ब्रेकिंग न्यूज़ 

अपने ही जाल में फंसे ट्रंप

अपने ही जाल में फंसे ट्रंप

पिछले हफ्ते वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम सुर्खियों में रहा, जो दावोस नाम से भी चर्चित है क्योंकि उसी सुंदर शहर में उसका आयोजन होता है। दावोस में उद्योग जगत के आला लोग, राजनैतिक और वेचारिक नेतृत्व और पत्रकारों का चार दिनों का जमावड़ा होता है जिसमें वैश्विक मुद्दों पर विचार-विमर्श होता है।

इस साल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी दावोस पहुंचे। वे अठारह साल में वहां पहुंचने वाले पहले पदेन राष्ट्रपति हैं। दो साल तक भूमंडलीकरण विरोधी लोकलुभावन भाषणों के बाद उनकी दावोस में मौजूदगी को विश्व भू-राजनैतिक मामलों में चीन की बढ़ती शह को रोकने की कोशिश की तरह देखा जा रहा है। दुर्भाग्य से, उनकी हाल की कुछ नीतिगत पहल और कमजोर रुझान उनकी कोशिशों में पहले ही पलीता लगा चुके हैं।

फ्रांस के राष्ट्रपति मैकरॉन, इटली के प्रधानमंत्री गेंटीलोनी और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रंप के ‘अमेरिका पहले’ नारे की आलोचना की। यहां तक कि इस साल कॉन्फ्रेंस का विषय ”विभाजित विश्व में साझा भविष्य का निर्माण’ भी ट्रंप के आर्थिक संरक्षणवाद वाले नजरिए को मुंह चिढ़ा रहा था। इस बीच, चीन विश्व मंच पर अमेरिका के खाली किए स्थान को भरने को काफी उत्सुक लग रहा है। उसने अपनी ‘वन बेल्ट, वन रोड’ योजना को दक्षिण अमेरिका के देशों तक भी विस्तार किया है।

विश्व बिरादरी से ट्रंप का अलगाव लंबा होता जा रहा है। खासकर व्यापार समझौतों और अंतरराष्ट्रीय संधियों के प्रति ट्रंप का प्रतिकूल रवैया उसके साथी देशों और व्यापार सहयोगियों दोनों को विदका रहा है। ट्रंप के दौर में अमेरिका को प्रशांत पार साझेदारी और पेरिस संधि वगैरह से पीछे हटते देखा गया, जो पहले किया जा चुका था। इन समझौतों पर अमल होना था और ट्रंप ने धमकी दी कि अगर नाफ्टा और नाटो जैसी संधियों पर दोबारा बातचीत नहीं की गई तो वे पीछे हट जाएंगे।

संधियों को सीधे स्वीकार न करने के अलावा ट्रंप बहुपक्षीय संधियों के उल्लंघन पर भी उतावलापन दिखाते हैं। विश्व व्यापार संगठन के नियमों और उसकी व्यवस्था के बावजूद ट्रंप ने कई नाजायज और गैर-कानूनी शुल्क लगाया या लगाने की धमकी दी। मसलन, वाशिंग मशीन और सौर ऊर्जा बैटरियों पर हाल की व्यवस्था और स्टील, एल्युमिनियम तथा दूसरे चीनी सामान पर शुल्क थोपने की धमकी दी है। ऐसे शुल्क लगाने की कोशिश अमेरिका में बुश सरकार के दौरान भी हुई थी लेकिन डब्लूटीओ ने उन्हें समझौते के विपरीत बताया और उन्हें हटा देना पड़ा।

इन हरकतों ने अमेरिकी राष्ट्रपति को विश्व बिरादरी के सामने भरोसे के लायक नहीं रहने दिया है और उन्हें जायज व्यापार संधियों के प्रति अनिच्छुक साबित किया है।

इसके अलावा अमेरिका में प्रवासियों के प्रति ट्रंप के बेहद कटु वाक्यों ने भी उनके कई सहयोगियों को विदका दिया है, खासकर उनका शरणार्थियों पर निशाना साधना तो दुनिया को कतई नहीं सुहाता। ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और कई अन्य देशों ने उनके भाषणों और कार्रवाइयों की निंदा की, खासकर ओबामा सरकार के दौरान किए गए शरणार्थियों से संबंधित समझौतों से वापस हटने की कार्रवाइयों की काफी आलोचना की गई। दुर्भाग्य से, ट्रंप अपने रवैए पर कायम रहे और विश्व बिरादरी को अंगूठा दिखाते रहें।

ट्रंप के प्रवास विरोधी और मुस्लिम विरोधी बड़बोलेपन ने खासकर लंदन के मेयर से उनकी सार्वजनिक कहासुनी के बाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों को काफी नुकसान पहुंचाया। ट्रंप के रवैए के विरोध में ब्रिटेन ने अमेरिकी राष्ट्रपति से संबंध तोड़ लिए और उनका राजकीय दौरा रद्द कर दिया। मेयर और प्रधानमंत्री दोनों ने ही ट्रंप की हरकतों और नजरिए की तीखी आलोचना की।

राष्ट्रपति की चलताऊ टिप्पणियों ने भी अमेरिका के राजनैतिक असर को प्रभावित किया है। येरुशलम पर उनके ट्विटर ऐलान और द्विदेशीय समाधान को खारिज करने से पश्चिम एशिया के कई सहयोगियों को उनसे नाराज कर दिया है। ये देश उनकी हरकतों को इजराईल को खुश करने के चक्कर में शांति को तवज्जो न देने जैसा मानते हैं। इस बीच, मैक्सिको और चीन पर उनके लगातार हमलों से यह हुआ है कि मैक्सिको तो अलग हो गया है और चीन ने विश्व मंच पर वह जगह हासिल करने की कोशिश की है, जहां रहने के ट्रंप काबिल नहीं हैं।

