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एक श्रीदेवी का यूं ही चले जाना

एक श्रीदेवी का यूं ही चले जाना

कलाकार की कोई चारदीवारी नहीं होती। बंधन नहीं होता। बस कला से कला और कला। कला इबादत है। अपने विभिन्न रुपों में आत्मा से परमात्मा का मेल कराती है। तभी सहसा एहसास नहीं होता कि श्रीअम्मा यंगर अयप्पन (श्रीदेवी) अब इस दुनिया में नहीं रही। अस्सी, नब्बे के दशक की जबरदस्त अदाकारा। बालीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन के साथ फिल्मों को ठुकराने का साहस रखने वाली चांदनी, तमिल फिल्मों के देवता कहे जाने वाले रजनीकांत से कभी अधिक पारिश्रमिक लेकर अदा का जादू बिखेरने वाली श्रीदेवी का यूं ही चले जाना। मुझे नहीं लगता कोई यकीन करेगा। लेकिन सच तो यही है कि अपने अभिनय से लोगों के दिल में जगह बनाने वाली श्रीदेवी अब केवल सिल्वर स्क्रीन पर ही जिंदा हैं। वह अब बॉलीवुड के इतिहास में नाचेंगी, रिझाएंगी, सदमा भी देंगी और कहेंगी देखो खुदा गवाह है।

वैसे तो श्रीदेवी से कभी मिलना नहीं हुआ। सिल्वर स्क्रीन पर श्रीदेवी की नटखट आंखे, चुलबुली हरकत, शोख अदाएं, मासूमियत और गंभीरता के भाव में पिरोई भंगिमा ही उनकी कला का एहसास कराती रही। मि. इंडिया के मोगेम्बो और नागिन के महाकाल (अमरीश पुरी) के सामने उनकी कला दम भरती रही। हालांकि उनके पति बोनी कपूर से दिल्ली के नवरंग हाऊस में कई बार भेंट हुई। बोनी अक्सर नवरंग हाऊस में अमर सिंह के दफ्तर में आते हैं। वह श्रीदेवी के पति हैं। निर्माता, निर्देशक हैं। पहचान भी रखते हैं लेकिन उनके साथ न होते हुए भी वह जहां भी रहते थे, श्रीदेवी की छवि हमेशा उन्हें घेरे रहती थी। कई बार की बातचीत में उन्होंने बताया कि शादी करके उन्हें श्रीदेवी तो मिल गई, लेकिन श्रीदेवी के भीतर जिन्दा कला सिमट गई। बोनी को यह मान लेने में कोई एतराज नहीं था कि उनसे शादी करने के बाद बालीवुड की एक बेहतरीन अदाकारा का कॉरियर खत्म सा हो गया। इसके लिए वह खुद को भी माफ नहीं कर पाते हैं। निजी जीवन के बारे में बोनी ने बताया था कि श्रीदेवी एक अच्छी पत्नी, उनकी दोनों बेटियों की बेहतरीन मां, उनके कॉरियर की एक बहुत अच्छी सहयोगी हैं। इसी के साथ वह न तो किसी की जिंदगी में ताक-झांक करती हैं और न ही किसी को अपनी जिंदगी में कोई ताक-झांक का अवसर देती हैं। शायद बोनी सही भी हैं। क्योंकि उनसे शादी करने के बाद एक दशक से अधिक समय तक रुपहले पर्दे से पूरी तरह गायब श्रीदेवी ने जब इंग्लिश विंग्लिस से वापसी की तो लगा कि वह (मॉम) बस यूं गई थी और यूं लौट आई।

बॉलीवुड की एक अभिनेत्री के बारे में यह भी कोई कम नहीं है कि उनकी कला के बारे में सब जानते हैं, निजी जिंदगी के बारे में बहुत कम जानते हैं। तभी तो यह हुआ। 54 साल की श्रेदेवी की दुबई से 24 फरवरी को मौत की खबर आई। कुछ समय बाद शराब के नशे में बाथ टब में डूबने से मौत की अफवाह फैली और सुबह होते ही सूरज की किरणों के साथ अफवाह हवा हो गई। अमर सिंह जैसे राजनेता ने भी तस्दीक कर दिया कि श्रीदेवी शराब नहीं पीती थी। महानायक अमिताभ बच्चन से लेकर बॉलीवुड के दुख- दर्द ने भी श्रीदेवी के व्यक्तित्व का एहसास करा दिया। चार दशक से अधिक के जीवन में पिछले तीस-पैंतीस साल के दौरान किसी अभिनेत्री को श्रद्धांजलि देने के लिए जमाने को इस तरह से पलक पांवड़े बिछाए नहीं देखा।

तमिल, तेलगू, कन्नड़, मलयालम.हिन्दी…..

