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वसुंधरा राजे का राजतिलक कांग्रेस के माथे सजा

वसुंधरा राजे का राजतिलक कांग्रेस के माथे सजा

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह द्वारा ताबड़तोड़ चुनाव प्रचार में वाहवाही से भरे मैदान पर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने पन्द्रहवीं राजस्थान विधानसभा की चुनावी पिच पर चौका तो लगाया लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तथा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट की अगुवाई में कांग्रेस के उमंग से भरे खिलाडिय़ो ने सत्ता की गेंद लपक ली और पिछले बीस वर्षो से बारी-बारी सरकार परिवर्तन के मिथक को बरकरार रखते हुए उन्हें खाली हाथ पवेलियन लौटने को विवश कर दिया। कांग्रेस सरकार की ताजपोशी के लिए पार्टी स्तर पर मशक्कत शुरू हो गई है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान अलवर जिले के रामगढ़ निर्वाचन क्षेत्र में बसपा प्रत्याशी का निधन होने से 200 सदस्यीय विधानसभा में 199 सीटों पर गत 7 दिसम्बर को मतदान हुआ। मंगलवार ग्यारह दिसम्बर को सम्पन्न मतगणना में कांग्रेस ने एक सौ सीटों पर सफलता हासिल की। अब तक सत्तारूढ़ भाजपा 73 सीटे जीत सकी। बसपा ने 2008 का इतिहास दोहराते हुए फिर छ: सीटों पर कब्जा किया। पिछली बार वामपंथी दलों का खाता नहीं खुला था लेकिन इस बार माकपा के दो उम्मीदवार जीते हैं। जनजाति बहुल डूंगरपुर में भारत ट्राइबल पार्टी ने भी दो सीटे जीतकर भाजपा-कांग्रेस को चौंकाया है। भाजपा से बगावत करके दो बार के निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल ने तीसरे मोर्चे की पहल में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का गठन करके 57 प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। लेकिन बेनीवाल अपनी खींवसर (नागौर) सीट पर तिकड़ी जीत दर्ज करते हुए मेड़ता और भोपालगढ़ सीट भाजपा से हथियाने में सफल हो गये। कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनाव में अन्य दलों से संभावित महागठबंधन के मद्देनजर सहयोगी दलों के लिए पांच सीटे छोड़ी थी। इनमे चौधरी अजीत सिंह के राष्ट्रीय लोकदल को मिली मालपुरा एवं भरतपुर सीट में से भरतपुर में डॉ. सुभाष गर्ग विजयी रहे हैं। अशोक गहलोत के पिछले कार्यकाल में गर्ग माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान के अध्यक्ष नियुक्त किये गये थे और वह कांग्रेस टिकट पर चुनाव लडऩे की तैयारी में जुटे हुए थे।

राजनीति में शुद्धिकरण और लोकतंत्रीकरण की वकालत करने वाले भाजपा के दिग्गज नेता वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने पिछले चुनाव के बाद से मुख्यमंत्री वसुंधरा के खिलाफ आवाज बुलंद की जिसकी परिणति भारत वाहिनी पार्टी के रूप में हुई। तिवाड़ी ने 68 प्रत्याशी खड़े किये जिनमे भरतपुर में गिरधारी लाल तिवारी के अलावा सभी की जमानत जब्त हुई। पिछले चुनाव में राज्य में सर्वाधिक मतों से जीत दर्ज करने वाले घनश्याम तिवाड़ी सांगानेर में जमानत नहीं बचा सके।

लाख टके का सवाल है कि पिछले चुनाव में अब तक की 163 सीट जीतने के कीर्तिमान के बावजूद सत्तारूढ़ भाजपा का जादुई किला क्यों ढ़ह गया? मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने विकास के रिकार्ड दावे की गति बनाये रखने के लिए मतदाताओं से सत्ता परिवर्तन के ट्रेंड को विराम देने की मनोवैज्ञानिक गुहार की। चुनाव से पूर्व राजस्थान गौरव यात्रा में वसुंधरा राजे ने कांग्रेस द्वारा उठाये गये सवाल दर सवालों की अनदेखी करते हुए अपनी सरकार के कामकाज का हिसाब किताब जनता के समक्ष रखने का दावा किया। लेकिन मौन मतदाता के गले यह खुराक नहीं उतर सकी।

