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सियासत का मास्टरस्ट्रोक नागरिकता अधिनियम

सियासत का मास्टरस्ट्रोक नागरिकता अधिनियम

लोकसभा में नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 के पारित होते ही पूर्वोत्तर भारत को अपने कब्जे में लेने के भाजपा की कोशिश कामयाब होते दिखने लगी है। विगत आठ जनवरी को आल असम स्टूडेंट्स यूनियन और अन्य पूर्वोत्तर संगठनों द्वारा की गयी इस बिल के विरोध में की गयी हिंसा से यह और स्पष्ट हो गया। असम गण परिषद (अगप) ने बिल के विरोध में भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ दिया है और मेघालय, नगालैंड एवं मिजोरम में अन्य क्षेत्रीय दलों ने भी, जिन्होंने भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई है, इसके खिलाफ तीखा विरोध जताया। उन्हें भय है कि यह विधेयक, जो धार्मिक उत्पीडऩ से बचने के लिए बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से भागकर आए गैर-मुस्लिम प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्रदान करना चाहता है, उससे उनके राज्य में बांग्लादेश से आए बंगाली हिंदुओं और बौद्ध चकमाओं को भी ना सिर्फ वैधता मिल जाएगी बल्कि उनकी राजनीती भी खत्म हो जाएगी।

समस्या के मूल में क्या है?

इस विधेयक को लेकर असम में बड़ा बबाल मचा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की ओर से इसपर लोकसभा में रिपोर्ट पेश किए जाने के तुरंत बाद विधेयक को मंजूरी दे दी। उसके बाद लोकसभा में भी यह विधेयक पारित हो चुका है। राज्यसभा में इसे पास किया जाना बाकी है। इससे पहले जेपीसी ने अपनी रिपोर्ट में 31 दिसंबर, 2014 तक असम में घुस चुके अल्पसंख्यक लोगों को वैध ठहराने के प्रस्ताव का अनुमोदन किया है लेकिन सरकार से कहा है कि चूंकि मामला कोर्ट में है, इसलिए वह सावधानी से कदम उठाए। रिपोर्ट में सभी कानूनी कदम उठाने को कहा गया है ताकि बाद में यह परेशानी का सबब न बने। असल में असम में बाहरी बनाम असमिया का मुद्दा काफी पुराना है। औपनिवेशिक काल में बिहार और बंगाल से चाय बागानों में काम करने के लिये बड़ी संख्या में श्रमिक असम आए और अंग्रेजों ने उन्हें यहां खाली पड़ी जमीनों पर खेती करने के लिये प्रोत्साहित किया। इसके अलावा विभाजन के बाद नए बने पूर्वी पाकिस्तान से पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के साथ-साथ असम में भी बड़ी संख्या में बंगाल वासी आए और तब से ही वहां बाहरी बनाम स्थानीय का मुद्दा बराबर बना रहता है। आजादी के बाद 1951 में एक नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन तैयार किया गया था, जो 1951 की जनगणना के बाद तैयार हुआ था और इसमें तात्कालिक असम के रहने वाले लोगों को शामिल किया गया था। लेकिन इसके बाद 1971 में जब पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के खिलाफ पाकिस्तानी सेना की हिंसक कार्रवाई शुरू हुई तो वहां के लगभग 10 लाख लोगों ने असम में शरण ली। बांग्लादेश बनने के बाद इनमें से अधिकांश लौट गए, लेकिन लगभग 1 लाख बांग्लादेशी असम में ही अवैध रूप से रह गए। 1971 के बाद भी बांग्लादेशी अवैध रूप से असम आते रहे। तब स्थानीय लोगों को लगा कि ये लोग उनके संसाधनों पर कब्जा कर लेंगे और इस तरह जनसंख्या में हो रहे इन बदलावों ने असम के मूल निवासियों में भाषायी, सांस्कृतिक और राजनीतिक असुरक्षा की भावना उत्पन्न कर दी।

