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कैसे रहेंगे भारत और नेपाल के संबंध?

कैसे रहेंगे भारत और नेपाल के संबंध?

संस्कृत के एक सुभाषित में नेपाल की परिभाषा की गई है–ने नीति: ताम्पालयति इतिहास नेपाल–अर्थात जहां नीति का पालन हो वह नेपाल है। नेपाल में नीति का कितना पालन होता है और कितना नहीं, यह विवाद का विषय हो सकता है और है भी। नेपाल के इतिहास में बहुत पीछे न भी जाएं तब भी राणाशाही तक तो जाना ही पड़ेगा। नेपाल में लम्बे अरसे तक राजशाही रही। 1768 में पृथ्वीनारायण शाह ने नेपाल में शाह राजवंश के शासन की शुरुआत की थी। लेकिन उसके अंतिम काल में सत्ता पर असली कब्जा वहां के प्रधानमंत्रियों का ही हो गया था जिसे इतिहास में राणाशाही के नाम से जाना जाता है। 1846 में राजमहल में सामूहिक हत्याकांड करने के बाद जंगबहादुर राणा ने सत्ता पर कब्जा किया और राजा के पास केवल नाम की सत्ता बची। इस प्रकार नेपाल में राणाशाही की शुरूआत हुई। बाद में राणाओं की सत्ता को बनाए रखने में ब्रिटिश सरकार का भी अप्रत्यक्ष हाथ रहा क्योंकि राणा अंग्रेजों के पक्षधर थे। प्रथम विश्व युद्ध में नेपाल नरेश उलझना नहीं चाहते थे जबकि प्रधानमंत्री राणा अंग्रेजों का साथ देना चाहते थे। स्वाभाविक था अंग्रेज सरकार भी राजवंश को शक्तिहीन कर असली सत्ता राणाओं के देने में रुचि लेती। राजवंश की तरह नेपाल में राणावंश भी पारम्परिक या पैतृक हो गया था। राणाओं  ने राजाओं को अपनी कठपुतली बना लिया या एक प्रकार से बन्धक ही। राणाशाही के खिलाफ वहां के लोगों ने सशस्त्र जन संघर्ष छेड़ दिया, जिसका नेतृत्व नेपाली कांग्रेस ने किया। कुछ सीमा तक इसमें नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी की भी भागीदारी रही। इस संघर्ष में बहुत से भारतीयों ने भी हिस्सा लिया। हिन्दी के जाने- माने साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु भी उनमें से एक थे। भारत सरकार ने इस संघर्ष में नेपाल की जनता का साथ दिया और नेपाल में त्रिभुवन नरेश की वापिसी हुई। राणाशाही समाप्त हुई और वास्तविक राजशाही का युग शुरू हुआ। इस संघर्ष की पृष्ठभूमि में नेपाल की दो प्रमुख पार्टियों को जान लेना भी लाभकारी होगा।

मोटे तौर पर नेपाल के राजनैतिक दलों के दो समूह बनते हैं। पहले समूह के केन्द्र में नेपाली कांग्रेस है, जिसके इर्द-गिर्द छोट-छोटे राजनैतिक दल एकत्रित हो जाते हैं। नेपाली कांग्रेस मोटे तौर पर समाजवादी विचारधारा की पोषक पार्टी मानी जाती है और इसका संबंध भारत के समाजवादी आन्दोलन से भी रहा है। नेपाली कांग्रेस ने नेपाल में राणाशाही के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था जिसके कारण राणाशाही समाप्त हुई। इस आन्दोलन में भारत के समाजवादियों ने भी सहायता की थी।  नेपाल की राजनीति का दूसरा बड़ा केन्द्र वहां की साम्यवादी पार्टियां हैं। ये साम्यवादी पार्टियां फिलहाल दो समूहों में विभाजित हैं। पहला समूह  कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत माक्र्सवादी-लेनिनवादी) का है  और दूसरा समूह कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी केन्द्र) का है। सीपीएन (यूएलएम) और सीपीएन (एमसी) दोनों वामपंथी दल यद्यपि कार्ल माक्र्स के सिद्धान्तों को मानते हैं लेकिन उसकी प्राप्ति के लिए दोनों दलों में मौलिक मतभेद है। सीपीएन (यूएलएम) यद्यपि वामपंथी है लेकिन उनका लोकतांत्रिक प्रणाली में विश्वास है। प्रचण्ड की  सीपीएन (एमसी) ने नेपाल में लम्बे अरसे तक स्थापित सत्ता को उखाडऩे और उस पर कब्जा करने के लिए आतंकवादी गतिविधियों का संचालन किया। वह नेपाल की सत्ता पर बन्दूक के बल पर ही सत्ता पर कब्जा करना चाहती थी। उसका मुख्य वैचारिक स्रोत माओ तो थे ही साथ ही उनका ध्येय वाक्य सत्ता बन्दूक की नली से निकलती है और इसी को उन्होंने व्यवहारिक रूप से अपनाया। लेकिन अन्तत: उसने भी लोकतांत्रिक पद्धति से समझौता किया। पर सत्ता मिलने पर उसकी कम्युनिस्ट पार्टी भी समय समय पर विघटन का शिकार होती रही। अब तक उसके चार हिस्से हो चुके हैं और उसके एक हिस्से सीपीएन (एमसी) का नेतृत्व वे करते हैं।

