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विधानसभा चुनावों के संदर्भ में लोकसभा की तस्वीर

विधानसभा चुनावों के संदर्भ में लोकसभा की तस्वीर

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजे आने के बाद कांग्रेस जहां उत्साहित है, वहीं भारतीय जनता पार्टी की चिंताएं बढ़ गई हैं। चिंता की वजह यह है कि इन राज्यों के नतीजों में भारतीय जनता पार्टी को नकार मिल है। इनमें से दो राज्य मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ ऐसे रहे हैं, जहां पार्टी पंद्रह वर्षों से सत्ता पर काबिज थी। विधानसभा चुनावों में हार के बाद से सवाल उठ गया है कि क्या 2014 के लोकसभा चुनावों की तरह भारतीय जनता पार्टी का इन राज्यों में जादू चल पाएगा? सवाल यह भी है कि क्या भारतीय जनता पार्टी अपनी बादशाहत बनाए रख पाएगी?

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दौर में शब्दों की बाजीगरी और उनके चमत्कारिक इस्तेमाल का चलन बढ़ गया है। लोकसभा चुनावों से ठीक पहले हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को मीडिया ने सत्ता का सेमीफाइनल बताया। इन चुनावों में मिजोरम को गंवाने के बावजूद तीन राज्यों में जीत से उत्साहित कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जिस तरह कहा कि सेमीफाइनल हमने जीत लिया है, और 2019 में भी हम मोदी को हराएंगे, वह उनके जोश को जाहिर करने के लिए काफी है। पांच साल से केंद्रीय सत्ता और कई सालों से कई राज्यों की राजनीति से किनारे पड़ी कांग्रेस के लिए निश्चित तौर पर यह जीत संजीवनी का कार्य कर रही है। ऐसे हालात में अपने कार्यकर्ताओं के उत्साह को बनाए रखने के लिए राहुल गांधी को यह कहना वाजिब ही है कि 2019 में भी वे मोदी को हराएंगे।

लेकिन एक तथ्य पर और ध्यान देने की जरूरत है। कांग्रेस की अगर सही मायने में जीत हुई है तो वह छतीसगढ़ में ही हुई है। मध्य प्रदेश में भले ही वह 114 सीटों के साथ विजेता बनकर उभरी है, लेकिन उसे भारतीय जनता पार्टी से कम ही वोट मिले हैं।  इन चुनावों में जहां बीजेपी को एक करोड़ 56 लाख 42 हजार 980 वोट मिलें, वहीं कांग्रेस को उसकी तुलना में एक करोड़ 55 लाख 95 हजार 153 वोट ही मिले यानी कांग्रेस को भारतीय जनता पार्टी से कुल 47 हजार 827 वोट कम मिलें। कम से कम 11 सीटें ऐसी रहीं, जहां कुछ सौ से लेकर कुछ हजार में हार हुए हैं। अब जरा यहां नोटा को मिले वोटों की संख्या पर नजर डालिए। मध्य प्रदेश में पांच लाख 42 हजार 295 लोगों ने नोटा का इस्तेमाल किया। यह नोटा का वोट आया कहां से और ज्यादातर किसका है? नोटा का वोट भारतीय जनता पार्टी के कोर वोट बैंक ब्राह्मण, क्षत्रिय और ऐसे ही अगड़ समुदाय का है। भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व इस समुदाय को अपना बपौती वोटर मानने लगा था। यही वजह है कि इनके विरोध को दरकिनार करते हुए उसने एससी एसटी अत्याचार निवारण कानून पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया। दिलचस्प यह है कि बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती भी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए मानती रहीं है कि इस कानून का सवर्णों के खिलाफ दुरूपयोग होता रहा है। सवर्णों के तमाम विरोध को दरकिनार करते हुए भाजपा की केंद्रीय सरकार ने कानून के जरिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया। इससे नाराज सवर्ण वोटरों ने कांग्रेस को वोट भले ही नहीं दिया, लेकिन भाजपा का भी साथ नहीं दिया और अपना गुस्सा जता दिया। इसका असर यह हुआ कि भारतीय जनता पार्टी 120 का आंकड़ा छूते-छूते रह गई और नाराज वोटरों के चलते कांग्रेस जीत के करीब पहुंच गई।

