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आतंकवाद घटा पर खत्म नहीं हुआ

आतंकवाद घटा पर खत्म नहीं हुआ

एक खुशखबरी-सारी दुनिया को बारूद के ढ़ेर पर खड़ा कर देनेवाले वैश्विक आंतकवाद अपने चरम पर जाने के बाद उतार पर है। आतंकी हमले कम हो गए है, मरने वालों की संख्या भी घटी है। आतंकवाद के कुछ पुराने अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी सुस्ता रहे हैं तो क्षेत्रीय खिलाड़ी उभर रहे हैं। कुल मिलाकर आतंकवाद का तापमान घटा है। आतंकवाद कम तो हुआ है मगर हारा नहीं है। अफगानिस्तान जैसे देशों में तो वह जीतता नजर आ रहा है। अफगानिस्तान में तालिबान के सामने अमेरिका हार चुका है, वहां से निकलना चाहता है। मगर दूसरी तरफ अफ्रीका की गरीबी में आतंकवाद की मार भी तेज होती जा रही है। सोमालिया का अलशबाब और नाइजीरिया को बोको हराम ने अफ्रीकी के लोगों का जीना हराम किया हुआ है सभी इस्लामी और खासकर वहाबी आतंकवादी है मगर इन पांच में गैर इस्लामी माओवाद की भी प्रवेश हुआ है। इस तरह दुनिया ने माओवाद की बढ़ती चुनौती को पहचाना है। उसके कारण ही भारत आतंकवाद से प्रभावित देशों में तीसरे नंबर पर है। बाकी दो देश हैं-इराक और अफगानिस्तान।

अपनी कट्टरता और बर्बरता के लिए मशहूर आईएसआईएस इस्लामिक स्टेट में हारने के बावजूद भी आतंक की दुनिया में सिरमौर है। आईएसआईएस के खिलाफ अमेरिका के नेतृत्व में 59 देशों के ग्लोबल गठबंधन की इराक और सीरिया में बने इस्लामिक स्टेट में जीत के बाद लगा था कि वह खत्म हो जाएगा मगर वह अब भी जिंदा है और आतंक की दुनिया में सक्रिय है। इसकी वजह यह है कि आईएसआईएस का ढांचा फेडऱल है इसलिए केंद्र ढ़ह गया  है मगर दुनिया भर में उसके प्रांत है जिन्हें वह विलायत कहता है। उसके ये प्रांत हैं-लीबिया, मिस्र (सिनाई), खोरासान (भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान), नाईजेरिया, अल्जीरिया, यमन, सऊदी अरब, नार्थ कॉकेशस। इनमें से लीबिया मिस्र और खोरासान प्रांत बहुत सक्रिय हैं उनका अपने देशों के कुछ क्षेत्रों पर कब्जा है। कुछ देश तो ऐसे हैं जहां उसके सहयोगी संगठनों ने भी बड़े क्षेत्र पर कब्जा भी किया हुआ है। लीबीया में कद्दाफी के बाद हुए गृहयुद्ध का लाभ उटाकर उसके सहयोगी संगठनों ने कुछ हिस्से पर कब्जा कर लिया।

मिस्र के सीनाई में आईएसआईएस के सहयोगी संगठन का नाम ‘अंसार बैत अल मकदिस’ है उसने कई आतंकी हमले किए हैं। इस गुट ने आईएसआईएस के साथ मिलाने के पहले ही दुश्मनों का सिर कलम करने जैसे मध्ययुगीन तरीके अपना लिए थे। आईएसआईएस ने अफगानिस्तान के  नंगरहार प्रॉविंस के ईस्टर्न बॉर्डर आचिन में कई अहम इलाकों पर कब्जा कर लिया है। अफगानिस्तान में जहां तालिबान की तूती बोलती। आईएसआईएस का प्रभाव भी है। पिछले कुछ समय में आईएस ने अफगानिस्तान में कई हमले किए है। यह हमले आईएस की विलायत खोरासान ने किए हैं। खोरासान में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और भारत आते हैं। अफगानिस्तान से इस्लामिक स्टेट अब भारत में पैर जमाने की एक बड़ी रणनीति पर काम कर रहा है। भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ ने एक रिपोर्ट केंद्र को सौंपी है। इसमें कहा गया है कि आईएस अफगानिस्तान में नांगरहार कैंप में युवाओं को आतंकी हमलों का प्रशिक्षण दे रहा था। इनमें ज्यादातर केरल से थे। गौरतलब है कि केरल से 21 मुस्लिम गायब हो गए थे मगर वे इराक नहीं आईएस खोरसान के साथ लडऩे अफगानिस्तान गए थे। आईएस खोरासान पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तान में भी तीन बड़े हमले करा चुका है जिनमें मस्त कलंदर  की दरगाह पर हुआ हमला भी शामिल हैं।