ट्रंप ने दावोस में इस रुझान को पलटने की कोशिश की। कहा कि ”अमेरिका कारोबार के लिए खुला है’’ और ”अमेरिका पहले का मतलब अमेरिका अकेले नहीं होता है।’’ लेकिन उनके भाषण और नारों की असली वजह साफ नहीं थी क्योंकि वे किसी भी अपने संरक्षणवादी रवैए से पीछे हटने को तैयार नहीं हुए या अपने हाल के वैश्विक पहल में बदलाव लाने के प्रति खुले नहीं थे। सो, उनके बयान का फौरी तौर पर कोई खास मतलब नहीं निकला। इस तरह निवेश और सहयोग के उनके आधे-अधूरे बयान आश्वस्त नहीं कर पाए और दुनिया अमेरिका के बिना भी आगे बढऩे लगी है।

भाषण के दौरान ट्रंप ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था के प्रति आकर्षित करने की कोशिश की, आर्थिक वृद्धि और शेयर बाजार में तेजी का श्रेय लेना चाहा। उन्होंने कहा कि उनके नेतृत्व और दिसंबर में पास हुए कर कटौती बिल की वजह से अमेरिकी अर्थव्यवस्था में तेजी लौटी। इस तरह उन्होंने खुद को बहुमूल्य व्यापार सहयोगी बताकर पेश करना चाहा।

हालांकि ये बातें अतिश्योक्ति ज्यादा थीं या उनमें बाहरी वजहों को छुपाने की कोशिश थी। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में तेजी 2017 की वैश्विक आर्थिक सुधारों की वजह से थी। उसमें ट्रंप की किसी देश या विदेश संबंधित नीति को कोई लेनादेना नहीं था। दूसरे, वे जिस वृद्धि का श्रेय लेना चाहते हैं, वह ओबामा प्रशासन के दौरान शुरू हो गई थी। वे बस यही श्रेय ले सकते हैं कि उन्होंने अर्थव्यवस्था के साथ ज्यादा छेड़छाड़ नहीं की और ओबामा की फायदेमंद नीतियों को जारी रहने दिया। वैसे, वे इसका कोई श्रेय नहीं ले सकते कि उनके किसी फैसले से ऐसा कुछ हुआ।

जहां तक ट्रंप के कर कटौती बिल का संबंध है, इस बिल का मजमून अमेरिकी हेरिटेज फाउंडेशन ने बनाया और तब आगे बढ़ाया था, जब ट्रंप का राजनीति के मंच पर अवतरण भी नहीं हुआ था। बिल उपराष्ट्रपति पेंस के जरिए पास हुआ, जो फाउंडेशन के साथ लंबे समय से जुड़े रहे हैं, न कि उसमें ट्रंप को कोई योगदान है। इसके अलावा यह तो अभी महीने भर पहले ही पास हुआ है और अगले मार्च से शुरू हो रहे वित्त वर्ष में ही उसका असर दिखेगा। अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव की वह फिर भी एक वजह ही होगा और उसका असर अभी बता पाना जल्दबाजी होगी।

इस बीच, चीन ट्रंप के अलगाव की नीति से विश्व मंच पर खाली हुई जगह को भरने की कोशिश कर रहा है। वह अमेरिका के अलग होने से प्रशांत पार साझेदारी में नेतृत्व की भूमिका में आ गया है। फिर उसने वन बेल्ट, वन रोड पहल से भी अपना असर व्यापक किया है। एक वरिष्ठ चीनी राजनयिक ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अब्बासी का परिचय दिया और कहा कि उनके देश में हम बिजली घरों से लेकर बंदरगाह और सड़क में भारी निवेश कर रहे हैं। अब्बासी ने भी चीन की काफी तारीफ की।

चीन दक्षिण अमेरिकी देशों ब्राजील और वेनेजुएला में भी पहल कर रहा है। चीन की सत्तारूढ़ पोलितब्यूरो के ली हे ने कॉन्फ्रेंस में अच्छा भाषण दिया और उसमें सबसे ज्यादा भीड़ जुटी। उनके भाषण के बाद ब्राजील की राष्ट्रपति टेमर ने लैटिन अमेरिका के देशों में चीन की पेशकश का स्वागत किया।

चीन की वन बेल्ट वन रोड पहल शुरू में मध्य एशिया तक ही सीमित थी लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार और संधियों-समझौतों से अमेरिका के हटने से चीन को शह मिली और उसने वन बेल्ट वन रोड पहल का विस्तार पश्चिम एशिया, यूरोप, दक्षिण एशिया और पूर्वी अफ्रीका तक में कर रहा है। इसके तहत चीन के सरकारी बैंकों से खासकर हाइवे, रेल, बंदरगाह और बिजली घरों में खरबों डॉलर के निवेश का प्रस्ताव है। पूर्ण विकसित आर्थिक कॉरीडोर से चीन को निर्यात में बढ़त मिलेगी और एक साझा बाजार कायम होगा।

ट्रंप प्रशासन ने दावोस को चीन के बढ़ते असर पर अंकुश लगाने के मौके के तौर पर इस्तेमाल करने और अपने संरक्षणवादी और अलगाववादी रुझान को पलटने की कोशिश की लेकिन कॉन्फ्रेंस में उसका असर नहीं के बराबर दिखा, न ही कोई लक्ष्य साधा जा सका। अमेरिका अपने रवैए से पहले ही विश्व मंच पर काफी जगह चीन को दे चुका है। अब चीन कैसी प्रतिक्रिया करता है, यह देखना बाकी है।

आकाश कश्यप

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.