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प्रकृति-प्रदत आठ चिकित्सक

प्रकृति-प्रदत आठ चिकित्सक

प्रकृति और मानव-शरीर में जन्मजात साहचर्य रहा है। यह एक सर्वमान्य बात है कि मानव प्रकृति की

शस्य-श्यामल-गोद में जन्म लेता, पलता और उसी के विस्तृत प्रांगण में क्रीड़ा कर अन्तर्धान हो जाता है।

इस शरीर का निर्माण भी धरती (मिट्टी), जल, अग्नि, आकाश और वायु-इन पांच प्राकृतिक तत्त्वों से हुआ है। ये पांचों तत्व मानव-जीवन के लिए प्रत्येक क्षण कल्याणप्रद हैं। प्रकृति का यह विचित्र विधान है कि जिन तत्त्वों से प्राणी के शरीर का निर्माण हुआ, पुन: उन्हीं तत्वों से उसकी प्राकृतिक चिकित्साएं (Natural Treatments) भी होती हैं।

प्रकृति द्वारा प्रदत्त आठ ऐसे चिकित्सक हमें प्राप्त हैं, जिनके सहयोग तथा उचित सेवन से हम यथासंभव आरोग्य प्राप्त कर सकते हैं। वे चिकित्सक हैं- 1- वायु, 2- आहार, 3- जल, 4- उपवास, 5- सूर्य, 6- व्यायाम, 7- विचार और 8-निद्रा। यहां संक्षेप में इनकी चर्चा की जा रही है-

वायु- प्रसिद्धि है कि मानव जीवन में वायु का स्थान जल से भी अधिक महत्वपूर्ण है। वेद में कहा गया है कि वायु अमृत है, वायु ही प्राणरूप में स्थित है। प्रात: काल वायु-सेवन करने से देह की धातुएं और उपधातुएं शुद्ध और पुष्ट होती हैं, मनुष्य बुद्धिमान और बलवान बनता है, नेत्र और श्रवणेन्द्रियकी शक्ति बढ़ती है तथा इन्द्रिय-निग्रह होता है एवं शान्ति मिलती है। प्रात: कालीन शीतल-मन्द-सुगन्ध वायु पुष्पों के सौरभ को लेकर अपने पथ में सर्वत्र विकीर्ण करता है, अत: उस समय वायु-सेवन करने से मन प्रफुल्लित और प्रसन्न रहता है, साथ ही आनंद की अनुभूति भी होती है।

शुद्ध वायु, शुद्ध जल, शुद्ध भूमि, शुद्ध प्रकाश एवं शुद्ध अन्न यह ‘पच्ञामृत’ कहलाता है। प्रात: कालीन वायु-सेवन तथा भ्रमण सहस्त्रों रोगों की एक रामबाण औषधि है। शरीर, मन, प्राण, ब्रम्हाचार्य, पवित्रता, प्रसन्नता, ओज, तेज, बल, सामथ्र्य, चिर-यौवन और चिर-उल्लास बनाये रखने के लिये शुद्ध वायु-सेवन तथा प्रात: कालीन भ्रमण अति आवश्यक है। प्रात: काल का वायु-सेवन ‘ब्राम्हावेला का अमृतपान’ कहा गया है।

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आहार- शरीर और भोजन का परस्पर घनिष्ठ संबंध है। प्रत्येक व्यक्ति को सात्त्विक भोजन करना चाहिये, क्योंकि सात्त्विक आहार से शरीर की सब धातुओं को लाभ पहुंचता है।

एक समय ईरान के एक बादशाह ने अपने यहां के एक श्रेष्ठ हकीम से प्रश्न किया कि  ‘दिन-रात में मनुष्य को कितना खाना चाहिए?’ उत्तर मिला ‘छ: दिरम’ अर्थात 39 तोला। फिर पूछा, ‘इतने से किया होगा?’ हकीम ने कहा- ‘शरीर- पोषण के लिये इससे अधिक नहीं खाना चाहिये। इसके उपरान्त जो खाया जाता है, वह केवल बोझ ढोना और उम्र खोना है।’

मनुष्य को स्वल्प आहार करना चाहिये- ‘स्वल्पहार: सुखवह:।’ थोड़ा आहार करना स्वास्थ्य के लिये उपयोगी होता है। आहार उतना ही करना चाहिये, जितना कि सुगमता से पच सके।

शुद्ध एवं सात्त्विक आहार करना शरीर का पोषण करने वाला, शीघ्र बल देने वाला, तृप्तिकारक, आयुष्य और तेजोवर्धक, साहस तथा मानसिक रोगी शक्ति और पाचनशक्ति को बढ़ाने वाला है। आहार से ही शरीर में सप्त धातुएं बनती हैं।

गरिष्ठ अधिक हानिप्रद होता है। सच्ची भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिये। इससे यथेष्ट लाभ मिलता है। भोजन शान्तिपूर्वक करना चाहिये।

जल- स्वास्थ्य की रक्षा के लिये जल का महत्त्वपूर्ण स्थान है। सोकर उठते ही स्वच्छ जल पीना स्वास्थ्य के लिये बड़ा ही हितकर कहा गया है। लिखा है कि-

