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मध्य प्रदेश में आया ‘कमल’

मध्य प्रदेश में आया ‘कमल’

पिछले दिनों सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में बड़े उलटफेर हुए जहां छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ दल को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा वहीं मध्य प्रदेश में कांटे की टक्कर हुई और कांग्रेस इसे शिवराज सिंह से  हथियाने में कामयाब रही। गौरतलब है कि ये दोनों ही राज्य अभेद किले के रूप में देखे जा रहे थे और भाजपा तीनों ही हिन्दी बेल्ट में मजबूत जनाधार के साथ जीत के प्रति आश्वस्त थी राजस्थान में जो परिणाम आये उसमें कोई चौकानें वाली बात नहीं थी वो वहां का ट्रेंड है। मगर कांटे की लड़ाई मध्य प्रदेश में थी जहां आखिरकार 15 साल बाद बीजेपी ने सत्ता गंवा दी। हालांकि दोनों पार्टियों के बीच  सीटों का अंतर बहुत अधिक नहीं था और स्पष्ट जनादेश किसी के पास नहीं था  लेकिन कमलनाथ जी ने सत्ता की बागडोर संभाल ली है और आते ही चुनावी घोषणा  वायदे के मुताबिक किसानों के कर्जे का 2 लाख रुपया माफ कर दिया ये बात और है खजाने पर इसका कितना बोझ पड़ा है इसके साफ आंकड़े उपलब्ध नहीं है। तो सवाल ये उठता है कि क्या किसानों के हितों की अनदेखी की सजा शिवराज सरकार को मिली। लेकिन अगर ये बात सच है तो लगातार तीन बार सत्ता में रहने के बावजूद केवल 5 सीटों का फर्क जीत और हार यदि तय होता है तो इसका अर्थ है जनता ने एकदम से नकारा नहीं है। अब चुनाव नतीजों पर गौर करें तो बीजेपी को 40 प्रतिशत और कांग्रेस को 40.9 प्रतिशत वोट मिले हैं/ 15,642,980 लोगों ने बीजेपी पर भरोसा जताया है। जबकि उससे 47,827 कम वोट कांग्रेस को मिले। पार्टी पर 15,595,153 लोगों ने भरोसा जताया।

दूसरी तरफ हम नोटा को पूरी तरह से इन चुनावों में खारिज भी नहीं कर सकते हैं क्योंकि भाजपा को अगर सत्ता गंवानी पड़ी है तो उसकी पृष्ठभूमि में कहीं न कहीं नोटा भी महत्वपूर्ण है। आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि नोटा ने कई सीटों पर नतीजे तय करने में अहम भूमिका निभाई है। मध्य प्रदेश में कम से कम 11 सीटें ऐसी हैं जहां नोटा ने प्रत्याशियों का खेल बिगाड़ा है यानी यहां भाजपा की हार कांग्रेस से नहीं बल्कि नोटा से हुई है क्योंकि माना जा रहा है मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों में 5 लाख के आसपास मतदाताओं ने नोटा का इस्तेमाल किया और कहीं कहीं जीत का अंतर कहीं कम था और नोटा उससे कहीं अधिक।

कुछ चुनावी विश्लेषक इन चुनावों में एंटी इनकंबेंसी की चर्चा करना नहीं भूलते हैं। आम मतदाता 15 सालों से राज्य में एक ही दल एक ही मुख्यमंत्री को देखते हुए ऊब चुका था और एक बदलाव की जरूरत महसूस हो रही थी ये बात गौर करने लायक है चुनावों से काफी पहले से शिवराज सिंह चौहान खुद की मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं मान रहे थे और उन्होंने ये निर्णय पार्टी के हाथों में सौंप दिया था यानि संभव था भाजपा इस बार मुख्यमंत्री बदल सकती थी और अगर एंटी इनकंबेंसी थी तो महज 5 सीटों का फर्क क्यों रहा हार या जीत में, परिणाम छत्तीसगढ़ की तरह आते जहां भाजपा की बुरी तरह पराजय हुई या यूं कहें की सूपड़ा साफ हो गया। मगर इस तरह की लहर कम से कम मध्य प्रदेश और राजस्थान में देखने को तो नहीं मिलती है।