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आईएस इराक में भले ही हारा हो मगर वह अभी खात्में की स्थिति में नहीं पहुंचा है। वह संगठन और उग्र विचारधारा के रूप में जीवित है और लोन वोल्फ का सहारा लेकर कई देशों में कई आतंकी हमले भी करा चुका है।

मगर किसी समय दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी संगठन रहा लादेन का अलकायदा इस सूची से गायब है। अल कायदा और आईएस में फर्क है। अल कायदा वल्र्ड ट्रैड सेंटर पर हमले जैसे बड़े कारनामें करता है। आईएस छोटे बड़े का फर्क नहीं करता। फिर इन दिनों आईएस आतंक की दुनिया का सबसे बड़ा ब्रांड है इसलिए आतंकवादी गतिविधियां करने वाले आईएस का नाम लेना ज्यादा पसंद करते हैं क्योंकि उससे मामला सनसनीखेज हो जाता है।

विश्व के सबसे दुर्दात आतंकवादी संगठन के रूप में इस्लामिक स्टेट (आईएस) अलकायदा को पछाड़ रहा है। अमेरिकी विदेश विभाग ने यह बात कही है। आतंकवाद पर विदेश मंत्रालय की वार्षिक रपट में कहा गया है कि आईएस का अभूतपूर्व प्रसार और उसकी क्रूरता, विदेशी लड़ाकों को नियुक्त करने की ताकत, संदेश और हमले करने की क्षमता ने आईएस को इतना सशक्त बना दिया है कि वह अलकायदा को पीछे छोड़ रहा है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान में अलकायदा के कोर नेतृत्व को हुए काफी नुकसान के अलावा इस संगठन का नेतृत्व लगता है अपनी गति खोता जा रहा है। इसकी तुलना में आईएस का विस्तार तेजी से हो रहा है।

आतंकी संगठन अलकायदा का सरगना बिन लादेन के  पाकिस्तान में अमेरिकी हमले  में मारे जाने के बाद  खबर मिली है कि अल कायदा का नया सरगना अल जवाहिरी भी पाकिस्तान में  ही है। अमेरिका को  उसके ठिकाने के बारे में भी पता है क्योंकि पिछले सालों में जनवरी में बराक ओबामा प्रशासन ने जवाहिरी को टारगेट कर ड्रोन हमला किया था लेकिन वह बाल-बाल बच गए। पाकिस्तान के एक पूर्व शीर्ष अधिकारी ने बताया कि उसे 100 प्रतिशत यकीन है कि ओसामा बिन लादेन का 26 साल का बेटा हमजा भी आईएसआई के संरक्षण में पाकिस्तान में रह रहा है।

नौ सितंबर 2001 को न्यूया के वल्र्ड ट्रैड सेंटर पर हुए आतंकी हमले ने सारी दुनिया को दहला दिया था। महाबली अमेरिका पर आतंकी हमले को अंजाम देनेवाले अल काईदा के नेता ओसामा बिन लादेन से सारी दुनिया खौफ खाने लगी थी। इस घटना को हाल ही में अठारह साल पूरे हो गए लेकिन उसके बाद अल काईदा 11 सितंबर जैसे किसी थर्रा देने वाली किसी वारदात को अंजाम नहीं दे पाई  और उसके बाद पैदा हुआ खूंखार आतंकी संगठन आईएसआईएस आतंक की दुनिया पर इस कदर छा गया कि लोगों को लग रहा है कि वह अल काईदा को निगल गया। अल काईदा अब इतिहास की वस्तु बन गई है। कभी-कभी अल काईदा नेताओं जवाहिरी आदि के  बयानों के अलावा अल काईदा का  कोई अस्तित्व ही नजर नहीं आता।