सवितु: समुदयकाले प्रसृती: सलिलस्य पिबेदष्टौ।

रोगजरापरिमुक्त्तो जीवेद वत्सरशतं साग्रम।।

अर्थात सूर्योदय के समय (सूर्योदय से पहले) आठ घूंट जल पीने वाला मनुष्य रोग और वृद्धावस्था से मुक्त होकर सौ वर्ष से भी अधिक जीवित रहता है। कुएं का ताजा जल अथवा ताम्रपात्र में रखा हुआ जल पीने के लिये अधिक अच्छा है। खाने से एक घंटा पूर्व अथवा खाने के दो घंटे बाद जल पीना चाहिये। एक व्यक्ति को एक दिन में कम-से-कम ढाई सेर जल पीना चाहिये, इससे रक्तसंचार सुचारू रूप से होता है।

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उपवास- धर्मशास्त्रों में उपवास का बहुत महत्त्व प्रतिपादित किया गया है। उपवास से शरीर, मन और आत्मा सभी की उन्नति होती है। उपवास से शरीर के त्रिदोष नष्ट हो जाते हैं। आंतों को अवशिष्ट भोजन के पचाने में सुविधा मिलती है तथा शरीर स्वस्थ और हलका-सा प्रतीत होता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से उपवास बहुत आवश्यक है। उपवास करने से मनुष्य की आत्मिक शक्ति बढ़ती है। कहते है कि यदि महीने में दोनों एकादशियों के निराहार-व्रत का विधिवत पालन किया जाय तो प्रकृति पूर्ण सात्त्विक हो जाती है। जिन्हें उपवास करने का अभ्यास नहीं है, उन्हें चाहिये कि वे सप्ताह में एक दिन एक बार ही भोजन करें और धीरे-धीरे आगे चलकर संपूर्ण दिवस उपवास रखने का व्रत लें।

सूर्य- जीवन की रक्षा करने वाली सभी शक्तिीयों का मूल स्त्रोत सूर्य है। ‘सूर्यो हि भूतानामायु:।’ समस्त चराचर भूतों का जीवनाधार सूर्य न होते तो हम लोग एक क्षण भी जीवित न रह पाते। जीवन में सूर्य-रश्मियों का महत्त्व बहुत अधिक है। सूर्य की किरणें शरीर के ऊपर पडऩे से हमारे शरीर के अनेकों रोग-कीटाणु नष्ट हो जाते हैं।

सूर्य का प्रभाव मनुष्य के शरीर एवं मनपर बहुत गहरा पड़ता है। चिकित्सकों का मत है कि सूर्य-रश्मि (Sun beams)- के सेवन से  प्रत्येक प्रकार के रोग शान्त किये जा सकते हैं। यजुर्वेद में कहा गया है कि चराचर प्राणी और समस्त पदार्थों की आत्मा तथा प्रकाश होने से परमेश्वर का नाम ‘सूर्य’ है ‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च’- अतएव इन्हें वेद में ‘जीवनदाता’ कहा गया है।

व्यायाम- आयुर्वेद का मत है कि व्यायाम करने से शरीर का विकास होता है, शरीर के अगों की थकावट नष्ट हो जाती है, निद्रा खूब आती है और मन की चच्ञलता दूर होती है। जठराग्नि प्रदीप्त होती है तथा आलस्य मिट जाता है। शारीरिक सौन्दर्य की वृद्धि होती है और मुख की कान्ति में निखार आता है।

विचार- विचारशक्ति में एक महान उद्देश्य छिपा रहता है। इसलिये हमे अपने विचारों को सदा-सर्वदा शुद्ध एवं पवित्र रखना चाहिये। विचारों का प्रभाव सीधे स्वास्थ्य पर पड़ता है। सांकल्पिक दृढ़ता तथा सात्त्विक चिन्तन-मनन रोगों की निर्मूलता के लिये बहुत आवश्यक है। दूषित विचारों से न केवल मन विकृत होकर रुग्न होता है, अपितु शरीर भी अनारोग्य हो जाता है। सम्यक सत-चिन्तन एवं सम्यक सद्विचार एक जीवनी-शक्ति है। अत: आरोग्य-लाभ के लिये मनुष्य को विचार-शक्ति का आश्रय लेना चाहिये।

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निद्रा- जिस प्रकार स्वास्थ्य-रक्षा के लिये शुद्ध वायु, जल, सूर्य और भोजन आदि की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार यथोचित निद्रा भी परमावश्यक है। रात्रि में सत- विचारों का स्मरण करते हुए शान्तिपूर्वक सोना चाहिये। सोते समय शरीर का वस्त्र ढीला होना चाहिये। उत्तम स्वास्थ्य के लिये सात्त्विक निद्रा आवश्यक है। दिन में सोने से विविध प्रकार की व्याधियां आ घेरती हैं। यथाकाल निद्रा से निम्नलिखित लाभ होते हैं-

  • नियमपूर्वक सोने से सारी श्रान्ति दूर हो जाती है।
  • नये काम करने नयी शक्ति प्राप्त होती है।
  • आर्युबल बढ़ता है।
  • स्वप्नदोष, धातुदौर्बल्य, सिर के रोग, आलस्य, अल्पमूत्र और रक्तविकार आदि से रक्षा होती है।
  • मन तथा इन्द्रियों को विश्राम मिलता है।

सोने से पहले मन को समस्त शोक, चिन्ता और भय से रहित कर लेना चाहिये तथा प्रसन्नता, संतोष और धैर्य के साथ सफलता की कामना करनी चाहिये। इससे आप प्रात: काल अपने में महान परिवर्तन पायेंगे।

उपर्युक्त प्रकृति-प्रदत्त आठ चिकित्सकों के समुचित सेवन से मनुष्य-जीवन स्वस्थ, समृद्ध, सुख-सम्पत्ति तथा आनंद से परिपूर्ण और आयुष्मान होता है।

(साभार: कल्याण आरोग्य अंक)

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