इसी तरह राजस्थान के चुनाव नतीजों पर भी नजर डाल लेना जरूरी होगा। राज्य में विजेता रही कांग्रेस को मिले एक करोड़ 39 लाख 35 हजार 201 वोट मिले। जबकि बीजेपी को कुल एक करोड़ 37 लाख 57 हजार 502 वोट मिलें, यानी बीजेपी को कांग्रेस से सिर्फ एक लाख 77 हजार 699  वोट ही कम मिले। अब जरा नोटा पर नजर डालते हैं। राज्य में नोटा को चार लाख 67 हजार 781 लोगों का समर्थन मिला। यहां भी मध्य प्रदेश की तरह सवर्ण वोटरों ने ही नोटा का इस्तेमाल किया। खासतौर पर राजपूत समुदाय ने। उनको वसुंधरा और भारतीय जनता पार्टी सरकार से दिक्कत यह थी कि उसने पद्मावत फिल्म पर राजपूती शान को देखते हुए सही रूख अख्तियार नहीं किया। नोटा का इस्तेमाल करने वाले वे वोटर हैं, जो कांग्रेस या किसी दूसरे दल को वोट नहीं दे सकते, भले ही अपना समर्थन भाजपा को न दें। लेकिन आखिर इससे फायदा किसे हो रहा है, जाहिर है कि पस्त पड़ी कांग्रेस को।

छत्तीसगढ़ और तेलंगाना की बात और रही। तेलंगाना में जहां के चंद्रशेखर राव ने एक बार फिर बाजी मारी, वहीं छत्तीसगढ़ राज्य में ग्रामीण इलाकों में भारतीय जनता पार्टी विरोधी लहर काम कर गई। वैसे छत्तीसगढ़ की हार में कांग्रेस के प्रति लहर के साथ ही भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी भी रही। एक साल पहले जिस तरह राज्य में पार्टी के बड़े नेता ब्रजमोहन अग्रवाल की पत्नी के रिजॉर्ट को लेकर सवाल उठे, वे भारतीय जनता पार्टी के लिए चेतावनी भरे थे। लेकिन पार्टी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। हैरतअंगेज यह रहा कि उस पर सवाल तब की विपक्षी कांग्रेस ने नहीं, भारतीय जनता पार्टी के अंदर से ही उठा था। दबी जुबान से पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह के भ्रष्टाचार पर भी सवाल उठा। राज्य के एक पत्रकार और मौजूदा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के रिश्तेदार विनोद वर्मा को जब गिरफ्तार किया गया तो कहा गया कि अभिषेक सिंह के भ्रष्टाचार से ध्यान बंटाने के लिए सरकार ने यह कदम उठाया। विनोद वर्मा की गिरफ्तारी को लेकर विवाद हुआ। राष्ट्रवादी खेमे के पत्रकारों तक ने इसका दबी जुबान से विरोध किया। बहरहाल रमन सिंह सरकार के खिलाफ हवा तो बन ही गई। वैसे माना जाता है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में सिर्फ दुर्ग ही राज्य की ऐसी सीट रही, जहां से भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी और मौजूदा महासचिव सरोज पांडे को महज दस हजार वोटों से हार मिली। इस हार की वजह भीतरघात को ही बताया गया। कहना न होगा कि विधानसभा चुनावों में इसका भी असर हुआ।