  • इसकी प्रतिक्रयास्वरूप 1978 के आस-पास वहां एक शक्तिशाली आंदोलन शुरू हुआ, जिसका नेतृत्व वहां के युवाओं और छात्रों के संगठनों-आल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) और आल असम गण संग्राम परिषद (AAGSP) के हाथों में था। इसी समय यह मांग की गई कि विधानसभा चुनाव कराने से पहले विदेशी घुसपैठियों की समस्या का हल निकाला जाए। बांग्लादेशियों को वापस भेजने के अलावा आंदोलनकारियों ने 1961 के बाद राज्य में आने वाले लोगों को वापस भेजे जाने या उन्हें कहीं और बसाने की मांग की। आंदोलन उग्र होता गया और राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति उत्पन्न हो गई। 1983 के विधानसभा चुनाव में राज्य की बड़ी आबादी ने मतदान का बहिष्कार किया। इस बीच 1983 में राज्य में आदिवासी, भाषायी और सांप्रदायिक पहचानों के नाम पर बड़े पैमाने पर हिंसा हुई तथा 1984 के आम चुनावों में राज्य के 14 संसदीय क्षेत्रों में चुनाव ही नहीं हो पाए।

 

नागरिकता संसोधन अधिनियम पर सदन की राय


 

  • केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में नागरिकता संशोधन विधेयक को मंजूरी दी। इस पर संसद की संयुक्त समिति ने विचार किया है और समिति में तृणमूल कांग्रेस समेत कुछ दलों के सदस्यों ने असहमति का नोट दिया था।
  • यह विधेयक नागरिकता कानून 1955 में संशोधन के लिए लाया गया है। इस विधेयक के कानून बनने के बाद, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्म के मानने वाले अल्पसंख्यक समुदायों को 12 साल के बजाय सात साल भारत में गुजारने पर और बिना उचित दस्तावेजों के भी भारतीय नागरिकता मिल सकेगी।
  • सदन में सिंह ने बताया कि असम के छह समुदायों को आदिवासी समुदाय का दर्जा देने की मांग लम्बे समय से की जा रही थी। गृह मंत्रालय ने इस संबंध में एक समिति का गठन किया था और समिति ने सिफारिश दे दी है। इस बारे में विचार विमर्श भी किया गया है। इसके अनुरूप कोच राजभोगशी, ताइ आहोम, चोटिया, मतक, मोरान एवं चाय बागान से जुड़े समुदायों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणी में शामिल किया जाने का प्रस्ताव है।

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  • गृहमंत्री ने इन देशों में अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले भेदभाव और जबरन धर्म परिवर्तन की घटनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन पीडि़त अल्पसंख्यकों के पास भारत की तरफ रूख करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
  • गृहमंत्री ने कहा कि इन समुदायों को पहले संरक्षण दिया गया था। इनके लिए लंबे समय के वीजा का प्रावधान भी किया गया था। प्रस्तावित संशोधन के बाद ये पीडि़त अल्पसंख्यक भारतीय नागरिकता पाने के योग्य बन सकेंगे। प्रक्रियागत जांच और राज्य सरकारों एवं जिले के अधिकारियों की अनुशंसा के बाद ही इन अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता दी जाएगी।
  • नागरिकता संशोधन विधेयक में भारत में अल्पसंख्यकों की रहने की न्यूनतम अवधि 12 वर्षों से घटाकर सात वर्ष की गई है।
  • नागरिकता संशोधन अधिनियम केवल असम तक सीमित नहीं है। यह अधिनियम पाकिस्तान से प्रताडि़त होकर गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में आए प्रवासियों को भी राहत पहुंचाएगा।
  • यह विधेयक देश के सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों पर लागू होगा।
  • नागरिकता संशोधन विधेयक के लाभार्थी देश के किसी राज्य में गुजर-बसर कर सकते हैं।
  • अल्पसंख्यकों के भारतीय नागरिकता से बढऩे वाले बोझ का भार पूरा देश सहन करेगा। भारत सरकार असम को पूरी मदद देने के लिए प्रतिबद्ध है।

