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खालिस्तान के मुद्दे को भड़काने की कोशिश में आईएसआई

खालिस्तान के मुद्दे को भड़काने की कोशिश में आईएसआई

28 नवंबर को पाकिस्तानी हिस्से में करतारपुर साहिब कॉरिडोर के उद्घाटन के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ती दोस्ती को लेकर लंबे-चौड़े दावे किए जा रहे हैं। इस मौके पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और पूर्व क्रिकेटर इमरान खान के इस मौके पर दिए गए भाषण पर भारतीय बुद्धिजीवियों का एक खेमा और सेक्युलर राजनीति लहालोट हुए जा रही है। लेकिन भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस पूरे समारोह के साथ ही अंदरखाने में चल रही पाकिस्तानी राजनीति और खेल को भांप लिया है। शायद यही वजह रही कि उन्होंने यह कहने में देर नहीं लगाई कि आतंक और दोस्ती दोनों साथ-साथ नहीं चल सकती। उनके इस बयान की वजह जल्द ही सामने आ गई, जब भारतीय पंजाब के मंत्री और पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू के साथ इसी समारोह में एक और सिख शख्स नजर आया। वह शख्स था गोपाल सिंह चावला। गोपाल सिंह चावला भारत से पंजाब प्रांत को अलग करके आजाद खालिस्तान देश बनाने की मांग करने वाले संगठन का सदस्य है और ब्रिटेन, अमेरिका और कनाडा में खालिस्तान के समर्थन में अभियान चलाता रहा है। करतारपुर कॉरिडोर के उद्घाटन के मौके पर एक तरफ इमरान खान की लच्छेदार भाषणबाजी और दूसरी तरफ उसी समारोह में गोपाल सिंह चावला की मौजूदगी पाकिस्तान की असल मंशा को ही जाहिर करते हैं।

पंजाब में नब्बे के दशक में कांग्रेसी मुख्यमंत्री बेअंत सिंह और तत्कालीन सुपरकॉप केपीएस गिल की जोड़ी ने पंजाब में खालिस्तान के नाम पर पनपे आतंकवाद की कमर तोड़कर रख दी थी। बेशक बेअंत सिंह की हत्या करके खालिस्तानी आतंकियों ने इस अभियान की हवा निकालने की कोशिश की, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव की नीतियों और पुलिस को खुला हाथ देने की रणनीति ने खालिस्तानी आतंकवाद को जड़ से खत्म कर दिया। खून-खराबे से परेशान पंजाब की जनता ने भी आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति रखने से तौबा कर ली। फिर भी आतंकी विदेशी जमीन से अपना अभियान चलाते रहे। खासकर कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका में बसे और नौकरी कर रहे अनिवासी सिखों के जरिए खालिस्तानी आंदोलन को शह देने की कोशिशें जारी रहीं। लेकिन अपने खात्मे के बाद पहली बार सिख आतंकवाद का डर साल 2013 में सुनाई दिया, जब बेअंत सिंह की हत्या में मृत्युदंड की सजा पाए आतंकी देविंदर सिंह भुल्लर को फांसी देने की तैयारियां शुरू हुईं। 18 अप्रैल 2013 को पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे से मुलाकात करके यह आशंका जताई कि देविंदर सिंह भुल्लर को फांसी दी गई तो खालिस्तानी आतंकी भारतीय पंजाब में गड़बड़ी फैलाने की कोशिश करेंगे और पंजाब के लोगों को गुमराह कर सकते हैं। पंजाब में पिछले कुछ वर्षों में ड्रग्स की जिस तरह सप्लाई हुई है, उसके पीछे पाकिस्तान की खूंखार खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ अब खुला सीक्रेट है। आईएसआई ड्रग्स के जरिए ही पंजाब को तबाह करने और वहां खालिस्तानी आतंकवाद को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है। वैसे देश की खुफिया एजेंसियों को इसकी जानकारी साल 2007 से ही है। तब पुलिस महानिदेशकों की सालाना बैठक में यह मुद्दा उठा भी था। साल 2011 में खुफिया ब्यूरो ने भी अपनी एक रिपोर्ट में इसे स्वीकार किया था।

वैसे खालिस्तानी आतंकवाद को भड़काने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार की बरसी को लक्षित किया गया है। रेफरेंडम 2020 के नाम से स्वर्ण मंदिर में काबिज आतंकियों के खिलाफ हुई सैनिक कार्यवाही ऑपरेशन ब्लूस्टार की बरसी 6 जून 2020 पर कार्यक्रम करने की तैयारी में सिख अलगाववादी हैं। सिख समुदाय के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार संवेदनशील मुद्दा रहा है। 1984 में हुए इस ऑपरेशन को लेकर तब बहुत क्षोभ था। जिस पीढ़ी ने इसे देखा है, वह अब तक बदल चुकी है। लोग पुरानी बातों को भुला चुके हैं। इसके बावजूद इस मसले को भड़काने की कोशिश जारी है।

