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‘एैक्सीडैंटल प्राईम मिनिस्टर’ पुस्तक ठीक, फिल्म गलत

‘एैक्सीडैंटल प्राईम मिनिस्टर’ पुस्तक ठीक, फिल्म गलत

बेटा: पिताजी।

पिता: हां बेटा।

बेटा: क्या मेरे कानूनी व संविधानिक अधिकार और हैं, आपके अलग, नेताओं के अलग,  महिलाओं के अलग, पुरूषों के अलग, गरीबों के अलग, अमीरों के अलग?

पिता: बेटा, क्या बात कर रहा है तू? हमारे संविधान में सब बराबर हैं – कोई छोटा, कोई बड़ा नहीं। हमारा संविधान किसी के साथ किसी में भी भेदभाव नहीं रखता, न जाति के आधार पर, न लिंग, न पंथ के आधार पर।

बेटा: जो फिर ‘ऐक्सिीडैंटल प्राईम मिनिस्टर’ फिल्म पर यह क्यों बड़ा बावेला मच रहा है?

पिता: यह है तो समझ के बाहर।

बेटा: पर पिताजी, फिल्म तो अभी 11 जनवरी से देश के सिनेमाघरों में दिखाई जानी है। किसी ने अभी इस फिल्म को तो देखा भी नहीं है। फिर यह विवाद कैसे उठ खड़ा हुआ?

पिता: बेटा, जहां तक मेरी जानकारी है, अभी तक तो केवल इसका ट्रेलर ही जारी हुआ है।

बेटा: तो झगड़ा ट्रेलर पर ही चालू हो गया?

पिता: अभी तक तो यही लगता है।

बेटा: पर यह फिल्म है क्या?

पिता: बताया जा रहा है कि यह फिल्म यूपीए के तत्कालीन प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह पर उनके ही प्रेस सलाहकार की इसी नाम की एक पुस्तक पर आाधारित है।

बेटा: पर पिताजी, यह पुस्तक तो कई वर्ष पूर्व यूपीए के कार्यकाल में छपी थी। उस समय कोई हंगामा हुआ था उसमें लिखी बातों व तथ्यों पर?

पिता: जब यह पुस्तक छपी थी उस समय उसके छपने के समाचार तो अवश्य छपे थे पर किसी विवाद के उठने के समाचार तो शायद नहीं थे।

बेटा: अब उस पुस्तक पर आधारित इस फिल्म पर क्यों विवाद उठ रहा है?

पिता: अब हैरानी तो इस बात की है बेटा, कि जब यह पुस्तक यूपीए के र्काकाल में छपी थी तब तो कांग्रेस व उसके सहयोगी दलों ने इस पुस्तक में लिखे तथ्यों व विचारों पर कोई आपत्ति नहीं दर्ज की। पर अब फिल्म पर सख्त ऐतराज जता रहे हैं।

बेटा: फिर यह विरोधाभास क्यों?

पिता: मेरे को तो ऐसा लग रहा है कि एक गैर-राजनीतिक मामले को व्यर्थ में ही राजनीति की दलदल में फंसाया जा रहा है।

बेटा: पिताजी, मेरे को मेरे एक दोस्त ने एक घटना सुनाई थी। पता नहीं, यह घटना सच्ची थी या मनघड़न्त। यह कोई लतीफा भी हो सकता है। पर इस फिल्म के विरोधियों पर सटीक उतरती है।

पिता: क्या है यह?

बेटा: सुनाते हैं कि कुछ दोस्त बैठे गप्पें हांक रहे थे। एक ने इतना जबरदस्त लतीफा सुनाया कि सब लोटपोट हो गये पर एक दोस्त ने लोटपोट तो क्या होना उसके चेहरे पर मुस्कान तक न आई। पर दूसरे दिन वह शाम को फिर  से इकट्ठे हुये तो वह दोस्त जब पिछले दिन संजीव रहा वह तब लोटपोट होने लगा। सब हैरान थे कि अभी तो ऐसी कोई बात हुई ही नहीं जिस पर कि वह ऐसी प्रतिक्रिया करे। तब उसने मामला स्वयं ही  साफ किया। पेट पर हाथ रख कर अपनी हंसी पर थोड़ा कंट्रोल करते हुये उसने कहा, ”कल यार तुमने बड़ा जबरदस्त लतीफा सुनाया’’। मतलब कि उस महानुभाव को उस लतीफे को समझ पाने में 24 घंटे लग गये। इसी तरह लगता है कि तब की सत्ताधारी पार्टियों को पांच वर्ष बाद समझ आया कि संजय बारू की उस पुस्तक में सोनियाजी व मनमोहनजी तथा अन्य नेताओं के बारे कुछ गलत लिखा गया था।

बेटा: बात तो ठीक है कि यदि पुस्तक में कुछ आपत्तिजनक था जो उन्होंने अपने शासनकाल में ही क्यों इसमें सुधार नहीं करवा लिया।

पिता: ऐसा तब कर लेते तो आज जो स्थिति पैदा हुई है वह पैदा ही नहीं होती।

बेटा: मतलब कि अपनी गल्ती का सुधार वह वर्तमान सत्तासीन सरकार से करवाना चाहते हैं।

पिता: अब उनके दोनों हाथें में लड्डू — न संजय बारू से बुरे बने और न उनसे ही जो अपने विचार अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की दुहाई देते फिरते हैं।

बेटा: अगर अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की ही बात है तो अब उस फिल्म का वह विरोध क्यों कर रहे हैं जो उनके सत्ता कार्यकाल में प्रकाशित हुई थी?

