकता है कि भारत में सिनेमा दो खांचों में बंटा दिखता है। इसमें एक सिनेमा वो है जिसमें सिर्फ टिकट खिड़की का मनोविज्ञान काम कर रहा होता है। ये सिनेमा सिर्फ टिकट खिड़की पर भीड़ जुटाने में यकीन रखता है। दूसरी तरह का सिनेमा भी टिकट खिड़की पर भीड़ तो देखना चाहता है, लेकिन उसे बनाने वाला ये भी चाहता है कि तीन घंटे सिनेमाघर में बिताने के बाद दर्शक खुद पर खीझता हुआ बाहर न निकले। मनोरंजन हो, लेकिन स्वस्थ हो, बस दूसरी तरह का सिनेमा यही चाहता है। रीमेक पर रीमेक बना रहे सिनेमा में वाकई असल कहानियां खोजने वाले गिनती के हैं।

कहां गए वो लोग?
कहानियों के बाद सिनेमा के सम्बन्ध में अगली बात निकलती है निर्देशन की। ऐसा क्यूं कर है कि श्याम बेनेगल जैसे फिल्म निर्देशकों को इन दिनों पहले फिल्में बनाने के लिए और फिर बन जाने पर उन्हें बेचने के लिए सौ जगह सिर पटकना पड़ता है। सिनेमा अब मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों को टटोलने का माध्यम नहीं रह गया है।  सिनेमा की सामाजिक सोच अकाल मृत्यु का शिकार हो चुकी है और अब यहां सिर्फ वही तीर मार सकता है जिसकी जेब में पैसा हो और जिसके निशाने पर भी बस पैसा ही हो। पैसे का बोलबाला सिनेमा में हमेशा से रहा है, पर सिनेमा में भी नकारात्मक प्रवृत्तियों का प्रतिकार ही किया है। भारतीय सिनेमा खासकर हिंदी सिनेमा एक ऐसी अंधी सड़क पर रफ्तार लगा चुका है, जिसके मोड़ों और मंजिल के बारे में उसे खुद नहीं पता। सिनेमा अब सिनेमा रहा ही नहीं, वह खालिस मनोरंजन का बाजार बन चुका है। एक ऐसा बाजार जहां एक रुपये लगाकर सौ रुपये कमाने का जुआ खेला जा रहा है और जिसकी फड़ पर फेंके जा रहे पत्तों में हर बार तीन इक्के निकलने ही निकलने जरूरी हैं। ऐसे में ये तीनों इक्के किसके पास निकलेंगे जाहिर है ये पहले से तय होता है। भारतीयВладимир мунтян биографияil topodin