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इमरान की गुगली

इमरान की गुगली

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान मशहूर क्रिकेटर रहे हैं मगर वे डिप्लोमेसी को भी क्रिकेट का मैदान समझते हैं और गुगली बॉल फेंक देते हैं। इस बार करतारपुर कोरिडोर के मामले में ऐसा ही हुआ। तालिबानी कहलाने वाले इमरान अचानक शांतिदूत बन गए और करतारपुर कोरिडोर के लिए तैयार हो गए। मगर जानकार कहते हैं भारत पाक रिश्तों में तनाव की असली वजहों को दूर किए बिना उठाए गए दिखावटी कदमों का वही हश्र होता है जो 1999 की लाहौर बस यात्रा का हुआ था। उसके शुरू होने के बाद पाकिस्तान ने  कारगिल युद्ध थोपा और बस यात्रा बंद करनी पड़ी। इसलिए राजनीतिक विश्लेषकों को लग रहा है कहीं करतारपुर कोरिडोर का भी यही हश्र न हो। आखिर अचानक शांतिदूत बने इमरान खान कैसे इस असंभव को संभव बना लेंगे कि एक तरफ आतंकियों को पुचकारते रहेंगे और दूसरी तरफ भारत के साथ दोस्ती भी कायम कर लेंगे।

पिछले दिनों इमरान खान ने देश के करतारपुर में गरूद्वारा दरबार साहिब को भारत के गुरदासपुर जिले में स्थित डेरा बाबा नानक गुरूद्वारा से जोडऩे वाले बहुप्रतीक्षित गलियारे की आधारशिला रखी। करतारपुर में ही सिख धर्म के संस्थापक गुरू नानक देव जी ने अंतिम सांस ली थी। करतारपुर साहिब पाकिस्तान में रावी नदी के पार स्थित है और डेरा बाबा नानक से करीब चार किलोमीटर दूर है। भारतीय सीमा के गुरूदासपुर से सिर्फ 3 किलोमीटर दूर होने के बाद भी पवित्र गुरूद्वारे के दर्शन के लिए सिख समुदाय के लोगों को काफी परेशानी होती है। बॉर्डर पर दूरबीन लगाकर दर्शन करवाए जाते हैं। करतारपुर गलियारे से भारतीय सिख श्रद्धालु करतारपुर में स्थित गुरूद्वारा दरबार साहिब तक बिना वीजा यात्रा कर सकेंगे।

दरअसल भारत और पाकिस्तान ने इसका रास्ता निकाला है और करतारपुर पहुंचने के लिए एक अलग कॉरिडोर बनाने का फैसला लिया है। इस गलियारे के छह महीने के भीतर बनकर तैयार होने की उम्मीद है। लेकिन अब सिख समुदाय के लोग एक दूसरे से बिना किसी रोक-टोक के मिल सकते हैं। ठीक ऐसा ही जर्मनी में भी हुआ था। एक दिन वेस्ट बर्लिन और ईस्ट बर्लिन को अलग करने वाली यह दीवार तोड़ दी गई। यह बात किसी और ने कहा होता तो शायद इतनी तरजीह ना मिलती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी तुलना बर्लिन दीवार गिरने से कर दी तो लोगों को अचानक भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में गर्मजोशी की आहट दिखने लगी।

पाकिस्तान यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि उसकी पहल पर कोरिडोर बन रहा है मगर यह सही नहीं है। भारत ने इस गलियारे का प्रस्ताव पाकिस्तान को करीब बीस वर्ष पहले दिया था। जब अटल बिहारी की सरकार थी। लेकिन भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने यह भी स्पष्ट कहा कि द्विपक्षीय बातचीत और करतारपुर कॉरिडोर दोनों अलग-अलग हैं। भारत सरकार पिछले 20 साल से इस कॉरिडोर के बारे में पाकिस्तान से बातचीत कर रही है। पाकिस्तान ने पहली बार सकारात्मक जवाब दिया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि द्विपक्षीय बातचीत शुरू हो जाएगी। हम हमेशा कहते आ रहे है कि आतंकवाद और बातचीत साथ नहीं चल सकती। पाकिस्तान को पहले आतंकी गतिविधियों को रोकने होगा, उसके बाद बातचीत शुरू होगी।’