मधेसी राजनैतिक दल

नेपाल के भूगोल में, उसकी जो सीमा भारत से लगती है, वह क्षेत्र मधेस कहलाता है और उसकी जो सीमा तिब्बत के साथ लगती है, वह हिमाल कहलाता है। मधेस और हिमाल के बीच पडऩे वाले इलाके को पहाड़ी कहा जाता है। मधेस को तराई का क्षेत्र भी कहा जाता है। यह नेपाल के लगभग 23 प्रतिशत क्षेत्रफल में फैला है। तराई में नेपाल की लगभग आधी आबादी रहती है। मधेसी समुदाय में बिहार, उत्तर प्रदेश और कुछ सीमा तक पश्चिमी बंगाल के जाति समुदायों से ताल्लुक रखने वाले लोग रहते हैं। कुछ जातियां ऐसी भी हैं जो मधेस क्षेत्र में रहती हैं जैसे थारू, राजवंशी, धीमाल लेकिन वे अपने आप को मधेसी नहीं मानते। मधेस क्षेत्र में राजनैतिक दलों का एक तीसरा समूह भी बनता है। मधेस क्षेत्र में मोटे तौर पर दो राजनैतिक समूह कार्यरत हैं। मधेसी जन अधिकार फोर्म और माओवादियों द्वारा संचालित मधेसी राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा।

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नेपाली कांग्रेस

नेपाली कांग्रेस, दो राजनैतिक दलों के विलय से अस्तित्व में आया था। कोलकाता में मातृ प्रसाद कोईराला ने 25 जनवरी 1946 को नेपाली नैशनल कांग्रेस का गठन किया था। कोलकाता में ही लगभग अढ़ाई साल बाद सुवर्ण शमशेर राणा ने कोलकाता में ही नेपाली डैमोक्रेटिक कांग्रेस का गठन किया था। सुवर्ण चाहे दूर नजदीक से राणाशाही से सम्बंधित था लेकिन उसने इस निजाम के खिलाफ विद्रोह का परचम लहराया हुआ था। भारत से 1947 में अंग्रेज विदा हुए उधर इन दोनों दलों ने नेपाल से राणाशाही को समाप्त करने हेतु सशस्त्र क्रान्ति का रास्ता पकड़ा। लेकिन इसमें सफलता मिले, इसके लिए जरूरी था कि दोनों दल आपस में मिल जाते। अत: दोनों दलों के विलय से 10 अप्रैल 1950 को नेपाली कांग्रेस का उदय हुआ। नेपाली कांग्रेस ने अपना अड्डा भारत से हटा कर नेपाल में बना लिया और सत्ता से राणाशाही को उखाड़ फेंकने के लिए मुक्ति सेना का गठन कर दिया। मुक्ति सेना सशस्त्र क्रान्ति में विश्वास करती थी। इस मुक्ति सेना ने वीरगंज पर कब्जा कर लिया। उसके बाद राणाशाही कितने दिन टिकती? दिल्ली में तीन पक्ष एकत्रित हुए। त्रिभुवन नरेश, नेपाली कांग्रेस और राणाशाही के प्रतिनिधि। तय हुआ कि त्रिभुवन नेरेश अपना मंत्रिमंडल गठित करेंगे जिसमें आधे राणाशाही के लोग होंगे और आधे नेपाली कांग्रेस के। इस प्रकार 13 फरवरी 1951 को नेपाल का पहला मंत्रिमंडल गठित हुआ। राणाशाही के चंगुल से नेपाल नरेश मुक्त हुए और त्रिभुवन वीर विक्रम शाह के पास असली सत्ता आ गई। एक शताब्दी से भी ज्यादा काल से चली आ रही राणाशाही की समाप्ति के बाद मोटे तौर नेपाल की राजनीति में नेपाल कांग्रेस की ही महत्वपूर्ण स्थिति बनी रही। साल के भीतर भीतर राणाओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और असली सत्ता एक बार फिर शाह राजवंश के पास आ गई। 1955 में त्रिभुवन शाह के देहान्त के बाद उनके सुपुत्र महेन्द्र राजा बने। लेकिन पांच साल बाद ही 15 दिसम्बर 1960, को उन्होंने संविधान स्थगित कर दिया, तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वेश्वर प्रसाद कोईराला और उनके साथियों को बंदी बना लिया। दो साल बाद उन्होंने देश में नया संविधान लागू कर दिया जिसके अनुसार देश में राजनैतिक दल विहीन पंचायती राज शासन प्रणाली लागू कर दी, जिसे निर्देशित लोकतांत्रिक व्यवस्था कहा गया। भारत और चीन से समान दूरी का सिद्धान्त अपनाया। सत्ता की बागडोर एक बार फिर राजशाही के पास ही आ गई। नेपाल नरेश महेन्द्र की मृत्यु के बाद 1972 में उनके सुपुत्र वीरेन्द्र ने गद्दी संभाली। वीरेन्द्र के राज्यकाल में एक बार फिर लोकतंत्र की बहाली हेतु आन्दोलन शुरु हो गया।

