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प्रयाग कुम्भ: विभिन्न आयाम

प्रयाग कुम्भ: विभिन्न आयाम

प्रयाग महातीर्थ है और संगम उसका केन्द्र बिन्दु। प्रत्येक वर्ष माघमेला का आयोजन, प्रत्येक छ: वर्ष के पश्चात अर्धकुम्भ का आयोजन तथा बारह वर्ष के पश्चात महाकुम्भ का आयोजन प्रयाग इलाहाबाद के सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक ढांचे के प्रमुख अंग हैं। डॉ. प्रमोद कुमार अग्रवाल हिन्दी के प्रतिष्ठित लेखक हैं। वे सन् 1987 से 1992 तक उत्तर प्रदेश में गंगा कार्य योजना भारत सरकार के निदेशक रह चुके हैं। धर्मनिरपेक्ष दृष्टि से-यह संसार का सबसे विशाल जन समावेश है, जहां तत्कालीन वर्ष में जनसंख्या के सापेक्ष इससे बड़ा आयोजन और कहीं नहीं होता, क्योंकि गंगा द्वारा छोड़ी गयी जमीन पर पूरा नगर बस जाता है।

धर्मनिरपेक्ष दृष्टि से-यह संसार का सबसे विशाल जन समावेश है, जहाँ तत्कालीन वर्ष में जनसंख्या के सापेक्ष इससे बड़ा आयोजन और कहीं नहीं होता, क्योंकि गंगा द्वारा छोड़ी गयी जमीन पर पूरा नगर बस जाता है। यूनेस्को ने इसे मानवता की अपूर्व सांस्कृतिक विरासत कहा है। पंडित जवाहरलाल नेहरू भी लोगों की अद्भुत धार्मिक आस्था देखकर अभिभूत थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जहां भारतीयों की इन आयेजनों में आस्था के प्रशंसक थे वहां वे इन मेलों में स्वच्छता पर भी जोर देते थे। दूसरे गंगा एवं यमुना के लंबे किनारे तीर्थ यात्रियों के चलने एवं बसने का अवसर प्रदान करते हैं। इस समागम में आध्यात्मिक विचार-विनिमय होता है। जिससे पुण्य प्राप्ति के साथ-साथ व्यक्ति वापिस जाकर अपने-अपने परिवार, समाज, प्रान्त एवं देश की प्रगति में योगदान देते हैं। बदलते युग के साथ-साथ धर्म को भी नये ढंग़ से परिभाषित किया जाता है। सभी धर्म प्रचारक हिन्दुओं को मुसलमान भाईयों के साथ-साथ रहने के लिए उपदेश दे रहे हैं, ताकि भारतीय संस्कृति के मूलमंत्र सर्वधर्म सद्भाव अथवा वसुधैव कुटुम्बकम की स्थापना हो सके। कुम्भ में नियमित प्रवचन एवं प्रार्थनाए होती हैं। इस आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक प्रवाह से कोई भी यात्री अछूता नहीं रह सकता। व्यक्तिगत शुचिता, उन्नति, सुख एवं समृद्धि के साथ-साथ सामाजिक कल्याण के विषय में भी ज्ञान-दान होता है। कुम्भ की तैयारी में सभी समुदायों, वर्गों तथा जातियों के लोग समान रूप में संलग्न रहते हैं। कई बार इलाहाबाद के मुसलमान जिलाधिकारी ने माघमेला का प्रारम्भिक कलश रखा। जब तीर्थयात्री इलाहाबाद की सड़कों से गुजरते हैं तो इलाहाबाद के हिन्दू और मुसलमान निवासी यात्रियों का समान रूप से स्वागत करते हैं। नेहरू जैसे धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति को कुम्भ में उमड़ते हुए जन सैलाब को देखकर उनकी श्रद्धा एवं विश्वास की प्रशंसा करनी पड़ी एवं उसे भारतीय संस्कृति का एक अविभाज्य अंग मानना पड़ा। किस प्रकार बिना बुलाए करोड़ों लोग प्रयाग-संगम की ओर चले आते हैं, जबकि राजनैतिक दलों तथा धार्मिक मठाधीशों द्वारा लाखों-करोड़ों रूपये खर्च करने पर भी ऐसी भीड़-एकत्रित नहीं होती। प्रशासन कुम्भ-मेला का आयोजन इसके विभिन्न शंकराचार्यों, महामण्डलेश्वरों तथा धार्मिक गुरूओं के विभिन्न मतों के टकराने का स्थल हो जाता।