श्रीअम्मा अयप्पन मूलत: चेन्नई(मद्रास) के सिवकाशी में पैदा हुई थी। कला बचपन से ही कूटकर भरी थी। बहुत कम उम्र में ही रुपहले पर्दे पर आई और आती चली गई। तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री और जमाने की मशहूर अदाकारा जयललिता के साथ भी अभिनय किया। एक फिल्म में जयललिता देवी पार्वती बनी हैं तो उनकी गोद में बैठी श्रीदेवी भगवान मुरुगन की भूमिका में। शिवाजी गणेशन को भी श्रीदेवी में खास प्रतिभा दिखाई पड़ी। वह एक के बाद एक फिल्मों में आती चली गई। इतनी की रजनीकांत, कमल हासन सबके साथ काम किया। 1976 में आई फिल्म मोन्द्रु मुदिचू में उन्होंने रजनीकांत के साथ अभिनय किया और रजनीकांत ने दो हजार के पारिश्रमिक पर काम किया तो श्रीदेवी ने पांच हजार रुपये लिए थे। कॉरियर में उन्होंने 58 तमिल फिल्मों में अभिनय किया। कुछ कन्नड फिल्मों में भी अभिनय किया। नंदमूरि तारक रामाराव भी श्रीदेवी की कला के प्रशंसक थे और 62 तेलगू फिल्मों में अभिनय करके श्रीदेवी ने अपनी क्षमता का लोहा मनवाया। 21 मलयाली फिल्मों में भी श्रीदेवी ने सशक्त भूमिका निभाई। श्रीदेवी की यात्रा दक्षिण भारत से उत्तर भारत में सशक्त हस्ताक्षर बनकर आई।

हिन्दी की हिम्मतवाला

1978 में श्रीदेवी सोलहवां सावन में नजर आई। यह फिल्म बॉक्स आफिस पर कुछ खास नहीं कर सकी। लेकिन अभिनय का जादू तो था। 1983 में अभिनेता जितेन्द्र के साथ फिल्म हिम्मतवाला में श्रीदेवी ने अभिनय किया। अभिनय किया और छा गई। इसके बाद तो सिनेमाहाल के रुपहले पर्दे पर श्रीदेवी आई नहीं कि सीटियां….ही ….सीटियां….। वह फिल्म के सफल होने की गारंटी बन गई। यह अस्सी का दौर था। हिन्दी सिनेमा अपना नया रुप गढ़ रहा था। दक्षिण से कुछ और कलाकार भी पैर जमाने आए थे। इतिहास गवाह है कि सबसे मजबूत पांव श्रीदेवी के ही जमे। वह भी बिना विवादों में रहे। पूरी तरह से व्यवसायिक बनकर। खम ठोंककर सबसे ऊंचा पारिश्रमिक मांगती थी और मिलता था। यहां तक  कि सुपरस्टार अमिताभ बच्चन से कम पारिश्रमिक लेना भी कुबूल नहीं था। साथ ही फिल्म में भी दमदार भूमिका चाहिए थी। हालांकि बाद में इसी फिल्म में हेमा मालिनी ने अभिनय किया। हेमा के अभिनय को सराहा भी गया, लेकिन श्रीदेवी ने ठुकरा दिया था। फिल्म अजूबा के साथ भी यही हुआ। मोहब्बतें में भी श्रीदेवी नजर नहीं आई। करीब 63 फिल्मों में श्रीदेवी रहीं तो श्रीदेवी बनकर। 80 और 90 के दशक में रुपहले पर्दे पर माधुरी दीक्षित के जगह लेने तक वह अपनी चमक बिखेरती रहीं। हिम्मतवाला, सदमा, नागिन, निगाहें, मि. इंडिया, लमहे, खुदा गवाह, जुदाई में दमदार अभिनय।

जितेन्द्र के साथ हिट जोड़ी, अनिल कपूर के साथ जबरदस्त फिल्में, अमिताभ बच्चन समेत अन्य के साथ अभिनय का लोहा मनवाना।