महाराजा ने दल विहीन सिस्टम और दलीय सिस्टम को लेकर 1980 में जनमत संग्रह करवाया। दल विहीन पक्ष जीत तो गया लेकिन आन्दोलन बन्द नहीं हुआ। अन्तत: दस साल बाद नेपाल नरेश वीरेन्द्र को दलीय राजनीति पर आधारित संविधान लागू करना पड़ा। नए संविधान ने देश में सांविधानिक राजशाही की व्यवस्था की। इस प्रकार देश में सांविधानिक राजशाही का दौर (1990-2008) शुरू हुआ।

महाराजा ने अंतरिम मंत्रिमंडल की नियुक्ति कर दी और नेपाली कांग्रेस के कृष्ण प्रसाद भट्टाराई प्रधानमंत्री बने। नए संविधान के अनुसार देश की संसद प्रतिनिधि सभा के 205 स्थानों के लिए 1991 में चुनाव हुए। नेपाली कांग्रेस ने 112 सीटें जीत कर सरकार बनाई। गिरिजा प्रसाद कोईराला प्रधानमंत्री बने।  कालान्तर में जैसे जैसे राजशाही और लोकतांत्रिक संसद में गतिरोध बढऩे लगा, तो कुछ राजनैतिक दल राजशाही के समर्थन में भी बने। लेकिन इन राजशाही समर्थकों राजनैतिक दलों का गहरा प्रभाव नेपाली जनता पर नहीं पड़ सका।  लेकिन जल्दी ही नेपाली कांग्रेस में फूट पड़ गई और पार्टी के सांसदों ने अपनी ही सरकार को संसद में एक बिल पर हुए मतदान में पराजित कर दिया। महाराजा ने संसद भंग कर दी और चुनाव करवाने की घोषणा कर दी। 1994 में हुए इन चुनावों में नेपाली कांग्रेस को 83 सीटें मिलीं और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) को 88 सीटें मिलीं। सरकार बनाने के लिए 103 सीटों की जरूरत थी। बीस सीटें राजशाही की समर्थक पार्टी राष्ट्रीय प्रजातंत्र  पार्टी ने जी लीं। नेपाली कांग्रेस ने राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के साथ मिल कर सरकार बनाने की कोशिश की लेकिन दोनों दलों में समझौता न हो सका। तब कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) ने देश में अल्पमत की सरकार बनाई और मनमोहन अधिकारी प्रधानमंत्री बने। दुनिया में किसी साम्यवादी दल द्वारा लोकतांत्रिक पद्धति से सत्ता संभालने का यह पहला उदाहरण था।

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नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी

इसे महज संयोग ही कहा जाएगा कि नेपाली कांग्रेस की तरह नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना भी भारत में ही हुआ। नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी या सीपीएन की स्थापना 15 सितम्बर 1949 को कोलकाता में ही हुई थी। नेकपा की स्थापना भी नेपाल की राणाशाही को समाप्त करने के लिए ही हुई थी। नेकपा ने भी राणाशाही को उखाडऩे के लिए सशस्त्र क्रान्ति का ही सहारा लिया। लेकिन नेपाली कांग्रेस और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के विचार और व्यवहार में वही अन्तर था जो भारत की उस समय की समाजवादी व कम्युनिस्ट पार्टियों में था। नेकपा ने भी राणाशाही को उखाडऩे के लिए अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी की हिंसक गतिविधियों के चलते 1952 में सरकार ने पार्टी को प्रतिबन्धित कर दिया। यह प्रतिबन्ध अप्रैल 1956 को समाप्त किया गया। लेकिन बाद में नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी में कार्ल माक्र्स की विचार धारा की व्याख्या और उसकी प्रप्ति के लिए अपनाए जाने रास्ते को लेकर मतभेद होते रहे और अनेक कम्युनिस्ट पार्टियों का जन्म होता रहा। यह अलग बात है, ये सभी पार्टियां अपने आप को नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के विरासत के पहरेदार मानते रहें। सभी वामपंथी दल माक्र्स, लेनिन या माओ का नाम लेते रहे और स्वयं को सोवियत मॉडल, चीनी मॉडल का अलम्बरदार बताते रहे। 1994 में पहली बार नेपाल में सीपीएन (यूएमएल) ने पहली बार अल्पमत सरकार बनाई। लेकिन नेपाल के विभिन्न राजनैतिक दलों का ताना बाना इतना उलझा कि सरकार के लिए काम करना मुश्किल हो गया। अधिकारी लगभग एक साल ही पद पर रह सके। उसके बाद राजनैतिक दलों के विभिन्न मोर्चे बनते रहे और प्रधानमंत्री बदलते रहे। यहां तक की बीस सदस्यीय राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी ने भी सरकार बनाई।