अगर इन चुनावों को करीब से देखा जाये तो बेशक किसान बड़ा मुद्दा तो नहीं था जितना की इसको भुनाया गया खासतौर से राहुल गांधी का किसानों की कर्ज माफी का वादा, जिसमें दस दिनों के भीतर किसानों का 2 लाख रुपया कर्जा माफ करने की बात कही गई थी और किसान कहीं न कहीं इस लोकलुभावन वादे के फेर में आ गया क्योंकि आए दिन सोशल मीडिया और समाचारों में प्याज आलू के गिरते दामों से वो कहीं न कहीं परेशान था रही सही कसर बिचौलियों ने पूरी कर दी थी हलकी मध्य प्रदेश सरकार की किसानों के लिए चलाये जा रही भावांतर योजना पूरे राज्य में सही प्रकार से काम कर रही थी किसानों के लिए ऐसे कई योजनाएं चलाई जा रही थी जो आने वाले वर्षों में किसानों को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करती इसमें वो योजनाएं भी शामिल हैं जो केंद्र में मोदी सरकार किसानों के लिए लेकर आई है मगर किसान कहीं न कहीं कर्जा माफी के लोभ में फंस गया जो अल्पकालिक समाधान तो हो सकता है लेकिन आने वाले वर्षों में किसान को फिर उसी कर्ज की दहलीज पर लाकर खड़ा कर देगी। वहीं राज्य में एक बड़ी आबादी युवाओं की है जिसको उन्होंने 10 हजार रुपया प्रतिमाह बेरोजगारी भत्ता देने का चुनावी वादा भी किया था इसको कब तक पूरा करेंगे तो भगवान ही जानता है लेकिन ये भी सत्य है एक बड़ी आबादी आज भी देश के असंगठित क्षेत्रो में 5 से 10 हजार रुपया महीना पर काम करने को मजबूर है ऐसे में वो मुफ्तखोरी की संस्कृति को जन्म देंगे जिसका नतीजा संभव है आने वाले वर्षों में देश के अन्य भागों को भी भोगना पड़े। इसके साथ ही सस्ती बिजली, पेंशन योजना, 5 रुपया लीटर दूध, बेघरों को घर समेत अनेक लोकलुभावन वादे किए गए थे सच पूछा जाये तो ये कांग्रेस की नहीं उन वायदों की जीत है जिसमें कितनी पूरी होती है ये तो आने वाला वक्त बताएगा।

दूसरी तरफ सरकार दावरा संसद में लाये गए एससी/एसटी संशोधन बिल को भी इस हार से जोड़कर देख रहे हैं जिसके बारे में कहा जा रहा है सवर्ण मोदी सरकार से नाराज है और उन्होंने नोटा या कांग्रेस को वोट देकर अपनी नाराजगी जाहीर की है यानि ये नाराजगी भी सीधे तौर पर शिवराज सिंह के साथ नहीं थी जिसका खामियाजा मध्य प्रदेश में उनको भुगतना पड़ा। ये बात सही है जब आप केंद्र की योजनाओं के लिए अपनी पीठ थपथपपाते है तो कहीं न कहीं उनकी नीतियों का नुकसान उठाने के लिए भी आपको तत्पर रहना पड़ता है। हालांकी नोटबंदी और जीएसटी के बाद भी जब बड़ी आबादी को इस फैसले की वजह से कई दिनों तक परेशानियों का सामना करना पड़ा था उसके बावजूद भी जनता ने उन्हें उत्तर प्रदेश की जीत तोहफे के रूप में दी थी।

शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व का ही कमाल था जो 109 सीटें भी हासिल हुई ये बात दीगर है ज्यादातर वो विधायक या मंत्री  अपना चुनाव हारे हैं जिनकी टिकटें काटी नहीं गई ये जानते हुए भी की उनका परफॉरमेंस खराब है और जीतना मुश्किल हो जायगा जैसा की तमाम सर्वे की रिपोर्ट्स में कहा जा रह था और इसकी का नतीजा है जो पराजय का मूह देखना पड़ा। इस चुनाव में 13 मंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा अर्चना चिटनीस, उमा शंकर गुप्ता, ललिता यादव, जयंत मलैया, जयभान सिंह समेत तमाम बड़े नेताओं को हार का सामना करना पड़ा जैसा की सर्वे में पहले से आकलन किया गया था लेकिन फिर भी भाजपा आंख मूंदे बैठी रही।