फैंटेसी में खो जाना

राम गोपाल वर्मा ठीक कह रहे होंगे। वह एक सफल फिल्म निर्माता, निर्देशक हैं। कुछ करीब से देखा और जाना है। वह यह कि श्रीदेवी अभिनय के दौरान जीवन के दर्द भुलाकर फैंटेसी में खो जाती थी। लेकिन थी तो प्रोफेशनल। कोई भी फिल्म देख लीजिए। कहीं से नहीं लगता कि श्रीदेवी ने अपने किरदार के साथ कोई अन्याय किया है। सदमा तो वास्तव में सदमा है। फिर मिस्टर इंडिया और लमहे को कैसे भुला पाएंगे। जितनी फिल्में उतने रंग। जैसी जरूरत वैसा अभिनय। आंखो का नटखट अंदाज, चेहरे पर तैरती शोखियां, चुहुल, मिस्टर इंडिया के नखरे, पर्दे पर रोना, हंसना, इतराना, रुठना, इठलाना, मटकना, इमोशनल हो जाना, हर पल बदलते संवाद के अंदाज और फिर हवा हवाई। रजनीकांत की सौतेली मां से लेकर अमिताभ बच्चन के फिल्मों की हिरोईन बनने तक। यही तो है अभिनय का 360 डिग्री है।

विवाद से दूर

श्रीदेवी के 54 साल के प्रोफेशनल लाइफ में कोई विवाद रहा ही कहां? जैसी भी थी अपने हर भूमिका में जीने वाली हिरोइन थी। पर्दे से लेकर प्यार के जीवन तक तमाम रंग बिखेरे और विवाद में भी नहीं रही। कभी मिथुन चक्रवर्ती से करीबी थी, लेकिन संबंध का विवाद नहीं हुआ। जब बोनी कपूर भा गए तो बस उनकी होकर रह गई। हालांकि बोनी और श्रीदेवी की इस मुलाकात ने मोना कपूर के वैवाहिक जीवन की बलि ले ली। मोना कपूर को बोनी से अलग होना पड़ा। अर्जुन कपूर की मां मोना कपूर और मोना की मां सत्ती सूरी हमेशा इसके लिए श्रीदेवी को कोसती रही। यह बालीवुड में चर्चा ही है कि श्रीदेवी के पेट में बेटी जान्ह्वी पल रही थी। तब सत्ती सूरी ने श्रीदेवी के पेट पर घूंसा मारा था। उनकी नजरों में श्रीदेवी डायन थी, क्योंकि श्रीदेवी ने उनकी बेटी मोना कपूर का घर तोड़ दिया था। यह प्रेम है जो उम्र, जाति, धर्म कुछ नहीं देखता। तब बोनी कपूर सफलता के बड़े शिखर पर नहीं थे। श्रीदेवी का कॅरियर ठीक ही चल रहा था। बोनी कर्ज में डूबे थे, लेकिन प्यार के रिश्ते पैसों के तराजू पर नहीं तौले जाते। इसी ने बोनी कपूर को भी लक्ष्मण रेखा लांघने पर मजबूर कर दिया और श्रीदेवी के साथ विवाह के बंधन में बंध गए। कला की दुनिया में इसका हमेशा खतरा बना रहता है। मोना कपूर और बोनी कपूर के बीच में चुपचाप श्रीदेवी आ गई।

अच्छी अभिनेत्री, अच्छी मां

श्रीदेवी के अच्छी अभिनेत्री होने में किसे संदेह। वह तो थी ही। अच्छी मां भी थी। जान्ह्वी और खुशी की मां ने अपने हिसाब से बच्चों के पालने में जो जरूरी समझा वो किया। फिल्मों से एक दशक से अधिक समय तक तौबा किया। उन्हें पढ़ाया, लिखाया। बड़ा किया। रमेश सिप्पी श्रीदेवी के पड़ोसी हैं। वह श्रीदेवी के पारिवारिक जिम्मेदारी के लिए समर्पण की तारीफ करते नहीं थकते। हालांकि राम गोपाल वर्मा श्रीदेवी के जीवन के कृष्ण पक्ष को भी सामने ले आए। राम गोपाल वर्मा के खुले पत्र से श्रीदेवी के खुद ही संघर्ष करने का एहसास होता है, लेकिन यही तो जीवन का उतार चढ़ाव है। शुक्ल पक्ष यह है कि दो दशक तक हिन्दी सिनेमा पर बतौर अभिनेत्री राज करने वाली सुपरस्टार (महानायिका) के आकस्मिक, अप्राकृतिक निधन के बाद उसकी विदाई भारतीय रीति, परंपरा के अनुरुप सुहागन की तरह व्यक्तित्व का एहसास कराते हुए हुई।

रंजना

 

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