इसी पृष्ठभूमि में पुष्प कमल दहाल प्रचण्ड ने 1996 में चीन की जन मुक्ति सेना के नाम पर नेपाल में भी जन मुक्ति सेना का गठन कर भूमिगत आतंकवादी आंदोलन की शुरूआत की। ये आतंकवादी नेपाल में माओवादी के नाम से प्रसिद्ध हुए और इन्होंने पुलिस स्टेशनों पर हथियारों से हमले करना, सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमले करना शुरु किया। जल्दी ही इस दल का आतंक पसर गया और ग्रामीण क्षेत्रों में इसने अपना जनाधार भी बढ़ाया। नेपाल में एक प्रकार से सिविल वार शूरवीर हुई। इसी पृष्ठभूमि में मई 1999 में प्रतिनिधि सभा के चुनाव सम्पन्न हुए। इस बार नेपाली कांग्रेस को 111 सीटें मिलीं और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत माक्र्सवादी लेनिनवादी) केवल 71 सीटों पर सिमट गई। नेपाली कांग्रेस के कृष्ण प्रसाद भट्टाराई प्रधानमंत्री बने। लेकिन महाराजा का आरोप था की सरकार माओवादियों से निपटने में सक्षम सिद्ध नहीं हो रही।

लेकिन इसी बीच नेपाल में हुई एक घटना ने प्रचण्ड के दल की ताकत को बढ़ाने का एक और कारण बना। 1846 की तर्ज पर ही 2001 में राजमहल में पूरे राजपरिवार की हत्या। राजशाही से लोगों का विश्वास तब हटा जब प्रथम जून 2001 की अर्धरात्रि को महाराजा वीरेन्द्र अपने पूरे परिवार समेत राजमहल में ही मार दिए गए। उनके एक मात्र बचे हुए भाई, ज्ञानेन्द्र राजा बने। लेकिन इस हत्याकांड के कारण आम नेपाली की राजा के प्रति रही सही श्रद्धा भी  समाप्त हो गई। आम लोगों को शक था कि यह हत्याकांड ज्ञानेन्द्र और उनके बेटे पारस ने ही करवाया था। इसका लाभ माओवादियों ने उठाया। उन्होंने भूमिगत आतंकवादी आन्दोलन तेज कर दिया। हत्याओं का नया दौर शुरू हो गया। सरकार माओवादियों के आतंकवाद को नियंत्रित करने में असफल रही। देश में अराजकता का माहौल पैदा हो गया। इस बहाने ज्ञानेन्द्र ने 2002 में संसद को भंग कर दिया और सत्ता स्वयं संभाल ली। लेकिन महाराजा के इस अलोकतांत्रिक कदम का विरोध करने के लिए देश के सात प्रमुख राजनैतिक दल एकत्रित हो गए। इसे सात पार्टी गठबन्धन कहा गया और इसके दबाब के चलते राजा को 2006 में भंग की गई प्रतिनिधि सभा को पुन: बहाल करना पड़ा और 25 अप्रैल 2006 को नेपाली कांग्रेस के गिरिजा प्रसाद कोईराला पुन: प्रधानमंत्री बनें। वे 18 अगस्त 2008 तक इस पद पर रहे। इस बीच दस साल से चल रहे सिविल वार से भी लोग आजिज आ चुके थे। प्रचण्ड के इस सिविल वार ने दस साल के अन्दर अन्दर ही 13000 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। सैकड़ों नागरिकों का आजतक अता पता नहीं चला। गिरिजा प्रसाद कोईराला की इस कालखंड की सबसे बड़ी उपलब्धि माओवादियों से 2006 में शान्ति समझौता करना था। इसी समझौते के चलते 2007 में संसद को भंग किया गया।

राजशाही की समाप्ति

नेपाल में राजशाही की समाप्ति के लिए चले आन्दोलन के फलस्वरूप 15 जनवरी 2007 को संसद को भंग कर दिया गया और 330 सदस्यीय अंतरिम संसद  का गठन किया गया। इस अंतरिम संसद ने एक अंतरिम संविधान लागू किया। इस संविधान के अनुसार नई संविधान सभा के लिए चुनाव होने था। अप्रैल 2008 में 601 सदस्यीय संविधान सभा का चुनाव सम्पन्न हुआ। इस संसद ने 28 मई 2008 को नेपाल में 238 साल से चली आ रही सांविधानिक राजशाही की, जो 1990 से चली आ रही थी, को समाप्त कर  देश का नाम आधिकारिक तौर पर संघीय लोकतांत्रिक गणतन्त्र नेपाल कर दिया गया। राजा के स्थान पर राष्ट्रपति का स्थान निश्चित किया गया। नेपाली कांग्रेस के रामबरण यादव 23 जुलाई 2008 को नेपाल के पहले राष्ट्रपति चुने गए। (वे इस पद पर 29 अक्टूबर 2015 तक रहे)

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2008 के चुनाव– प्रथम संविधान सभा

इस अंतरिम संसद ने एक अंतरिम संविधान का निर्माण किया और उसके आधार पर अप्रैल 10 अप्रैल 2008 को 601 (इनमें आम मतदाता द्वारा चुनी जाने वाली सीटें 575 थीं , इन 575 सीटों में से भी 60 प्रतिशत सीटें आनुपातिक चुनाव द्वारा और 40 प्रतिशत सीटें प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा भरी जानी थीं। 26 सीटें प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत की जानी थीं।) सदस्यीय संविधान सभा के चुनाव हुए। चुनाव में विभिन्न राजनैतिक दलों की स्थिति निम्न प्रकार से थी –