ये बात सच है की मध्य प्रदेश की जनता भाजपा के साथ दिल से जुड़े हुए हैं लेकिन उनकी और स्वयं भाजपा कार्यकर्ताओं की भी नाराजगी मौजूदा मंत्रियों और विधायकों से थी जिसकी शिकायत भी पार्टी के स्तर पर कई बार की गई मगर इस पर सुध नहीं ली गयी नतीजा सामने है। पिछले 15 सालों से ज्यादातर पुराने मंत्री और विधायक मठाधीश बनकर सत्ता के गलियारों में बैठे रहे इससे कहीं ना कहीं जनता के मन में उनको लेकर नाराजगी थी लगता है इसी का खामियाजा शिवराज सरकार को उठाना पड़ा। दूसरी तरह जिस तरह का सहज भाव अब तक पार्टी के पदाधिकारियों और विधायकों में देखा जा रहा था जिस सहज भाव से जनता से घुले मिले थे 15 साल की सत्ता में वो कब जनता से कटने लगे और दूरी बना ली इसका भी असर इन चुनावों पर भारी पड़ा/चंद लोगों की सत्ता में हिस्सेदारी रही और नए लोगों को सत्ता में भागीदारी का अवसर नहीं दिया गया इससे कार्यकर्ताओं में कहीं ना कहीं असंतोष का भाव था जिसके चलते उन्होंने पूरे मन से चुनाव प्रचार नहीं किया। और अगर आरोप प्रत्यारोप टिकटों के बंदरबाट तक पहुंच जाए तो ये बात आसानी से समझी जा सकती है की स्तिथियां कितनी गंभीर रही होंगी टिकटों में हुई बंदरबांट से नाराजगी झेलनी पड़ी।

कांग्रेस आलाकमान ने ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ पर चुनावों को जीतने की जिम्मेदारी छोडि़ए हो कौन मुख्यमंत्री होगा वो चेहरा भी न बताया हो मगर जनता के मन में कहीं न कहीं युवा मुख्यमंत्री की चाहत थी जो उन्हें ज्योतिरादित्य के रूप में विकल्प देखने को मिला हो भले ही हम कितने ही परिपक्व लोकतंत्र में तब्दील न हो जाएं लेकिन व्यक्ति और परिवार पूजा की परंपरा जो कांग्रेस में गांधी नेहरू परिवार और फिर दक्षिण भारत में देखने को मिलता है वो मध्य प्रदेश के नींव  में भी कहीं न कहीं आज भी विद्यमान है तभी दिग्विजय सिंह और सिंधिया परिवार के प्रति उनके मन में आस्था कहीं दबी हुई है जो समय-समय पर हिलोरे मारती है।

एक अहम बात जो देखने को मिलती है लोकसभा चुनावों में अब ज्यादा वक्त नहीं रह गया है उससे लगभग 6 माह पहले ये चुनाव हुए है ऐसे में परंपरागत मतदाता जो भाजपा का दिल से जुड़ा हुआ है लेकिन वो चाहता है की वो उसका एक भूला हुआ एक वादा याद दिलाये जिसके लिए उन्होंने उसे 2014 के चुनावों में जीत दिलवाई थी ये सही है मोदी जी की अगुवाई में देश आगे बढ़ रहा है खुशहाल है लेकिन राम मंदिर एक ऐसा मुद्दा है जो व्यक्ति समाज और दलगत भावना से उपर है। अभी अयोध्या और रामलीला मैदान, बनारस में विश्व हिन्दू परिषद, कहीं शिवसेना कहीं अन्य हिन्दू संगठनों की रैलियां और बैठके हुई उसमें आम मतदाता उनसे पूछ रहा है राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, राज्यपाल, उपराष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष और सुबे बड़ी पार्टी आप सत्ता में हों फिर भी आप राम मंदिर क्यों नहीं बनाते क्यों आप न्यायलय की आदेश के प्रतिसखा में है जबकि आप अध्यादेश या कानून बनाने में समर्थ है अगर अब राम मंदिर नहीं बना तो कब बनेगा, ये सवाल आज ज्यादातर मतदाताओं के मन में है शायद इसीलिए ये झटका मतदाताओं ने दिया है।

बरहाल राज्य के नए मुख्यमंत्री कमलनाथ जी ने सत्ता संभाल ली है किसानों को कर्जमाफी भी दे दिया है रोजगार उत्पन्न करने के लिए प्राइवेट सेक्टरों में 70 प्रतिशत स्थानीय आबादी को रोजगार देने को कहा है जिससे राज्य में बेरोजगारी दूर हो सके। नि:संदेह भाजपा के लिए ये नतीजे चिंताजनक हैं, उसे लोकसभा चुनावों के लिए अपनी रणनीति बनानी होगी। अब तक आए जनादेश के साथ इस बात पर भी बहस शुरू होने लगी है कि क्या यह जनादेश राज्य सरकारों के खिलाफ है या केंद्र सरकार के भी? अब देखना ये है इन विधानसभा चुनावों अपना कितना असर लोकसभा चुनावों पर दिखते हैं ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन इन विस चुनावों को लोकसभा चुनावों का सेमीफाइलन कहना फिलहाल सर्वथा अनुचित होगा मगर उम्मीद है भाजपा इस हार से सबक लेते हुए भविष्य की रणनीति बनाएगी 2019 मील का पत्थर साबित होगा।

भोपाल से दीपा जोशी

 

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