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ईश्वर हमारी बात सुनते हैं

ईश्वर हमारी बात सुनते हैं

मनुष्य का जीवन सुख और दु:ख के समिश्रण से ही बनता है। ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं होगा जिसे जीवन में केवल सुख का सौभाग्य अथवा दु:ख का दुर्दिन देखना पड़ता हो लेकिन सुख और दु:ख दोनों ही मनुष्य की परीक्षा का समय कहा जाए तो गलत नहीं होगा। मनुष्य की असली पहचान उसी वक्त किया जा सकता है। सुख के समय वह केवल अधिक से अधिक आनंद को समेटने में लगा रहता है, तब अपना-पराया का अंदाज भी नहीं रहता। यहां तक कि अपनी खुशी के साथ किसी और को भी शामिल करना पसंद नहीं करता है। खुशी में रहकर वह इस बात को पूर्ण रूप से भूल जाता है कि उसे फिर से दु:ख का सामना भी करना पड़ सकता है। लेकिन जो व्यक्ति जीवन के मूल्यबोध को समझ लेता है, वह कोई भी अवस्था में रहकर भी अपना अस्तित्व नहीं भूलता है। वह हमेशा अपने जमीन से जुड़ा रहता है। वह उस मिलने वाले हर आनंद के लिए सदैव परमात्मा का शुक्रगुजार करता है। अपने नित्य जीवन में उन्हें स्मरण करना कभी भी नहीं भूलता है और कोई-कोई दु:ख के समय इतना अधिक घबड़ा जाते हैं कि परमात्मा के बताये हुए रास्तों पर से भटक जाते हैं। वह यह भूल जाते हैं कि हमारे लिए ईश्वर हमसे भी अधिक सोचते हैं। उनके द्वारा सोचा हुआ कार्य हमारे लिए कभी भी गलत नहीं हो सकता है।

इन सुख और दु:ख दोनों ही हालात में हम जब परमात्मा को स्मरण करते हैं तो केवल हम अपना कर्तव्य मानकर हम करते हैं। कभी-कभी हमारे अंदर धर्म के प्रति रहने वाले आस्था हमें पूजा-पाठ करने को मजबूर बना देती है। कभी-कभी कुछ पाने की इच्छा भी हमें पूजा करने को भी प्रोत्साहन देती है। हम अनेक बार यह मान बैठते हैं कि हम पूजा तो करते हैं लेकिन हमारी बात उनतक नहीं पहुंच पाती है, नहीं तो भगवान हमारी बात सुनते नहीं और न ही हमारे लिए सोचते ही। असल में देखा जाए तो परमात्मा को कभी हम सही रूप से पुकारते नहीं, अपने दिल को उनके पास लगाते नहीं,केवल फूल-चंदन-भोग-अर्पन करने से पूजा नहीं होता है। उसके लिए सर्वप्रथम अपने मन को उनके पास लगाना पड़ता है। कभी-कभी तो ऐसा होता है कि समाज में अपना परिचय कुछ इस प्रकार बनाने के लिए हम धूम-धाम सेपूजा करने लगते हैं। क्या ईश्वर को इन सब चीजों कि जरूरत होती है। केवल ईश्वर को लुभाने के लिए एक चीज कि जरूरत है वह है हमारे अंदर रहने वाली भाव कि। कभी-कभी तो हम प्रवचन सुनकर और भजन सुनकर दूसरों को अपने लिए एक सद्भावना बनाए रखते हैं। इस प्रकार ईश्वर को स्मरण करने से वह सुनते नहीं हैं।

हमारा मंतव्य स्थान कुछ और हम कुछ अलग रास्ता अपनाए तो हम कैसे अपनी मंजिल पर पहुंच पाएंगे। इस प्रकार ईश्वर को सदैव अपने ह्रदय में बैठा लें, हर सुख-दु:ख में शामिल करें, अपने से अलग ही नहीं सोचें, तभी वह भी हमारे लिए सोचेंगे। हर घड़ी उनके लिए अपना प्रेम भाव रखें। हम कुछ कर पाए कि नहीं लेकिन अगर हम उन्हें दिन-रात स्मरण करें तो हमसे गलत कार्य नहीं हो सकती। वह हमारे जटिल परिस्थतियों को सुधारने में लगे रहते हैं। देखा जाए तो वास्तविक ईश्वर हमारे हर बात को सुनते हैं और हमारे हर हालात को बेहतरीन बनाने का प्रयास भी करते हैं। लेकिन हम ईश्वर को सच्चे और सरल भाव से बोलते नहीं, यहां तक कि पहले से ही हमारा रिश्ता उनके साथ कुछ इस प्रकार रखते नहीं, ईश्वर को सच्चे और निर्मल भाव से सदैव अपने स्मरण में रखने से वह हमारे मुश्किल परिस्थितियों को खुद ही अनुध्यान करके सुधार भी देते हैं।

उपाली अपराजिता रथ

 

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