चुनाव परिणाम आने पर माओवादी नेता पुष्प कमल दहाल की एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) या यूसीपीएन (एम) को 220 सीटें मिलीं और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत माक्र्सवादी लेनिनवादी) को 103 सीटें मिलीं। नेपाली कांग्रेस ने  110 सीटों पर जीत हासिल की। शेष सीटें अन्य छोटे- छोटे दलों के हिस्से आईं। अब प्रधानमंत्री का पद हथियाने के लिए जोड़ तोड़ शुरु हुआ तो महीनों की मशक्कत के बाद 18 अगस्त 2008 में यूसीपीएन (एम) के अध्यक्ष पुष्प कमल दहाल प्रचण्ड प्रधानमंत्री चुने गए। जोड़-तोड़ की राजनीति के कारण समय-समय पर प्रधानमंत्री तो बदलते गए लेकिन निश्चित किए गए दो साल के भीतर यह संविधान सभा नेपाल का संविधान बनाने में सफल नहीं हुई। समय-समय पर इसकी काल अवधि भी बढ़ाई जाती रही लेकिन चार साल में भी यह सभा संविधान बनाने में कामयाब नहीं हुई। अन्तत: 28 मई 2012 को यह संविधान सभा भी भंग कर दी गई। उस समय प्रधानमंत्री पद पर प्रचण्ड की ही पार्टी के बाबूराम भट्टाराई थे। लेकिन अब सरकार को अगली संविधान सभा के लिए चुनाव करवाने थे, इसलिए किसी भी राजनैतिक दल का प्रधानमंत्री या सरकार नहीं होनी चाहिए, नहीं तो वह अपने राजनैतिक दल के हित के लिए सरकारी मशीनरी का उपयोग कर सकता है, इसलिए राष्ट्रपति ने उस समय के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश खिल राज नेग्मी को अंतरिम प्रधानमंत्री बना दिया। वे 11 फरवरी 2014 तक इस पद पर रहे और उनके कार्यकाल में द्वितीय संविधान के लिए चुनाव सम्पन्न हुए।

2013 के चुनाव- द्वितीय संविधान सभा

नई संविधान सभा चुनने के लिए 19 नबम्वर 2013 को एक बार फिर चुनाव हुए। इस संविधान सभा को द्वितीय संविधान सभा कहा गया। इन चुनावों ने पासा पलट दिया। सुशील कुमार कोईराला के नेतृत्व में नेपाली कांग्रेस ने 575 में से 196 सीटें जीतीं। प्रचण्ड की यूसीपीएन (एम) ने 80 सीटें जीतीं। सीपीएन (यूएलएम) ने 175 सीटें जीतीं। शेष सीटें पहले की तरह छोटे-छोटे दलों के हिस्से आईं। नेपाली कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरा था तो जाहिर है उसके नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाता। इस प्रकार सुशील कुमार कोईराला 11 फरवरी 2014 को देश के प्रधानमंत्री बने। कोईराला ने यह कहा कि जब यह संविधान सभा नया संविधान बना लेगी तो वे अपने पद से हट जाएंगे ताकि नए संविधान के अनुसार चुनाव हों और सरकार बने।

नेपाल का नया संविधान और चुनाव

इस द्वितीय संविधान सभा ने 2007 का अंतरिम संविधान समाप्त किया और उसके स्थान पर नया बीस सितम्बर 2015 को नया संविधान लागू किया। 2015 में लागू होने के कारण इसे 2015 का संविधान भी कहा जाता है। इस संविधान के अनुसार भारत की संसद की तरह नेपाली संसद के भी दो सदन हैं। प्रतिनिधि सभा जिसे निम्न सदन कहा जा सकता है और राष्ट्रीय सभा जिसे उच्च सदन कहा जा सकता है। प्रतिनिधि सभा के 275 सदस्य हैं और राष्ट्रीय सभा के 59 सदस्य हैं। नेपाल की राष्ट्रीय सभा भारत की राज्य सभा की तरह ही है। इसके 56 सदस्य देश की सात विधानसभाओं द्वारा चुने जाते हैं। इनमें से तीन महिलाएं, एक दलित और एक दिव्यांग होना आवश्यक है। प्रत्येक विधानसभा आठ सदस्य चुनती है। तीन सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत होते हैं। इसी तरह नेपाल के निम्न सदन प्रतिनिधि सभा के लिए कुल 275 सदस्यों में से 165 का चुनाव एकल-सदस्य निर्वाचन प्रणाली द्वारा और शेष 110 सदस्यों का चुनाव  अनुपातिक चुनाव प्रणाली के आधार पर होता है जिसमें मतदाता पूरे देश को एकल चुनाव निर्वाचन क्षेत्र समझ कर राजनीतिक दलों के लिए मतदान करते हैं। इस संविधान के अनुसार अक्टूबर 2015 में राष्ट्रपति के चुनाव हुए और सीपीएन (यूएलएम) की विद्या देवी भंडारी राष्ट्रपति चुनी गईं और अभी तक इस पद पर विराजमान है। 10 अक्टूबर 2015 को  अपने वायदे के अनुसार प्रधानमंत्री सतीश कुमार कोईराला ने भी त्यागपत्र दे दिया। अब सरकार बनाने के लिए प्रचण्ड की सीपीएन (एमसी) और नेपाली कांग्रेस ने आपस में हाथ मिला लिया। दोनों दल प्रधानमंत्री पद को रोटेशन के आधार पर संभालने के लिए सहमत हो गए। सीपीएन (यूएमएल) के खड्ग प्रसाद शर्मा ओली का समर्थन राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी नेपाल और मधेसी राईटस फोरम डैमोक्रेटिक ने भी किया।