हकीकत यह है कि 11 सितंबर का दुस्साहस अलकाईदा को बहुत भारी नुक्सान उठाना पड़ा। उसके बाद अमेरिका ने अगले छह माह में संगठन के अफगानिस्तान स्थित बुनियादी ढांचे को खत्म कर दिया। उसका नेतृत्व या तो मारा गया या गिरफ्तार हो गया। ओसामा बिन लादेन को भी छुप कर ही अपने आखिरी दिन गुजारने पड़े। आखिरकार वह भी पाकिस्तान में मारे गया। ओसामा बिन लादेन की हत्या के मकसद से की गई कार्रवाई के दौरान कुछ निजी चिट्ठियां हाथ लगी थीं। इन चिट्ठियों से खुलासा हुआ है कि आतंकी ओसामा बिन लादेन का बेटा हमजा अपने पिता की विचारधारा को आगे ले जाना चाहता है। यही नहीं, बल्कि वो अपने पिता की मौत का बदला भी लेना चाहता है।

अल काईदा में पिछले वर्ष सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि अल कायदा को उसका आतंक का शहजादा मिल गया है। बिन लादेन ने अपने पुत्र हमजा को अपने राजनीतिक वारिस के तौर पर तैयार किया था। उससे स्पष्ट है कि देर-सबेर उसके ही हाथों में संगठन की कमान होगी। अल काईदा को उम्मीद है कि उसका नेतृत्व संगठन में नई जान फूंकेगा।

अफगानिस्तान का तालिबान दुनिया दूसरा सबसे खतरनाक आतंकी संगठन है और अफगानिस्तान आतंक से प्रभावित दूसरा देश। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव के दौरान अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना को वापस बुलाने का वादा भी किया था। लेकिन, राष्ट्रपति बनने के बाद वे अपने इस वादे से पलट गए। तीन महीने बाद जनवरी 2018 में ट्रंप ने अफगानिस्तान को लेकर अपनी रणनीति पर दो टूक कहा था, ‘इस नीति को बदला नहीं जाएगा, हम तालिबान को खत्म करके ही वापस आएंगे।’ लेकिन, अब डोनाल्ड ट्रंप अपनी बात से पलटते दिख रहे हैं। अमेरिकी जानकारों की मानें तो ऐसा इसलिए है कि अफगानिस्तान में डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति बुरी तरह असफल रही है। इनके अनुसार डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक नीति का अमेरिका को कोई फायदा नहीं हुआ, उलटे इसके बाद से तालिबान की ताकत में आश्चर्यजनक बढ़ोत्तरी हुई है। बताते है कि आतंकी संगठन ने पिछले करीब एक साल में अफगान-अमेरिकी फौजों को शिकस्त देते हुए अपना कब्जा तेजी से बढ़ाया है। जहां कई देश अफगानिस्तान के आधे से ज्यादा हिस्से पर तालिबान का कब्जा बताते हैं, डोनाल्ड ट्रंप की नीति के बाद से युद्ध में मरने वालों की संख्या में भी रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी हुई है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान में इस साल जनवरी से जून तक 1692 नागरिकों की युद्ध के दौरान मौत हुई है। संस्था के मुताबिक अफगानिस्तान में 2008 के बाद युद्ध में मरने वालों की यह संख्या सबसे ज्यादा है।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार बताते है कि पिछले एक साल में अफगानिस्तान में जिस तरह के परिणाम सामने आए हैं उन्हें देखते हुए डोनाल्ड ट्रंप और उनके अधिकारियों को अब यह समझ में आ गया है कि अफगानिस्तान का नतीजा बंदूक से नहीं निकलने वाला ये जानकार यह भी कहते है कि अब अमेरिका किसी तरह अफगानिस्तान से निकलना चाहता है।

अमेरिकी थिंक टैंक ‘फाउंडेशन फॉर द डेमोक्रेसीज डिफेंस’ में अफगानिस्तान मामलों के विशेषज्ञ बिल रोगजीओ कहते हैं-’17 साल के युद्ध के बाद अमेरिका थक चुका है। अब वह वहां से निकलना चाहता है। एक वही है जो चाहता है कि शांति के लिए वार्ता की जाए।’ रोगजीओ के मुताबिक तालिबान को देखकर अभी भी यह नहीं लगता कि वह वार्ता करने को उतावला है।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार अमेरिका की रणनीति में बदलाव की एक और वजह रूस को मानते हैं। दरअसल, पिछले डेढ़ साल में रूस की तालिबान से नजदीकियां बढ़ी हैं, जिन्हें रूस ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी किया है। रूस इस समय न सिर्फ अफगानिस्तान में आईएस से लडऩे में तालिबान की मदद कर रहा है बल्कि, अफगानिस्तान में शांति के लिए पुरजोर प्रयास भी कर रहा है। ऐसे में अमेरिका को लगता है कि जिस तालिबान को वह 17 साल में नहीं हटा सका उसे रूस की मदद मिलने के बाद युद्ध में शिकस्त देना नामुमकिन हो जाएगा।

