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वेदों में सूर्यकिरण-चिकित्सा

वेदों में सूर्यकिरण-चिकित्सा

वेदों में प्राकृतिक चिकित्सा से संबंद्ध सामग्री पर्याप्त मात्रा में मिलती है। इसमें विशेष उल्लेखनीय है-

  1. सूर्यकिरण-चिकित्सा, २. वायु-चिकित्सा या प्राणयाम-चिकित्सा, ३. अग्नि-चिकित्सा, ४. जल-चिकित्सा, ५. मृत्-चिकित्सा, ६. यज्ञ-चिकित्सा, ७. मानस-चिकित्सा या मनोवैज्ञानिक चिकित्सा, ८. मन्त्र-चिकित्सा, ९. हस्तस्पर्श-चिकित्सा, 1०. उपचार-चिकित्सा। यहां केवल सूर्यकिरण-चिकित्सा विवेचन प्रस्तुत किया जा रहा है। वेदों में सूर्य को इस स्थावर और जंगम जगत की आत्मा कहा गया है-सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च। (ऋक्.1। 115। 1,यजु.7। 42, अथर्व.13। 2। 35,तैत्ति. सं.1। 4। 43। 1)। यह मंत्र ऋक्, यजु और अथर्व तीनों में आया है। प्रश्रोंपनिषद् में भी सूर्य को ‘प्राण:प्रजानाम्’ अर्थात मनुष्यमात्र का प्राण कहा गया है। मत्स्यपुराण का कहना है कि ‘आरोग्यं भास्करादिच्छेत्’ अर्थात यदि नीरोगता की इच्छा है तो सूर्य की शरण में जाओं। अतएव प्राचीन ऋषि-मुनि और आचार्यो ने सूर्योपासना तथा सूर्य नमस्कार आदि की विधि प्रचलित की।

वेदों में उदित होते हुए सूर्य की किरणों का बहुत महत्व वर्णित किया गया है। अथर्ववेद के एक मंत्र में कहा गया है कि उदित होता हुआ सूर्य मृत्यु के सभी कारणों अर्थात सभी रोगों को नष्ट करता है। 1. उदित होते हुए सूर्य से अवरक्त (हलकी लाल- Infrared) किरणें निकलती हैं। इन लाल किरणों में जीवनी शक्ति होती है और रागों को नष्ट करने कि विशेष क्षमता होती है। अतएव ऋग्वेद में कहा गया है कि उदित होता हुआ सूर्य हृदय के सभी रोगों को, पीलिया और रक्ताल्पता (Aaemia)- को दूर करता है।  २. अर्थवेद में भी इस बात की पुष्टि करते हुए कहा गाया है कि सुर्य की अवरक्त किरणें हृदय की बीमारियों को तथा खून की कमी को दूर करती हैं।

प्रात: सूर्योदय के समय पूर्वाभिमुख होकर संध्योपासना और हवन करने का यही रहस्य है कि ऐसा करने से सूर्य की अवरक्त किरणें सीधे छाती पर पड़ती हैं और उनके प्रभाव से व्यक्ति सदा नीरोग रहता है।

सूर्यकिरण-चिकित्सा हेतु रोगी उदित होते हुए सूर्य के सम्मुख खड़े होकर या बैठकर सूर्य की किरणों को शरीर पर सीधे पडऩे दे। ऋतु के अनुसार शरीर को खुला रखे या हलका कपड़ा पहने, जिससे किरणों का प्रभाव पूरे शरीर पर पड़ सके। कम-से-कम पंद्रह मिनट सूर्य के सम्मुख रहे। रोग और आवश्यकता के अनुसार यह समय आधा घंटा तक बढ़ा सकते हैं। इसके बाद सूर्य की किरणें तीव्र हो जाती हैं, अत: विशेष लाभ नहीं होगा। सूर्योदय के समय की किरणों का जो लाभ होता है, वह अन्य समय संभव नहीं है।