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इस प्रकार 12 अक्टूबर 2015 को वे नेपाल के प्रधानमंत्री बने। लेकिन वे प्रशासन पर अपनी पकड़ नहीं बना पाए। 2015 में आए भयंकर भूकम्प में उनकी सरकार आम लोगों को राहत पहुँचाने में असफल रही। प्रचण्ड की सीपीएन (एमसी) ने भी ओली से समर्थन वापिस ले लिया और उसने नेपाली कांग्रेस से समझौता कर लिया। इस कारण ओली संसद में बहुमत का विश्वास गंवा बैठें और प्रचण्ड के हाथों पराजित हुए।  नेपाली कांग्रेस के साथ हुए  इस समझौते के अनुसार प्रचण्ड पुष्प कमल दहाल 4 अगस्त 2016 को देश के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने समझौते के अनुसार ही 31 मई 2017 को अपना पद छोड़ दिया और नेपाली कांग्रेस के शेर बहादुर देऊबा सात जून 2017 को प्रधानमंत्री बने।

लेकिन अक्टूबर 2017 में सीपीएन (एमसी) ने नेपाल की राजनीति में धमाका कर दिया। आगामी चुनाव लडऩे के लिए दोनों साम्यवादी दलों सीपीएन (यूएमएल) और  सीपीएन (एमसी) ने आपस में गठबन्धन बनाने की घोषणा कर दी। नेपाली की राजनीति पर गिद्ध दृष्टि रखने वालों का मानना था कि यह गठबन्धन करवाने में, दोनों पार्टियों के चीन समर्थक नेताओं का हाथ है क्योंकि ये दोनों वामपंथी दल भारत विरोध और चीन समर्थन के लिए जाने जाते हैं। इसमें कोई शक नहीं की वाम मोर्चा के दोनों दल भारत विरोध के लिए जाने जाते हैं। उनका चीन के प्रति प्रेम जगजाहिर है। केपीएस ओली तो आम तौर पर कहते रहते हैं कि भारत नेपाल के मसलों में नाजायज दखलंदाजी करता रहता है। सीपीएन (माओवादी केन्द्र) के पुष्प कमल दहाल प्रचण्ड के प्रधानमंत्रित्व काल 2016-2017 में ही नेपाल, चीन सरकार की योजना China Road and Belt Initiative में शामिल हुआ था। भारत ने अपने आप को इस योजना से दूर ही नहीं रखा बल्कि इसे भारत को अलग थलग करने की चीनी योजना भी बताया।  यह गठबन्धन केवल चुनाव के लिए ही नहीं बल्कि दोनों पार्टियों ने एकीकरण की मंशा भी जताई। लेकिन इसका तुरन्त प्रभाव यह हुआ कि इससे नेपाली कांग्रेस के शेर बहादुर देऊबा की सरकार अल्पमत में आ गई। परन्तु प्रचण्ड की पार्टी ने घोषणा की कि उनकी पार्टी सरकार में शामिल भी रहेगी और सरकार का समर्थन भी करती रहेगी। राजनैतिक पंडितों का मानना था कि प्रचण्ड की पार्टी ऐसा केवल इसलिए कर रही है ताकि सरकारी मशीनरी का प्रयोग चुनावों में अपने हित के लिए किया जा सके। प्रधानमंत्री शेर बहादुर देऊबा ने इसका भी रास्ता निकाल लिया। उन्होंने प्रचण्ड की पार्टी के सभी सत्रह मंत्रियों के विभाग छीन लिए। इस प्रकार वे प्रधानमंत्री के पद पर भी बने रहे। देऊबा की इस सरकार ने 2015 के प्रावधानों के अनुसार चुनावों की प्रक्रिया प्रारम्भ की।

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2017-2018 के चुनाव

2015 के संविधान के अनुसार स्थानीय निकायों, प्रादेशिक सभाओं, राष्ट्रीय संसद (प्रतिनिधि सभा और राष्ट्रीय सभा) के चुनाव सम्पन्न हुए। अंतिम चरण के चुनाव फरवरी 2018 को ही समाप्त हुए हैं।