डोनाल्ड ट्रंप के रूख में आए बदलाव का एक और कारण भी बताया जा रहा है। इस समय अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो अफगानिस्तान एक ऐसी जगह है जहां अमेरिका सबसे ज्यादा पैसा खर्च कर रहा है। 17 साल में अमेरिका वहां 840 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम खर्च कर चुका है। अब अगर रूस के आने के बाद भी अमेरिका युद्ध जारी रखता है तो उसे बहुत ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ेगा। अमेरिकी मीडिया की मानें तो अफगानिस्तान और इराक युद्ध में खरबों डॉलर खर्च कर चुका अमेरिका अब ऐसा करने के मूड में नहीं है।

गरीबी और भुखमरी के लिए दुनिया भर में चर्चित सोमालिया में सक्रिय है-खूंखार आतंकी संगठन अल-शबाब। वह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा आतंकी संगठन है। कुछ समय पहले अल-शबाब के आतंकियों ने ग्रेनेड और स्वचालित हथियारों से गैरीसा यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में सो रहे छात्रों पर हमला बोल दिया। हमलावरों की अंधाधुंध गोलीबारी में 147 छात्र मारे गए और 79 से ज्यादा घायल हुए हैं। चश्मदीदों का कहना है कि चरमपंथियों ने ईसाई छात्रों को अलग खड़ा कर गोलियों का निशाना बनाया। केन्या में 1998 में अमेरिकी दूतावास पर हमले के बाद यह सबसे बड़ा हमला था। इससे दो दिन पहले अल-शबाब के आतंकवादियों ने सोमालिया के मका अल-मुकर्रम होटल को 12 घंटे से अधिक समय तक कब्जे में रखा था। सुरक्षा बलों की कार्रवाई में छह हमलावरों समेत कम से कम 24 लोगों की मौत हो गयी।

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इससे पहले, 2011 में अल-शबाब ने नैरोबी के मशहूर मॉल वेस्टगेट में कई विदेशियों समेत 50 से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतारा था। अल-शबाब ने हमले की जिम्मेदारी लेते हुए कहा था कि कीनियाई बलों द्वारा सोमालिया में घुसकर चलाए गए अभियान का ये जवाब है। इसे दरअसल अलकायदा का सोमालियाई संगठन भी कहा जाता है। अल-शबाब का दक्षिणी सोमालिया में खासा प्रभाव है। एक जमाने में यहां के कुछ इलाके पर उसका कब्जा भी था।

अल-शबाब का मकसद सोमालिया की फेडरल सरकार को गिराकर इस्लामी सरकार स्थापित करना है। आयरो अल-शबाब का पहला मुखिया था। उसी की अगुवाई में अल-शबाब ने तालिबान से संपर्क साधा और अपने लड़ाकों को अफगानिस्तान में तालिबान से ट्रेनिंग दिलाई। अल-शबाब तालिबान के तर्ज पर सोमालिया में काम करने लगा। अल-शबाब के पास करीब 15 हजार ट्रेन्ड आतंकी है। कभी शबाब का मुखिया थे गोडाने। जिसकी एक अमरीकी हवाई हमले में  मौत हो गई।

तालिबान से अपने लड़ाकों को ट्रेनिंग दिलाने वाले इस संगठन की सोच भी तालिबान जैसी ही है। वर्ष 2007 में माली के गॉउ शहर में आतंकवादी हमले के बाद अल-शबाब ने संगीत और नृत्य पर पाबंदी घोषित करते हुए इस पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की। उसके आतंकवादियों ने युगांडा में 11 जुलाई 2010 को छिहत्तर लोगों की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी कि युगांडा सरकार ने सोमालिया में आतंकवादियों से लडऩे के लिए अपने सैनिक भेजने का फैसला लिया था। अक्टूबर 2011 से लेकर मार्च 2013 तक अल-शबाब ने केन्या में इसी मुद्दे को लेकर बम विस्फोट किए और सैकड़ों जानें लीं।