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सामाजिक दृष्टि से-कुम्भ आयोजन में इलाहाबाद के सभी वर्ग, समान उत्साह, प्रेम एवं भाईचारे से भाग लेते हैं। कुम्भ के एक-डेढ़ मास के दौरान इलाहाबाद-प्रयाग का प्रत्येक घर एवं स्थल बाहर के अतिथियों के लिए पूर्णत: खुल जाता है। वस्तुत: अतिथिगण भी अपने इलाहाबाद के मित्रों, संबंधियों तथा सहकर्मियों को इस तिथि तक प्रतीक्षा कराते हैं-एक पंथ, दो काज। जहाँ एक ओर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मेला-प्रांगण को नव-नवेहिन दुल्हन की भांति सजाया, संवारा जाता है। वहां इलाहाबाद का प्रत्येक निवासी अपनी सामथ्र्य के अनुसार अपना निवास ठीक करने का प्रयास करता है, ताकि इलाहाबाद से तीर्थयात्री उत्तम संदेश लेकर जायें। जहां इलाहाबाद के पण्डे एवं मल्लाह अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ तैयारियां करते हैं, वहां दूसरे वर्गों के लोग भी पीछे नहीं रहते। कोई अपनी गाडिय़ां ठीक कराता तो दूसरे अपने यहां अतिथियों के ठहरने के लिए आवश्यक सामान तथा सुख-सुविधाओं की व्यवस्था करते। प्रयाग के मुनि भारद्वाज के आतिथ्य-सत्कार से तो राम भी अभिभूत हो गये थे।

विभिन्न सामाजिक कार्यकत्र्तागण तथा औद्योगिक एवं वाणिज्यिक प्रतिष्ठान विभिन्न, विभिन्न पोस्टरों, पर्चों आदि के द्वारा अपने उत्साह तथा सम-समसामयिक चेतना का प्रचार-प्रसार करते तथा विभिन्न कार्यशालाओं तथा सभाओं का आयोजन करते हैं। साहित्यकार गण, लोगों में कुम्भ की सही दृष्टि को जगाने का प्रयत्न करते पर धार्मिक दुंदुभी इतनी तीव्र होती कि उनका स्वर मंद पड़ जाता है। विभिन्न राजनैतिक दल भी इस प्रचार-प्रसार के युग में कुम्भ जैसे अवसर का उपयोग करने से नहीं चूकते। नई-नई संस्थाओं तथा योजनाओं के प्रचार-प्रसार का तो यह सुअवसर होता है। स्नान के समय यह ज्ञात नहीं होता कि कौन निर्धन है और कौन धनी? संगम स्थल पर जैसे भारत एक दृष्टिगोचर होता है, केवल पुरूषों तथा स्त्रियों के सिर दृष्टिगोचर होते हैं।