बहरहाल जिन पांच राज्यों में चुनाव हुए हैं, उनमें से तीन मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को भारी जीत मिली थी। राजस्थान की सभी 25, मध्य प्रदेश की 29 में से 27 और छत्तीसगढ़ की 11 में से दस सीटों पर भारतीय जनता पार्टी को जीत मिली थी। मिजोरम की इकलौती लोकसभा सीट से भी कांग्रेस विरोधी मिजोरम नेशनल फ्रंट को जीत मिली थी, जबकि तेलंगाना की 17 में से सिर्फ एक सीट पर भारतीय जनता पार्टी को जीत मिली थी। यहां यह भी याद रखा जाना चाहिए कि तब उसका तेलुगू देशम पार्टी से गठबंधन था। लोकसभा चुनावों में तेलुगूदेशम ने भी एक सीट पर विजय हासिल की थी। जबकि तेलंगाना की सत्ताधारी तेलंगाना राष्ट्रसमिति को 11, कांग्रेस को दो, वाइएसआर कांग्रेस को एक, और ओबैसी की पार्टी को भी एक सीट पर जीत मिली थी। इस तरह देखा जाए तो 83 लोकसभा सीटों में से भारतीय जनता पार्टी को 63 सीटों और एक उसके सहयोगी तेलुगू देशम को जीत मिली थी। लेकिन जिस तरह विधानसभा चुनाव के नतीजे आए हैं, अगले आम चुनाव में ऐसी जीत की उम्मीद करना बेमानी होगा। अब तो बड़े से बड़े राजनीतिक जानकार मानते है कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में इतनी बड़ी जीत हासिल करना मोदी सरकार के लिए संभव नहीं होगा। माना जा रहा है कि तीन राज्यों में सत्ता पर काबिज होने का मनोवैज्ञानिक फायदा कांग्रेस को मिलेगा। ऐसे में सवाल यह है कि इन सीटों की कमी की भरपाई भारतीय जनता पार्टी कहां से करेगी।

लोकतंत्र में सत्ता हासिल करने के बाद हर दल के सामने दो तरह की चुनौतियां होती हैं, उसे अपने वोटर को भी खुश रखना होता है और दीर्घकालिक महत्व के कदम भी उठाने होते हैं। भारतीय जनता पार्टी की गड़बड़ी यह है कि सत्ता में आते ही दीर्घकालिक महत्व के वह कदम उठाती तो है, लेकिन लोकलुभावन कदमों से वह दूर जाने लगती है। आजादी के 70 साल में यह परिपाटी बन गई है कि जिस दल की सरकार होती है, उस दल के कार्यकर्ता की सुनवाई कुछ ज्यादा ही होती है, उसके काम कुछ ज्यादा ही आसानी से होते हैं। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के साथ दिक्कत यह है कि सत्ता में आते ही उसके नेता अपने कार्यकर्ताओं से लगातार दूर जाने लगते हैं। उन्हें अपने कार्यकर्ता की चिंता कम, दीर्घकालिक हित के कदमों की चिंता ज्यादा होने लगती है। सवाल यह है कि कार्यकर्ता केंद्रित व्यवस्था में भारतीय जनता पार्टी अपने कार्यकर्ताओं से त्याग और नि:स्वार्थ सेवा की उम्मीद ही क्यों रखती है ? जाहिर है कि जब कार्यकर्ता उससे दूर जाने लगते हैं या उदासीन होने लगते हैं तो उसकी चुनावी हार होने लगती है और पार्टी के दीर्घकालिक महत्व के कदमों का फायदा उसके विरोधी दल उठाने लगते हैं। भारतीय जनता पार्टी को अगर अगला लोकसभा चुनाव जीतना है तो उसे अपने कार्यकर्ताओं का भरोसा जीतना होगा। उन्हें समझाना होगा कि भारतीय जनता पार्टी के राज में उसके वाजिब कार्य जरूर होंगे।

चुनावी जीत के लिए स्थानीय समीकरणों को भी साधना होगा और नई रणनीति बनानी होगी। पार्टी को यह भी साबित करना होगा कि उसी की अगुआई में देश तरक्की कर सकता है। उसे अपने कोर वोटरों का भी ध्यान रखना होगा। भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने उज्जवला और तीन तलाक जैसे मुद्दों पर बेहतर काम किया है। उज्ज्वला योजना का फायदा जहां सारे वर्ग को हुआ है, वहीं तीन तलाक का मुस्लिम महिलाओं को लाभ मिला है। लेकिन वोटों के अंकगणित में भाजपा के पक्ष में इनका फायदा नजर नहीं आया है। जाहिर है कि पार्टी को इन वर्गों का समर्थन हासिल करने के लिए भी जोर देना होगा। मोदी सरकार ने जिस तरह राजकाज चलाया है और एससी एसटी अत्याचार निवारण कानून पर तेजी दिखाई, उसे राममंदिर आंदोलन पर भी तेजी दिखानी होगी। लोगों को यह भरोसा देना होगा कि वह राम मंदिर के लिए भी उतनी ही संजीदा है। तभी जाकर उसे चुनावी मैदान में फायदा मिल पाएगा।

उमेश चतुर्वेदी

 

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