पाकिस्तान कोई भी कदम उठाए उसके पीछे कोई शैतानी सोच होती ही है। इसलिए कॉरिडोर के शिलान्यास का न्योता पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को भी पहुंचा था लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि कुछ ही दिनों पहले पाकिस्तान के इशारे पर पंजाब में आतंकवादी वारदात हुई थी। मगर शोहरत के लिए लालायित पंजाब सरकार में मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू इस कार्यक्रम में शामिल होने पाकिस्तान पहुंचे। सवाल उठा कि जब कैप्टन अमरिंदर सिंह ने नवजोत सिंह सिद्धू से पाकिस्तान जाने के फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए कहा था, इसके बावजूद वह क्यों गए। शायद इसलिए कि कुछ दिनों पहले सिद्धू इमरान के शपथ ग्रहण समारोह में गए थे। वहां पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष बाजवा न केवल उनसे गले मिले बल्कि उनसे कहा कि वे करतारपुर साहिब कोरिडोर बनाने की योजना पर विचार कर रहे हैं। इसकी जानकारी सिद्धू ने देश को दी और तबसे उन्हें लगने लगा कि वे ही करतारपुर कोरिडोर के योजना के अग्रदूत हैं। वे ही वहां चर्चा में रहेंगे। हुआ भी यही। इमरान और सिद्धू के बीच जमकर तारीफों की जुगलबंदी हुई। सिद्धू वहां खूब बोले और इमरान की शान में जमकर कसीदे पढ़े। इस मौके पर नवजोत सिंह सिद्धू ने कहा कि करतारपुर कॉरिडोर के लिए मेरे यार, दिलदार इमरान खान का शुक्रिया। सिद्धू ने करतारपुर कॉरिडोर को ‘अनंत संभावनाओं वाला गलियारा’ बताया। लाहौर में उन्होंने कहा कि ऐसी पहल शांति को बढ़ावा देगी और भारत-पाकिस्तान के बीच दुश्मनी को खत्म। उनके भाषण सुनकर तो लोगों को लगा कि वे पाक के ऐजेंट हो गए हैं। दूसरी तरफ इमरान ने कहा भारत पाक रिश्तों के बुरे दिन तब खत्म होंगे जब सिद्धू पीएम बनेंगें। यह भी कहा गया कि सिद्धू पाकिस्तान से चुनाव लड़े तो जीत जाएंगे।

यू तो भारत सरकार ने तय कर रखा है कि जबतक पाकिस्तान आतंकवाद का निर्यात करता रहेगा तबतक उससे बातचीत नहीं की जाएगी मगर यह मामला धार्मिक था इसलिए उसे बातचीत करनी ही पड़ी। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज खुद तो नहीं गईं मगर  पाकिस्तान में होने वाले समारोह के लिए  भारत सरकार ने कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल और हरदीप सिंह पुरी को भेजा। इस मौके पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने बहुत लच्छेदार भाषण दिया कहा कि भारत-पाकिस्तान दोनों तरफ से गलतियां हुईं हैं। जब फ्रांस और जर्मनी साथ हैं फिर हम क्यों नहीं? उन्होंने कहा कि क्या हम अपना एक मसला हल नहीं कर सकते? कोई ऐसी चीज नहीं जो हल नहीं हो सकती। इरादे बड़े होने चाहिए. ख्वाब बड़े होने चाहिए। उन्होंने कहा कि हम भारत के साथ सभ्य संबंध चाहते हैं। इमरान ने बातें बहुत बड़ी-बड़ी की मगर वे भूल गए कि भारत में पर आतंकी हमले करने वाले दाऊद और सईद जैसे आतंकवादी पाकिस्तान में ही खुल्ले घूम रहे हैं।

करतारपुर साहिब कोरिडोर की पहल इमरान की कम और पाक सेना की ज्यादा है। इसका संकेत पाक सेना प्रमुख जनरल बाजवा ने दिया था, जब वह इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह में सिद्धू से मिले थे। इसका मतलब है कि कॉरिडोर खोलने का विचार पाक सरकार की तरफ से नहीं, बल्कि वहां की सेना की तरफ से आया है। इसलिए उस कार्यक्रम में पाकिस्तानी सेना प्रमुख उपस्थित थे। वैसे बहुत से राजनीतिक विश्लेषक मानते है कि इमरान में कोई नई पहल कर पाने की क्षमता नहीं है। वे अपने बूते न तो युद्ध कर सकते हैं न शांति कायम कर सकते हैं। इसके अधिकार तो केवल सेना के पास हैं। इसलिए वहां सेनाअध्यक्ष बाजवा की उपस्थिति को महत्वपूर्ण माना जा रहा था। उनकी उपस्थिति को सेना द्वारा मुहर लगाना माना जा रहा था।

