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ख्वाबों की शहजादी हवाहवाई

ख्वाबों की शहजादी हवाहवाई

गत रविवार की सुबह इस खबर के साथ की श्रीदेवी नहीं रही भारी बोझ के साथ शुरू हुई, वो बोझ, की हमने देश की पहली फीमेल सुपरस्टार  खो दी,  अब ताउम्र हमारे साथ रहेगा। मात्र 54 साल की उम्र में उनका जाना सभी को इस जिन्दगी पर हैरान होने पर मजबूर कर गया।

महज चार साल की उम्र में अपने कॅरियर की शुरुआत करने वाली श्रीदेवी अब सिने परदे पर नजर नहीं आएंगी इस बात पर जैसे किसी ने अपने बचपन की यादों के छूटने का दर्द महसूस किया तो किसी को अलमारी में उनकी छुपाई तस्वीर याद आ गयी।

उनके साथ काम कर चुके लोगों की यादों का तो जैसे सोशल मीडिया पर तांता ही लग गया,सुपरस्टार रजनीकांत ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि मैं इस खबर को सुन सदमे में हूं, आज मैंने एक दोस्त और इंडस्ट्री ने एक लीजेंड खो दिया।

PAGE 26-291 copyकमल हसन ने उन्हें याद करते हुए कहा कि वो उन्हें तब से जानते थे जब वो एक बाल कलाकार के तौर पर आयीं थीं, अभिनेत्री के तौर पर उनके फिल्मी सफर को उन्होंने नजदीक से देखा और वो इस लोकप्रियता के काबिल थीं।

ऋतिक रोशन ने अपनी और श्रीदेवी का एक फोटो पोस्ट करते हुए कहा कि कैसे उन्होंने अपनी लाइफ का पहला शॉट उनके साथ दिया था और वो बहुत नर्वस थे, इतने नर्वस  की उनके हाथ-पांव कांप रहे थे, तब श्रीदेवी जी ने भी अपने हाथ उन्हें दिखाते हुए कहा कि देखो मैं भी नर्वस हूं ऐसा होता है।

‘मिस्टर इंडिया’ के उनके डायरेक्टर शेखर कपूर ने कहा की कैसे आमतौर पर शांत रहने वाली श्रीदेवी  ने उन्हें अपनी कॉमिक टाइमिंग से हैरान कर दिया था। पूरे बी टाउन ने उनकी अकस्मात मृत्यु पर दु:ख व्यक्त किया।

फैंस का दु:ख समझे तो एक दौर था जब  लड़कियों में श्रीदेवी- माधुरी का झगड़ा बड़ा आम था और उस झगड़े में माधुरी के साथ खड़ी भीड़ भी जैसे इस खबर पर यकींन करने में असमर्थ दिखी।

जीतेन्द्र, शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना, राजेश खन्ना, अमिताभ बचन, ऋषि कपूर, सनी देओल, अनिल कपूर फिर 90 आते-आते  शाहरुख खान, सलमान खान,अक्षय  कुमार हर दशक के सभी बड़े स्टार के  साथ उनकी जोड़ी बनी।

श्रीदेवी जिनका असली नाम श्री अम्मा यंगर अय्यपन था ने चार साल की उम्र में एक तमिल फिल्म थुनीवं में भगवान् मुरगन का किरदार निभा कर शुरुआत की थी। आगे कुछ और फिल्मों में बतौर बाल कलाकार नजर आने वाली श्रीदेवी के लिए लीड हिरोइन का रास्ता उनकी फिल्म जूली जो हिंदी और मलयालम दो भाषाओं में बनी ,उस से होकर गुजरा जिसमें उनके काम को देख साउथ के एक बड़े डायरेक्टर बालचंदर ने उन  पर पहला भरोसा जताते हुए उन्हें अपनी फिल्म मूंडरू मूढ़ीचु जिसमें रजनीकांत और कमल हसन जैसे बड़े कलाकार थे उसमें  पहला बड़ा ब्रेक दिया।

श्रीदेवी के लिए यह फिल्म सिर्फ एक बड़ा मौका ही नहीं एक बड़ा चैलेंज भी था क्योंकि इसमें उनके सुपरस्टार रजनीकांत की सौतेली मां का किरदार निभाना था लेकिन पारखी नजर वाले डायरेक्टर बालचंदर ने यह बड़ा दांव श्रीदेवी पर लगाया और वो कामयाब भी हुए।

PAGE -292 copyइसके बाद ‘सिग्गप्पू रोजककल’ और वरुमाईं निराम सिग्गप्पू जैसी फिल्मों के साथ  कमल हसन और उनकी जोड़ी लोगों को खासा पसंद भी आयी।

श्रीदेवी अब तक तमिल, तेलुगु और मलयालम फिल्मों में अपना बड़ा नाम बना चुकी थी, अब बारी थी हिंदी की। 1979 की ‘सोलहवां सावन’ जो की तमिल की सुपरहिट फिल्म ’16वायड हिनीले की रीमेक थी के साथ उनका सफर शुरू हुआ। इस फिल्म से उन्हें पहचान भले ही न मिली हो लेकिन हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को एक नया चेहरा जरूर मिला।

