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राजस्थान में अजब-गजब होली

राजस्थान में अजब-गजब होली

इन्द्रधनुषी छटा के लिए जग विख्यात राजस्थान के बारे में यह कहना मुनासिब होगा- सिम्पली कलरफुल राजस्थान और जब रंगो की बात हो तब इस प्रदेश की होली के क्या कहने। वैसे भी ऋतुराज वसंत के मौसम से प्रकृति भी अपना रूप बदलने लगती है। जाती हुई सर्दी तथा आने वाली गर्मी के मिलन बिन्दु रंग पर्व होली पर प्रकृति की सतरंगी पिचकारी जीवन में आनंद एवं उल्लास का प्रतीक बन जाती है। प्रेम और भाईचारे सहित एकता की मिसाल बने इस पर्व पर जनमानस को अपनी भड़ास निकालने का खुला मौका मिलता है। मौजमस्ती के आलम में सभी डूब जाते है।

शौय्र्य और बलिदान के धरातल पर राजस्थान सिरमौर है। इसीलिए यहां पिचकारी और कटार फाग तथा खाग, रक्त और रंग दोनों से होली खेलने की परम्परा रही है। इसी परम्परा के निर्वाह में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी सेना से जूझते भरतपुर के जाटों की कीर्ति होली के मौके चंग पर ”गोरा हटजा। भरतपुर गढ़ बंाको रे, गोरा हटजा’’ की हुंकार से गायी जाती है। राजस्थानी लोकगीतों में फागुन तथा होली की गूंज कभी खत्म नहीं हुई।

राजस्थान का पूर्वांचल ब्रज की संस्कृति से सराबोर है जहां श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से लेकर होली की मस्ती का अनूठा संगम है। ब्रज चौरासी कोस और गोवर्धन परिक्रमा मार्ग से जुड़े भरतपुर जिले पूंछरी का लौठा डीग, कामां के निकट नंदगांव बरसाने की होली तो जगविख्यात है जिसे देखने विदेशी पर्यटक भी आते है। ब्रज अंचल से जुड़े इस भू भाग में होली या होरी को ‘होरा’ की संज्ञा दी जाती है। इसलिए डीग क्षेत्र में रंगपर्व होली को हुरंगा महोत्सव के रूप में मनाया जाता रहा। कई दशकों तक विधायक रहे राजा मानसिंह ने अपने निर्धन से पूर्व तक डीग में हुरंगा के रंग रंगीले आयोजन की छटा बिखेरी। विशालकाय बम्ब (ढ़ोल) की गूंज पर लोकगीत गाते समूह का नृत्य अजीब समा बांध देता था। कई मर्तबा राजा मानसिंह डीग कुम्हेर से भरतपुर तक खुली ट्रेक्टर ट्रोली में बम्ब पार्टी लेकर आते थे। तत्कालीन भरतपुर रियासत के महाराजा तो हाथी पर सवार होकर आम जनता से होली खेलते थे। उनकी बड़ी पिचकारी या पिचकरा तो दूर-दूर तक लोगों को भिगो देता। जगह-जगह पर रियासत की ओर से रंग तथा पानी की भरपूर व्यवस्था की जाती थी। भरतपुर रियासत में तो वसंत दरबार लगाने की परम्परा रही है। होली पर हास्य कवि सम्मेलनों का प्रचलन रहा है। होली का हुड़दंग एक पखवाड़े तक परवान चढ़ता जन मनोरंजन के लिए तरह-तरह के स्वांग रच जाते। ग्रामीण इलाकों में होली पर गोबर और कीचड़ तक इस्तेमाल होता था। यार दोस्त किसी एक को निशाना बनाकर हंसी मजाक तथा ”होली का भाड’’ बनाने में नहीं चूकते थे। अब तो अबीर गुलाल तथा रंगो के प्रयोग तक होली सिमट गई है। भरतपुर में पिछले तीन दशकों से भी अधिक समय से मित्र मण्डली तरूण समाज समिति द्वारा रंगीलो महोत्सव मनाया जाता है जिसमे मूर्खाधिराज की सवारी विशेष आकर्षण का केन्द्र होती है। इस यात्रा में लोग स्वांग रचाकर लोगों का मनोरंजन करते हैं। एक बार पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गिर्राज प्रसाद तिवारी मदारी और जमूरे का स्वांग बनाकर बाजारो में निकले तो लोग उन्हे पहचान नहीं पाये।