फरवरी 2012 में अल-शबाब के तत्कालीन नेता गोडाने ने एक वीडियो जारी करके अयमान अल जवाहिरी के नेतृत्व वाले अलकायदा में विलीन होने की घोषणा की थी। अलकायदा की घटती ताकत और समर्थन के चलते इस्लामी कट्टरपंथियों के बीच अब अल-शबाब अधिक लोकप्रिय हो रहा है। अल-शबाब का काम करने का अपना तरीका है जिसमें रहम और करम की कोई गुंजाइश नहीं है। इसके आतंकवादी सोमालिया में 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को आतंकवादी बनाने के लिए बाकायदा स्कूल चलाते हैं और उनके दिलो दिमाग में नफरत के बीज बो कर पश्चिमी देशों में हमलों को अंजाम देने के लिए तैयार करते हैं।

मगर इन पांच में गैर इस्लामी संगठन भाकपा माओवादी का भी चौथे स्तान पर प्रवेश हुआ है। इस तरह दुनिया ने माओवाद की बढ़ती चुनौती को पहचाना है। उसके कारण ही भारत आतंकवाद से प्रभावित देशों में तीसरे नंबर पर है। बाकी दो देश हैं – इराक और अफगानिस्तान।

साल 2017 के दौरान भारत पर हुए विभिन्न आतंकी हमलों में से 53 फीसदी हमलों के लिए सीपीआई (माओवादी) संगठन जिम्मेदार था। 2017 में उसका सबसे बड़ा हमला सुकमा में हुआ था जहां 25 लोग मारे गए। इस संगठन पर भारत में पाबंदी लगी हुई है।

रिपोर्ट में साल 2017 के दौरान जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी घटनाओं में बढ़ोत्तरी का दावा भी है। इसमें पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक 2017 में जम्मू-कश्मीर के आतंकवादी हमलों में जहां 24 फीसदी की वृद्धि हुई तो इन हमलों में जान गंवाने वालों की संख्या में 89 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी देखने को मिली। इसके अलावा 2017 के दौरान भारत में 860 आतंकी हमले हुए थे जिनमें से 25 फीसदी का सामना अकेले जम्मू-कश्मीर को करना पड़ा था।

उधर, माओवादी चरमपंथियों के बारे में इस रिपोर्ट में लिखा गया है कि साल 2016 के मुकाबले 2017 में इस संगठन के हमलों में कमी देखने को मिली। 2016 में इस संगठन ने जहां 338 हमलों को अंजाम दिया था वहीं 2017 में यह आंकड़ा 295 रहा। लेकिन इसी दौरान इन हमलों में मारे जाने वाले लोगों की संख्या 24 प्रतिशत बढ़ गई।

माओवादियो ने कई बार राजनीति नेताओं की हत्या की हैं। हाल ही में आंध्र प्रदेश के विशाखापटनम में पिछले दिनों अराकू  विधानसभा सीट से विधायक सर्वेश्वर राव और पूर्व विधायक एस सोमा की माओवादियों ने  गोली मारकर हत्या कर दी। घटना को तब अंजाम दिया गया जब विशाखापटनम से करीब 125 किमी दूर अराकू के थुतांगी गांव में दोनों एक कार्यक्रम में भाग ले रहे थे। कहा जा रहा है कि माओवादियों ने इस ताजा हमले के जरिए संभवत: भीमा-कारेगांव हिंसा मामले में वामपंथी रूझान वाले तेलुगू कवि और लेखक वरवर राव और अन्य मानवाधिकारवादियों को गिरफ्तार किए जाने के विरूद्ध केंद्र सरकार को कड़ा संदेश देने की भी कोशिश की है। इसलिए माओवादियों ने सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक और पूर्व विधायक को अपनी बंदूकों का निशाना बनाकर यहां की शांति को भंग करके अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। वरवरा राव उन पांच अर्बन नक्सल नेताओं में से है जिन्हें हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हत्या की साजिश रचने के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया है। ये सभी भाकपा माओवादी से भी जुड़े थे।

माओवादी कितने खतरनाक है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राजशेखर रेड्डी की तरह। चंद्रबाबू नायडू की  सरकार भी माओवादियों के खिलाफ सख्ती से पेश आती रही। बौखलाए माओवादियों ने एक बार नायडू की हत्या करने की भी कोशिश की। इस सिलसिले में याद आता  है हाल ही में कुछ अर्बन नक्सल कार्यकत्र्ताओं पर प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगा था।

