ब्रेकिंग न्यूज़ 

आचार्य श्री कीर्तियशसूरिजी महाराज: जैन धर्म और संस्कृति के अभिनव उन्मेष

आचार्य श्री कीर्तियशसूरिजी महाराज:  जैन धर्म और संस्कृति के अभिनव उन्मेष

भारत की संस्कृति को समृद्ध एवं सशक्त बनाने में यहां की संत परम्परा के अनेक धर्मगुरूओं, आचार्यों एवं संतों का अपूर्व योगदान रहा है। जिनमें जैन आचार्यों की एक समृद्ध परम्परा है। उन्हीं में एक प्रभावी और तेजस्वी आचार्य हैं आचार्य श्री कीर्तियशसूरिजी महाराज। वे विशिष्ट धर्मगुरू, जनसामान्य में प्रवचनकार, लेखक, जिनालय जीर्णाद्धारक और नवनिर्माण के शिल्प शास्त्रीय मार्गदर्शक, सिद्धांत रक्षक हैं। जिन्होंने अपने व्यक्तित्व एवं कृर्तत्व से अनेक कीर्तिमान स्थापित किये हैं। वे एक ओर जहां श्रमण परम्परा में जैन धर्म का प्रचार-प्रसार करते हैं, वहीं दूसरी ओर अपनी प्रवचनों से जीवन को सार्थक एवं संयमित बनाने का उनका प्रयास रहता है। सैकड़ों जैन मंदिरों के निर्माण से उन्होंने जहां संस्कृति को समृद्ध बनाया है वहीं सेवा और परोपकार के कार्यों से मानवता को उपकृत किया है। उनकी एक बड़ी विशेषता है सृजनशीलता। वे एक सृजनशील लेखक हैं, प्रखर वक्ता हैं। प्रात: काल से लेकर सायंकाल निरन्तर क्रियाशील बने रहना उनकी प्रतिभा और क्षमता का जीवंत उदाहरण है।

आचार्य श्री कीर्तियशसूरिजी महाराज का जन्म गुजरात के बनासकांठा जिले के भरोल तीर्थ में हुआ। उनका बचपन का नाम कांति था। उनकी माता का नाम जीवीबेन और पिता का नाम गगलभाई वोहेरा था। वे वीशा श्रीमाली वणिक जैन कुल में जन्मे। जन्म से ही बुद्धि एवं प्रतिभा के धनी आचार्यश्री ने प्रचंड वैरागी पिता के साथ विक्रम संवत 2023 मुरवाड में 14 वर्ष की उम्र में दीक्षा अंगीकार की थी। गुरूकुल वास में क्रमिक विकास करके गणि, उपन्यास, उपाध्याय और फिर आचार्य बने। गुरू समर्पण को जीवनमंत्र बनाकर उन्होंने गजब का आत्मविकास किया। उन्होंने वयोवृद्ध जैनाचार्य तथा विशाल समुदाय के स्वाध्याय, सेवा-शुश्रूषा की अधिकतम जिम्मेदारी निभाई। साथ ही विविध तप-जप करके आत्मविकास साधा। व्याकरण, न्याय, साहित्य, आगम, षडदर्शन, शिल्प, मंत्रविज्ञान, ज्योतिष, मनोविज्ञान, ग्रंथसंशोधन-संपादन-प्रकाशन, ताड़पत्रीय गंरथलेखनोद्धार, शिष्यसंग्रह-संस्करण आदि अनेक शाखाओं में निपुणता हासिल की। 350 से अधिक ग्रंथ तैयार किये हैं। हृदय को झकझोर देनेवाले प्रवचन उनकी सबसे महान विशेषता है। उनके नाभि की गहराई से निकलने वाले शब्द अच्छे-भले को वैरागी बनाने के लिए समर्थ हैं। अब तक उन्होंने विविध विषयों पर 15000 से अधिक प्रवचन किये हैं। उनका संपूर्ण जीवन भारतीय चेतना का अभिनव उन्मेष है। इतना लंबा मुनि जीवन, इतनी लंबी पदयात्राएं, इतना लंबा आचार्य पद, इतना व्यापक जनसंपर्क और इतना ही जनजागरण का प्रयत्न, इतना पुरूषार्थ, इतना आध्यात्मिक विकास, इतना तीर्थों का जीर्णोद्धार, इतने नये मंदिरों का निर्माण, इतना साहित्य सृजन और इतने व्यक्तियों का निर्माण वस्तुत: अद्भुत है, आश्चर्यकारी है।