इस विषय में अथर्व वेद के नौवें काण्ड का आठवां सुक्त विशेष महत्व का है। इसमें बाईस मंत्रों में सूर्यकिरण-चिकित्सा से ठीक होने वाले रोगों की एक लंबी सूची दी गयी है और कहा गया है कि उदित होता हुआ सूर्य इन रोगों को नष्ट करता है। 4. इस सूची में निर्दिष्ट प्रमुख रोग हैं- सिरदर्द, कान दर्द, रक्त की कमी, सभी प्रकार के सिर के रोग, बहरापन, अंधापन, शरीर में किसी प्रकार का दर्द या अकडऩ, सभी प्रकार के ज्वर, पीलिया (पाण्डुरोग), जलोदर, पेट के विविध रोग, विषका प्रभाव, वातरोग, कफज रोग, मूत्ररोग, आंख की पीडा, फेफड़ों के रोग, हड्डी-पसली के रोग, आंतों और योनि के रोग, यक्ष्मा (ञ्ज.क्च.), घाव, रीढ़ की हड्डी, घुटना और कूल्हे के रोग आदि। एक अन्य सुक्त में ‘सूर्य: कृणोतु भेषजम्’ सूर्य इन रोगों को ठीक करे, कहकर अपचित् (गण्डमाला), गलने और सडऩे वाली बीमारियां तथा कुष्ट आदि रोगों का उल्लेख किया गया है। 5.अथर्व वेद का कथन है कि सूर्य के प्रकाश में रहना अमृत के लोक में रहने के तुल्य है।

  1. मृत्यु के बंधनों को यदि तोडऩा है तो सूर्य के प्रकाश से अपना संपर्क बनाये रखें।
  2. सूर्य शरीर को नीरोगता प्रदान करते हैं- सूर्यस्ते तन्वे शं तपाति। (अथर्व.8। 1। 5)

ऋग्वेद का कथन है कि सूर्य मनुष्य को नीरोगता, दीर्घायूष्य और समग्र सुख प्रदान करते हैं- सविता न: सुवतु सर्वतातिं सविता नो रासतां दीर्घमायु:।। (ऋक्.10। 36। 14) एक अन्य मंत्र में कहा गया है कि सूर्य की किरणें मनुष्य को मृत्यु से बचाती हैं-सूर्यस्त्वाधिपति- र्मृत्योरूदायच्छतु रश्मिभि:।। (अथर्व. 5। 30। 15) सूर्य की सात किरणों से सात प्रकार की ऊर्जा प्राप्त होती है- अधुक्षत् पिप्युषीमिषम् ऊर्जं सप्तपदीमरी:। सूर्यस्य सप्त रश्मिभि:।। (ऋक्. 8। 72। 16)

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सूर्य किरणों द्वारा चिकित्सा- इसके अनेक नाम प्रचलित हैं, जैसे सूर्य-चिकित्सा, सूर्यकिरण-चिकित्सा, रंग-चिकित्सा (Colour-therapy, choromo-therapy, chromotherapy) आदि। इस चिकित्सा में सूर्य की किरणों को शरीर पर सीधे लेकर रोग-निवारण या सूर्य की किरणों से प्रभावित जल, चीनी, तेल, घी, ग्लिसरीन आदि का प्रयोग करके रोगों का निवारण किया जाता है।

सूर्यकिरण-चिकित्सा का प्रसार- पाश्चात्य जगत् में इस चिकित्सा-पद्धति का आविष्कार और प्रचार जनरल पंलिझन होनने किया था। तप्पश्चात् डॉक्टर पेन स्कॉट, डॉक्टर राबर्ट बोहलेंड तथा डॉक्टर एडविन, बेबिट आदि ने इस चिकित्सा-पद्धति को आगे बढ़ाया। धीरे-धीरे यह विद्या फ्रांस और इंग्लैंड आदि देशों में फैली। अब इस विषय पर प्रचुर साहित्य उपलब्ध है। भारतवर्ष में विशेषरूप से हिंदी में इस चिकित्सा-पद्धति के प्रचार और उन्नयन का श्रेय श्रीगोविन्द बापू जी टोंगू और डॉक्टर द्वारकानाथ नारंग आदि को है। सम्प्रति हिंदी में इस विषय पर अनेक ग्रंथ प्राप्य हैं।

सूर्य की सात रंग की किरणें- सूर्य की किरणें सात रंग की हैं। ऋग्वेद 1 और अथर्ववेदम् में २ सूर्य की सात रंग की किरणों उल्लेख सप्तरश्मि, सप्ताश्व (सप्त अश्व) आदि शब्दों किया गया है।

इन सात रंग की किरणों का वैज्ञानिक दृष्टि से बहुत महत्व है। प्रत्येक किरण का अलग-अलग प्रभाव है। इनकी गति और प्रकृति भी भिन्न-भिन्न है। इन सात रंगों को मिला देने से सफेद रंग हो जाता है। इन सात रंग की किरणों से ही संसार के प्रत्येक पदार्थ को रूप-रंग प्राप्त होता है। इन सात किरणों के तीन भेद किये गये हैं- उच्च, मध्य और निम्न अर्थात गहरा, मध्यम और हल्का। इस प्रकार 7&3=21 प्रकार की किरणें हो जाती हैं। इनसे ही संसार के सारे रूप-रंग हैं। अथर्ववेद के प्रथम मंत्र में इसका वर्णन करते हुए कहा गया है कि ये 21 प्रकार की किरणें संसार में सर्वत्र फैली हुई हैं और ये ही सारे रूप-रंगों को धारण करती हैं-ये त्रिषप्ता: परियन्ति विश्वा रूपाणी बिभ्रत:। (अथर्व.1। 1। 1)