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ब्रज संस्कृति में रचे पचे मेवाड़ अंचल के श्रीनाथद्वारा में भी होली की छटा देखी जा सकती है। वैष्णव सम्प्रदाय के इस मुख्य हवेली मन्दिर में कई दिनों तक होली की धूम मचती है जिसमे फाग महोत्सव का आनंद दुगुना हो जाता है। मेवाड़ के आदिवासी क्षेत्र के लोग हर्षोल्लास से होली मनाते है और यह परम्परा आज भी जीवंत है। बांसवाड़ा और डूंगरपुर में आदिवासी उत्साहपूर्वक गैर निकालते हैं और अजब गजब तरीके से होली पर्व मनाते हैं। इन जिलों के मुख्य गांवो में गैर दल की अनेक टोलियां लोगों का गढ़ बनाकर एक खेल खेलते हैं, एक-एक व्यक्ति बारी-बारी से इस गढ़ को तोडऩे का प्रयास करता है और सफल होने पर उसे सम्मानित किया जाता है। इसी तरह खजूर के पेड़ पर एक लम्बा कपड़ा लटकाया जाता है और गैर दलों का समूह पिरामिड के रूप में खड़ा होता है और अन्य दल के युवा खजूर के शिखर तक पहुंचने का प्रयास करते है। डूंगरपुर के ओवरी गांव में होली पंचमी पर पत्थरो की रॉड खेली जाती है जिसमे आपस में पत्थर बरसाये जाते है। हर साल 70-80 लोग इससे जख्मी होते है। आम धारणा यह है कि इस अवसर पर यदि खून नही निकला तो अपसकुन हो जाता है। इस खेल को युद्व कौशल का प्रतीक माना जाता है।

भीलवाड़ा जिले में भी गैर निकाली जाती है। गंगानगर हनुमानगढ़ के पीलीबंगा में महिलायें पहले पुरूषों की खातिरदारी करती है और बाहर निकलने पर गीले कोड़ से पिटाई का आनंद लेती है।

होली पर शेखावाटी अंचल में ‘गीदड़’ की गूंज शबाब पर होती है। पैरों में घुंघरू तथा चंग की धाप पर घेरा बनाकर न वर्तकों की गति लोकगीतों के साथ जब ताल बिठाती है तो रसिक दर्शक सुध-बुध खो बैठते हंै। गीदड़ का आयोजन अल सुबह तक चलता है। बांसुरी की मनमोहक धुने तो वातावरण में मिश्री घोल जाती है। गींदड़ का भव्य आयोजन कभी एक दंगल का रूप लेता है जब कुश्ती अखाड़े की तरह बीच में मिट्टी का बड़ा चबूतरा बनाकर उसमे गींदड़ होती है। फतहपुर शेखावाटी में ऐसे एक आयोजन में जनसत्ता के तत्कालीन संपादक प्रभाष जोशी (स्वर्गीय) के साथ इस लेखक को भी गींदड़़ में भाग लेने का अवसर मिला। गींदड़़ खेलने वालों की अनेक टोलियां बनी हुई है जो सीकर, चुरू, झुंझुनू के साथ जयपुर में भी अपनी कला प्रदर्शित करती है। अब तो शादी विवाह में भी गींदड़़ के चंग थाप की गूंज होने लगी है।