स्थानीय निकायों के चुनाव

नेपाल में स्थानीय निकायों के चुनाव 2006 में हुए थे। उसके बाद आतंकवाद और अराजकता के कारण चुनाव नहीं हो सके। बाद में 2015 के संविधान में तीन स्तरीय संरचना बनाई गई। राष्ट्रीय सदन, प्रादेशिक सदन और स्थानीय निकाय। 2015 के संविधान में काठमांडू,पोखरा लेखनाथ, ललितपुर, भरतपुर, विराटनगर और वीरगंज में छह महानगरपालिका, घोराही, जनकपुर, हेटोडा, धनगढ़ी, तुलसीपुर, ईटहरी, नैपालगंज, बुटवल, धरान, कलैया, जीतपुर सीमरा में ग्यारह उप महानगरपालिका का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त 276 नगरपालिकाएं, और 460 ग्राम परिषदों का प्रावधान है। इन सभी निकायों में तीन चरणों 14 मई, 28 जून और 18 सितम्बर 2017 को सम्पन्न हुए। इन स्थानीय निकाय के चुनावों में सीपीएन (यूएमएल) ने 14097, नेपाली कांग्रेस ने 11454 और सीपीएन (एमसी) ने 5442 पद हासिल किए।

 

प्रतिनिधि सभा के चुनाव

इस संविधान के अनुसार 26 नबम्वर और 7 दिसम्बर  2017 को प्रतिनिधि सभा की 275 सीटें के लिए दो चरणों में चुनाव हुए। खड्ग प्रसाद शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत माक्र्सवादी लेनिनवादी)          और पुष्प कमल दहाल प्रचण्ड की  कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी केन्द्र) और  ने मिलकर आपसी समझौते से यह चुनाव लड़ा  था। सीपीएन (यूएमएल) और सीपीएन (एमसी) के इस वाममोर्चा ने भारी जीत हासिल की। दोनों ने मिल कर 174 सीटें हासिल कर लीं। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत माक्र्सवादी लेनिनवादी) ने 121 और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी केन्द्र) ने 53 (पूर्व में इस पार्टी का नाम यूनिफाईड कम्युनिस्ट पार्टी आफ नेपाल (माओवादी) था सीटों पर विजय प्रप्त की। नेपाली कांग्रेस मात्र 63 सीटों पर सिमट कर रह गई।

राष्ट्रीय सभा के चुनाव

नेपाल के संविधान -2015 के अनुसार संसद के दो सदन होंगे। प्रतिनिधि सभा और राष्ट्रीय सभा। प्रतिनिधि सभा के चुनाव हो चुके हैं और राष्ट्रीय सभा के सात फरवरी 2018 को हुए। राष्ट्रीय सभा के 59 सदस्य हैं जिनमें से 56 सदस्य संयुक्त निर्वाचन मंडल द्वारा निर्वाचित होंगे। इस निर्वाचन मंडल, देश की सात प्रादेशिक सभाओं को चुने हुए सदस्य, जिनकी संख्या 550 है, 753 स्थानीय निकाओं के चुने हुए मेयर और उप मेयर जिनकी संख्या 1506 है को मिला कर बनता है। प्रादेशिक सभाओं के चुने गए सदस्यों की एक वोट की कीमत 48 होगी और स्थानीय निकाओं के चुने गए मेयर और उप मेयर की एक वोट की कीमत 18 होगी। (प्रत्येक प्रादेशिक सभा से आठ सदस्य चुने जाएंगे लेकिन उनमें से तीन महिलाएं, एक दलित और एक दिव्यांग होना लाजिमी है) और शेष तीन, सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत होंगे, लेकिन उनमें से भी एक महिला का होना जरुरी है। राष्ट्रीय सभा के लिए सात फरवरी को हुए चुनाव में सीपीएन (यूएमएल) को 27 सीटें मिलीं, पुष्प कमल दहाल प्रचण्ड की  सीपीएन (एमसी) को 12 सीटें मिलीं। नेपाली कांग्रेस के हिस्से 13 सटें आईं। दो मधेसी  दलों राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल और फेडरल सोशलिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल ने दो दो सीटें जीतीं। इस प्रकार दोनों कम्युनिस्ट दलों ने राष्ट्रीय सभा की 56 सीटों में से 39 पर कब्जा कर लिया। यह गठबन्धन 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा की 174 सीटों पर पहले ही कब्जा कर चुका है।

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प्रादेशिक विधान सभाओं के चुनाव

प्रतिनिधि सभा के साथ-साथ नेपाल की सात प्रदेश सभाओं के लिए भी चुनाव हुए। सभी सात प्रदेश सभाओं में कुल मिला कर 550 सीटें हैं। प्रदेश सभाओं के लिए भी साठ प्रतिशत सीटें प्रत्यक्ष मताधिकार द्वारा और चालीस प्रतिशत आनुपातिक प्रतिनिधित्व द्वारा भरी जाती है। इस प्रकार 550 सीटों में से 330 प्रत्यक्ष मताधिकार द्वारा और 220 आनुपातिक प्रणाली द्वारा भरी जाती हैं। नेपाल में कुल सात प्रान्त या प्रदेश हैं। अभी इनका नामकरण नहीं हुआ है। इन्हें संख्या के आधार पर ही पुकारा जाता है।

