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दीपक राग लुप्त हुआ, संस्कृत से अनभिज्ञता है कारण!

दीपक राग लुप्त हुआ, संस्कृत से अनभिज्ञता है कारण!

तानसेन दीपक राग गाकर दीप को जला दिया करते थे। उनके मलहार राग से आकाश में घटाएं घिर आती थीं, रिमझिम-रिमझिम वर्षा होने लगती थी, ऐसी अनेक दन्त कथाएं प्रचलित है। क्या दीपक राग वास्तव में गाया जाता था? फिर आज क्यों लुप्त हो गया है? प्रसिद्ध संगीत विशलेषख एस.बी. बब्बन जी का मत है कि

”जिस प्रकार  आज भैरव, मेघ, मालकोश आदि रागों को गाने-बजाने से उक्त प्रभाव नहीं होता, फिर भी वे गाए-बजाए जाते हैं, उसी प्रकार यदि दीपक राग भी व्यवहार में रहता, तो कौन सी हानि होती? कुछ भी हो, इसमें कोई गुप्त रहस्य अवश्य है, जो अनुसंधान का विषय है।’’

संगीत-शास्त्रानुसार दीपक राग भगवान शंकर के पूर्व-मुख से उत्पन्न हुआ है। जब यह राग गान्धार ग्राम में गाया जाता है, तो विशेष प्रभावोत्पादक सिद्ध होता है। इसका वर्ण लाल तथा सूर्य और अग्नि इसके देवता है। इस राग के प्रभाव से गायक का शरीर जलकर भस्मीभूत हो जाता है।

कुछ लोगों का विश्वास है कि दीपक राग के प्रभाव से दीपक प्रज्वलित हो उठता है। किन्तु यह धारणा गलत है, क्योंकि दीपक-जैसी चीज तो लंकादहन-सारंग राग के प्रभाव से ही प्रज्वलित हो सकती है।

दीपक के इस भयंकर दाहक प्रभाव के कारण ही प्रत्येक काल के गुणियों ने जानबूझकर उसकी ओर से उदासीनता दिखलाई, अतएव धीरे-धीरे इसका प्रचार कम होता गया। किन्तु तपोनिधि और सिद्धि-प्राप्त योगी और ऋषि गायक यदा-कदा इसे गा लेते थे और अपनी अध्यात्म-शक्ति के प्रभाव से इसके प्रभाव को नियन्त्रित कर देते थे। पंडित अहोबल द्वारा रचित संगीत-पारिजात के अनुसार दीपका राग भैरव ठाठ का औडुव-सम्पूर्ण राग है, अर्थात इसके आरोह में पांच और अवरोह में सातों स्वरों का प्रयोग होता है। शाग्र्ड दिव-कृत ‘संगीत-रत्नाकर’ के अनुसार ‘सम्पूर्णो दीपको जात:’ (दीपक सम्पूर्ण राग है), अर्थात इसके आरोहावरोह में सातों स्वरों का प्रयोग होता है।

‘नाद-विनोद’ के अनुसार यह कल्याण ठाठ का पाडव-पाडव राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह, दोनों में छह-छह स्वरों का प्रयोग होता है। कर्नाटक संगीत के अनुसार दीपक के विभिन्न भेद हैं, जो कामवद्र्धनी, मनोहरी और वरुणप्रिया ठाठ के अन्तर्गत पाए जाते हैं। अतएव दीपक राग की शुद्धता का निर्णय करना जटिल समस्या है।

दीपका राग के प्रभाव से शरीर का भस्मीभूत हो जाना कहां तक सम्भव है, शरीर विज्ञान के दृष्टिकोण से हम इस पर विचार करने का प्रयत्न करेंगे। मानव-शरीर में गले के नीचे कंठनाल से सम्बद्ध एक नाड़ी शून्य ग्रन्थि होती है, जिसे चुल्लिक ग्रन्थि (थाइराइड ग्लैंड) कहते हैं।

आयुर्वेद के अनुसार यही ग्रन्थि शरीर की उष्णता तथा कामना, प्रेम, क्रोध, स्नेह, घृणा आदि विभिन्न विकारों एवं मानसिक वृत्तियों के जागृत होने का मूल कारण है। इस ग्रन्थि से एक प्रार का रस-स्नाव होता है, जिसे ‘थाइराक्सिन’ कहते हैं। शरीर-विज्ञान के विख्यात डाक्टर लू बमौन, एमडी ने उक्त ग्रन्थि के रस-स्नाव के विषय में अपनी पुस्तक ‘दी ग्लैंड रेगुलेटिंग पर्सनेलिटी’ नामक ग्रन्थ में लिखा है, जिसका सारांश इस प्रकार है –