आचार्य श्री कीर्तियशसूरिजी महाराज पर मां लक्ष्मी और मां सरस्वती दोनों की असीम अनुकंपा है। वे जब से दीक्षित हुए हैं तब से लेकर आचार्य बने तब तक विविध संपदाएं और उपलब्धियां उनके जीवन में समाहित रही है। उन्होंने संपूर्ण भौतिक ऐश्वर्य को ठोकर मारकर संन्यस्त जीवन स्वीकार किया। इसी कारण ऐश्वर्य उनके चरणों में लौटता है। लक्ष्मी और लक्ष्मीपति उनके चरणों की चाकरी करते हैं। ठीक उसी तरह उन पर सरस्वती की भी मेहरबानी बरसती रही है। उसी का परिणाम है ‘सरस्वती नंदन’ एवं ‘विशारद’ का खिताब। हालांकि इसके लिए उन्होंने पुरूषार्थ किया। उनके जीवन में प्रमाद अंशमात्र भी दिखाई नहीं देता। इसीलिए मां शारदा उन पर प्रसन्न हुई है और उसी की निष्पत्ति के रूप में उन्होंने हजारों प्रवचन दिए और सैकड़ों ग्रंथों का संपादन और लेखन किया।

उनका चिकित्सकीय ज्ञान एवं सेवा भावना ने अनेक रोगियों को जीवनदान दिया है। रोगग्रस्त किसी भी साधु की किसी भी प्रकार की सेवा करने में किसी प्रकार का अहं, स्टेटस सिंबल अथवा किसी प्रकार का अन्यथा विचार, आचार्यश्री के हृदय में कभी नहीं आया और उन्होंने बहुत ही सूझबूझ, विनम्रता, विवेक, भक्तिभाव, सदाशय, करूणा और वात्सल्य भाव को रोगग्रस्त साधु-साध्वी के निदान से लेकर इलाज का कोई भी काम हो, उनके लिए वार्डबोय, नर्स, हाउसमेन या डॉक्टर द्वारा किये जाने वाले हर कार्य को सद्भावना पूर्वक किया है।

आचार्य श्री कीर्तियशसूरिजी महाराज ने इस वर्ष जैनधर्म की पवित्र एवं पावन भूमि झारखंड के पाश्र्वनाथ तीर्थ में चातुर्मास किया एवं वहां पर भव्य जैन मंदिर का निर्माण से इस पवित्र भूमि की महिमा को बहुगुणित किया है। जो निश्चित ही भारत और विश्व के आत्मार्थीजनों के लिए लाभदायी साबित होगी। इस मंदिर के निर्माण की भव्यता, दिव्यता एवं आध्यात्मिक छटाएं दर्शनार्थियों को बांधकर रखेगी। इस मंदिर के निर्माण से पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा एवं जैनधर्म में आस्था रखने वालो लोगों के लिए यह अपने जीवन को उन्नत बनाकर वास्तविक सुख की दिशा में आगे बढऩे का माध्यम बनेगा।

आचार्य श्री कीर्तियशसूरिजी महाराज एक ऐसे महापुरूष हैं जिन्होंने विकास के चक्र को सदा ऊध्र्वमुखी और गतिमान ही रखा है। वे विकास से कभी अघाए नहीं। सदैव विकास की एक मंजिल पार करने के बाद अगली मंजिल के लिए चरणन्यास करते हैं। चुनौतियों को संभावनाओं में एवं अवरोधों को गति में बदलकर निरंतर मानवता की सेवा के लिए तत्पर हैं। उनमें नई कल्पना, नया चिंतन और नये प्रयोग की स्फुरणा हर समय बनी रहती है। उनका कर्तृत्व विलक्षण है। उदात्त और उदार भाव से उन्होंने युग को नया दर्शन दिया है। उन्होंने अपनी जड़ों को मजबूत बनाकर गगनचुंबी ऊंचाई को मापा है। क्योंकि वे इस सत्य को जानते है कि बिना मजबूत जड़ के ऊंचाई कभी भी धराशाई हो सकती है।