इन प्रदेश सभाओं की सीटों की संख्या निम्नानुसार है-

प्रदेश      1-            56+37    = 93

प्रदेश      2-            64+43    =107

प्रदेश      3-            66+44    =110

प्रदेश      4-            36+21    =57

प्रदेश      5-            52+39    =9१

प्रदेश      6-            24+15    =39

प्रदेश      7-            32+21    =53

यह संख्या प्रत्यक्ष और आनुपातिक सीटों को जोड़ कर है।

इन 550 सीटों में से खड्ग प्रसाद शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत माक्र्सवादी लेनिनवादी) ने 242, नेपाली कांग्रेस ने 113 और प्रचण्ड की  कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी केन्द्र) या सीपीएन (एमसी) ने 109 सीटें जीतीं।

कुल मिला कर नेपाल के राष्ट्रीय, प्रादेशिक और स्थानीय चुनावों में सीपीएन (यूएमएल) और सीपीएन (एमसी) के वामपंथी मोर्चा ने स्पष्ट विजय प्राप्त कर ली है। इसी बीच   सीपीएन (यूएमएल) और सीपीएन (एमसी) के एकीकरण की प्रक्रिया शुरु होने की संभावना भी बनी है। एकीकृत पार्टी का नाम कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल होगा। इसी समझौते के तहत खड्ग प्रसाद शर्मा ओली नेपाल के नए प्रधानमंत्री बनें। नई पार्टी के अध्यक्ष पद की कमान पुष्प कमल दहाल संभालेंगे। आधा समय बीत जाने पर दोनों पदों की अदला-बदली हो जाएगी। प्रचण्ड प्रधानमंत्री होंगे और ओली पार्टी अध्यक्ष। दोनों वामपंथी दलों के एकीकरण का यह प्रयोग कितने समय चलेगा, इसका उत्तर तो भविष्य ही देगा, फिलहाल इस वाम मोर्चा के सांझे प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद शर्मा ओली बन ही गए हैं।

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मधेस क्षेत्र की पार्टियों की भूमिका

मधेस क्षेत्र में नेपाल की जनसंख्या का लगभग पचास प्रतिशत भाग रहता है। लेकिन मधेसियों से अन्याय होता है और शासन में भी उनको जनसंख्या के अनुपात से हिस्सेदारी नहीं दी जाती। बहुत से मधेसियों को तो नागरिकता से भी बंचित रखा गया है। उनकी भाषा को संविधान मान्यता नहीं देता। मधेस क्षेत्र को आम तौर पर भारत समर्थक माना जाता है। मधेसियों का आरोप है कि 2015 का संविधान उनके हितों और विकास पर कुठाराघात करता है। इसलिए शुरु में उन्होंने 2017-2018 के चुनावों का बहिष्कार करने का ही निर्णय किया था। लेकिन अप्रैल 2017 को पांच मधेसी पार्टियों, महन्त ठाकुर की तराई मधेस लोकतांत्रिक पार्टी, राजेन्द्र महतो की सद्भावना पार्टी, शरत सिंह भंडारी की राष्ट्रीय मधेस समाजवादी पार्टी, महेन्द्र यादव की तराई मधेस सद्भावना पार्टी और रामकिशोर यादव की मधेसी जनाधिकार फोर्म गणतांत्रिक ने मिल कर राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल का गठन कर लिया। इस पार्टी ने चुनावों में हिस्सा लिया। पार्टी को 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में से 17 सीटें मिलीं। राष्ट्रीय सभा में पार्टी केवल दो सीटें हासिल कर सकी।

मधेसी पार्टियां 2015 के संविधान को मधेस विरोधी मानती है और उसमें नागरिकता सम्बधी उपबंधों में संशोधन चाहती है। वामपंथी मोर्चे द्वारा सरकार बनाने के बाद, उसका इस सम्बंधी क्या रुख रहेगा, यह तो भविष्य ही बताएगा। भविष्य के ही खाते में एक और प्रश्न छिपा है कि यह मोर्चा टिकेगा भी कितने दिन? नेपाल में व्याप्त इस अस्थिरता के चलते आम नागरिकों का मोहभंग हो रहा है। प्रचण्ड का ग्राफ जो कभी बहुत नीचे था, वह काफी नीचे आ गया है। नेपाल की राजनीति में उसकी पार्टी की हैसियत तीसरे दर्जे पर पहुंच गई है। दरअसल नेपाल का आम आदमी भारत के साथ स्वयं को ज्यादा सहज अनुभव करता है, जबकि साम्यवादी नेतृत्व उसे चीन की गोद में ले जाना चाहता है। नेपाल के मामले में भारत सरकार को वहां की सरकार और आम जन से स्वतंत्र रूप से संवाद सूत्र स्थापित करने चाहिए। इसके साथ ही वहां की वामपंथी सरकारों से भी संवाद बनाए रखना चाहिए क्योंकि नेपाल तीन ओर से भारत की सीमा से लगता है और वहां सरकार कोई भी हो, वह अपने हित में ही भारत से सम्बंध बिगाडऩा नहीं चाहेगी। यही कारण है कि 2017-18 के चुनावों के बाद भारत की प्रधानमंत्री सुषमा स्वराज नेपाल में इन सभी वामपंथी नेताओं यथा, केपीएस ओली और कमल पुष्प दहाल से मिलीं और उन्हें भारत की मदद का भरोसा दिलाया।

(लेखक हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला, के कुलपति हैं)

डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

 

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