चुल्लिक ग्रन्थि (थाइराइड ग्लैंड) ही शरीर में तापमान (बॉडी-टेम्परेचर) तथा स्नेह, घृणा, वैर आदि भावनाओं एवं वृत्तियों को उत्पन्न और जागृत करती है। इस ग्रन्थि के द्वारा ‘थाइराक्सिन’ रस का स्नाव ठीक उसी अनुपात में होता रहता है, जितना शरीर की उष्णता और साधारण स्थिति को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। इस स्नाव की गति न्यूनाधिक होने के कारण शारीरिक परिस्थितियों और मानसिक वृत्तियों में भी अन्तर होता रहता है। इस रस का स्नाव जब एक परिमित सीमा का अतिक्रमण कर अधिक हो जाता है, तो शरीरस्थ उष्णता बढऩे लगती है। अतएव प्रकृति ने इस रस-स्राव की गति को ऐसे साधनों द्वारा नियन्त्रित कर रखा है, जिससे यह उस निश्चित सीमा का अतिक्रमण न कर सके तथा साधारण स्थिति को सम बनाए रखे। शरीर को रक्त परिभ्रमण (ब्लड-सरकुलेशन) के कारण अथवा किसी भावना या वृत्ति की जागृति के कारण यदि थाइराक्सिन रस का प्रवाह अधिकाधिक मात्रा में होता रहे, तो उन मांसपेशियों मेें पहुंचने वाली शक्ति का दबाव (प्रेशर) उस ब्वायलर की स्थिति को प्राप्त हो जाता है, जिसमें निरापद उपद्वार (सेफ्टी-वाल्व) का हो। ऐसी स्थिति में शरीरधारी की कंठनाल के पास से अग्नि प्रस्फुटित होकर शरीर को भस्मीभूत भी कर सकती है। किन्तु प्रकृति ने शरीर में ही उस स्नाव और ताप पर नियन्त्रण रखने के निमित्त ऐसी सुन्दर योजना बना रखी है, जिससे मांसपेशियों को उतना ही ताप प्राप्त होता रहे, जितना कि स्वास्थ्य को सम रखने के लिए आवश्यक है। अतएव चुल्लिक ग्रन्थि से अधिक रस-स्नाव होने पर शरीरांग से अग्नि का प्रस्फुटित होकर ज्वलित हो उठना नितान्त सम्भव है। इस स्थिति को डा. वर्मीन महोदय ने ‘हाइपरथाइरीडिज्म’ का सिद्धान्त कहा है। अन्य विद्वान डाक्टरों ने भी इस ग्रन्थि-विज्ञान का अनुमोदन तथा समर्थन किया है।

हमारे शरीर के अन्दर एक विशेष प्रकार की अग्नि का निवास है, जिसके सम्बन्ध में भगवान कृष्ण ने गीता में संकेत किया है कि ‘मंै ही वैश्वानर होकर शरीर में स्थित हूं और उसके भीतर चतुर्विध अन्न को पचाता हूं।’’ अस्तु, जो अग्नि अप्रकट रूप में शरीर में ही निवास करती है, यदि कारण-विशेष से प्रकट हो जाए, तो कोई आश्चर्य नहीं है।

भरत मुनि के सैकड़ों वर्ष पश्चात भी संगीतरत्नाकर श्री शांगदेव (1314 ई.) तथा संगीत सुधा-प्रणेता तंजोराधिपति श्री रघुनाथ (1614 ई.) के समय तक दीपका राग की गणना भारतीय संगीत के प्रमुख रागों में गई है। लेकिन कितने आश्चर्य की बात है कि हमारा यह लगभग 400 वर्ष पुराना प्रसिद्ध राग, आज नाममात्र में प्रसिद्ध रहकर, परियों की कहानियों में घटित-घटनाओं के समान केवल कौतूहल की वस्तु रह गया है। पर इसका ऐसा पतन क्यों और कैसे हुआ? इस प्रकार का ह्रास सिर्फ दीपका राग का हुआ है अथवा अन्य प्राचीन रागों का भी?

अब संगीत अधिकांश मुस्लिम गायकों की सम्पत्ति बन गया है और मुस्लिम गायकों की यह परम्परा संस्कृत से अनभिज्ञ थी। संगीत के ग्रंथ संस्कृत में होने से इनके लिये अगम तथा दुर्बोध थे। इन गायकों की एक विशेषता और थी, वे अपनी विद्या किसी दूसरे को देने में बड़ा संकोच करते थे, यहां तक कि अपनी बेटी के परिवार को भी विद्या देने में हिचकिचाहट दिखाते थे। परिणामस्वरूप ज्ञान की परम्परा नष्ट होती गई।

राग दीपक का निश्चित स्वरूप क्या है, इस विषय में विद्वान कोई एक मत निर्धारित नहीं कर पाये हैं, क्योंकि विभिन्न ग्रन्थों में इसके विभिन्न रूपों में दो रूप मुख्य माने गये हैं। पहला पूर्वी मेल से उत्पन्न दीपक तथा दूसरा बिलावलजन्य दीपक। संगीत सुधाकर (पृष्ठ 39) के अनुसार पूर्वजन्य राग दीपक का स्वरूप इस प्रकार है-

अबदीपका राग: स्यात्षडजजन्यासग्रहांशक:।

पंचम स्वरसंवादी आरोहे वर्जितर्षभ:।।

अवरोहे निगदितो निषाद स्वर वर्जित।

गीयते दीप-समये बुधै: षाडव षाडव:।।

‘तानसेन’ फिल्म में गाया गया दीपक राग बड़ा लोकप्रिय हुआ है। गीत है –

दिया जलाओ,

जगमग-जगमग दिया जलाओ

सरस सुहागन तेरे मंदिर में देख अंधेरा।

रूठ न जाए पिया तेरा, दिया जलाओ।

कुछ ग्रंथकारों ने पूर्वी मेलजन्य दीपक के स्वरों में निषाद को सर्वथा हीन मानकर दीपक को कल्याण मेल से उत्पन्न माना है।

बिलावल जन्य राग दीपक में श्री मल्लक्ष्य संगीत के अनुसार दोनों निषाद का प्रयोग होता है।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

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