पौरूष एवं पराक्रम से भरे अजेय कर्तृत्वशील आचार्य श्री कीर्तियशसूरिजी महाराज का संपूर्ण जीवन तेज और ओज से अनंत प्रवाही स्रोत है। वे नये से नये कार्य, कठिन से कठिन समय में भी संकोच, भय और व्याकुलता को पास में नहीं फटकने देते। उनका विश्वास प्रशंसा नहीं, प्रस्तुति में है। वे स्वार्थ छोड़ परमार्थ की प्रेरणा देते हैं। बड़ी लकीर खींचने के दर्शन को मानवीय विकास की परिभाषा बताने वाले आचार्यजी स्वयं एक ऐसे विकासपुरूष हैं जिन्होंने जो दूसरों से करने के लिए कहा, पहले वह स्वयं करके दिखाया। उन्होंने जो अध्यात्म को प्राणवत्ता दी है उसके कारण से मानवता सदियों-सदियों तक लाभान्वित होती रहेगी। पिछले सौ सालों में जैनधर्म में जो प्रमुख घटनाएं हुई हैं जिनमें प्रमुख है आचार्य श्री कीर्तियशसूरिजी महाराज के अवदान। इसे हम एक क्रांति मान सकते हैं। यह क्रांति जैनधर्म को जनधर्म बनाने की क्रांति है। आपने आधुनिक भारत में जैनधर्म, जैनसंस्कृति, आगम साहित्य, प्राकृत भाषा तथा अहिंसा के सिद्धांतों का व्यापक स्तर पर प्रचार और विस्तार किया है। विश्व मानव को जैनधर्म के अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह, संयम, शांति और आत्मज्योति प्राप्त करने का मंत्र दिया है। वे धर्म को ग्रंथ और पंथ में नहीं, मनुष्य के जीवन में देखना पसंद करते हैं। यही कारण है कि उनके प्रवचनों एवं लेखों में इंसान को इंसान बनाने पर जोर दिया गया है।

आचार्य श्री कीर्तियशसूरिजी महाराज स्वाध्याय एवं तप की जीवंत प्रतिमा हैं। आपके जीवन में विद्या और आचार की समन्विति है। जैन समाज में व्याप्त विभिन्न रूढिय़ों, ककुरीतियों और मान्यताओं के संदर्भ में अनेक हितकारी और जनोपयोगी परिवर्तन किये हैं। शाकाहार एवं नशामुक्ति जीवन की प्रेरणा देने के लिए उन्होंने व्यापक बल दिया है। वे धार्मिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महापुरूष हैं। जिन्होंने सांस्कृतिक चेतना को जागृत कर मानव के नवनिर्माण का बीड़ा उठाया है। छोटे-छोटे गांवों तक अब तक सत्तर हजार किलोमीटर की पदयात्रा करके  करके केवल उपदेश ही नहीं दिया बल्कि सद्संस्कारों का जागरण, जैन संस्कृति का पल्लवन, आडम्बर एवं प्रदर्शनमुक्त जीवन जीने की प्रेरणा दी है। उनकी यात्राएं एवं विचार आज की विषम परिस्थितियों में आशा, विश्वास, रचनात्मकता एवं मानवता का संदेश देते हैं।

आचार्य श्री कीर्तियशसूरिजी महाराज के कण-कण में अहिंसा का नाद प्रस्फुटित होता रहता है। वे स्वयं अहिंसा का जीवन जीते हैं और अहिंसक जीवने जीने की प्रेरणा देते हैं। किसी भी विषम परिस्थिति में हिंसा की क्रियान्विति तो दूर उसका चिंतना भी उन्हें मान्य नहीं है। लोकचेतना में अहिंसा को जीवनशैली का अंग बनाने के लिए उन्होंने व्यापक प्रयत्न किये हैं, मौलिक एवं प्रभावी विचार दिये हैं। वे सचमुच ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व हैं जिन्हें चिंतन का अक्षयकोश कहा जा सकता है। उनके चिंतन की धारा एक ही दिशा में प्रवाहित नहीं हुई है बल्कि उनकी वाणी ने जीवन की विविध दिशाओं का स्पर्श किया है। यही कारण है कि कोई भी महत्वपूर्ण विषय उनके प्रवचनों एवं लेखन से अछूता रहा हो, ऐसा नहीं लगता। उनके चिंतन की खिड़कियां समाज को नई दृष्टि देने के लिए सदैव खुली रहती हैं जिनसे आती ताजी हवा समाज को नई दिशा और और नई दृष्टि देने में सक्षम है।

 

ललित गर्ग

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.