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भाजपा ने 180 प्लस के लक्ष्य के साथ पुन:सत्ता में लौटने की योजना बनाई। बेहतर बूथ प्रबंधन, संघ की तर्ज पर विधानसभा क्षेत्रो में विस्तारक योजना की सफल क्रियान्विति पर बल दिया गया। लेकिन सत्तारूढ़ होने के बाद से कार्यकर्ताओं की सश्रा में भागीदारी की घोर उपेक्षा होती गई। राजनीतिक विश्लेषक और भाजपा के अंदरूनी सूत्र भी यह मानते है कि अलवर-अजमेर लोकसभा तथा माण्डलगढ़ विधानसभा के उपचुनाव में आम मतदाताओं तथा पार्टी कार्यकर्ताओं के गुस्से की परिणति शर्मनाक पराजय के रूप में प्रकट हुई। इस हार के लिए प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विधायक अशोक परनामी का त्याग पत्र लेकर उन्हे बलि का बकरा बनाने के प्रयास तथा नये अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर ढ़ाई माह तक पार्टी हाईकमान से टकराव ने पार्टी की फजीहत ही करायी। जमीनी कार्यकर्ता पूर्व विधायक मदन लाल सैनी की तैनाती ने जरूर मरहम का काम किया लेकिन पार्टी को लगा घाव भर नहीं पाया। किसानों की कर्ज माफी की घोषणा भी कारगर साबित नहीं हुई। किसान मजदूर आंदोलन चुनावी घोषणा पत्र के वायदों को पूरा करने तथा युवाओं को रोजगार, बिगड़ती कानून व्यवस्था तथा हर मोर्चे पर विफलता को लेकर कांग्रेस ने सरकार को कठघरे में खड़ा करने में कही कोई चूक नहीं की। भाजपा द्वारा कांग्रेस नेताओं की कथित एकजुटता के दावों तथा गुटबाजी के चलते टिकट वितरण में अत्यधिक विलम्ब की खिल्ली उड़ाने के बावजूद राहुल गांधी की अगुवाई में चलाये गये चुनाव अभियान ने पार्टी को सरकार चलाने का अवसर मिल गया। नतीजो की घोषणा के बीच कैम्पेन समिति के अध्यक्ष डॉ.रघु शर्मा ने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से भेंट के बाद अपनी टिप्पणी में स्वीकार किया कि पार्टी को उम्मीद के अनुरूप सीटे नहीं मिली है। यह चिंताजनक है और पार्टी इसका विश्लेषण करेगी।

इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि भाजपा हाईकान ने राजस्थान के राजनीतिक परिदृष्य के मद्देनजर चुनाव जीतने के लिए पूरी ताकत लगा दी। खुद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कमान संभाली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रैलियों ने निराश कार्यकर्ताओं तथा मतदाताओं को उत्साहित किया। केन्द्रीय मंत्रियो के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दौरे से मतों के धु्रवीकरण के प्रयास विफल हुए। साथ ही हनुमान जी की जाति के बारे में कथित विवादास्पद टिप्पणी निंदा का मुद्दा बन गई। फिर भी सत्ता विरोधी लहर के अंडर करंट के बावजूद भाजपा 73 सीटे जीतकर सम्मानजनक स्थिति में है। प्रदेश अध्यक्ष मदनलाल सैनी ने इसे मानते हुए आम मतदाताओं तथा पार्टी के प्रति आभार व्यक्त किया है। वर्ष 1998 से सत्ता परिवर्तन के दौर में कांग्रेस ने 44.95 प्रतिशत वोट लेकर 153 सीटे जीती थी तब भाजपा को 33.23 प्रतिशत वोट के साथ 33 सीटे मिली थी। निर्दलीय व अन्य ने 14 सीटे लेकर 21.82 प्रतिशत वोट हासिल किए। वर्ष 2003 में भाजपा पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटी। वसुंधरा राजे के नेतृत्व में पार्टी को 39.20 प्रतिशत वोट के साथ 120 सीटें मिली। कांग्रेस ने 36.65 फीसदी वोट लेकर 56 सीटे हासिल की। निर्दलीय तथा अन्य दलों को 24 सीटे और 25.15 फीसदी वोट मिलें। वर्ष 2008 के चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। कांग्रेस 36.82 फीसदी वोट तथा 96 सीटो के साथ सबसे बड़ा दल था। अशोक गहलोत ने बसपा के छ: तथा निर्दलीयो के समर्थन से सरकार बनाई तब भाजपा को 34.27 फीसदी वोट और 78 सीटे मिली। निर्दलीय तथा अन्यों को 26 सीटे हासिल हुई और उन्होंने 28.91 प्रतिशत मत प्राप्त किए। अगले चुनाव वर्ष 2013 में परिदृष्य बदल गया। भाजपा ने अब तक के सर्वाधिक 45.17 मत हासिल कर 163 सीटें झटक ली जबकि कांग्रेस 31.07 मत प्राप्त करके महज 21 सीटों पर सिमट गई। इस चुनाव में निर्दलीय एवं अन्यों को 16 सीटे मिली जिन्हे 21.76 प्रतिशत मत मिले।