रिपोर्ट में साल 2017 के दौरान जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी घटनाओं में बढ़ोत्तरी का दावा भी है। इसमें पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक 2017 में जम्मू-कश्मीर के आतंकवादी हमलों में जहां 24 फीसदी की वृद्धि हुई तो इन हमलों में जान गंवाने वालों की संख्या में 89 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी देखने को मिली। इसके अलावा 2017 के दौरान भारत में 860 आतंकी हमले हुए थे जिनमें से 25 फीसदी का सामना अकेले जम्मू-कश्मीर को करना पड़ा था।

उधर, माओवादी चरमपंथियों के बारे में इस रिपोर्ट में लिखा गया है कि साल 2016 के मुकाबले 2017 में इस संगठन के हमलों में कमी देखने को मिली। 2016 में इस संगठन ने जहां 338 हमलों को अंजाम दिया था वहीं 2017 में यह आंकड़ा 295 रहा। लेकिन इसी दौरान इन हमलों में मारे जाने वाले लोगों की संख्या 34 फीसदी बढ़ गई।

पांचवा सबसे खतरनाक आतंकी संगठन है – बोको हराम, जो नाइजीरिया में सक्रिय है। बोको हरम ने कुछ अर्से पहले खिलाफत कहलाने वाले आईएसआईएस का साथ निभाने की शपथ ली है। बर्बरता में वह आईएसआईएस को टक्कर देता है।

कुछ अर्से पहले नाइजीरिया स्थित जाबा गांव में बोको हरम के कुछ सदस्यों ने 68 लोगों की हत्या कर दी। भारी हथियारों से लैस आतंकी बोर्नो प्रांत के गांव में सभी दिशाओं से घुस आए। उन्होंने यहां पर स्थानीय लोगों पर गोलियां बरसाना शुरू कर दीं, भागते हुए लोगों के ऊपर भी उन्होंने गोलियां बरसाईं। इन मारे जाने वाले लोगों में किशोर और बुजुर्ग भी शामिल थे। इसके दो दिन बाद ही शहर मेदुईगुरी में हुए पांच आत्मघाती हमलों में 54 लोग मारे गए और 143 घायल हुए। अफ्रीकी देश नाइजीरिया में इस तरह के नरसंहार अब आम बात हो चुके हैं। रोजाना बोको हरम के हैवानियत की कोई न कोई खबर अखबारों की सुर्खियों में होती है। नाइजीरिया के कई राज्यों में मजबूत पकड़ रखने वाले बोको हरम ने महिलाओं और बच्चों सहित 500 से अधिक लोगों को का अपहरण किया। बोको हरम ने 2011 में पुलिस के खिलाफ आत्मघाती हमले किए और राजधानी अबुजा में संयुक्त राष्ट्र के कार्यालय पर हमला किया। और संयुक्त रूप से लगभग 7500 सैनिकों को बोको हरम के खिलाफ उतारा।

लेकिन बोको हराम लोकतंत्र और चुनाव का घोर विरोधी है इसलिए उसे रोकने के लिए बड़े पैमाने पर हिंसा का तांडव किया। बोको हराम देश से मौजूदा सरकार का तखतापलट करना चाहता है और उसे पूरी तरह इस्लामिक देश में तब्दील करना चाहता है।

शेकाऊ के नेतृत्व में बोको हरम ने लगातार छोटे बच्चों को अपना निशाना बनाया है। अप्रैल 2014 को, बोको हरम ने उत्तरी नाइजीरिया से लगभग 300 लड़कियों का उनके स्कूल से अपहरण कर लिया। एक वीडियो संदेश में, शेकाऊ ने इस अपहरण की जिम्मेदारी लेने का दावा किया, लड़कियों को गुलाम बुलाया और उन्हें बाजार में बेचने की धमकी भी दी। इसके अलावा बह छोटे लडकों और लड़कियों का प्रयोग आत्मघाती दस्तों के तौर पर करता है।

रहम शब्द तो शायद इस संगठन की डिक्शनरी में ही नहीं है। कुछ समय पहले बोको हरम के आतंकवादियों ने नाइजीरिया के उत्तर-पूर्व के शहर बागा पर बड़ा हमला कर सैन्य अड्डे को लूट लिया। पूरे शहर में आग लगा दी। सड़कों और गलियों को लाशों से पाट दिया।

सतीश पेडणेकर

 

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