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रण उत्सव का अनूठा टेंट सिटी

रण उत्सव का अनूठा टेंट सिटी

यह दुनिया भी अजब-गजब है जिसमे एक सिटी हर साल बसती है फिर उजड़ती है। लगता है कि बसना और उजडऩा इसकी नियति बन गई है। साल दर साल यही सिलसिला चला आ रहा है। जी हां हम बात कर रहे है  ”रण उत्सव द टेंट सिटी’’ की जो पाकिस्तान की सीमा से लगते गुजरात के कच्छ इलाके में फैले व्हाईट रन (श्वेत मरूस्थल) के निकट बसायी जाती है हर साल। देश-विदेश से आने वाले मेहमानों के लिए यह टेंट सिटी नवम्बर माह से सुसज्जित हो जाती है और फरवरी माह आते-आते फिर से उजडऩे की तैयारी में जुट जाती है। अगले साल पुन: बसने के लिए। वाह री टेंट सिटी।

लगता है प्रकृति से भी इस टेंट सिटी ने अपना नाता जोड़ लिया है। मानसून के छटते-छटते जब मौसम मे ठंडक का अहसास होने लगता है और दीपावली का उजास नई उमंग लेकर आता है तब टेंट सिटी अंगड़ाई लेने लगती है। शरद के पश्चात् जब बसंत अपने यौवन पर होता है और रंग पर्व होली की दस्तक सुनाई देने लगती है तब टेंट सिटी के बोरी-बिस्तर सिमटने लगते है। प्रशिक्षित टीम इस सिटी की देखरेख और व्यवस्थाओं को गरिमामय तरीके से अंजाम देने में दिन रात जुटी रहती है। टेंट सिटी का संचालन लगभग एक शताब्दी अनुभवी संस्थान लल्लू जी एण्ड संस द्वारा किया जाता है। गुजरात के ब्राण्ड एम्बेडसर फिल्म जगत के महानायक अमिताभ बच्चन ने रण उत्सव को प्रचारित किया था।

भुज वायु सेना का प्रमुख केन्द्र है। रेलवे स्टेशन से स्टेट हाइवे पर 85 किमी के सफर से इस टेंट नगरी में पहुंचा जा सकता है। इसी मार्ग पर आगे भारत पाक सीमा पर सीमा सुरक्षा बल की आखरी सीमा चौकी धर्मशाला स्थित है। स्टेट हाइवे के निकट अद्र्व अंडाकार में बसी टेंट सिटी अंग्रेजी वर्णमाला के अनुसार कलस्टर में बसी है जिसमे अलग-अलग किस्म के साढ़े तीन सौ से चार सौ टेंट लगाये जाते है। दो बड़े वातानुकूलित डायनिंग हॉल में रूचिकर व्यंजनो का आनंद लिया जा सकता है। पर्यटक अतिरिक्त शुल्क देकर पैरामोटरिंग, ए टी वी, बाइक राइड पेंटबाल ट्रिकी पूल स्पा इत्यादि गतिविधियों का उपयोग कर सकते है। मनोरंजन के लिए अन्य गतिविधियां भी पर्यटको को व्यस्त रखती है।

रण उत्सव की इस टेंट सिटी का अहसास कराने के मकसद से अपनी जीवनसंगिनी पुष्पा बत्रा के साथ हम बरेली भुज रेलगाड़ी द्वारा नवम्बर माह मे जयपुर से भुज पहुंचे थे। भुज रेलवे स्टेशन के बाहर ही रण उत्सव द टेंट सिटी का स्वागत कक्ष बना हुआ था। रेलगाड़ी करीब तीन घंटे विलम्ब से पहुंची। सीनियर सिटीजन के नाते हमे टेंट सिटी तक पहुंचाने की विशेष व्यवस्था की गई थी। हम तीन रात्रि और चार दिन के पैकेज पर थे। कच्छ रण के धोरडो गावो के निकट बसी टेंट सिटी के स्वागत केन्द्र पर कुछ औपचारिकता के बाद हमे अपने कलस्टर के टेंट में पहुंचाया गया। इधर हमारा सामान आया। स्नान की तैयारी के बीच पैकड लंच भी आ गया। साथ ही सूचना रण कच्छ में सूर्यास्त के अवलोकन की। गाइड से कच्छ रन के बारे में रोचक जानकारी लेते हुए हमने ऊंट गाड़ी का आनंद लिया। सूर्यास्त में अभी देर थी। दूर तक फैला मैदान-साथी पर्यटक गुजराती साफा एवं अन्य परिधान से सुसज्जित हो कैमरा क्लिक किए जा रहे थे। कुछ ने ऊंट सवारी का आनंद लिया। सूरज के ओझल होते ही विशाल रण कच्छ अंधेरे मे डूबने लगा। वापसी में हमारी ऊंटगाड़ी पर आगरा से आया होटल प्रबन्धन कॉलेज का विद्यार्थी सवार हुआ जो इस टेंट सिटी में प्रशिक्षण के लिए आया था।

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इस टेंट सिटी में तीन रात और चार दिन कैसे निकल गये पता ही नही चला। पैकेज के अनुसार प्रत्येक कार्यक्रम में समय से पहुंचाने की जिम्मेदारी टेंट सिटी की टीम पर गजब का अनुशासन और आवभगत में कोई कोर-कसर नहीं। इस दौरान कच्छ के कर्णप्रिय लोकसंगीत के साथ 55 वर्षीय कलाकार राजेन्द्र रावल का अद्भुत नृत्य देखा। नाचते नाचते तलवारबाजी फिर नीले सफेद वस्त्र से मोर की आकृति बना लेना आश्चर्यचकित कर गया। एंकर अखिल ने अगली रात तीन-चार पर्यटकों को स्टेज पर बुलाकर उनसे एक स्थान पर घूमने का अनुरोध किया। उत्साही पर्यटक आये और पांच-छ: चक्कर लगाते ही डगमगाने लगे। तब रावल ने नृत्य के दौरान सफेद वस्त्र से कबूतर और खरगोश बनाया तो सेल्फी लेने की हौड़ लग गई। इस कलाकार का एक ही स्थान पर लगातार 90 मिनट तक नाचने का रिकार्ड है।

