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मोदीजीजरा संभल के!

Deepak Kumar Rath

By दीपक कुमार रथ

आखिर संसद के शीतकालीन सत्र में कांग्रेस ने मानो खुद को मजबूत विपक्ष साबित करने के लिए प्रधानमंत्री की सदन में अनुपस्थिति का मामला ही उठा लिया। प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में विपक्ष की मांग का आदर भी किया। उन्होंने अपनी एक मंत्री निरंजन ज्योति की असंसदीय भाषा पर नाखुशी जाहिर की और सदन से अनुरोध किया कि मंत्री अपने कथन पर पहले ही खेद व्यक्त कर चुकी हैं इसलिए अब सामान्य कामकाज पर लौट आया जाए। विपक्ष लगातार यह आरोप लगा रहा था कि प्रधानमंत्री अपनी संसद के बदले विदेशी संसदों में ज्यादा समय बिता रहे हैं। हालांकि इससे उसकी हताशा ही जाहिर होती है, क्योंकि हाल के वर्षों में मोदी ने विदेशों में अपने और देश के लिए अपने कई पूर्ववर्तियों के मुकाबले ज्यादा अहमियत बटोरी है। शायद इसी वजह से मोदी सरकार के छह महीने के कामकाज के आंकलन में मिले-जुले संकेत दिए जा रहे हैं। कोई भी मोदी सरकार की पहली छमाही पर कोई स्पष्ट फैसला नहीं सुना पा रहा है। असल में लोकसभा चुनावों के दौरान जब मोदी मैदान में उतरे तो चारों तरफ बदलाव की लहरें हिलोरे ले रही थीं। देश का जनमानस यूपीए सरकार के पैदा किए हालात से आजिज आ चुका था। बदलाव की महती आकांक्षा के साथ आई सरकार के कामकाज पर फैसला सुनाने के लिए छह महीने की अवधि इसलिए भी काफी कम है।

इसमें कोई शक नहीं है कि मोदी की शख्सियत के दमखम से उनके पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री का कोई मुकाबला ही नहीं है। आखिर उन्होंने ही ‘अच्छे दिन’ लाने का अब तक का सबसे बड़ा वादा करने की हिम्मत दिखाई। यह युगांतरकारी बदलाव की तरह था। इन दो शब्दों में करोड़ों भारतीयों की मानो समूची आकांक्षा समा गई थी। ‘अच्छे दिन’ आम आदमी को भरोसा दिला रहे थे कि आने वाला कल, बीते कल से बेहतर होगा।

मोदी ने बेहद सकारात्मक नजरिए के साथ इस आशावाद को आत्मसात भी किया और अपने शपथ ग्रहण में सार्क देशों के नेताओं को आमंत्रित करके नई फिजा तैयार करने के लिए राजनेता जैसी उदारता भी दिखाई, लेकिन अफसोस कि पाकिस्तानी उच्चायुक्त ने हुर्रियत नेताओं को बातचीत के लिए बुलाकर इस आशावाद में शक के बीज बो दिए और मोदी को पाकिस्तान के साथ सचिव-स्तरीय बातचीत को खत्म करने का फैसला लेना पड़ा। इस तरह नया अध्याय शुरू करने के मोदी के आशावाद में फच्चर फंसा दिया गया।

मोदी ने अपने इसी आशावाद को पड़ोस से दूर देशों तक विस्तार देने के लिए अपने पहले छह महीने में जितने विदेशी दौरे किए, उतना कोई प्रधानमंत्री नहीं कर पाया था। इस छह महीने में वे आठ देशों की यात्रा कर चुके हैं और नौ देशों के नेताओं को आमंत्रित कर चुके हैं। वे इस दौरान नेपाल, म्यांमार, भूटान, ब्राजील, जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और फिजी तक की यात्रा कर आए।

