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‘युग पुरूष’ मेरे अटल जी

‘युग पुरूष’ मेरे अटल जी

यह कल-कल छल-छल बहता यह पुण्य प्रवाह हमारा समय अपनी अबाध गति से चलता है। समय के अपने प्रवाह में कभी कोई अन्तर नही आता। समय की प्रत्येक धारा का अपना-अपना एक लक्ष्य होता है, जो अपरिवर्तनीय है। अनगनित लोग हैं जो अपने होने की एक ‘दस्तक’ देते हैं, परन्तु कुछ लोग समय के प्रवाह में बह जाते हैं और बहते-बहते अतीत के असीम अंधकार में विलीन हो जाते हैं। परन्तु कुछ व्यक्तित्व ऐसे भी होते हैं जो समय की धारा को परिवर्तित करने का सामथ्र्य रखते हैं। वह लकड़ी के लट्ठे की तरह बहते नहीं, बल्कि बहाव को अपने अनूकल बहाने में सक्षम होते हैं। धाराएं उनका अनुसरण करती है। ऐसे ही लोग होते है- ‘युगपुरूष’। वे समय के कपाल पर एक नयी राह बन कर जीते हैं, कभी देह-सहित कभी देह-रहित समय की धारा इन्हे केवल स्मरण ही नही रखती बल्कि अपनी धाराओं पर इनका नाम स्वर्ण-अक्षरों में लिख लेती हैं। युगातीत न जाने कितने महापुरूषों की यादें बीते युग के साथ लोप हो जाती हैं। विस्मरण हो जाती हैं परन्तु ‘युगपुरूष’ प्रत्येक युग में एक नए अन्दाज में नये-नये रूप में याद किए जाते हैं। कभी वो मर्यादा पुरूषोत्तम होते हैं, वह बीते युग के अवतार कहलाते है। ऐसे ही मेरे अटल जी जो भारतीय क्षितिज पर एक सितारा बन कर चमके। वह ध्रुव तारे की तरह युगों-युगों तक भारतीय राजनीति की एक नयी धारा के रूप में सदैव प्रवाहमान रहेंगे, कभी ‘कवि’ रूप में तो कभी सभी को एक माला मे पिरो कर रखने वाले एक सक्षम धागे के रूप में व कभी प्रखर विचार अमिट छाप छोडऩे वाले कुशल-वक्ता के रूप में, कभी दृढ़ता के प्रतीक के रूप में, कभी सिद्धान्त के रूप में, कभी निश्छल अबोध में हंसी-मजाक व तत्काल हाजिर-जवाबी के प्रतीक रूप में न जाने कितने रूपों में यह जग उन्हें याद रखेगा। बहरहाल, एक राष्ट्र व श्रेष्ठ प्रशासक के प्रतीक के रूप में अटल जी सदैव अविस्मरणीय रहेंगे। यूं तो असंख्य कार्यकर्ताओं को अटल जी के साथ उनके नेतृत्व में कार्य करने का अवसर मिला है। वस्तुत: अटल जी के जीवन का पूर्णत: मूल्यांकन करना संभव है या नहीं मैं कुछ नहीं कह सकता परंतु मुझे कुछ समय व पल उनके सान्निध्य में बिताने का गौरवशाली अवसर मिला, उन पलों की स्मृति को शब्द देने का प्रयास कर रहा हूं।

अटल जी के प्रेरणादायी शब्दों को सुनने का अवसर जिन लोगों को मिला वे उन शब्दों की सरलता, गंभीरता और धाराप्रवाह-प्रभावी विचार प्रतिपादित करने की उनकी छवि से परिचित हैं। वे मुक्त हृदय से विचार निधि के मोती जब बिखेरते थे तो कठिन से कठिन वैचारिक भंवर में राह की तरंग झंकृत होने लगती थी। बोझिल से बोझिल समस्याओं को तर्कपूर्ण ढ़ंग से तार-तार कर देना और कुशल एकाग्रता से ताने-बाने पिरोकर सबको मंत्रमुग्ध कर सबको सुघड़, सुन्दर व अनुगामी बना देने की क्षमता उनके व्यक्तित्व की विशेषता थी। यही कारण है कि कभी एक थे हम, हुए आज इतने, लक्ष्यभेदी बाण बन कर राष्ट्र व जग में केन्द्र बिन्दू के रूप में प्रतिष्ठित होते जा रहे हैं। अपने सही विचार को सब का विचार बनाकर व अपने पथ का दृढ़-निश्चयी पथिक बनाकर साथ-साथ चलाना और अपने से आगे बढ़ाकर खड़ा करने की उनकी अद्वितीय क्षमता कला का ही परिणाम है कि उनके विचारों की पताका को लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी उनके समान अटल पताका फहराते हुए दिखाई दे रहे हैं।