सात किरणों के नाम और प्रभाव- इन सात किरणों को अंग्रेजी और हिंदी में ये नाम दिये गये हैं- इनकी तरंग- दैघ्र्य (Wave length) और आवृति (Frequency) अलग-अलग है। अत: इनका प्रभाव भी पृथक्-पृथक् है। अपनी गति और प्रकृति के अनुसार ये विभिन्न रोगों को दूर करते हैं। इसकी संक्षिप्त रूपरेखा नीचे दी जा रही है। इन किरणों को संक्षेप में अंग्रेजी और हिंदी में ये नाम दिये गये हैं-(1) VIBGYOR (2) बै नी आ ह पी ना ला।

गति और प्रकृति के आधार पर नीचे से ऊपर वाली किरणें क्रमश: अधिक प्रभावशाली हैं। जैसे-लाल से अधिक नारंगी, उससे अधिक पीली और सबसे अधिक प्रभावशाली बैगनी है। अत: बैगनी से अधिक शक्तिवाली किरणों परा-बैगनी (Ultra-violet) किरणें और लाल से कम शक्तिशाली किरणों अवरक्त (Infra-red) किरणें कहते हैं।

वस्तुत: मूल रंग तीन हैं- लाल पीला और नीला। इनके मिश्रण से ही अन्य रंग बनते हैं। जैसे-लाल और नीले से बैगनी, नीले और सफेद से आसमानी, नीले और पीले से हरा, लाल और पीले से नारंगी।

सूर्य की सात रंग की किरणें के तीन परिवार किये गये हैं- 1. पीला, नारंगी, लाल २. हरा तथा ३. बैगनी, नीला, और आसमानी।

ओषधि-निर्माण-विधि- साधारणतया औषधि-निर्माण के लिये उसी रंग की कांच की साफ बोतल ली जाती है। विभिन्न रंग की बोतल न मिलने पर उस रंग का पतला कागज सादी शीशी पर पूरा चिपका दिया जाता है, अत: वह उस रंग का काम दे देती है। सात शीशी लेने की जगह प्रत्येक परिवार से एक-एक रंग लेने पर तीन बोतलों से काम चल जाता है। ये तीन रंग हैं- (1) नारंगी, (2) हरा तथा हरा वातज रोगों के लिए और नीला पित्तज रोगों के लिए है। इस प्रकार वात, पित्त और कफ-इन त्रिदोषज रोगों की चिकित्सा हो जाती है।

बोतलों को अच्छी तरह साफ करने के बाद उनमें शुद्ध जल भरा जाता है। बोतलों को कम-से-कम तीन अंगुल खाली रखे। तत्पश्चात उन्हें ढक्कन लगाकर बंद कर दे। शुद्ध जल से भरी इन बोतलों को धूप में छ: से आठ घंटे रखने पर दवा तैयार हो जाती है। धूप में बोतल को इस प्रकार रखे कि एक बोतल की छाया दूसरे रंग की बोतल पर न पड़े। रात्रि में बोतल को अंदर रख ले। इस प्रकार बनी हुई दवा को दिन में तीन या चार बार पिलावे। एक बार बनी दवा को चार या पांच दिन सेवन कर सकते हैं। पुन: दुबारा बोतल में दवा बना ले।

साधारणतया नारंगी रंग की दवा भोजन के बाद पंद्रह से तीस मिनट के अंदर लेनी चाहिए। हरे और नीले रंग की दवाएं खाली पेट या भोजन से एक घंटा पहले ले। हरे रंग की दवा प्रात: खाली पेट छ:-से आठ औंस ले सकते हैं। यह दवा विजातीय द्रव्यों को बाहर निकाल कर शरीर को शुद्ध करती है। इसका विपरीत प्रभाव नहीं होता।

दवा की मात्रा- आयु के अनुसार चाय वाली चम्मच से एक-से-चार बार में ले। साधारणतया दवा दिन में तीन या चार बार ले। तीव्र ज्वर आदि में आवश्यकतानुसार एक-एक घंटे पर भी दवा ली जा सकती है।

