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विलुप्तता के कगार पर डाकघर

विलुप्तता के कगार पर डाकघर

By अनिल धीर

75 वर्षीय दशरथी दास ओडिश के बालासोर जिले के कियापाड़ा गांव के बासुदेव ब्लॉक में रहते हैं। दशरथी दास प्रतिदिन गांव के डाकघर का दौरा किया करते हैं। वह ऐसा इसलिए नहीं करते कि ये उनका कार्य है, बल्कि वो ऐसा करना पसंद करते हैं इसलिए दौरा करने निकल पड़ते हैं। पिछले 50 सालों से ये डाकघर यहीं पर स्थित है और डाकघर के पास बनी छोटी पुलिया उनकी पसंदीदा जगह है जहां दशरथी दास और उनके हम उम्र हर रोज इक्ट््ठे बैठ कर बातचीत में वक्त व्यतीत किया करते हैं। दशरथी दास कहते हैं कि वो यहां सिर्फ डाक बाबू की वजह से आते हैं, क्योंकि डाकबाबू पूरे गांव के लोगों के घनिष्ट मित्र हैं। यहां डाक बाबू से मतलब सुखदेव जेना से है, जोकि कियापाड़ा गांव के छोटे से डाकघर के शाखा पोस्ट मास्टर के पद पर तैनात हैं।

डाकघर को पहली नजर में देख कर ऐसा लगता है मानो किसी गरीब की झोपड़ी हो। इसकी छत फूस की बनी है। मिट्टी की मोटी परत से दीवारें बनी हैं। इसमें एक छोटा-सा दरवाजा है और बाहर जंग लगा जर्जर अवस्था में पत्र बॉक्स लटका हुआ है। डाकघर गांव के बाहर धान के खेतों के बीच नारियल और दूसरे विशाल पेड़ों के झुरमुट के नीचे बना हुआ है। दशरथी दास कहते हैं कि मैंने देश भर में कई डाकघर देखे हैं पर इतनी दुखद अवस्था में किसी डाकघर को आज तक नहीं देखा।

कियापाड़ा गांव के बाहर स्थित ये डाकघर आसपास के छ: गावों को अपनी सेवाएं प्रदान करता है। इसमें कियापाड़ा, नरेन्द्रपुर, अयातपुर, गरूदपुरम, बघदोविनायकपुर और तमाखांडी का पुरवा शामल है। डाक बाबू सुखदेव जेना सुबह 9.30 बजे डाकघर आकर अपना कार्य शुरू करते हैं और दोपहर तक वह अपने कार्यालय में बैठकर कागजी काम-काज  संभालते हैं। साथ ही वे टिकट और लिफाफे बेचते हैं और भुगतान की लेनदारी-देनदारी करते हैं। उनके सहयोगी भास्कर दलेइ अपनी खस्ताहल साइकिल पर सवार हो कर पत्र बांटने जाते हैं। भास्कर बताते हैं कि वह सप्ताह के अधिकांश दिनों में खस्ताहल साइकिल पर सवार होकर सभी छ: गावों का दौरा करने जरूर जाते हैं। भास्कर कहते हैं कि 60 वर्षीय ‘रूरल पोस्ट ऑफिस इंप्लाईÓ पिछले 42 सालों से ये कार्य करते आ रहे हैं।

ग्रामीणों ने कई बार उच्च अधिकारियों को पत्र लिखकर डाकघर की हालत सुधारने को कहा पर अभी तक कोई सफलता नहीं मिली। मिट्टी से बने इस डाकघर से गांव के लोगों को बचत बैंक, आवर्ती जमा, मनीऑर्डर और पंजीकृत डाक जैसी सेवायें प्रदान की जाती हैं, लेकिन डाकघर की अल्प संरचना अब ग्राहकों को हतोत्साहित करती है।

डाक विभाग के लिए उल्लेखित नियमों के अनुसार शाखा पोस्ट ऑफिस के लिए उचित स्थान की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी ग्रामीण डाक सेवा की है या शाखा पोस्टमास्टर की। डाक विभाग के नियमों के मुताबिक शाखा डाकपाल जिसे मासिक 2745 रूपये वेतन मिलता है, उसे अपने वेतन  से ही पोस्ट ऑफिस के लिए पर्याप्त जगह की व्यवस्था करनी चाहिए। जिसके रख-रखाव के लिए 100 रूपये मासिक भत्ता कार्यालय द्वारा डाकपाल को भुगतान किया जाएगा।