फिल्म के न चलने की वजह से श्रीदेवी को हिंदी बोलते देखने के लिए चार साल का इंतजार करना पड़ा लेकिन इस बार  जब वो लौटी तो पूरी हिम्मत के साथ 1983 में  फिल्म आयी ‘हिम्मतवाला’ उस साल की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर जिसने सबको इस साउथ इंडियन ब्यूटी का  कायल बना दिया। लेकिन इस साल ‘हिम्मतवाला’ से भी बड़ा मौका साबित हुई उनकी फिल्म ‘सदमा’ वो फिल्म जिसने यह साबित किया की श्रीदेवी सिर्फ डांस ही नहीं बल्कि एक्टिंग भी कर सकती हैं। आलोचकों की माने तो इस फिल्म के लिए वो नेशनल अवार्ड जितने से बस जरा सी चूक गयी।

इसके बाद 80 के दशक में तो जैसे उनकी फिल्मों की बाढ़ सी आ गयी, जिसमें सबसे ज्यादा कुल 16 उनकी फिल्में रही जंपिंग जैक जीतेन्द्र के साथ जिसमें ‘तोहफा’, ‘मवाली’, ‘मकसद’ और ‘जस्टिस चौधरी’ प्रमुख रही।

यह वो दौर था जब उनके पास न तो काम की कमी नहीं थी और न ही मिथुन चक्रवर्ती से जुड़ी खबरों की, लेकिन कॅरियर की मशरूफियत जैसे श्रीदेवी के लिए कुछ और ही सोच कर बैठी हो 1987 में उनकी 10 फिल्में रिलीज हुई जिसमें थी पुरुष प्रधान इंडस्ट्री को झटका देने वाली ‘नगीना’ जिसकी नीली आंखों वाली श्रीदेवी, इस फिल्म की सफलता का सारा श्रेय ले गयी और ऐसा ही हुआ ‘चांदनी’ के साथ भी, ‘चांदनी’ उनकी  पहली हिंदी फिल्म बानी, जिसके लिए उन्होंने खुद अपनी आवाज दी और सिर्फ डबिंग नहीं बल्कि गाना भी गाया। ‘चांदनी’ वो फिल्म जिसमें यश चोपड़ा साहब के फ्रेम से श्रीदेवी की खूबसूरती कुछ ऐसे छन कर आयी की दुनिया स्तब्ध रह गयी। हालांकि 1987 में  ‘मि. इंडिया’ में सीमा की नीली साड़ी भी लोगों को हमेशा याद रहेगी लेकिन इस फिल्म के साथ खूबसूरती का खिताब बन गयी ‘चांदनी’। लेकिन 1989 का एक बड़ा सरप्राइज तो अभी बाकी था और बाकी था श्रीदेवी का कूल टैग भी फिल्म आयी ‘चालबाज’ ‘में अंजू नहीं मंजू हूं जी’, भले ही इस कहानी पर पहले हमने ‘राम और श्याम’, ‘सीता और गीता’ जैसी फिल्में देखी थी लेकिन इसमें कुछ कमाल था, ‘मैं मदिरा नहीं पीती जी’ या फिर ‘यह चाकू है जानी लग जाये तो खून निकल आता है’ यह डायलॉग्स आज भी बोले जाते हैं। और गाने उनकी तो क्या ही कहे देखा जाये तो श्रीदेवी जी फिल्मों की जान होती थी, उनके गाने और यही हाल ‘लम्हें’ का भी था वक्त से पहले की कहानी कहकर आज जिस फिल्म को लोग कल्ट का दर्जा देते हैं यश चोपड़ा साहब की पसंदीदा फिल्म बताई जाती है। मां और बेटी दोनों का डबल रोले निभाने वाली श्रीदेवी ने इस फिल्म और खुदा गवाह जैसी कुल 6 फिल्मों के साथ डबल रोल क्वीन भी कहलायी।

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कहते हैं 1993 की ‘रूप की रानी चोरों का राजा’ श्रीदेवी के लिए सिर्फ प्रोफेशनल ही नहीं बल्कि पर्सनल एंड फाइनेंशियल तौर पर भी एक बड़ा झटका थी क्योंकि सूत्रों की मानें तो इस फिल्म में उनके भी पैसे लगे थे और अब लगातार फ्लॉप हो रही फिल्मों के बाद उन्हें इंतजार था एक हिट फिल्म का।

और उनका यह इंतजार बड़े अजीब तरीके से खत्म हुआ, दिव्या भारती जिन्हें लोग छोटी श्रीदेवी कहकर पुकारते थे उनकी मृत्यु के बाद उनकी छोड़ी फिल्म लाडला श्रीदेवी जी के लिए लकी साबित हुई।

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श्रीदेवी के कॅरियर की एक बड़ी रोमांचक कहानी है कि जब भी लोगों को लगा की यह तो बेस्ट है उन्होंने कुछ बेस्टेस्ट कर दिखाया जैसे 15 साल का लम्बा ब्रेक लेने से पहले 1997 में रिलीज हुई ‘जुदाई’ या फिर 15 साल के बाद उनकी कमबैक फिल्म ‘इंग्लिश इंग्लिश’ या पिछले साल उनकी 300वीं फिल्म ‘मॉम’ जिसने हमें नेवर बिफोर श्रीदेवी दी।

शायद ही आज की तारीख में कोई दूसरी ऐसी कलाकार होंगी, जिनके जाने का दु:ख  70 साल के बुजुर्ग से लेकर 7 साल के  बच्चे तक को है।

यह सदमा जीवन भर रहेगा, आप बहुत याद आएंगी श्रीदेवी जी……

रानी झा

 

 

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