मेरा पहला परिचय श्रद्धेय अटल जी से तब हुआ जब मैं संघ का प्रचारक था और सन् 1984 में प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की हत्या हो चुकी थी, परन्तु मृत्यु घोषित नही हुई थी। उनके शव को अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान में ले जाया जा चुका था। देश में, दिल्ली में श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या की अफवाह फैल चुकी थी। श्रीमान् कौशल किशोर जी (तत्कालीन दिल्ली) हरियाणा प्रान्त-प्रचारक ने मुझे अटल जी के पास भेजा कि मैं पूछ कर बताऊं कि क्या वास्तविक रूप से इन्दिरा जी की हत्या हो चुकी है। और यदि हां, तो क्या-क्या एहतियात ले लेनी चाहिए। मैं श्रद्धेय अटल जी को मिलने 11-अशोक रोड कार्यालय पर जा कर मिला तथा मैंने अटल जी को अपना परिचय देकर मा. कौशल किशोर जी का सन्देश उन्हें दिया। उन्होंने मुझे इतना जवाब देकर भेज दिया कि हम पता कर रहे हैं। मैं स्वयं ही झंडेवालान कार्यालय आकर सारी परिस्थिति को बताता हूं।

मैं 1989 में संघ-प्रचारक जीवन से वापिस लौटा और 1991 में मुझे भाजपा में काम करने के लिए भेजा गया तब वर्तमान में गुजरात के राज्यपाल श्री ओम प्रकाश कोहली जी को दिल्ली प्रदेश का नया-नया अध्यक्ष बनाया गया था। मुझे कहा गया कि मुझे श्री कोहली जी की टीम में रह कर काम करना है। श्री कोहली जी ने मुझे अपनी टीम में लेेकर दिल्ली के चार जिलों का प्रभारी बना दिया।

इस बीच कालक्रम में श्री कोहली जी का कार्यकाल पूरा हो चुका था और श्री केदार नाथ साहनी जी पुन: प्रदेश अध्यक्ष बन चुके थे। उन्होंने भी मुझे अपनी टीम में कार्य करने का अवसर दिया और उनकी टीम का स्नेह व कृपापात्र कार्यकर्ता रहा। इस बीच में अखिल भारतीय स्तर पर अनेकोनेक प्रशिक्षण वर्ग आयोजित हो रहे थे। मुझे इस दिशा में प्रशिक्षण वर्ग का समय-समय पर दायित्व मिलता रहा। 1996 में अटल जी की 13 दिन की सरकार गिरने के बाद जब 1998 में पुन: अटल जी की सरकार बनी तो देश के सभी सांसदो का एक प्रशिक्षण वर्ग दिल्ली के हरेवली ग्राम के समीप हरियाणा के झिंझोली ग्राम में स्थित सूर्या फार्म हाउस पर आयोजित हुआ। प्रशिक्षण वर्ग की व्यवस्थाएं आदि देखने हेतु तत्कालीन केन्द्रीय महामंत्री श्री प्रमोद महाजन, श्री गोविन्दाचार्य जी एवं प्रदेश अध्यक्ष श्री केदार नाथ साहनी जी के साथ आए। क्योंकि उन दिनों इन क्षेत्रो का दायित्व मेरे पास था अत: श्री साहनी जी ने मुझे भी शिविर स्थल पर बुलवा लिया। आदरणीय श्री गोविन्दाचार्य जी से मेरा पुराना परिचय था। तो वहां उन्होंने मुझे श्री साहनी जी के परामर्श से उन सांसदो के प्रशिक्षण शिविर का व्यवस्था प्रमुख बना दिया। तत्पश्चात श्री गोविन्दाचार्य जी के दिशा निर्देशानुसार अपेक्षित सभी समुचित व्यवस्थाएं ठहरने से लेकर नित्य दिनचर्या व अन्य व्यवस्था की देखरेख की जिम्मेदारी मेरी थी। शिविर के पहले ही दिन श्री गोविन्दाचार्य जी ने मेरा व अन्य व्यवस्थापकों का परिचय करा कर मुझे सभी सांसदो को शिविर स्थल की जानकारी देकर व कौन-कहां ठहरेगा आदि की सूचना व दिनचर्या की जानकारी देने को कहा, तो मैंने प्रशिक्षण वर्ग सम्बन्धी समुचित सूचनाएं सभी सांसदों को दीं। मंच पर श्रद्धेय अटल जी व मा. लालकृष्ण अडवाणी जी विराजमान थे।

