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हास्य और लास्य के महीने में राजनीति के बदलते रंग

हास्य और लास्य के महीने में राजनीति के बदलते रंग

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर राज्यसभा में चर्चा का जवाब देते वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नारी अट्टहास का सामना करना पड़ा। इसका उन्होंने अपने तईं जवाब भी दिया। राज्यसभा सभापति वेंकैया नायडू से निवेदन करते हुए उन्होंने कह दिया कि हंसने दीजिए उन्हें, रामायण के बाद ऐसी हंसी सुनने को मिली है। इसे लेकर कांग्रेस और अट्टहास करने वाली रेणुका चौधरी ने मुद्दा बना दिया। प्रधानमंत्री से माफी की मांग की जाने लगी। इस पूरे प्रकरण को सहज और हल्के मूड में लिया जा सकता था। फागुनी बयार की दस्तक के बीच अव्वल तो होना यह चाहिए था कि हास-परिहास के तौर पर ऐसा लिया जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसे देखकर ऐसा लगता है कि हमारे जीवन से हास-परिहास की जगह कम होती जा रही है। राजनीति निश्चित तौर पर रोजाना के ढ़ेर सारे तनाव का जरिया है। लेकिन इसमें भी परिहास के मौके तलाशे जा सकते हैं। लेकिन ऐसा अब नहीं हो रहा है। लेकिन अतीत में ऐसा नहीं था।

भारतीय संसद हास और परिहास से गूंजती थी। इंदिरा गांधी की सरकार थी। उस दौरान सरकार ने महिला के इस्तेमाल वाली बिंदी और कुछ सौंदर्य प्रसाधनों पर टैक्स लगा दिया। इसे लेकर तब विपक्ष ने हंगामा बरपा दिया था। समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने इसे तब मुद्दा बनाते हुए लोकसभा में कहा था कि जिस देश की प्रधानमंत्री महिला हो, वहां महिला सौंदर्य प्रसाधनों पर टैक्स लगा देना समझ में नहीं आता। उन्होंने इस मुद्दे पर धाराप्रवाह भाषण दिया था। उन दिनों लोकसभा में पटना से चुनकर पहुंची कांग्रेस की युवा नेता तारकेश्वरी सिन्हा का व्यक्तित्व सांसदों के आकर्षण का केंद्र था। उन्हें सैकड़ों शेर-ओ-शायरी याद थीं। वे संसद की बहसों में जिंदादिली से हिस्सा भी लेती थीं। जब महिला प्रसाधनों पर डॉक्टर लोहिया तकरीर कर रहे थे, तब तारकेश्वरी सिन्हा उठीं और उन्होंने लोहिया से पूछ लिया, ‘लोहिया जी, आपको इस विषय की इतनी जानकारी कैसे मिली।’ लोहिया ने देर नहीं लगाई। तपाक से जवाब दे डाला, ‘तारकेश्वरी जी, आपने मौका ही कहां दिया।’ कहना न होगा कि पूरा सदन ठहाकों से गूंज उठा था। यहां यह बता देना उचित है कि लोहिया ने विवाह नहीं किया था। बहरहाल संसद की एक गंभीर बहस से उपजे तनाव को इस विनोदपूर्व संवाद ने सहज बना दिया था। सोचिए आज के दौर में लोहिया ने ऐसा बोला होता तो नारी अस्मिता का कितना बड़ा सवाल उठ खड़ा होता।