गुजरात की समुद्री सीमा पर टेंट सिटी से 140 किमी दूर माण्डवी बीच शांत और सुरम्य स्थल है। समुद्र के किनारे विजय विलास पैलेस बना हुआ है। कच्छ के महाराजा द्वारा 1929 में समर रिर्सोट के रूप में बना यह महल समुद्र तथा घनी हरियाली के बीच संगम स्थल है। फोटोजनिक इस महल को संग्रहालय में बदला गया है। महल के रास्ते श्याम जी कृष्ण वर्मा स्मारक बना हुआ है। इसी माण्डवी कस्बे में 4 अक्टूबर 1857 को जन्मे श्याम जी कृष्ण वर्मा महान क्रांतिकारी जन्मे थे। उन्होने लंदन में ”इंडिया हाउस’’ बनाकर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख क्रांतिकारियों को प्रेरित किया। इसी गुजरात के टंकारा में जन्मे स्वामी दयानंद से अनुप्राणित आर्य समाज से दीक्षित श्याम जी और उनकी पत्नी ने ही जेनेवा में 1926 में आखिरी शवांस ली। उनकी वसीयत थी कि हमारी अस्थियां स्वतंत्र भारत में लायी जाये। देश आजाद हो गया लेकिन यह क्रांतिकारी विस्मृत हो गया। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्मा दम्पत्ति की अस्थियां लाकर स्मारक बनवाया। अस्थि कलश पर इलेक्ट्रानिक पद्वति से पुष्पांजलि अर्पित कर सैलानी कृतज्ञ होते है। इसी परिसर में इंडिया हाउस भी बना हुआ है। जहां लघु शिल्म द्वारा श्याम जी कृष्ण वर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को दर्शाया जाता है।

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सूर्यास्त की भांति व्हाइट रण में सूर्योदय का नजारा अलौकिक है। गुजरात पर्यटन ने वहां वाच टावर बनाया है। जहां तक नजर जाती है बस नमक की सफेद चादर दिखाई देती है। सूर्य की किरणें नमक के कणो को जीवंत करती है। रात्रि में विशेषकर पूनम का चांद व्हाइट रण के सौंदर्य को द्विगुणित कर देता है। समुद्र का पानी जब रण कच्छ में हिलोरे लेता है तो उसकी परत दर परत इसे व्हाहट रन में बदल देती है। इस नजारे को देखने दुनिया भर से सैलानी पहुंचने लगे हैं। रण उत्सव के आयोजन ने इसमे नये आयाम जोड़ दिये हैं। काला डूंगर (ब्लेक हिल्स) से भी व्हाहट रण अलग अंदाज में दिखाई देता है। काला डूंगर चढते समय एक हिस्से में मेगेनटिक फील्ड के किस्से भी चर्चित हैं। डूंगर पर दतात्रेय का मन्दिर है। यहां की पहाडिय़ो से दूरबीन से वह पुल देखा जा सकता है जिसे 1971 के भारत-पाक युद्व के दौरान तोडऩे के बाद पुन: बनाया गया है। फिल्म बार्डर में भी इसकी शूटिंग हुई है। काला डूंगर के रास्ते गांधी नू ग्राम गुजरात की हस्तकला को दर्शाता है। वर्ष 2001 के भूकम्प के बाद इसे बसाया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसका उद्घाटन किया था।

टेंट सिटी से विदाई लेने वाले पर्यटकों को भुज पहुंचते ही स्वामी नारायण मन्दिर, कच्छ म्यूजिम, ऐना महल, संसद भवन की अनुकृति को दर्शाता वंदे मातरम मेमोरियल और गुजरात की हस्तशिल्प के खजाने भूजोडी गांव का अवलोकन करवाया जाता है। भूकम्प प्रभावित और हस्तकला में बेजोड़ कलाकारों को यहां बसाकर रोजी-रोटी कमाने के साथ अपनी अद्भुत कला को दर्शाने का अवसर दिया गया है। टेक्सटाईल सेन्टर के रूप में विकसित भूजोड़ी अब भारत ही नहीं अपितु अन्तर्राष्ट्रीय मानचित्र में उभर चुका है।

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गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की कल्पना और पहल ने तीन दिवसीय रण उत्सव को नये आयाम दिए है। वर्ष 1921 से कुम्भ मेले में साधु संतों तथा अन्य श्रद्धालुओं को ठहराने की व्यवस्था करने वाले जाने माने प्रतिष्ठान लल्लू जी एण्ड संस ने वर्ष 2013 से आधुनिक सुविधायुक्त स्विस टेंट के रूप में टेंट सिटी की अवधारणा से रण उत्सव को आकर्षण का केन्द्र बना दिया है। गुजरात पर्यटन के साथ पीपीपी मोड पर संचालित अनूठी टेंट सिटी देशी-विदेशी सैलानियों के आकर्षण का प्रतीक बन गई है। टेंट सिटी की सुखद स्मृति के साथ वापसी में द्वारका एवं सोमनाथ और गीर लायन सफारी का आनंद तो अवर्णनीय है।

 

कच्छ से गुलाब बत्रा

 

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