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पिछले चार चुनावों के विश्लेषण से यह तथ्य उजागर होता है कि निर्दलीय तथा अन्य दलो के प्रत्याशियों ने 22 से 27 फीसदी मत प्राप्त करने के साथ 14 से 26 सीटों पर कब्जा करने में सफलता हासिल की है। वर्ष 2018 के चुनाव में भाजपा तथा कांग्रेस के बागियो और निर्दलीयों के साथ हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक (रालोपा) पार्टी ने चुनावी समीकरणों को प्रभावित किया है। बसपा, रालोपा तथा बागी प्रत्याषी कांग्रेस को सम्मानजनक बहुमत प्राप्त करने के मार्ग में बाधक बने है लेकिन कांग्रेस के बागी विजेता प्रत्याषी पार्टी के समर्थन में भी आ गये है। उधर भाजपा के खिलाफ बसपा सुप्रीमो मायावती के समर्थन की घोषणा से कांग्रेस को राहत मिली है।

इस चुनाव में कुल 74.21 प्रतिषत मतदान हुआ। वर्ष 2013 में 75 फीसदी से अधिक मतदान हुआ। सत्तारूढ हुई कांग्रेस को 39.2 फीसदी तथा भाजपा को 38.8 प्रतिषत बसपा को 4.02 सी पी एम को 1.2 तथा निर्दलीयो को 9.5 प्रतिषत मत मिले। अठारह निर्वाचन क्षेत्रो मे हार जीत का अंतर नोटा वोट की तुलना में प्रत्याषी की जीत के अंतर से कही अधिक था। नोटा के पक्ष में 1.3 प्रतिषत वोट पड़े।

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भाजपा के अन्र्तविरोध के बावजूद वसुंधरा राजे को भावी मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में पेष किया गया। पार्टी ने प्रत्याषियो की सूची तथा चुनाव घोषणापत्र जारी करने में भी पहल की। कांग्रेस मे मुख्यमंत्री का चेहरा अंत तक घोषित नहीं किया गया। केवल सामूहिक नेतृत्व की बात कही गई। टिकट बंटवारे में गुटबाजी के हावी होने से अत्यधिक विलम्ब होने सहित विभिन्न कारणों से पार्टी 99 सीटो के फेर में फंस गई। प्रतिपक्ष के नेता रामेश्वर डूडी ने नोखा में अपनी सीट बचाने के चक्कर में बीकानेर में टिकटों की अदला बदली से पार्टी को काफी नुकसान पहुंचाया। वह खुद भी हार गए। अलबत्ता कांग्रेस ने भाजपा के परम्परागत जयपुर गढ़ को ढ़हाने में सफलता हासिल की। मंत्री डॉ.अरूण चतुर्वेदी राजपाल सिंह शेखावत सहित भाजपा के पूर्व अध्यक्ष अशोक परनामी पराजित हुए तो चिकित्सा मंत्री कालीचरण सराफ को मामूली जीत से संतोष करना पड़ा। कांग्रेस का झालावाड़, पाली, सिरोही में खाता नहीं खुला। हालांकि सिरोही में कांग्रेस के बागी संयम लोढ़ा जीते है और वह अशोक गहलोत समर्थक माने जाते है। कांग्रेस ने जैसलमेर बाडमेर दौसा, सवाईमाधोपुर, करौली, टोंक, सीकर तथा धौलपुर में बेहतर प्रदर्शन किया है। पिछले चुनाव की तुलना में कांग्रेस के पक्ष में 6.23 फीसदी वोट के स्विंग से सीटो की संख्या 21 से बढ़कर 99 हो गई जबकि भाजपा के खिलाफ 6.70 मत पडऩे पर उसे लगभग 90 सीटों से हाथ धोना पड़ा। भाजपा को दो तथा कांग्रेस को पांच संभागो में बढ़त मिली। जयपुर संभाग में कांग्रेस भाजपा को बीस-बीस सीटों का नफा नुकसान हुआ। भाजपा को अजमेर संभाग में 12 सीटो कोटा में 6 उदयपुर में दस सीटों का नुकसान हुआ। बीकानेर संभाग में कांग्रेस को आठ सीटों का फायदा मिला।