जिंदगी में हास-परिहास का अपना महत्व है। फागुन का महीना जिंदगी में विनोद और हंसी के महत्व को ही जताने आता है। सालों भर जिंदगी के तनाव के चलते मानव मन में क्षोभ, निराशा, गुस्सा जैसे नकारात्मक भाव भरता रहता है। फागुन का महीना मन से इन दूषित तत्वों को निकालने के लिए विरेचन का जैसा महीना बनकर आता है। महाभारत के शांति पर्व की एक कथा के मुताबिक फागुन के महीने में लोगों को एक-दूसरे से हास-परिहास करने, एक-दूसरे पर रंग-गुलाल उड़ेलने और पानी-कीचड़ फेंकने की छूट होती थी। फागुनी बयार वैसे भी शरीर को लास्य से भर देती है। भोजपुरी में एक गीत है, फागुन में बुढ़वो देवर लागे यानी बसंत में बूढ़ा भी देवर लगता है। चूंकि राजनीति भी समाज का ही हिस्सा है। इसलिए राजनीति से भी ऐसी उम्मीद की जाती रही है कि वह हास-परिहास से भरी रहे। वह मानसिक और सामाजिक शांति के लिए भी जरूरी होता है।

लेकिन राजनीति अब इससे दूर होती जा रही है। चूंकि राजनीति ही शासक का चुनाव करती है, इसलिए उसका असर समाज पर सबसे ज्यादा पड़ता है।

याद आता है चीन को लेकर संसद में हुई एक बहस। अक्साई चीन इलाके में चीन के बढ़ते कब्जे को लेकर चीन युद्ध के पहले लोकसभा में बहस हुई। चीन की बढ़ती साम्राज्यवादी नीति पर लोकसभा में तब देहरादून के कांग्रेसी सांसद महावीर त्यागी ने सवाल उठाया। त्यागी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कितने नजदीकी थे, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें नेहरू की मां स्वरूप रानी बख्शी अपना दूसरा बेटा मानती थीं। उन दिनों नेहरू पंचशील के सिद्धांत के चलते चीन पर अगाध भरोसा करते थे। लिहाजा उनकी नजर में चीन की साम्राज्यवादी नीति में दम नहीं था। लिहाजा उन्होंने महावीर त्यागी को कह दिया कि वैसे भी जिस इलाके पर चीन की नीयत खराब होने की बात की जा रही है, वहां घास का एक तिनका भी नहीं उगता। इसका जबर्दस्त जवाब महावीर त्यागी ने दिया था। प्रधानमंत्री के इतना कहते ही वे अपनी सीट से उठे। अपने सिर से गांधी टोपी उतारी और सिर झुकाकर कहा, ‘वैसे मेरे सिर पर एक भी बाल नहीं है, लेकिन क्या मैं अपना शीश चढ़ा दूं?’ उन्होंने नेहरू को गहरा जवाब दिया था, लेकिन उनका तरीका ऐसा था कि पूरी लोकसभा ठहाकों से भर उठी थी।

Holi celebrations

भारतीय राजनीति से हास्यबोध हाल के दिनों में कुछ ज्यादा ही गायब हुआ है। 1980 के चुनावों में चंदौली लोकसभा सीट से कमलापति त्रिपाठी कांग्रेस के उम्मीदवार थे। उनके मुकाबले समाजवादी राजनारायण ने पर्चा दाखिल किया था। एक दिन चुनाव प्रचार में दोनों का आमना-सामना हो गया। राजनारायण पंडित जी के पास जा पहुंचे। ना सिर्फ उनसे अपनी विजय का आशीर्वाद मांगा, बल्कि अपने समर्थकों को चाय-नाश्ता कराने को भी कहा। कमलापति जी ने राजनारायण को ना सिर्फ विजयी होने का आशीर्वाद दिया, बल्कि अपने समर्थकों को नाश्ता भी कराया। इसके ठीक पांच साल पहले राजनारायण की ही अपील पर कांग्रेस की सर्वोच्च नेता इंदिरा गांधी की संसद सदस्यता को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज किया था। क्या आज के दौर में ऐसी घटना कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के बीच दिख सकती हैं?

