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कला और सौंदर्य का  संगम

कला और सौंदर्य का  संगम

कला को पूजा मानने वालों के लिए कलाकार देवी होती है जो कलाकार कला और सौंदर्य दोनों से भरपूर हो वही श्रीदेवी हो सकती है। श्रीदेवी एक नाम है जो हर पीढि़, हर प्रांत, हर गली में परिचित है। अदाकारी जैसे कूट-कूट कर उनके नस-नस में भर गई थी, उनके कला के प्रति रहने वाली समर्पण उनके हर अदाकारी में दृश्यमान होता है। बिना केवल एक बेहतरीन कलाकार बल्कि एक बेहतरीन पत्नी एक बेहतरीन मां और एक बेहतरीन नारी के रूप में साबित कर पायी है।

70 के दशक से शुरू होकर 80 के दशक में भारतीय सिनेमा जगत में दिलों पर  राज करने वाली इस अभिनेत्री को पहली महिला सुपरस्टार माना जाता है। इस महान कलाकार के जीवन की शुरूआत ही, बहुत संघर्षमय रही है। एक बाल कलाकार के रूप में उन्होंने सिनेमा जगत में अपना कदम रखा था। लेकिन कामयाब होने के लिए बहुत अधिक वर्ष लग गया था। श्रीदेवी के पिता तमिल परिवार से और माता तेलगू परिवार से थें। इसलिए दोनों भाषाओं में उनकी पकड़ बहुत अच्छी थी, इसलिए वह तेलगु, तमिल,मलयालम, कन्नड़ आदि भाषाओं में था। अनेक सिनेमा कर पाये थे, मात्र चार वर्ष की आयु में उनका कला का कुछ नमूना देखने को मिली थी। फिर 1979 में ‘सोलह सावन’ में उन्होंने हिंदी सिनेमा में कैरियर प्रारंभ किया था।

लेकिन 1983 में आई हुई ‘हिम्मतवाला’ उन्हें सुपरस्टार बनाने में सक्षम हुआ। इसी सिनेमा में दर्शक श्रीदेवी के सौंदर्य- नृत्य की ओर अभिनय से आत्मायीत हो गए। उस समय के प्रसिद्ध अभिनेता जितेन्द्र के साथ मुकाबला करते हुए अपना अभिनय प्रदर्शन किया। उसी साल दक्षिणी अभिनेता कमल हासन के साथ फिल्म’सदमा’ किये थे। ‘सदमा’ संपूर्ण रूप से उनकी अदाकारी को बेहतरीन साबित करने के लिए सक्षम हुआ था। इसी फिल्म के लिए इन्हें तत्कालीन भारतीय राष्ट्रपति से सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला था। कमल हासन के साथ तेलगु और तमिल में उन्होंने खुब सारी फिल्में किये हैं। सफलता की सिढ़ी तभी से उन्होंने चढऩा प्रारंभ कर दिया। उसी साल तोहफा में थी उनकी अभिनय दर्शकों के मन को छू लिया था। उसके उपरान्त श्रिषी कपूर के साथ ‘नगिना’ थी, जो लोगों के मन को खूब आन्दोलित कर दिया था। ‘नगिना’ फिल्म के गाने भी इतने अधिक लोकप्रिय हो गये थे कि आज भी लोगों के जेहन में बसे हैं। ‘नगिना’ में भी नृत्य खुब हृदय स्पर्शी हो पाये थे। ‘करमा’ ‘जांबाज’ जैसे अनेक फिल्म थी, श्रीदेवी को दर्शकों के दिलों में राज करने के लिए मजबूर कर देती थी। 1987 में अनिल कपूर के साथ सुपरहीट  फिल्म ‘मिस्टरइंडिया’ से उनका अभिनय इतना अधिक लोकप्रिय हो जायेगा उसका अंदाजा नहीं था, उनका पर्दों पर चुलबुल अभिनय सबको खुब पसंद आ रहा था। कहा जाता है कि वह कैमरे के सामने जितना अधिक जोशीले चुस्ती-फुर्ती हो जाते हैं। कैमरे के बाहर उतना अधिक और कम बोलने वाली सीधी लड़की बन जाती थी। शायद एक अच्छी अभिनेत्री का यही लक्षण होता है। कैमरे से अलग होते ही एक साधारण नारी उनके अंदर से साफ  दृश्यमान होते थे।

1989 में ‘चालबाज’ भी उनकी सफलता को कायम रखने के लिए सहायक हो पाया, उसी फिल्म में सुपरस्टार रजनीकांत और नये उभरता हुआ अभिनेता सन्नी देओल के साथ दोहरी भूमिका को बेखूबी से निभा पाई। उसी फिल्म के लिए उन्हें पहला फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था। 1989 में फिल्म ‘चांदनी’ में शशि कपूर के साथ उनकी अभिनय को दर्शक खुब पसंद करने लगे, चांदनी में उनकी अदा और नृत्य अभी तक भी दर्शकों के हृदय से दूर नहीं हो पाते हैं। चांदनी फिल्म में उन्होंने कुछ गाने भी खुद गायी थीं। 1991 में ‘लम्हें’ में भी एक साथ दोनों ओर बटे किरदार को खुब सुंदर निभा सकी ‘लम्हें’ में एक साथ दर्शकों ने दोनों पर्दों में देखकर दो अलग-अलग अभिनय देखकर खुब पसंद किए। इसी फिल्म के लिए दूसरी बार फिल्मफेयर अवार्ड मिला। कहा जाता है कि एक साधारण गृहणी से लेकर अतिआधुनिक दिलों को दहलाने वाली, धूम मचानेवाली चरित्र खूब आसानी से श्रीदेवी अत्याधुनिक सदी के महानायक अमिताभ बच्चन जी के साथ भी अभिनय करने मौका मिला था। आखरी रास्ता ‘खुदा गवाह’ आदि फिल्म भी लोकप्रिय हो पाये थे। उस समय ‘रूप की रानी चोरों का राजा’ को भी दर्शकों के स्वीकृति मिल पायी थी, उसी समय बॉक्स- ऑफिस में श्रीदेवी को  फिल्म बहुत अधिक पैसा कमाने को सक्षम हो पाया था। कोई-कोई यह भी कहते हंै कि उस समय की सबसे अधिक पैसा लेनेवाली कलाकार श्रीदेवी हुआ करती थी।