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ढूंढ़ार क्षेत्र याने जयपुर अंचल में भी होली धूमधाम से मनाने की परम्परा रही है। राजा महाराजाओं के शासन काल में होली की धूम परवान पर थी। शासक आम जनता से होली खेलने के लिए महलों से बाहर निकलते। जयपुर में रंग गुलाल के गोटे फेकने की परम्परा रही है। लाख में बने ये गोटे कारीगरों की रोजी रोटी का भी साधन थे। होली पर कवि सम्मेलनों में किसी खास शख्स को मूर्खाधिराज बनाकर तरकारी की माला तथा गर्दभराज की टोपी इत्यादि पहनाकर सुशोभित किया जाता है। समाचार पत्रों के होली अंको में व्यंग्यात्मक उपाधियां दी जाती थी जिसका पाठक आनंद लेते थे। मारवाड़ याने जोधपुर संभाग में फागुन लगते ही होली पर्व की रंगत शुरू हो जाती है जो शीतला सप्तमी या अष्टमी तक बरकरार रहती है। विधि विधान से वसंत पंचमी पर होली का डांडा रोपा जाता है। यहां होली जलाने की जगह मंगलायी जाने की परम्परा रही है और पंडितों द्वारा इसका मुर्हूत निकाला जाता है। रियासत के समय होली मंगलाने के समय दरबार के पदाधिकारी मौजूद रहते। होली का डांडा रोपने के अगले दिन से गैर टोली फाग गीत गाते हुए किले तक पहुंचती। जोधपुर में राजा मानसिंह के समय इसका आलम परवान पर था। साहित्यानुरागी महाराजा ने स्वयं फाग गीत तथा होरिया लिखी जो आज भी जनमानस में लोकप्रिय है। किले में होली पर दरबार लगाया जाता। जनान खाने में भी उत्साहपूर्वक होली खेली जाती। एक जमाने में मेहरानगढ़ दुर्ग से राणा की सवारी निकाली जाती थी। ऐतिहासिक घटनाक्रम के अनुसार मेवाड़ में राव रिड़मल की षड्यंत्रपूर्वक हत्या से मारवाड़ के लोग कुपित हो गये। मेवाड़ के प्रति असंतोष जताने के मकसद से लोग अपने बच्चों के सिर पर सात पत्थर वार करके राणा की सवारी पर फेकते। यह भी मान्यता है कि इस प्रथा के पीछे पारिवारिक कष्ट हारी-बीमारी के निवारण के प्रति आस्था का भाव था। रियासतकालीन बहियो में वि.सं. 1970 तक ‘राणा’ सवारी निकालने का उल्लेख मिलता है। इस परम्परा के शुरू होने तथा बाद मे बंद होने के बारे में जानकारी नहीं मिलती।

सीमावर्ती बाड़मेर जिले में गैर डांडिया नृत्य का प्रचलन रहा है। जिले के कनाना, सिवाड़ा, खण्डप सनावडा लाखेटा इत्यादि में गैर दलों की धूम रहती है। नेहरू युवा केन्द्र के समन्वयक रहे पद्यश्री मगराज जैन (स्वर्गीय) और उनकी टीम ने इस कला को प्रोत्साहन दिया। केन्द्र और राजस्थान संगीत नाटक अकादमी जोधपुर के सहयोग से सनावड़ा की गैर नर्तकों की टोली ने 1982 में एशियाड खेलो के समय दिल्ली में अपनी प्रस्तुति दी तो गणतंत्र दिवस समारोह में कनाना की टोली ने हिस्सेदारी की। आगी बागी गैर टोली के सदस्यों की वेशभूषा विशिष्ट होती है। पैरो मे घुंघरूं बांधे नर्तकों की टोली जब ढ़ोल की थाप और थाली की टंकार पर लूरे ले उछलती है तो दर्शक ठगे रह जाते हैं। लू (लोकगीत) लेती महिलाओं के स्वर वातावरण को गुंजित करते हैं। समुचित प्रोत्साहन के अभाव में यह कला अब सिकुड़ती जा रही है।