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प्रशासनिक दृष्टि से

सन् 2013 में प्राय: 6 करोड़ लोग प्रयाग-कुम्भ के लिए इलाहाबाद पधारे। जो 2019 के अद्र्धकुम्भ में दस करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। इनका आवागमन ठहरने तथा प्रशासन के प्रबन्ध को मिलाकर प्राय: दस हजार करोड़ रूपये से अधिक खर्च आयेगा। इस मेले के दौरान खर्चे से इलाहाबाद का अर्थतंत्र पूरे वर्ष दौड़ता रहता है। रेस्तरों तथा होटलों एवं मिठाई तथा नमकीन-चाय की दुकानों को नये ढ़ंग से सजाया जाता है ताकि वे इलाहाबाद के अतिथियों की आवश्यकता की पूर्ति कर सकें। इलाहाबाद के रिक्शे वाले अपने रिक्शों को नया करते हैं तथा समय से अतिरिक्त रिक्शा खींचने वालों को ले आते हैं। इलाहाबाद के रिक्शे वाले बड़े चतुर होते हैं तथा वे ही इलाहाबाद के यात्रियों के सही मार्गदर्शक होते हैं। मेले के आयोजन पर केन्द्रीय तथा प्रदेश के सरकारी विभाग एवं प्रतिष्ठान बड़ी धनराशि खर्च करते हैं। उनमें भ्रष्टाचार को लेकर नरम-गरम समाचार प्रकाशित होते रहते हैं क्योंकि भारतीयों को चाय की चुस्की के साथ भ्रष्टाचार तथा राजनीति पर चर्चा करने का नशा है। वैसे कुम्भ के दौरान उ0 प्र0 में प्रत्येक विभाग के अधिकारियों में गलाकाट प्रतियोगिता होती है, ताकि वे आर्थिक दृष्टि से अपने परिवार को पार उतार सकें। विभिन्न आश्रमों के साधु-महात्मागण अपना जुड़ा हुआ धन, कुम्भ में खर्च करते हैं तथा कुम्भ के शेष होते-होते उन्हें अपने शिष्यों तथा तीर्थयात्रियों से इसका एक मुख्य अंश दान के रूप में प्राप्त हो जाता है। वृद्ध, स्त्री-पुरूष कुम्भ के लिए धन वर्षों से जोड़कर रखते हैं तथा कुम्भ में जी खोलकर खर्च करते हैं। देश की आर्थिक स्थिति में आमूल-चूल उन्नति आने से लोगों के जीवन स्तर में भी अभूतपूर्व विकास हुआ है। यही कारण है कि इन धार्मिक मेलों में शनै:-शनै: तीन सितारा संस्कृति जन्म ले रही है। गंगा की रेत पर पुआल बिछाकर सोने वालों की कमी हो रही है तथा सामूहिक शौचालयों का भी लोग कम इस्तेमाल करना चाहते हैं मेला प्रशासन धर्म की दृष्टि से प्रत्येक विशेष तिथि पर स्नान की सुव्यवस्था करता है। इस बार मेला प्रशासन ने प्राय: एक लाख बाइस हजार जलधौत शौचालयों की व्यवस्था की है पर यह संदेहास्पद है कि संगम पर गंगा की रेत कितने यात्रियों का मल-जल वहन कर सकेगी तथा इस मल जल के निस्तारण की रात के अंधेरे में कैसे सुव्यवस्था होगी।

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इसके बाद गांवों के निरीह तथा अशिक्षित लोगों में कुछ खो भी जाते हैं, उनके लिए लगातार उद्घोषणा चलती रहती है, जो धार्मिक संगीत एवं प्रवचनों को दबा देती है फिर भी माँ गंगा के दुधिया जल को देखकर तथा उसमें डुबकी लगाकर तीर्थयात्रीगण अपनी सभी परेशानियों को भूल जाते हैं एवं पुण्य की गठरी बांधकर अपने घर को रवाना होते हैं। इसके ऊपर यदि उन्हें संत-महात्माओं का आर्शीवाद प्राप्त हो गया, तो वह तो सोने में सुहागा होता है। रेलगाडिय़ों में आरक्षण की समस्या के कारण आजकल लोग कारों, टै्रक्टर-टेलरों तथा टेम्पों इत्यादि से समूह के समूह बनाकर आते हैं। अत: आजकल पार्किंग एक नई समस्या हो गई है तथा इस समस्या का मेला प्रशासन एक सीमा तक ही समाधान कर पाता है। मेला प्रशासन ने इस कुम्भ में 94 पार्किंग स्थलों में पांच लाख वाहनों के रखने की व्यवस्था की है। फिर भी सभी को पांच से दस किलोमीटर चलकर ही स्नान करना होगा। आशा है कि, आने वाले कुम्भ 2019 में आम आदमी ही वी. आई. पी. होगा, तथा उसे स्नान का समान अवसर मिलेगा।

भारत की भांति प्रयाग-कुम्भ की भी नाना प्रकार की समस्याएं हैं, पर भारत की सामान्य जनता भीड़ से भली-भांति जूझना जानती है, क्योंकि यह उसकी गति है। फिर सरकारें भी करोड़ों रुपये खर्च करके संगम पर जल वैज्ञानिक मानदण्डों के आधार पर प्राय: स्नान योग्य कर देती हैं। धार्मिक दृष्टि से तो गंगा सदियों से पवित्र थी, हैं और रहेगी।

अत: संगम पर कुम्भ के दौरान तीर्थयात्रीगणों ने निश्चित होकर डुबकी लगायें एवं पुण्य ग्रहण करेंगे। आशा है कि भविष्य में तीर्थयात्रीगण अपने एवं अपने परिवार के अतिरिक्त समाज एवं देश को भी स्वच्छ बनाने के लिए डुबकी लगायेंगे तथा देश के कल्याण के लिए प्रार्थना करेंगे।

डॉ. प्रमोद कुमार अग्रवाल

 

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