 

इस बार राज्य के 38 निर्वाचन क्षेत्रों में पिछली बार के चेहरों का आमना-सामना हुआ। वर्ष 2013 में इनमे कांग्रेस के केवल 3 जमींदारा पार्टी और निर्दलीय प्रत्याशी एक-एक तथा भाजपा के 33 प्रत्याशी विजयी हुए थे। इनमें मंत्री कालीचरण सराफ डॉ.अरूण चतुर्वेदी, डॉ.रामप्रताप, प्रभु लाल सैनी, श्रीचंद पलानी, राज्यमंत्री सुरेन्द्र पाल सिंह, श्रीमती अनिता भदेल, अमराराम शामिल थे। वर्ष 2018 के चुनाव में कांग्रेस के तीनो प्रत्याशी पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व मंत्री महेन्द्र जीत सिंह मालवीय और भंवर लाल शर्मा पुन: विजयी हुए है। पिछली बार जमींदारा पार्टी से विजयी सोना देवी इस बार कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव हार गई। निर्दलीय विधायक माणकचन्द सुराणा ने चुनाव नहीं लड़ा। भाजपा के दस प्रत्याशियों ने फिर जीत हासिल की है जिनमे मंत्री कालीचरण एवं श्रीमती अनिता भदेल, संसदीय सचिव सुरेश सिंह रावत शामिल है।

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कांग्रेस के पूर्व मंत्री प्रमोद जैन भाया ने अंता में कृषि मंत्री प्रभु लाल सैनी को प्रतिपक्ष के नेता रहे हेमाराम चौधरी ने गुडामालानी में संसदीय सचिव लादूराम विश्नोई को लगातार दो बार पराजित होने के बावजूद पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष एवं मंत्री बी.डी.कल्ला ने रिश्ते में अपने जीजा गोपाल कृष्णजोशी को बीकानेर पश्चिम में पूर्व मंत्री मास्टर भंवरलाल मेघवाल ने सुजानगढ़ में खेमाराम को, करणपुर में गुरमीत सिंह कुन्नर ने खान मंत्री सुरेन्द्र पाल सिंह टी.टी पूर्व विधानसभा अध्यक्ष दीपेन्द्र सिंह शेखावत ने श्री माधोपुर में झाबर सिंह खर्रा को पूर्व मंत्री दयाराम परमार ने खेरवाड़ा में नानालाल अहारी को पराजित करके हिसाब चुकता किया है। आमेर में भाजपा के सतीश पूनिया ने बसपा के नवीन पिलानिया को परास्त कर अपनी पिछली हार का बदला लिया। पिलानिया तब राजपा के उम्मीदवार थे।

2मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) अशोक गहलोत सहित अन्य नेता प्राय: छत्तीस कौमो को साथ लेकर चलने का दावा करते रहे हैं लेकिन टिकट वितरण से लेकर चुनाव प्रचार में जातीय समीकरणों को तरजीह देने में किसी ने भी कसर बाकी नहीं रखी। इसका परिणाम चुनाव में नफे नुकसान के रूप में देखा जा सकता है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट गुर्जर समुदाय से आते है और इस बार पार्टी ने एक दर्जन प्रत्याशियों को चुनाव में उतारा जिनमें सात को सफलता मिली। दूसरी ओर भाजपा के सभी नौ गुर्जर प्रत्याशी पराजित हो गये। गुर्जर समुदाय भाजपा का परम्परागत समर्थक रहा है लेकिन आरक्षण सुविधा के लिए पिछले दशक से संघर्षरत इस समुदाय को भाजपा से निराशा ही मिली है और अब अपने समुदाय के नेता में संभावित मुख्यमंत्री के चेहरे के नाते कांग्रेस के प्रति मोह स्वाभाविक था। गुर्जर समुदाय की बेरूखी के साथ भाजपा को अपने दूसरे बड़े समर्थक राजपूत समुदाय की नाराजगी भी मोल लेनी पड़ी। गैंगस्टर आनंदपाल एनकाउंटर, जयपुर राजघराने के राजमहल प्रकरण संजय लीला भ्ंसाली की बहुचर्चित फिल्म पद्मावत की शूटिंग एवं फिल्म प्रदर्शन को लेकर वसुंधरा सरकार के रवैये पर इस समुदाय में रोस गहराता गया। नतीजतन भाजपा के 26 प्रत्याशियों में से महज छ: राजपूतो को जीत नसीब हुई। वहीं कांग्रेस के पन्द्रह में से चार प्रत्याशी विजयी रहे। सीमावर्ती जैसलमेर-जालौर बाड़मेर, जोधपुर, नागौर, चित्तौडग़ढ़ एवं शेखावाटी अंचल में इस समुदाय के औसतन छ: फीसदी मतदाता 50 से 60 विधानसभा सीटों को प्रभावित करने में सक्षम माने जाते हैं। इसी कारण कांग्रेस इस इलाके से लगभग दो दर्जन प्रत्याशियों को जिताने में सफल रही। इसी प्रकार बीकानेर, चुरू, झुंझुनू, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ नागौर तथा भरतपुर जाट बाहुल्य इलाके माने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जाट समुदाय 40 से अधिक सीटों में हार जीत को प्रभावित करता है। भाजपा को इस इलाके से भी दो दर्जन से अधिक सीटों का नुकसान हुआ है। भाजपा ने जाट समुदाय के 29 उम्मीदवार उतारे जिनमे आठ को सफलता मिली। वही कांग्रेस के 32 में से 11 प्रत्याशी विजयी हुए। इसके अलावा सी.पी.एम. के बलवान भादरा से तथा शाहपुरा (जयपुर) से इसी समुदाय के निर्दलीय आलोक बेनीवाल को भी सफलता मिली। ब्राह्मण समुदाय से भाजपा के 19 प्रत्याशियों में से छ: तथा कांग्रेस के 22 उम्मीदवारों में सात विजयी हुए। गंगानगर से एक निर्दलीय प्रत्याशी जीता। मीणा समुदाय से भाजपा के तीन (प्रत्याशी 18) तथा कांग्रेस के चार (प्रत्याशी 16) प्रत्याशी जीते। अनुसूचित जनजाति के अन्य प्रत्याशियों की संख्या अलग है।

चुनावी चौसर पर समान जातियो के उम्मीदवारों के बीच जोरदार मुकाबला हुआ। प्रदेश में पन्द्रह निर्वाचन क्षेत्रो में जाट प्रत्याशी आमने-सामने थे। इनमे कांग्रेस को आठ तथा भाजपा को चार सीटों पर सफलता मिली। भरतपुर-कुम्हेर सीट पर कांग्रेस के वरिष्ठ प्रदेश उपाध्यक्ष पूर्व राजघराने के विश्वेन्द्र सिंह ने पिछले चुनाव में डॉ.दिगम्बर सिंह (स्वर्गीय) को हराया और अब की बार उनके पुत्र शैलेश सिंह को परास्त किया। किशनगढ़ से भाजपा के बागी सुरेश टांक तथा भादरा से माकपा प्रत्याशी बलवान पूनिया सफल रहे।

चार क्षेत्रो में राजपूत प्रत्याशियों के बीच आमने-सामने की टक्कर में भाजपा-कांग्रेस दो-दो सीट जीतकर बराबरी पर रहे। मीणा के सामने मीणा उम्मीदवार वाले निर्वाचन क्षेत्र में 11 सीटों में से सात कांग्रेस और तीन भाजपा के खाते में गई। बस्सी (जयपुर) में निर्दलीय विजयी हुआ। इसी प्रकार जाट-राजपूत समुदाय के प्रत्याशियों के बीच तीन क्षेत्रों में हुए मुकाबले में कांग्रेस को सफलता मिली। इनमे जाट समुदाय के दो प्रत्याशियों के साथ राजपूत समुदाय के एक प्रत्याशी सम्मिलित थे। धौलपुर की बड़ी सीट पर कांग्रेस के राजपूत प्रत्याशी गिरिराज सिंह मलिंगा ने भाजपा के जसवंत गुर्जर को भीलवाड़ा जिले के मांडल में कांग्रेस के रामलाल जाट ने मुख्य सचेतक कालूलाल गुर्जर (भाजपा) को तथा नसीराबाद में भाजपा के दिवंगत नेता सांवरलाल जाट के पुत्र रामस्वरूप लाम्बा ने कांग्रेस के रामनारायण गुर्जर को पराजित किया।