पाकिस्तान की अचानक पंजाब में दिलचस्पी पैदा होने को संदेह की नजर से भी देखा जा रहा है। कॉरिडोर खोलने के पीछे कई उद्देश्य हैं। पहला उद्देश्य तो यही है कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद धीरे-धीरे घट रहा है, इसलिए पाकिस्तान पंजाब में आतंकवाद को पुनर्जीवित करने के लिए बेताब है। अमृतसर में हुए धमाके के पीछे पाकिस्तान का हाथ होने संबंधी कैप्टन का बयान इसी तरफ इशारा करता था। कॉरिडोर का खुलना कट्टर युवाओं की आवाजाही को आसान बनाएगा। चूंकि इस कॉरिडोर का धार्मिक महत्व है और इससे सिख समुदाय को फायदा होगा, इसलिए कोई भी सरकार इसे बाधित करने का जोखिम नहीं उठाएगी। यानी पाकिस्तान ने अपने फायदे के लिए धार्मिक कार्ड खेला है। इस कॉरिडोर को खोले जाने के बाद सुरक्षा एजेंसियों को डर है कि इस मार्ग का दुरूपयोग भी हो सकता है। दरअसल पाकिस्तान में अभी भी खालिस्तान समर्थकों की तादाद काफी ज्यादा है और उन्हें पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का समर्थन हासिल है। ऐसे में आशंका है कि इस कॉरिडोर का उपयोग करते हुए खालिस्तान समर्थक पंजाब के युवाओं को उग्रवाद के लिए उकसा सकते हैं। केवल इतना ही नहीं, इस मार्ग का उपयोग नशीली दवाओं की तस्करी के लिए भी किया जा सकता है। कॉरिडोर तो खुल जाएगा, हालांकि इससे होने वाले सुरक्षा प्रभावों पर उद्घाटन से पहले विचार करने की जरूरत है। चूंकि पाकिस्तान भारतीय सुरक्षा चिंताओं पर विचार नहीं करेगा, इसलिए इसकी जिम्मेदारी भारतीय सुरक्षा एजेंसियों पर रहेगी।

पाकिस्तान सिख समुदाय के बीच अपनी छवि को बदलना चाहता है। बीती सदी के अस्सी के दशक में खालिस्तानी आतंकवाद के खात्मे के बाद पंजाब में शांति है। खालिस्तान के नाम पर नई भर्तियां मुश्किल हैं, लेकिन इस कदम से लोगों का दिल जीता जा सकता है। पाकिस्तान जानता है कि कॉरिडोर खोलने से वे खालिस्तान समर्थक समूहों के साथ अंतरराष्ट्रीय सिख समुदाय का भरोसा जीत लेंगे। उनके माध्यम से पाकिस्तान को भारतीय सिख युवाओं का भरोसा जीतने की उम्मीद है, जिन्हें वे आतंकी गुटों में भर्ती करना चाहते हैं। जो गुरूद्वारा जाएंगे, उन्हें खालिस्तान पर पाठ पढ़ाया जाएगा और भारत को चुनौती देने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

पाकिस्तान का इसके जरिये भारत के अलगाववाद को हवा देने का ऐजेंडा बिल्कुल साफ हैं। पाकिस्तान सरकार श्री गुरूनानक देव जी की 550 वीं जयंती के अवसर पर पाकिस्तान में करतारपुर साहिब सम्मेलन-2019 आयोजित करने की योजना बना रहा है। इस सम्मेलन के दौरान करतारपुर साहिब में खालिस्तान के लिए जो जनमत संग्रह 2020 कराया जा रहा है उसके मतदाता पंजीकरण की योजना है इसके अलावा जनमत संग्रह पर भी जानकारी दी जाएगी। एक तरह से ‘करतारपुर साहिब सम्मेलन पंजाब के सिखों के साथ विदेशी सिख अलगाववादियों की पहली सभा होगा।

पंजाब कैबिनेट के मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू के पाकिस्तान जाने का विवाद अभी थमा भी नहीं था कि एक और विवाद शुरू हो गया। मंगलवार को करतारपुर कॉरिडोर के शिलान्यास पर पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल कमर बाजवा के साथ खालिस्तानी आतंकवादी और हाफिज सईद का करीबी माना जाने वाला गोपाल चावला नजर आया था। कार्यक्रम के दौरान वह बाजवा से हाथ मिलाते हुए दिखाई दिया था। अब सोशल मीडिया पर सिद्धू की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिससे विवाद पैदा हो गया है। दरअसल, नवजोत सिंह सिद्धू खालिस्तानी आतंकवादी गोपाल सिंह चावला के साथ एक तस्वीर में नजर आ रहे हैं।  चावला पाकिस्तान सिख गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी का महासचिव है। उसे मुंबई में हुए आतंकी हमलों के मास्टरमाइंड सईद का करीबी माना जाता है। 21 और 22 नवंबर को भारतीय उच्चायोग के अधिकारियों को गुरूद्वारे के अंदर प्रवेश न करने देने के मामले में भी चावला का नाम सामने आया था।

