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दिल्ली तो दिल्ली ही है

दिल्ली तो दिल्ली ही है

बेटा: पिताजी।

पिता: हां बेटा।

बेटा: पिताजी, मैं दिल्ली घूम आया।

पिता: क्या देखा? आया कुछ मजा?

बेटा: बहुत मजा आया पिताजी।

पिता: तो फिर बता क्या खाास देखा?

बेटा: एक बात बताओ पिताजी। हमारे राष्ट्र की राजधानी नयी दिल्ली है या न्यू देल्ही?

पिता: बेटा राजधानी तो नयी दिल्ली ही है।

बेटा: फिर इसका नाम हिंदी में नयी दिल्ली और अंग्रेजी में न्यू देल्ही क्यों नहीं लिखा जाता है?

पिता: बेटा, हुआं एक हजार साल से ज्यादा गुलाम रहे। इसलिए हमारे मन और दिमाग से गुलामी की बदबू निकल नहीं पाती। अंगरेज इसका नाम न्यू देल्ही दे गए हैं तो हम कैसे बदल सकते हैं?

बेटा: तो अब समझा की हमरे देश का नाम हिंदी में भारत और अंग्रेजी में इंडिया क्यों है?

पिता: हां बेटा, तू ठीक ही समझा..

बेटा: पर पिताजी, कोई और देश भी है जिसका नाम अपनी भाषा में कुछ और और विश्व की दूसरी भाषाओं में और हो?

पिता: मुझे तो नहीं लगता कि ऐसा कोई और उदहारण भी होगा. भारत ही निराला है।

बेटा: पर पिताजी, अनेकों उदहारण हैं जहां देशों ने अपने नाम या राजधानियों के नाम सुधार लिए हों या बदल लिए हों — जैसे बर्मा बन गया म्यांमार, सीलोन बन गया श्रीलंका, और अन्य।

पिता: कई लोगों का तर्क है कि ऐसा करने से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई परेशानियां खड़ी हो जाएंगी।

बेटा: जब और देशों ने नाम बदल लिए तो परेशानियां खड़ी नहीं हुईं?

पिता: यही तर्क देते हैं शासक लोग।

बेटा: कई देशों ने तो अपनी राजधानियों के नाम भी बदले हैं। उससे विश्व में कोई दिक्कत नहीं हुयी?

पिता: यह तो वह ही जाने जिनको यह निर्णय लेना है।

बेटा: चलो इसको तो छोड़ो। मैंने वहां क्या देखा, यह सुनाता हूं।

पिता: बता।

बेटा: पिताजी, दिल्ली में मैंने एक बहुत बड़ा सेठ देखा ञ्जश रुद्गह्ल  साब के नाम पट्टियां हर मोहल्ले, हर मार्किट में, रिहायशी इलाकों में, सड़कों पर, छोटे और बड़े सब इलाकों में।

पिता: बेटा, जब मैं तुम्हें पढऩे के लिए कहता था, तब तू खेलता और आवारागर्दी करता फिरता था। इसलिए तेरे साथ तो ऐसी घटनाएं होती ही रहेंगी। यह टॉयलेट नहीं टूलेट लिखा होता है। इसका मतलब यह है कि जिस स्थान पर यह बोर्ड लटका हो, वह चाहे जमीन हो, मकान हो, दुकान हो वह किराये के लिए खाली है।

बेटा: अच्छा। यह बात है। अब समझ आ गया। पर यह क्या है? कहीं लिखा है नेहरू भवन, राजीव भवन, इंदिरा चौक, राजीव चौक। सड़कों के नाम भी कई लोगों के नाम से जुड़े दिखे। यह भवन या सड़कें उनकी अपनी हैं या उनके नाम से जुड़ी हैं?

पिता: नहीं बेटा, बड़े नेताओं व महानुभावों के सम्मान व उनकी याद में ऐसा किया जाता है। यह उनकी संपत्ति नहीं होती।

बेटा: पर उनके वंशज तो कल को दावा कर सकते हैं कि उनके नाम पर बनी इमारतें व सड़कें हमारी मलकियत हैं। पर पिताजी, सड़कों व भवनों के नाम तो कई विदेशी शासकों के नाम पर भी हैं जिन्होंने हमें गुलाम बना रखा था, जैसे डलहौजी रोड, मुगल बादशाहों के नाम आदि।

पिता: यह तो है।

बेटा: तो इसका मतलब क्या कि हम उनको भी सम्मान दे रहे हैं? हम यह नहीं भूलना चाहते कि हमने एक हजार वर्ष गुलामी में बिताई है?