हालांकि घरेलू मोर्चे पर मोदी सरकार मानो आलोचकों की धैर्य की परीक्षा ले रही है। आलोचक कह रहे हैं कि भाजपा सरकार के सितारे अच्छे हैं कि तेल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय बाजार में घट रही हैं, लेकिन वह इससे विदेशी मुद्रा भंडार में होने वाली बचत का लाभ नहीं ले पा रही है। इसका असर भुगतान संतुलन पर इसलिए नहीं दिख रहा है, क्योंकि सोने का आयात उसी अनुपात में बढ़ रहा है।

मोदी के छह महीने का कार्यकाल कुछ लोगों के निराशा का कारण हो सकता है। मसलन, कॉरपोरेट जगत का बड़े आर्थिक सुधारों के अभाव में मोदी की नतीजे देने वाली छवि से मोहभंग हो सकता है। कॉरपोरेट जगत भी आम चुनावों के दौरान मोदी की सराहना करने में आगे रहा है। देश के इतिहास में पहली दफा समूचा कॉरपोरेट जगत किसी पार्टी के पक्ष में खुलकर खड़ा दिखा।

दूसरी तरफ, निराशावदी अपने वक्त का इंतजार करते लग रहे हैं। हालांकि सांप्रदायिक मोर्चे पर मोटे तौर पर शांति है। दिल्ली में छोटी-मोटी स्थानीय किस्म की झड़प और एक चर्च में आगजनी की घटना ही अपवाद स्वरूप घटी है। लेकिन, विरोधी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि भाजपा की पहली सरकार के दौर के जैसा ही माहौल तैयार हो सकेगा।

आर्थिक मोर्चे पर देश आगे बढ़ रहा है, यह मोर्गन स्टेनली के अगले साल के 6.3 फीसदी की वृद्धि दर के अनुमान से ही जाहिर है। इस बीच भाजपा ने अपना विजय अभियान का विस्तार दो और राज्यों में कर लिया है। इसका दूसरा पहलू यह है कि मोदी के अब फेसबुक पर 2.5 करोड़ प्रशंसक हैं तो ट्विटर पर अस्सी लाख फॉलोवर हैं। फेसबुक और ट्विटर पर उनके अपने पसंदीदा अधिकारियों के जरिए निरंतर सक्रियता उन्हें ऐसी शख्सियत प्रदान करती है जो किसी भारतीय प्रधानमंत्री को अब तक नसीब नहीं थी। रेडियो पर ‘मन की बात’ संबोधन भी मोदी को ओजस्वी वक्ता के रूप में स्थापित करती है।

पहली एनडीए सरकार वाजपेयी के नेतृत्व मे भले गठबंधन की मजबूरियों में फंसी थी, लेकिन उसने कुछ साहसी और मौलिक बदलाव के कदम उठाए थे। मोदी का एनडीए तो कहने भर को गठबंधन है, फिर भी मोदी बेहद सतर्क दिखते हैं। शायद इसका रहस्य मोदी की कार्यशैली में ही निहित है। वे कहते हैं, ”मैं बेहद छोटा आदमी हूं, जो छोटी-छोटी चीजें करने में यकीन रखता है।’’

मोदी की अगुआई वाली एनडीए सरकार ने भी रेलवे में एफडीआई को आमंत्रण, पेट्रोलियम तेल के दाम के विनियमन और ‘मेक इन इंडिया’ जैसे अभियान से संबंधित कुछ साहसिक कदम उठाए हैं। इसी तरह ‘स्वच्छ भारत अभियान’ देश में स्वास्थ्य और शुचिता का वातावरण तैयार करने की दिशा में उठा कदम है। ‘जनधन योजना’ के तहत गरीबों को अपने बचत के नियोजन में मदद करने के लिए बैंक खाते खोले गए हैं।

व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन के लिए छह महीने की अवधि भले छोटी हो, मगर 180 दिन नई सरकार की नीयत और इरादों को परखने का काफी अच्छा वक्त है। और… अब तक के बुनियादी कामों का यही संकेत है कि मोदी कम से कम सरकारी निष्क्रियता के माहौल को तोडऩे में कामयाब रहे हैं।

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