करतारपुर कॉरिडोर को हरी झंडी मिलने बाद उम्मीदें जताई गईं कि अब भारत और पाकिस्तान के रिश्ते सुधर सकते हैं। लेकिन इसी बीच भारत ने पाकिस्तान सरकार को जबरदस्त झटका दे दिया। पाकिस्तान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सार्क शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित करने का इरादा जताया। मगर भारत सरकार ने इसे ठुकरा दिया।

राजनयिक हल्कों में कोरिडोर के खतरों को लेकर भी चिंता चताई जा रही है। सिद्धू भले ही अपने आप को करतारपुर कोरिडोर का सूत्रधार मान ले मगर यह असल में पाकिस्तानी सेना के शैतान खोपड़ी की उपज है। सिद्धू की हैसियत उनके मोहरे से कम नहीं है। पाकिस्तान की दूसरी बड़ी उपलब्धि यह रही कि कोरिडोर के चक्कर  में  26 नवंबर के मुंबई आतंकी हमले को भूला दिया गया।। उसके दो दिन बाद ही कार्यक्रम रखा। जबकि हाफिज सईद छुट्टा ही घूम रहा है। उस आतंकी हमले के बारे में न इमरान ने कुछ कहा न भारत के वहां गए मंत्रियों ने। वैसे कोरिडोर  की बात मानने के अलावा भारत के पास कोई विकल्प नहीं था मगर अब भारत को पूरी हतियायत रखनी होगी क्योंकि आतंक के लिए एक स्थायी कोरिडोर खुल गया है। कई बार तो यह लगता है कि पाकिस्तान ने धार्मिक मजबूरी का लाभ उठाकर काफी बड़ा गेम खेल दिया है। उसके कारण मोदी सरकार को पाकिस्तान से बात न करने का फैसला स्थगित करना पड़ा।

सिद्धू पाकिस्तान में तो लोकप्रिय हो गए मगर पंजाब कांग्रेस में उनके खिलाफ असंतोष पनप रहा है। पंजाब के तीन मंत्रियों ने मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के खिलाफ टिप्पणी करने को लेकर कैबिनेट से नवजोत सिंह सिद्धू के इस्तीफे की मांग की है। 3 जनवरी को राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में यह मुद्दा उठने की संभावना है, यह सारा विवाद करतारपुर कॉरिडोर के शिलान्यास कार्यक्रम में शामिल होने के लिए सिद्धू के पाकिस्तान जाने के बाद से पैदा हुआ है।

यह विवाद तब और गहरा गया जब सिद्धू ने ट्वीट किया, ‘तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने से पहले आप तथ्यों को सही कर लें। राहुल गांधी ने मुझसे पाकिस्तान जाने को कभी नहीं कहा। पूरी दुनिया जानती है कि मैं (पाकिस्तानी) प्रधानमंत्री इमरान खान के निजी न्यौते पर पाकिस्तान गया।’ एक दिन पहले हैदराबाद में सिद्धू से जब मुख्यमंत्री की मंजूरी के बगैर पाकिस्तान जाने के बारे में पूछा गया था, तब उन्होंने अमरिंदर का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि ‘राहुल गांधी मेरे ‘कप्तान’ हैं। उन्होंने ही मुझे पाकिस्तान भेजा। राहुल गांधी कैप्टन (अमरिंदर सिंह) के भी कैप्टन हैं।’ इस पर पंजाब के मंत्रियों ने कहा है कि अगर सिद्धू सीएम अमरिंदर सिंह को अपना कैप्टन नहीं समझते हैं तो उन्हें मुख्यमंत्री की टीम छोड़ देनी चाहिए।

पंजाब के मंत्री ने तो मांग की सिद्धू को मुख्यमंत्री से माफी मांगनी चाहिए। उन्हें कैप्टन साहब को पंजाब में अपने नेता के तौर पर स्वीकार करना होगा। और वह उनके नेतृत्व में काम नहीं कर सकते तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए।’ सिद्धू से पंजाब कैबिनेट के 10 मंत्री खफा हैं। सिद्धू के खिलाफ इनकी नाराजगी इतनी बढ़ चुकी है कि राज्य की अगली कैबिनेट मीटिंग में ये मंत्री सिद्धू को कैबिनेट से हटाने की मांग करेंगे।

अब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को यह कहते हुए सुना गया है कि उनकी सरकार दूसरे प्रस्तावों पर भी विचार कर सकती है जिसमें कश्मीर के शारदा पीठ की यात्रा भी शामिल है। यह एक प्राचीन शारदा मंदिर है। यह स्थान मुजफ्फराबाद से 160 किलोमीटर की दूरी पर लाइन ऑफ कंट्रोल के छोटे से गांव शारदी या सारदी में स्थित है। यहां नीलम नदी मधुमति और सरगुन की धारा में मिलती है।

सतीश पेडणेकर

 

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