पोस्ट ऑफिस में रखी गोंद की बोतल, कैलेंडर ये सभी चीजें पिछले 70 सालों से सम्बंधित प्रतीत होती हंै। जंग लगी कुर्सी और टेबल, माप करने वाला फुट्टा और तराजू जैसी प्राचीन सामग्री काफी पुराने वक्त में वापस ले जाती हैं। पोस्टमास्टर अपनी सूखा रोग से ग्रस्त कुर्सी पर बैठकर बताते हैं कि शाखा डाकघर की छत से पानी रिस कर डाकघर के अंदर आता है। डाकघर के बाहर लगा लाल रंग का पोस्ट ऑफिस बोर्ड, जिस पर सफेद अक्षरों से पोस्ट ऑफिस लिखा है, उस पर भी बुरी तरह से जंग लग चुकी है। इसकी वजह से किसी को इस बात का संदेश नहीं मिल पाता कि यहां कियापाड़ा का पोस्ट ऑफिस मौजूद है। छत पर रखे छप्पर से रिसते पानी को रोकने के लिए एक प्लास्टिक की शीट लगाई गई है। डाकपाल ने बताया कि शाखा डाकघर में लगभग हजार बचत खाते हैं। नई सरकार के द्वारा चलाये गए जन-धन योजना के तहत और भी ज्यादा संख्या तक पहुंच चुके हैं।

भरतीय डाक विभाग अब पहले जैसा नहीं रहा, बल्कि गहरे परिवत्र्तन की अवधि से गुजर रहा है। हर तरफ बदलाव की बयार चल रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था अविश्वसनीय विकास के अनुभव से गुजर रही है। भारतीयों के जीवन को छू जाने वाला डाक अब बंद दुकान में परिवर्तित हो रहा है। डाक सेवा अब जन सेवा में बदल चुकी है।

भारतीय डाक सेवा दुनिया का सबसे बड़ा डाक नेटवर्क है, जिसके अन्तर्गत 1,55,333 शहरी और ग्रामीण डाकघर आते हैं। इतनी बड़ी डाकघरों की सेवा चीन जैसे विशाल देश में भी उपलब्ध नहीं है। वहां भी डाकघरों की सेवा 80,000 के लगभग ही हैं, जोकि भारत से बहुत कम है।

इस ओर अभी तक किसी का ध्यान नहीं गया कि व्यक्तिगत पत्रों को लिखकर उन्हें डाक द्वारा भेजे जाने की प्राक्रिया लगभग हर साल घटती जा रही है। पिछले एक दशक मे लगभग हर साल 3 फीसदी की दर से पत्र-व्यवहारिकता घटती आ रही है। पत्र-व्यवहार की घटती दर को देखकर ऐसा लगता है कि आने वाले कुछ दशकों में शायद पत्र-व्यवहार मरणासन्न में पहुंच जाएगी।

एक पत्रकार की हैसियत से मैंने कई उच्च और पराक्रमी स्मारकों, संस्थानों और इमारतों के फोटो लिए हैं, जोकि आधुनिक राष्ट्र को दर्शाती है। लेकिन कियापाड़ा के छोटे से डाकघर की फोटो लेकर मैं सरकार से अपना एक विनम्र पक्ष रख रहा हूं। पिछले दस वर्षों में अपनी यात्रा के दौरान मैने राष्ट्र के लगभग सभी राज्यों के डाकघर और पत्र पेटियों के फोटो खींचे। हर जगह मेलबॉक्स का जादू घटता नजर आ रहा है। इससे भी ज्यादा दुखद ये है कि आधुनिक युग में हमारी आंखों के सामने डाक सेवा ढहती और बर्बाद होती नजर आ रही है। धीरे-धीरे डाक सेवा धूमिल हो रही है और दम तोड़ती नजर आ रही है। मुझे इस बात का दुख है कि पत्र लेखन की कला धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। डाकघर के ये फोटो पहली नजर में बहुत ही सादे और सरल नजर आयेंगे, लेकिन इनके भीतर छुपी सच्चाई अति भावुकतापू्र्ण और करुणामय होती है। डाक दूर-दराज के क्षेत्रों को एक-दूसरे से जोड़ती है। भारतीय डाक चिन्ह में बनी तीन पट्टियां इस बात को दर्शाती हैं। पहली बार देखने पर भारतीय डाक चिन्ह एक लिफाफे की आकृति का नजर आता है, लेकिन दूसरी ही नजर में ये चिन्ह पक्षी की आकृति में नजर आता है जोकि बिना किसी रूकावट के असीमित दूरी तय करने को तैयार है। इस डाक चिन्ह में अंकित तीन पट्टियां स्पष्ट संदेश देती हैं कि वो लोगों तक उनके संदेश को पहुंचाने के लिए और उनके भावनात्मक पहलू को छूने के लिए मुक्त उड़ान भरने को तैयार है।

इंटरनेट के लगातार बढ़ते उपयोग की वजह से डाक का प्रयोग घटता जा रहा है। इसकी वजह से डाक की बहुत सी शाखाओं को बंद करने का विचार भारतीय डाक द्वारा किया जा रहा है। ये पूर्ण कथा इस बात पर आधारित नहीं है कि हम डाकघर की व्यवस्था के बिना अपने जीवन को सुचारू रूप से चला पायेंगे या नहीं, बल्कि सवाल ये है कि हम इस व्यवस्था को आगे चाहते हैं या नहीं। अगर समय के हिसाब से उनके स्वरूप में बदलाव नहीं किया गया तो संभव है कि आने वाले वक्त में हम डाकघरों को खत्म होते हुए देखेंगे।

александр лобановскийнаписать отзыв

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