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जीत की चाहत

जीत की चाहत

हर व्यक्ति का इस दुनिया में आने का मकसद अलग होता है। हम अपने आस-पड़ोस और साथ रहने वाले कुछ लोगों की सफलता को दृष्टि में रखकर अपनी सफलता के बारे में सोचना नहीं चाहिए। हर व्यक्ति अलग-अलग गुणों का अधिकारी होते हैं। अपने अंदर छुपे हुए हुनर को पहचान करके उसी को उभारने की प्रयास करना और उसपर सफलता पाना ही हमारी जीत होनी चाहिए। असल में हमारी जीत खुद पर होना चाहिए। हमारे अंदर रहने वाले कुछ कुस्वभाव हमें अपने आपको बाहर निकालने में बाधा डालते हैं। एक बार इन कुप्रकृति के ऊपर जीत पाने से कभी भी हमें हार का सामना नहीं करना पड़ेगा अथवा अपनी जीत को साबित करने के लिए किसी और को हराने की जरूरत नहीं होती।

अपने आप जीत पाना इतना आसान नहीं है क्योंकि यह संघर्ष हमेशा हमारे अंदर चलता रहता है। हमारे अंदर रहने वाले ज्ञान के कारण हम सही और गलत के बारे में जान पाते हैं। लेकिन केवल जानने से भी सबकुछ ठीक नहीं होता है, उसे कार्य में लगाना ही बड़ी बात है। उसके लिए हमारा दृढ़ मनोबल चाहिए और एक निष्ठ अभ्यास भी जरूरी है। हमारा अपने ऊपर रहने वाला विश्वास ही हमारा मनोबल को दृढ़ बना सकता है। खुद पर विश्वास उन लोगों में होता है जिन्हें परमात्मा के ऊपर संपूर्ण विश्वास होता हो। जीत पाने के लिए सबसे अधिक अपने आप पर दृढ़ विश्वास होना चाहिए। अपने कार्य के प्रति संपूर्ण अध्यवसाय जरूरी है।

जीत की चाहत किसे नहीं होती? इस दुनिया में जितने भी व्यक्तियों ने जीवन धारण किये हैं, पहले तो वे जीने के लिए संघर्ष करते हैं और जब अच्छे तरीके से जीने लगते हैं तो वे जीतने के लिए संघर्ष करते हैं। हमेशा ही एक प्रतियोगिता चलता रहता है। देखा जाए तो हर व्यक्ति का जीने का मकसद ही दूसरों को हराना हो जाता है। जीत का असली अर्थ शायद हमें समझ में ही नहीं आती है। केवल कुछ अनुष्ठान और शिक्षा क्षेत्र में जीत को सीमित नहीं किया जा सकता है। जब हम जीत की तैयारी करते हैं तो अपने अंदर, तब मन में दूसरों को हराने की ठान लेते हैं। इस प्रकार जीतने का प्रयास करते-करते हम कब अपने आप से हार बैठते हैं, वह हमें ज्ञात नहीं होता है।

जीतने की परिभाषा को समझना एक महत्वपूर्ण कार्य है। यदपि इसे समझना उतना आसान नहीं होता है, फिर भी जीवन में उसकी आवश्यकता बहुत अधिक होता है। कभी-कभी सफलता को भी हम अपना जीत मानते हैं लेकिन वह निर्भर करता है कि हम किस क्षेत्र में सफल हैं। हमारा अध्ययन में सफलता और कार्य क्षेत्र में सफलता हमेशा हमारी जीत नहीं हो सकता। जिस अवस्था में आकर अथवा  कुछ भी चीज हासिल कर के यदि हमारे अंदर उतना अधिक प्रसन्नता और संतुष्टि नहीं हो सकता कि वह कैसे हमारे जीत हो सकता है। अधिकांश व्यक्ति जीतने के जुनून में इतना डूब जाते हैं कि अपने छोटे-छोटे बच्चों को भी उसमें डूबाए रखते हैं। उनके जीवन में केवल एक ही सपना रहता है। कैसे भी करके उन्हें जीतना ही होगा। उससे सबसे ज्यादा वह बच्चा ही प्रभावित होता है। दूसरों के साथ अपनी मुकाबला करते-करते वे अपने प्रगति की निर्णय करते हैं। उन्हें यह ध्यान देने के लिए समय भी नहीं होता है कि वह इस दुनिया में क्यों आया है।

 

उपाली अपराजिता रथ

 

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