पिता: इससे तो यह भी साबित होता है कि हमारे राजनीतिक महानुभावों की आंखों पर सत्ता के समय चश्मा और होता है और सत्ता छिन जाने कुछ और।

बेटा: पिताजी, यह जो उदारवादी, सैकुलर का चक्कर है, वह मेरी समझ में नहीं आता। सभी दावा करते हैं कि वह उदारवादी व सैकुलर हैं और उनके सभी विरोधी संकीर्ण साम्प्रदायिक।

पिता: और अभी तक कोई ऐसा मापदंड या मशीन नहीं बनी जिससे कि यह पता लगाया जा सके कि कौन सैकुलर है और कौन कम्यूनल।

बेटा: राजनीति में सब इसका ही फायदा उठा रहें हैं अपने को महान आदर्श सैकुलर घोषित करने का और अपने विरोधी को कटटर कंम्यूनल करार देने का।

पिता: और यही कारण है कि हमारे राजनेताओं के आये दिन स्वर बदलते रहते हैं। कभी वह उदार बन जाते हैं और विचार की अभिव्यक्ति के अधिकार को पवन मानते हैं। इस पर किसी प्रकार की रोकटोक पर जीने-मरने को तैयार दिखते हैं। कभी यही लोग किसी फिल्म या पुस्तक का विरोध करते हैं और कहते हैं कि जन भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाई जानी चाहिए।

बेटा: तब तो यह पूर्वानुमान लगाना बहुत कठिन है कि कौनसी पार्टी कब किस चीज का समर्थन करेगी या विरोध करेगी।

पिता: बेटा, इसी को तो पालिटिक्स कहते हैं। यदि तुझे पहले ही पता लग जाये कि कौन सी पार्टी कब किस विषय पर क्या स्टैंड लेगी तब तो कहानी का क्लाइमैक्स ही खत्म हो जायेगा।

बेटा: और तब विरोधी पक्ष को उस पक्ष की सारी योजना को विफल बनाने के लिए अपनी रणनीति पहले ही तैयार करनी आसान हो जायेगी।

पिता: असल में वही पार्टी सफल रहती है जो अपने पत्ते उस समय खोलती है जब उसे ऐसा करना राजनितिक दृष्टि से लाभदायक लगता है।

बेटा: मैं तो पिताजी आज तक यही समझता था कि किसी मुद्दे पर किसी पार्टी के स्टैंड का पूर्वानुमान उसके आदर्शों और असूलों के आधार पर पहले ही लगाया जा सकता है।

पिता: बेटा, तू किताबी ज्ञान पर बात करता है और मैं व्यावहारिकता पर। तू राजनीति में आदर्शों और असूलों की बात करता है।

बेटा: हां पिताजी।  मैंने बहुत से राजनीतिक दलों के संविधान पढ़े हैं। उनके चुनाव घोषणापत्र भी देखे हैं। उनमें तो बड़े ऊंचे-ऊंचे व असूलों और आदर्शों की बात की होती है।

पिता: कभी तूने इनको पूरा होते भी देखा है?

बेटा: आपकी बात तो ठीक है। जनता तो यही कहती रहती है कि पार्टी अपने सिद्धांतों से भटक चुकी है और उसने मतदाता से जो चुनावी वायदे किये थे वह पूरे नहीं किये गए हैं।

पिता: बेटा, असूल-वसूल कुछ नहीं होते पालिटिक्स में। होता है तो केवल यह कि कब कौनसा पैंतरा उन्हें चुनाव में या वर्तमान सरकार को बचने या गिराने में कारगर सिद्ध हो सकता है।

बेटा: अब समझा कि क्यों पार्टियां कभी तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का तकाजा करती हैं और कभी उसका विरोध यह कह कर कि जनभावनाओं का सम्मान होना चाहिए।

पिता: यही तो तमाशा है कि जिस कांग्रेस के कार्यकाल में डाक्टर मनमोहन सिंघ जी के मीडिया सलाहकार ने ऐक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर नाम की पुस्तक लिखी, तब तो उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का सम्मान किया और अब वही कांग्रेस उस पर आधारित फिल्म का विरोध कर रही है।

बेटा: शायद इसलिए कि पुस्तक तो कुछ अंग्रेजी पढ़े हजारों ने पढ़ी होगी पर फिल्म तो कुछ करोड़ लोग देख ही लेंगे।

पिता: तो फिर उनके आदर्श कहां गए?

बेटा: इससे तो आपकी बात ही सिद्ध होती है।

पिता: अभी इन पार्टियों की पुराने इतिहास को ही देखो।

बेटा: यह बात तो ठीक है। हिन्दू भावनाओं की तो कोई परवाह ही नहीं करता।

पिता: सलमान रश्दी, तसलीमा नसरीन की किताबें बिना पढ़े ही उनकी सरकारों ने उन पर प्रतिबन्ध लगा दिया था।

बेटा: हां, डा विनसी जैसी फिल्में भी बंद कर दी थीं।

पिता: उनके कार्यकाल में तसलीमा नसरीन पर हैदराबाद में एक घातक हमला किया गया था। संलिप्त लोगों पर आपराधिक मामला भी दर्ज हुआ। पर आज तक यह पता नहीं कि उस पर कोई कार्रवाई हुई भी या नहीं।

बेटा: तो ऐसे मामलों में उनका कोई असूल है भी या नहीं?

पिता: यह तो यह लोग ही जाने।

 

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