Lathmar Holi festival in Barsana

होली के अवसर पर सीमांत जिले बाड़मेर जालोर पाली तथा गोड़वाड़ इलाके में ‘ईलौजी’ आकर्षण के केन्द्र बन जाते हैं। घटना प्रसंग के क्रम में हिरण्यकश्यप की बहिन होलिका से विवाह करने के लिए घोड़ी पर सवार ईलौजी दूल्हा बनकर पहुंच तो गये लेकिन इससे पहले भक्त प्रहलाद को गोदी में बिठाने वाली होलिका आग में जलकर भस्म हो गई। इससे आवेश में आये ईलौजी ने दूल्हे की पोशाक फाड़ दी और शरीर पर होलिका की राख मल अपनी आस पूरी की और हमेशा के लिए कुंवारे रहे। इस प्रसंग से वह जनमानस में हंसी के पात्र बन गये। होली पर ईलौजी को अश्लील मुद्रा के रूप में सज्जित किया जाता है और लोग इसका आनंद लेते हैं। एक गांव में तो ईलौजी की बड़ी मूर्ति बनी हुई है जिसके बारे में यह किवंदती है कि महिला संतान प्राप्ति के लिए अजब तरीके से मूर्ति की पूजा करती है।

जालोर क्षेत्र के आहोर की भाटा गैर की अजब कहानी है। जोखिम भरे इस खेल में लाठियों तथा भाटा (पत्थर) का उपयोग किया जाता है। घावों से बचने के लिए उपाय किये जाते हंै पर इसे चामुण्डा का प्रसाद माना जाता है। आहोर के ठाकुर रावत सिंह ने करीब डेढ़ सौ बरस पहले इस परम्परा की शुरूआत इस उदेश्य से की थी कि बाहरी फौज के हमले से मातृभूमि की रक्षार्थ नागरिकों को त्याग व बलिदान के लिए प्रेरित किया जा सके। इस अनूठी और जोशीली भाटा गैर को रोकने का प्रयास आपातकाल के दौरान हुआ। वर्ष 1975-76 में तत्कालीन जिला कलेक्टर वी एल माथुर ने आहोर की भाटा गैर को आलू टमाटर से खेलने के आदेश जारी कर दिए। धारा 144 लागू कर दी गई। लागों से लाठियां छीनते- छीनते पुलिस परेशान हो गई। ढ़ोल धमाकों से जोश में जनता और पुलिस की भिंड़त भी हुई और जैसे तैसे लोगों ने मामूली मोरचाबंदी करके इस अजीब खेल की रस्म अदायगी की। आहोर की लाठी भाटा गैर दुनिया में अनूठी है। पाली जिले तथा अजमेर के ब्यावर में होली पर्व पर बादशाह की सवारी निकालने की परम्परा रही है। इसे मुगल बादशाह अकबर द्वारा होली खेलने की भावना से प्रेरित बताया जाता है। नसीराबाद में ढ़ोला मारू करौली जिले में लांगुरिया के रूप में नृत्य एवं होली गीत, श्री महावीर जी सहित ब्रज अंचल में लठामार होली की परम्परा का निर्वाह किया जाता है। हाडौती अंचल में भी होली पर्व जोश- खरोश से मनाया जाता है।

पिछले दशक से विशेषकर शहरी इलाको में होली पर्व का रूप सिमटता जा रहा है। अब तो धुलंडी के दिन लोग गुलाल और रंग का इस्तेमाल करते हैं और अपने परिचितों एवं रिश्तेदारों के साथ होली खेलने तक सीमित रहते हैं। अलबत्ता बाजारों में दुकानदार तथा ऑफिसों में यदाकदा होली जलाने से एक दिन पहले गुलाल लगाकर पर्व की खुशी मनायी जाती है। होली के बाद रामा सामा करने एक दूसरे के यहां जाना गुंजिया खिलाने तथा भांग ठंडाई की परम्परा बनी हुई है।

जयपुर से गुलाब बत्रा

 

 

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