मेरी सूचना देने के बाद शिविर गीत हुआ और आ. अटल जी का उद्घाटन भाषण हुआ। तत्पश्चात मैं श्रद्धेय अटल जी को उनके आवास तक छोडऩे हेतु उनके साथ गया। उनके आवास में उन्हें छोड़कर मैं जैसे ही जाने लगा तो अटल जी ने आवाज लगा कर कहा: और कौशल दूत प्रात: चाय कितने बजे मिलेगी? मैं उनके मुंह की तरफ अवाक रह कर देखता ही रह गया कि 1984 में घटी घटना का उन्हें आज तक स्मरण है। झण्डेवालान कार्यालय से एक कार्यकर्ता प्रान्त प्रचारक श्री कौशल जी का संदेश लेकर मिलने आया था। अटल जी के इस एक वाक्य ने मुझे जो अपनेपन का अहसास दिया वह अहसास आज तक मेरे मन में ज्यों का त्यों बना हुआ है। उनके विनोदी स्वभाव व अपनेपन से कहने का अंदाज मुझ सहित न जाने कितनों को अपनी विचारधारा को साथ लेकर आगे बढऩे की प्रेरणा का पथ बना गया और जब चले तो उस पथ पर चलते ही जा रहे हैं।

क्योंकि अटल जी 1998 में पुन: प्रधानमंत्री बन चुके थे, उन्हें जैड-प्लस सिक्योरिटी मिलने के कारण भी तथा देश-विदेश की व्यस्तता बढऩे के कारण भी पहले की तरह मिलना-मिलाना संभव नहीं था। परंतु यदा-कदा बड़े कार्यक्रमों में ही वह भी दूर से ही देखने का प्रसंग ही संभव हो पा रहा था क्योंकि स्वभावगत मैं भी अनाधिकार चेष्टा करने का आदि नहीं था। ऐसे ही काल अपनी गति से आगे बढ़ रहा था। ऐसे में एक दिन समाचार पत्र में खबर छपी कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ मिलने के लिए दिल्ली आ रहे हैं। मन में भारत विभाजन की कसक थी। मन में आया कि अटल जी कवि हृदय हैं तो मुशर्रफ के साथ कोई ऐसा समझौता ना हो जाए, तो रात्रि में ही मैंने बैठ कर देश विभाजन पर कुछ पंक्तियां लिख दीं। मैं चाहता था कि मुशर्रफ साहब के आने से पहले श्री अटल जी यह कविता जरूर पढ लें। यद्यपि कविता मैंने लिख तो दी परंतु जरूरत थी कि इसे अटल जी तक कैसे पहुंचाया जाए। डाक से मैं भेजना नहीं चाहता था तो अचानक पता लगा कि हमारे क्षेत्र की उस समय की पार्षद देवाज्ञा भार्गव मिलने जा रही हैं। मैं उसे निकनेम-छोटी के नाम से बुलाता हूं। मैंने देवाज्ञा केा कहा कि छोटी तुम अटल जी के पास जा रही हो-यह मेरी कविता उन तक पहुंचा दो। और देवाज्ञा ने वह कविता श्रद्धेय अटल जी को दी और पढ़कर भी सुनाई। कालान्तर में लगभग एक वर्ष बाद अटल जी से आमना-सामना हो पाया तो छूटते ही कहने लगे ‘अटल जी तो अटल हैं अब तो माकूल फरमाएं’ – मेरी उस कविता की एक पंक्ति दोहरा दी।

मैं तो यह सुन कर जैसे अवाक उनको देखता ही रह गया और मन में विचार आया कि यूं ही नहीं देश-विदेश के बड़े नेता अटल जी को अपना नेता मानते हैं। ऐसे थे मेरे अपने ‘युगपुरूष’ अटल जी! युग-युगों तक यह देश उनके सुशासन के कारण उनको स्मरण रखेगा।

तिलकराज कटारिया

 (लेखक नेता सदन, उत्तरी दिल्ली नगर निगम, हैं)

 

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