पहले-पहले हिन्दी फिल्में करने के समय उनकी हिन्दी भाषा पर पकड़ कम थी, इसिलिए दूसरे हिरोइन के द्वारा उनकी आवाज को डब किया जाता था। श्रीदेवी को इतना अधिक पर्दे पर देखना पसंद किया करते थे। वह उनके डब हुआ आवाज को आसानी से पकड़ भी नहीं पाते थे। और अगर जान भी जाते थे तो उनकी अभिनय के सामने उनकी डब होनेवाली आवाज असर नहीं कर पाती थी।

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इतने अधिक सफल कलाकार का जीवन कैसे साधारण हो सकता है, उनके सौंदर्य जैसे उनके प्रोफेशनल जीवन को सुखद बना पाया था। उतना अधिक उनके निजी जीवन को दुखद बना लिया था। उस समय उनके साथ काम करने वाले कुछ व्यक्तियों ने उसका खुब फायदा उठाने का प्रयास भी किया था। सुपरस्टार मिथुन चक्रवर्ती के साथ उनकी अफेयर खूब चर्चा में थी। मिथुन चक्रवर्ती और उनका गुप्त विवाह होने का खबर भी किसी ने फैलाये थे। मिथुन पहले शादी शुदा थे, इसिलिए उन्होंने सारे प्रेस के सामने श्रीदेवी का और उनके संबंध को स्पष्ट कर दिया था। जब कुदरत की मंजूरी न हो तो कोई भी चीज आगे बढ़ नहीं पाती, श्रीदेवी ‘लाडला’ में निगेटिब रोल को भी खुब अच्छे से निभा पायी थी। ‘जुदाई’ फिल्म में बेहतरीन अभिनय के बाद वह अपने दर्शकों को मायूस करके लम्बी छूटी ले ली ।

1996 में उन्होंने निर्देशक बोनी कपूर के साथ शादी करके अभिनय के दुनिया से दूर हो गईं, शायद उनके निजी जीवन को सुखमय करने का यह एक रास्ता था। जिस प्रकार सिनेमा में किरदार निभाने में वह महारथी बेखूबी निभा पायी। उन्होंने अपने दोनों बच्चों जान्ह्वी और खुशी की परिवरिश में कोई भी कमी नहीं रखी। पति के कार्य के खुब सहायता किया है। एक कलाकार का मन हमेशा कला परिवेश में ही भरता है। दर्शकों की तालियां उन्हें जितने अधिक तृप्त कर पाती है। उतना कोई हीरा- जेवरात में नहीं कर सकता है। कैमरे के सामने  कलाकार जितना अधिक नहीं तृप्त होते हैं, उतना न कोई आलिशान बंग्ला उन्हें कर पाता है। जैसे ही बच्चे थोड़े बड़े होने लग गए,अपना होश संभालने लगे। फिर से उन्होंने अपना प्रत्यावर्तन किया।

2012 में ‘इंगलिश-विंग्लिश’ में साल बाद भी उनके अभिनय में कोई  भी कमी दर्शकों नजर नहीं आई थी। उम्र का आभास उनके चेहरे पे हलका नजर आ रहा था। फिर भी उस का भी एक अलग चार्म लग रहा था, सिंपल और ग्रेसफुल लुक भी खुब पसंद योग्य हो पाया। फिर दो साल बाद ‘मॉम’ में उनके बोल्ड रोल खुब अधिक लोकप्रिय हो पाया। ‘मॉम’ के बाद उनको और भी फिल्में करने का चाहत थी। तभी तो अपने आपको फिट और सुन्दर दिखने के लिए निरन्तर प्रयास में थी। इन दिनों सबसे अधिक ध्यान अपनी बेटी जान्ह्वी के कैरियर के ऊपर दे रही थी। लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। जब मृत्यु का समय आ जाता है, तो वह वजह नहीं देखता, उनके मौत का कारण अभी भी अनेकों के मन में शंका लाती है।

अत्यधिक मदिरा पान के साथ, बाथ टब में डूबकर प्राण छोडऩा, यह कारण इतना विश्वसनीय नहीं हो सकता है, जब की मौत के कुछ समय तक केवल हृदय आघात के कारण मृत्यु  बतलाया गया था। इतनी अधिक हेल्थ-कंन्शस और समझदार महिला के साथ ऐसा भी हो सकता है? दुबई पुलिस के देर से मंजूरी होने के कारण उनके पार्थिव शरीर को मुम्बई पहुंचने में देर हो गयी थी। विधिवत उनका अंतिम संस्कार संपन्न हो पाया। शायद इस महान तारिका को चमकने के लिए अन्य एक ठिकाना मिल गया।

 

उपाली अपराजिता रथ

 

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