पिता: बात तो तेरी ठीक है। पर इसका मेरे पास उत्तर नहीं हैं। यह तो बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ ही बता सकते हैं।

बेटा:  फिर पिताजी, चीन ने भी हमारे देश पर हमला किया था। इससे पूर्व चीन के बड़े नेता भारत के दौरे पर भी आये थे। हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा भी हमने दिया था। मुगल व अंगरेज आक्रमणकारी शासकों के भांति उनकी याद ताजा रखने के लिए हमने भवनों, सड़कों आदि के नाम चीनी नेताओं के नाम पर क्यों नहीं रखे?

पिता: प्रश्न तो तेरा ठीक है, पर इसका उत्तर मेरे पास नहीं है.

बेटा: पिताजी, मैं वहां खरी बावली भी गया। मैंने पूछा कि बावली कहां है? पर कोई बता नहीं पाया।

पिता: यह तो है।

बेटा: उलटे मेरा स्कूटर वाला कहने लगा कि यहां कोई राशन-पानी खरीदना है तो चलो, बावली ढूंढते-ढूंढते तुम बावले हो जाओगे।

पिता: उसने तेरे को ठीक हे सलाह दी।

बेटा: ऐसा ही मेरे साथ तब हुआ जब मैं धौला कुआं में कुआं ढूंढने चला गया।

पिता: बेटा, कई बार नाम ऐसे ही पड़ जाते हैं। या कभी यहां कुआं होता भी होगा तो आज तो कहां मिलेगा? पता नहीं कहां लुप्त हो गया या सड़कों व भवनों के नीचे दब गया।

बेटा: पिताजी, मैंने नयी सड़क भी देखी पर उसमें कुछ नयापन था ही नहीं। उससे तो और कई सड़कें नयी थीं, बढिय़ा थीं।

पिता: यह सब चलता है। जब यह सड़क बनी होगी तब यह जरूर नयी होगी। अब नयी पुरानी पड़ गयी है।

बेटा: दिल्ली तो विद्या ग्रहण करने का बहुत बड़ा स्थान है। वहां कई महाविद्यालय व विश्वविद्यालय हैं।

पिता: राष्ट्र की राजधानी है, बेटा। इसलिए उसे तो हर चीज में अग्रणी रहना चाहिए।

बेटा: वहां दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल विश्वविद्यालय व कई निजी विश्वविद्यालय भी हैं।

पिता:  बेटा, जवाहरलाल विश्वविद्यालय का तो बहुत बड़ा नाम है, विदेशों में भी।

बेटा: पर पिताजी मैं जितने दिन वहां रहा मैंने तो यही खबरें पढ़ीं कि कहीं इन संस्थानों में में घेराव हो रहा है, कहीं प्रदर्शन।

पिता:  बेटा, देश में प्रजातंत्र है। यह चीजें तो चलेगी हीं। रोज कोई नयी से नयी मांग उठ कड़ी होती है।

बेटा: तो विद्यार्थी पढ़ाई कब करते होंगे?

पिता:   यह तो वहां के अध्यापक व विद्यार्थी ही जाने।

बेटा: पर पिताजी, निजी विश्वविद्यालयों के बारे तो मैंने कोई ऐसी खबर नहीं पढ़ी।

पिता:   हां, वहां की खबर मेरे भी ध्यान में नहीं आयी।

बेटा: तो क्या उन विश्वविद्यालयों में जनतंत्र नहीं है?

पिता:  यह तो मैं नहीं कह सकता।

बेटा: मैंने वहां यह भी देखा कि टैक्सीवालों व तिपहिया वाहनों में लिखा है ‘मेरा ईमान, महिलाओं का सम्मान’।

पिता:  पिछले कुछ वर्षों में ऐसे वाहनों में महिलाओं के विरुद्ध बड़ी अपमानजनक घटनाएं हुईं जिस कारण महिलाओं को आश्वस्त करने के लिए ऐसे तरीके अपनाये गए।

बेटा: तो क्या उससे महिलाओं के विरुद्ध घटनाएं कम हो गयीं?

पिता:  नहीं। 19-21 का फर्क पड़ा हो तो मैं कह नहीं सकता।

बेटा: इसका मतलब क्या कि जिन वाहनों पर यह नहीं लिखा है उन पर महिलाओं के विरुद्ध अत्याचार का शक है?

पिता:  ऐसा तो नहीं है, बेटा।

बेटा: पिताजी, तो क्या कोई लुटेरा, जेबकतरा  यह लोगों तो बताता है कि मैं ऐसा हूं?

पिता:  नहीं। सब अपने आप सब से बड़ा ईमानदार, कानून का पालक और शरीफ बताते हैं।

बेटा: दूसरों के मन में अपने प्रति विश्वास पैदा कर ही तो ऐसे अपराध किये जा सकते हैं।

पिता:  करने को कोई भी व्यक्ति अदालत में भी कहता है कि मैंने अपराध नहीं किया। पर अदालत उसे ही अपराधी कह कर सजा सुना देती है।

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