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विभिन्न रंगों की बोतलों के पानी का उपयोग

  1. लाल रंग- लाल रंग की बोतल का पानी अत्यंत गर्म होता है, अत: इसे पीना वर्जित है। इसको पीने से खूनी दस्त या उल्टी हो सकती है। इसका प्रयोग प्राय: मालिश करने या शरीर के बाहरी भाग में लगाने के काम आता है। यह आयोडीन से अधिक गुणकारी है।

यह रक्त एवं स्नायु को उत्तेजित करता है। शरीर में गर्मी बढ़ाता है। यह स भी प्रकार के वातरोग और कफ रोगों में लाभ देता है।

२. नारंगी रंग- यह रक्त संचार की वृद्धि करता है, मांसपेशियों को स्वस्थ रखता है और मानसिक शक्ति तथा इच्छाशक्ति को बढ़ाता है। बुद्धि और साहस को विकसित करता है। कफ-जन्य रोगों का नाशक है।

यह कफ-जन्य रोग खांसी, बुखार, निमोनिया, इनफ्लुएन्जा, श्वास रोग, क्षय रोग, पेट में गैस बनना, ह्दय रोग, गठिया, पक्षाघात, अजीर्ण, एनीमिया, रक्त में लाल कणों की कमी वाले रोगों के लिए लाभप्रद हैं। मां के स्तनों में दूध की वृद्धि करता है।

  1. पीला रंग- यह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ के लिए अत्युत्तम है। यह हल्का रेचक भी है। पाचन-संस्थान को ठीक करता है। यह ह्दय एवं उदर रोगों का नाशक है। इसकी प्रकृति उष्ण है, अत: पेचिश आदि इसे न ले।

यह पेट दर्द, पेट फूलना, कब्ज, कृमिरोग एवं मेदरोग, तिल्ली, ह्दय, जिगर और फेफड़े के रोगों में भी लाभप्रद है। यह युवा पुरूषों का तत्काल लाभ देता है। इसका पानी थोड़ी मात्रा में ही लेना चाहिए।

४. हरा रंग- यह प्रकृति का रंग है। समशीतोष्ण है। यह शरीर और मन को प्रसन्नता देता है। शरीर की मांसपेशियों का निर्माण करता है और उन्हें शक्ति देता है। मस्तिष्क और नाड़ी-संस्थान को बल देता है। रक्तशोधक है। यह वातजन्य रोग, टायफॉयड, मलेरिया आदि ज्वर यकृत् और गुर्दों की सूजन, सभी चर्म रोग, फोड़ा-फुन्सी, दाद, नेत्ररोग, मधुमेह, सूखी खांसी, जुकाम, बवासीर, कैंसर, सिरदर्द, रक्तचाप, एक्जिमा आदि रोगों में लाभप्रद है।

५. आसमानी रंग- यह शीतल है। पित्त-जन्य रोगों के लिए विशेष लाभकारी है। यह प्यास और आमाशयिक उत्तेजना को शांत करता है। यह अच्छा पोषक टॉनिक और एंटीसेप्टिक है। सभी प्रकार के ज्वरों के लिए रामबाण है। रक्त-प्रवाह को रोकता है। कफज रोगों में इसका प्रयोग न करे।

यह ज्वर खांसी, दस्त, पेचिश, संग्रहणी, दमा, सिरदर्द, मूत्र रोग, पथरी, त्वचा रोग, नासूर, फोड़े-फुंसी, मस्तिष्क आदि रोगों में लाभप्रद है।

६. नीला, गहरा नीला रंग- यह भी शीतल है। यह जीव मात्र को जीवन शक्ति देता है। यह शीतलता और शांती देता है। कुछ कब्ज करता है। शरीर पर इसकी क्रिया अतिशीघ्र होती है। यह अमाशय, अण्डकोश-वृद्धि, प्रदर, योनिरोग आदि रोगों में विषेश उपयोगी है। यह गर्मी के सभी रोगों को दूर करता है।

७. बैगनी रंग- इसके गुण प्राय: नीले रंग के तुल्य हैं। यह रक्त में लाल कणों की विद्धि करता है। खून की कमी को दूर करता है। क्षय-रोग में विशेष उपयोगी है। इससे अच्छी नींद आती है। उक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सूर्य वस्तूत: चर-अचर जगत् की आत्मा है। नीरोगता के लिए सूर्य शरण में जाना अत्युत्म है।

(साभार: कल्याण आरोग्य अंक)

पद्मश्री डॉ. श्रीकपिलदेवजी द्विवेदी

 

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