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इसी कोशिश के तहत इस साल ब्रिटेन में 12 अगस्त को रैली की गई थी। इसे आयोजित करने में परमजीत सिंह पम्मा और आईएसआई के लेफ्टिनेंट कर्नल शाहिद मोहम्मद मलही उर्फ चौधरी साहब ने बड़ी भूमिका निभाई थी। भारत ने इस रैली पर पाबंदी लगाने के लिए काफी कोशिशें की थीं, लेकिन कामयाबी नहीं मिल पाई थी। भारतीय खुफिया एजेंसियों को इनपुट है कि इस रैली के जरिए 2020 के छह जून को होने वाले रेफरेंडम को भड़काने और उसके लिए अनिवासी सिख समुदाय को जुटाने की कोशिश की जा रही है। दिलचस्प यह है कि इमरान खान भारत की तरफ दोस्ती की बात करते हुए इसमें अपनी सेना के भी सहयोगी होने का दावा कर रहे हैं, जबकि हकीकत में रेफरेंडम 2020 का पूरा रोडमैप उनकी ही सेना के एक विंग आईएसआई के लेफ्टिनेंट कर्नल शाहिद मोहम्मद मलही उर्फ चौधरी साहब ने तैयार किया है। जाहिर है कि इसकी जानकारी पाकिस्तानी सेना के उच्चाधिकारियों को भी है।

विदेशी धरती खालिस्तानी आंदोलन को भड़काने की कोशिश में कई विदेशी संगठन भी सहयोग दे रहे हैं। भारत सरकार इन संगठनों पर निगार रखे हुए ही होगी। जरूरत है कि उन्हें उनके देशों में अलग-थलग करने या एक्सपोज करने की कोशिश की जाय। ब्रिटेन में हुई लंदन डिक्लेरेशन नामक रैली की प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद रहकर पाकिस्तानी वैल्फेयर काऊंसिल, वल्र्ड कश्मीर फ्रीडम मूवमैंट, कश्मीरी पैट्रोयॉटिक फोरम इंटरनेशनल के साथ ही ब्रिटेन की वामपंथी ग्रीन पार्टी का अपना समर्थन जताना मामूली बात नहीं है। यहां याद दिला दें कि इस रैली के मुख्य कर्ताधर्ता परमजीत सिंह पम्मा कुख्यात खालिस्तानी आतंकी वधावा सिंह का सहयोगी रहा है। फरारी के बाद उसने खालिस्तान टाइगर फोर्स के मुखिया जगतार सिंह तारा से हाथ मिला लिया और उसके साथ काम करने लगा था। जब तारा की थाईलैंड में गिरफ्तारी हुई तो उसके बाद वह खालिस्तान टाइगर फोर्स का मुखिया बन गया। इसके बाद वह पाकिस्तान चला गया और साल 2000 में उसने ब्रिटेन में राजनीतिक शरण ले ली। पम्मा भारत का मोस्ट वांटेड आतंकी है। जिसकी गिरफ्तारी के लिए इंटरपोल ने रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया था, जिसकी वजह से उसे 2016 में पुर्तगाल में गिरफ्तार किया गया। लेकिन तब भारत सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद उसका प्रत्यर्पण नहीं हो पाया था।

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खालिस्तान के मसले को उठाने और जगाए रखने की कोशिशें काफी समय से जारी हैं। ब्रिटेन में अगस्त में हुई रैली के पहले इसी साल पांच मई को संयुक्त राष्ट्र संघ के जिनेवा स्थित मुख्यालय पर भी सिख कट्टरपंथियों के एक समूह ने प्रदर्शन किया था। इन प्रदर्शनकारियों ने खालिस्तान लिबरेशन फ्रंट (केएलएफ) के प्रमुख हरमिंदर सिंह मिंटू समेत कई सिख आतंकवादियों के समर्थन में बैनर भी लगाए थे। यहां यह बताना जरूरी है कि इस प्रदर्शन के कुछ ही दिनों पहले पंजाब के नाभा जेल में बंद मिंटू दिल का दौरा पडऩे मौत हो गई थी।

पाकिस्तान भले ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इनकार करे कि वह भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों को प्रश्रय नहीं दे रहा है, लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट है। इस साल गुरू पूर्णिमा पर गुरूनानक देव की जन्मस्थली ननकाना साहिब में जिस तरह रेफरेंडम 2020 के बैनर लहराए गए, उससे साफ है कि पाकिस्तान खालिस्तानी आतंकवाद को भड़काने की कोशिश कर रहा है। इसके ठीक बाद करतारपुरसाहिब कारिडोर के उद्घाटन कार्यक्रम में गोपाल सिंह चावला की मौजूदगी और उसका पाकिस्तानी सेना प्रमुख बाजवा से हाथ मिलाना पाकिस्तान की मंशा को ही जाहिर करता है। ऐसे में भारत सरकार को पहले की तुलना में कहीं ज्यादा सचेत रहना होगा और पंजाब सरकार को भी राज्य में अमन-व्यवस्था बनाए रखने के लिए हर कीमत पर तैयार रहना होगा।

 

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