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विधानसभा के परिदृष्य में देखे तो भाजपा के 84 वर्षीय कैलाश चन्द्र मेघवाल ने शाहपुरा (भीलवाड़ा) कांग्रेस के महावीर प्रसाद को राज्य में सर्वाधिक 74 हजार 542 मतों के अंतर से पराजित कर अध्यक्ष की जीत को बरकरार रखा। पिछली बार विधानसभा अध्यक्ष रहे कांग्रेस के दीपेन्द्र सिंह शेखावत पराजित हो गए थे। विधानसभा उपाध्यक्ष पद पर आसीन भाजपा के राव राजेन्द्र सिंह शाहपुरा (भीलवाड़ा) में कांग्रेस के बागी आलोक बेनीवाल से पराजित होने के साथ तीसरे नम्बर पर रहे। दिलचस्प तथ्य यह है कि पिछली बार उपाध्यक्ष रहे कांग्रेस के रामनारायण मीणा भी पराजित हुए थे। इसी क्रम में पिछली बार कांग्रेस के मुख्य सचेतक डॉ. रघु शर्मा पराजित हुए थे तो इस बार भाजपा के कालूलाल गुर्जर को हार का सामना करना पड़ा। उपमुख्य सचेतक मदन राठौड़ (भाजपा) का टिकट कट गया। इस बार संसदीय कार्यमंत्री राजेन्द्र राठौड़ चुरू से निर्वाचित हुए है। पिछले चुनाव में कांग्रेस के शांति धारीवाल कोटा में पराजित हो गए थे।

इस चुनाव में सर्वाधिक और न्यूनतम वोटों के अंतर से जीत का रिकार्ड भाजपा उम्मीदवारों ने बनाया है। विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल सर्वाधिक 74 हजार से अधिक मतो से विजयी हुए तो भाजपा के जब्बर सिंह सांखला ने आसींद से मात्र 154 मतों के अंतर से सफलता मिली। यह दोनो उम्मीदवार भीलवाड़ा जिले से चुने गये है। राजस्थान में लगभग एक दर्जन ऐसे निर्वाचन क्षेत्र है जहां के मतदाता जीत के अंतर को न्यूनतम रखने मे कंजूसी करते हैं। इस बार भाजपा के तीन तथा एक अन्य महज 500 वोटों के अंतर से चुनाव जीते है। भाजपा के चार तथा कांग्रेस के तीन उम्मीदवारों को पांच सौ से एक हजार के अंतर से तथा एक से तीन हजार के अंतर से भाजपा के दो कांग्रेस के तीन प्रत्याशियों को जीत दर्ज करने में सफलता मिली है। भाजपा के आठ, कांग्रेस के सात और पांच अन्य प्रत्याशी तीन से पांच हजार के अंतर से चुनाव जीते हैं। पांच से दस हजार के अंतर से चुनाव जीतने वालो में भाजपा के 13 कांग्रेस के पन्द्रह और अन्य चार प्रत्याशी है। भाजपा के 43 कांग्रेस के 72 तथा अन्य 16 प्रत्याशियों ने दस हजार से अधिक अंतर से जीत दर्ज की है।

पिछले बीस सालों से राजस्थान में सत्ता परिवर्तन के ट्रेंड को देखते हुए कांग्रेस सांसद डॉ. रघु शर्मा ने अजमेर जिले में केकड़ी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लडऩा मुनासिब समझा। उन्हे चुनाव कैम्पेन समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। गत जनवरी माह में अजमेर, संसदीय क्षेत्र में हुए उपचुनाव में जीत दर्ज कर डॉ.रघु शर्मा ने संसद की चौखट चूमने का सपना तो साकार कर लिया। वह दो बार जयपुर लोकसभा सीट पर चुनाव हार चुके हैं। अलवर संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव में कांग्रेस के डॉ.कर्ण सिंह यादव विजयी हुए थे। उन्हे पार्टी ने जिले के किशनगढ़बांस विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी बनाया लेकिन वह तीसरे स्थान पर लुढ़क गये।

3वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में ऐन मौके भाजपा के टिकट पर बाड़मेर-जैसलमेर संसदीय क्षेत्र मे भाजपा के दिग्गज नेता पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंत सिंह को पराजित करने वाले कर्नल सोनाराम ने भी इस बार बाड़मेर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा लेकिन वह कांग्रेस के मेवाराम जैन से पराजित हो गए। जैन ने तिकड़ी जीत दर्ज की है।