1996 में अपनी तेरह दिन की सरकार का विश्वासमत पेश करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था, ‘हमारे विपक्षी भी कहते हैं कि वाजपेयी अच्छे हैं, लेकिन गलत पार्टी में हैं।’ उनके इतना कहते ही तकरीबन पूरी लोकसभा से आवाज उठी , हां..वाजपेयी ने कुछ देर के विराम के बाद लोकसभा के सामने सवाल उछाल दिया, ‘अब यह सदन बताए कि वह अच्छे वाजपेयी के लिए क्या करने जा रहा है?’ कुछ देर तक सदन में सन्नाटा रहा, फिर हंसी का फव्वारा फूट पड़ा था। 1995 की बात है। साहित्य अकादमी के सचिव इंद्रनाथ चौधरी थे। उन दिनों साहित्य अकादमी एक कार्यक्रम करता था, कवि से मिलिए। उन दिनों देश मान चुका था कि वाजपेयी देश के भावी प्रधानमंत्री हैं। वाजपेयी जी कवि भी हैं, लिहाजा उन्हें साहित्य अकादमी ने कवि से मिलिए कार्यक्रम में बुलाया। दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुए उस कार्यक्रम में वाजपेयी ने कई कविताएं सुनाईं। जिसमें एक कविता राम और सीता पर भी थी। कार्यक्रम के आखिर में कवि से सवाल-जवाब का कार्यक्रम होता था। उस कार्यक्रम में एक महिला ने वाजपेयी से सवाल पूछ लिया, ‘वाजपेयी जी, आपने राम-सीता की कविता सुनाई। आपसे एक जानकारी चाहिए, आपको सीता मिली ही नहीं या आप राम नहीं बन पाए।’  वाजपेयी ने अपने सुपरिचित अंदाज में विराम लिया, मंच पर अकेले बैठे-बैठे नजरें नीची कीं और उस महिला को मुखातिब होकर बोल दिया, ‘आइए, किसी दिन एक साथ पेशतर में हम इस सवाल का जवाब ढूंढ़ते हैं।’ पूरा हॉल हंसी से गूंज उठा था और कार्यक्रम खत्म हो गया था। शुक्र है कि तब इस सवाल-जवाब को सहजता से लिया गया था, नारी अस्मिता या पुरूषवादी वर्चस्व के तौर पर इसे नहीं लिया गया था।

भारतीय समाज में हास्य की परंपरा कितने गहरे तक है, इसका अंदाजा आपको गांवों में मिल सकता है। जब बहुरियाएं अपने देवरों से मिलती हैं और उनकी तरफ मजाकिया सवाल उछालती हैं और देवर उनका कभी जवाब देते हैं तो कभी खीसें निपोर कर कट लेते हैं। प्राचीन भारतीय समाज का प्रतिबिंब है संस्कृत का शास्त्रीय साहित्य। कादंबरी हो या चंद्रापीड कथा या स्वप्नवासवदत्तं या प्रतिज्ञायौगंधरायण, हर्ष चरित हो या ऐसे ही ग्रंथ हैं, वहां हास्य और लास्य के त्यौहार बसंत का रंगीन वर्णन आता है। उसे पढ़ते हुए लगता है, जैसे कठुआए काठ में भी कोंपल फूट गई। बसंत में वैसे प्रकृति में ऐसा ही होता है। हजारी प्रसाद द्विवेदी का निबंध अशोक के फूल में बसंतोत्सव किस तरह जीवंत होता है, इसे वे ही जानते हैं, जिन्होंने इस निबंध का स्वाद लिया है। विद्यानिवास मिश्र का निबंध, फागुन दुई रे दिना पढ़िए, लगेगा जैसे लोक और शास्त्र का बसंत जैसे जीवंत हो गया। इस बसंत राग में समाज का हर तबका मनोयोग से शामिल होता था। ताकि आने वाले दिनों में स्वस्थ मन से समाज को आगे बढ़ाया जा सके। काश कि राजनीति एक बार फिर इसे समझती..वैसे समझना तो सोशल मीडिया को भी है…जिसे अब विवादस्पदपूर्ण सवाल उठाने में ही ज्यादा आनंद आता है…

उमेश चतुर्वेदी

 

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