दौसा से भाजपा सांसद और प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक हरीश मीणा ने भी कांग्रेस के सत्ता में लौटने की आहट को भांपते हुए अप्रत्याशित रूप से कांग्रेस का दामन थामा और देवली उनियारा विधानसभा सीट पर चुनाव जीतने में कामयाब हो गये। हरीश मीणा ने दौसा में अपने बड़े भाई और पूर्व केन्द्रीय मंत्री नमोनारायण मीणा को पराजित किया था। इस बार बड़े भाई उनके चुनाव प्रचार में सक्रिय हुए। कांग्रेस से सांसद रहे कोटा के पूर्व राजघराने के इज्यराज सिंह इस बार विधानसभा चुनाव लडऩे के इच्छुक थे। लेकिन कांग्रेस से बात नहीं बनी। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ खिचड़ी पकने पर इज्यराज सिंह की पत्नी कल्पना सिंह को कोटा के लाडपुरा से भाजपा विधायक रहे भवानी सिंह राजावत का टिकट काटकर लड़ाया गया और वह चुनाव जीत गई।

चुनाव नतीजों ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे मंत्रिमण्डल का चेहरा बेनकाब कर दिया। झालावाड़ के झालरापाटन क्षेत्र से विधानसभा के लिए वर्ष 2003 से लगातार निर्वाचित होती आयी वसुंधरा राजे ने इस बार चुनावी चौका तो लगाया लेकिन शिव (बाड़मेर) से विधायक मानवेन्द्र सिंह ने कांग्रेस का दामन थामकर उन्हे अधिक रन बनाने नहीं दिये। पिछली बार 64.47 फीसदी वोट हासिल करने वाली वसुंधरा  को 54.64 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। गृहमंत्री गुलाब चन्द कटारिया न उदयपुर से लगातार चौथी जीत दर्ज कर कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रही पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. गिरिजा व्यास को पराजित कर 1985 में हुई हार का हिसाब चुकता किया। कटारिया को 47.32 प्रतिशत वोट मिले। आठवी बार विधायक बने कटारिया 2008 में 58.94 प्रतिशत मत प्राप्त कर चुके हैं। वसुंधरा के मुख्य सलाहकार रहे यातायात और सार्वजनिक निर्माण मंत्री युनूस खान को टोंक में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के मुकाबले शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा। युनूस को 54 हजार 861 वोट मिले और वह 54 हजार 179 मतों से पराजित हुए। युनूस नागौर जिले की अपनी डीडवाना सीट से लडऩे के इच्छुक थे। वसुंधरा राजे के खिलाफ कांग्रेस द्वारा मानवेन्द्र सिंह को चुनाव मैदान में उतारने की रणनीति के जवाब में भाजपा ने पायलट को घेरने की खातिर विधायक अजीत सिंह मेहता का टिकट काटकर नामांकन के आखरी दिन पार्टी के एक मात्र मुस्लिम चेहरे के रूप में युनूस को खड़ा किया। युनूस खान की उम्मीदवारी को हिन्दुत्व कार्ड में मुस्लिम टीका के रूप में जाना गया। इसी तरह खाद्यमंत्री बाबूलाल वर्मा को बूंदी के केशोरायपाटन की जगह बांरा अटरू से खड़ा किया गया। वह भी चुनाव हार गये। लेकिन रामगंज मंडी के स्थान पर केशोरामपाटन लाई गई भाजपा विधायक चन्द्रकांता मेघवाल चुनाव जीत गई। बारां जिले के अंता निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस के पूर्व मंत्री प्रमोद जैन माया ने कृषि मंत्री प्रभु लाल सैनी को पटकनी दी। जल संसाधन मंत्री डॉ. राम प्रताप पर्यावरण वन मंत्री गजेन्द्र सिंह खींवसर सहकारिता मंत्री अजय सिंह, स्वायत्त शासन मंत्री श्रीचंद कृपलानी, पर्यटन मंत्री, श्रीमती कृष्णेन्द्र कौर खान मंत्री सुरेन्द्र पाल सिंह, स्वास्थ्य राज्य मंत्री बंशीधर खण्डेला, ओटाराम देवासी राजस्व मंत्री  अमराराम भी पराजित हो गये। भाजपा के परम्परागत जयपुर में सामाजिक न्याय मंत्री डॉ.अरूण चतुर्वेदी को पुराने प्रतिद्वंदी शहर कांग्रेस अध्यक्ष प्रताप सिंह खाचरियावास से तथा पूर्व केन्द्रीय मंत्री लालचंद कटारिया से राजपाल सिंह शेखावत को मात मिली। चिकित्सा मंत्री कालीचरण सराफ को कांग्रेस प्रवक्ता डॉ.अर्चना से कड़े संघर्ष में महज 1704 वोटो से सफलता मिली। मालवीय नगर क्षेत्र में नोटा वोट की संख्या अधिक थी। पिछली बार सराफ ने अर्चना को 48 हजार 718 मतों से हराया था। चुरू में पिछली बार 24 हजार मतों से जीतने वाले पंचायत मंत्री राजेन्द्र राठौड़ को महज 1850 मतों की जीत मिली। राजसमंद मे किरण माहेष्वरी अजमेर में वासुदेव देवनानी और अनिता भदेल तथा बाली (पाली) में पुष्पेन्द्र सिंह चुनाव जीतने में सफल रहे। लेकिन जीत का अंतर कम रहा।

टिकट कटने पर जन स्वास्थ्य अभियंात्रिकी मंत्री सुरेन्द्र गोयल (सोजत) खाद्य मंत्री हेमसिंह भडाना (थानागाजी) देवस्थान राज्यमंत्रंी राजकुमार रिणवा (रतनगढ़) और धन सिंह रावत ने बांसवाड़ा जिले में पार्टी से बगावत कर चुनाव लड़ा किन्तु किसी को सफलता नहीं मिली। श्रममंत्री डॉ. जसवंत गुर्जर (बहरोड़) जनजाति विकास मंत्री नंदलाल मीणा (प्रतापगढ़) ने चुनावी राजनीति से सन्यास लेकर अपने पुत्रों को टिकट दिलवाया लेकिन दोनो विधानसभा पहुंचने में नाकामयाब रहे। वंशवाद और परिवारवाद की इस फेहरिस्त में भगवा रंग की चमकी फीकी रही। भाजपा ने नसीराबाद से स्वर्गीय सांवरलाल जाट के पुत्र रामस्वरूप लाम्बा, लाडपुरा कोटा से कल्पना सिंह मुण्डावर (अलवर) विधायक स्व. धर्मपाल चौधरी के पुत्र मंजीत चौधरी, बीकानेर पूर्व से विधायक सिद्धि कुमारी को पुन: चुनाव मैदान में उतारा और सभी विधानसभा की चौखट चढऩे में सफल रहे। पिछले चुनाव में राजपा के बैनर पर केवल चार विधायकों को जिताने वाले मीणा समुदाय के दिग्गज नेता विधायक डॉ. किरोड़ी लाल मीणा भाजपा में शामिल होकर राज्यसभा सदस्य बने। इस चुनाव में उनकी पत्नी गोलमा देवी और भतीजे राजेन्द्र मीणा भी पराजित हुए। पूर्व मंत्री देवी सिंह भाटी की पुत्रवधू पूनम कंवर, विधायक कैलाश भंसाली के भतीजे अतुल भंसाली, पूर्व मंत्री स्व. डॉ. दिगम्बर सिंह के पुत्र डॉ. शैलेश सिंह, विधायक सुंदर लाल काका के बेटे कैलाश मेघवाल, कांग्रेस के पूर्व मंत्री बनवारी लाल शर्मा के पुत्र अशोक शर्मा भी चुनावी दौड़ में पराजित हो गए।

कांग्रेस भी परिवारवाद से अछूती नहीं रही। पूर्व मंत्री हीरालाल इंदौरा के पुत्र कुलदीप पूर्व जिला प्रमुख सहदेव शर्मा के पुत्र प्रशांत शर्मा पूर्व विधायक जयनारायण बैरवा के पुत्र रीतेश बैरवा भी चुनाव में पराजित हुए। चुरू में राजेन्द्र राठौड़ ने मकबूल मण्डेलिया के बाद उनके पुत्र रफीक को हराया। कोटा के लाडपुरा में पराजित हो चुके नइमुद्दीन गुडडू ने इस बार पन्नी गुलनाज को चुनावी दाव पर लगाया लेकिन वह भाजपा की कल्पना सिंह से पराजित हो गई। पूर्व मंत्री स्व. गुलाब सिंह शक्तावत के पुत्र गजेन्द्र सिंह पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व. डॉ. अबरार अहमद के पुत्र दानिश अबरार, पूर्व मंत्री प्रद्युम्न सिंह के पुत्र रोहित बोहरा, पूर्व मंत्री महिपाल मदेरणा की पुत्री दिव्या, पूर्व विधायक मलखान विश्नोई के पुत्र महेन्द्र चुनाव जीतने वालो की जमात में शामिल है।

 

जयपुर से गुलाब बत्रा

 

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