          साभार: टाइम्स नाऊ


 

असम एकॉर्ड

  • 1983 की इस भीषण हिंसा के बाद समझौते के लिये बातचीत की प्रक्रिया शुरू हुई तथा 15 अगस्त 1985 को केंद्र सरकार और आंदोलनकारियों के बीच समझौता हुआ जिसे असम समझौते (Assam Accord) के नाम से जाना जाता है। इस समझौते के तहत 1951 से 1961 के बीच असम आए सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता और वोट देने का अधिकार देने का फैसला हुआ। 1961 से 1971 के बीच आने वाले लोगों को नागरिकता तथा अन्य अधिकार दिये गए, लेकिन उन्हें मतदान का अधिकार नहीं दिया गया। इस समझौते का पैरा 5.8 कहता है- 25 मार्च, 1971 या उसके बाद असम में आने वाले विदेशियों को कानून के अनुसार निष्कासित किया जाएगा। ऐसे विदेशियों को बाहर निकालने के लिये तात्कालिक एवं व्यावहारिक कदम उठाए जाएंगे। असम के आर्थिक विकास के लिये पैकेज भी दिया गया। यह भी फैसला किया गया कि असमिया भाषी लोगों के सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषायी पहचान की सुरक्षा के लिये विशेष कानून और प्रशासनिक उपाय किये जाएंगे। असम समझौते के आधार पर मतदाता सूची में संशोधन किया गया। विधानसभा भंग करके 1985 में चुनाव कराए गए जिसमें नवगठित असम गण परिषद् को बहुमत मिला और AASU के अध्यक्ष प्रफुल्ल कुमार महंत को मुख्यमंत्री बनाया गया।

सर्वोच्च न्यायालय में गया मामला

2005 में 1951 के नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन को अपडेट करने का फैसला किया गया था, लेकिन इस पर कोई विशेष प्रगति नहीं हुई। असम में मुसलमानों की आबादी 34 प्रतिशत से ज्यादा है और इनमें से 85 प्रतिशत ऐसे हैं जो बाहर से आकर बसे हैं तथा ऐसे लोग ज्यादातर बांग्लादेशी हैं, जो अलग-अलग समय में आते रहे। बाद में इस मुद्दे को लेकर मामले विभिन्न अदालतों तक गए और 2015 में सभी मामलों को इकट्ठा कर सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में लाया गया। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर 31 दिसंबर, 2017 की रात असम के लिये नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन का मसौदा जारी किया गया जिसमें दो करोड़ से ज्यादा लोगों के नाम हैं।

क्यों हो रहा विरोध?

  • इस प्रस्तावित संशोधन का विरोध भी हो रहा है क्योंकि यह पहली बार है जब देश में स्पष्ट तौर से धार्मिक आधार पर नागरिकता दिये जाने की बात कही जा रही है। इस संशोधन को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ माना जा रहा है, जो समानता के अधिकार की बात करता है। साथ ही इस संशोधन को अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी नियमों के भी विरूद्ध माना जा रहा है। ‘भारत के विदेशी नागरिकों’ (ओसीआई) के पंजीकरण को रद्द करने संबंधी जो बदलाव इस विधेयक में किये जाने हैं, उन पर भी विवाद है। इस संशोधन विधेयक के विरोधियों का मानना है कि इससे अवैध प्रवास की समस्या को बढ़ावा मिलेगा।

इस मुद्दे पर क्या कहता है नागरिकता अधिनियम-1955?

नागरिकता अधिनियम-1955 कहता है कि किसी भी ‘अवैध प्रवासी’ को भारतीय नागरिकता नहीं दी जा सकती। इस कानून के तहत ‘अवैध प्रवासी’ की परिभाषा में दो तरह के लोग आते हैं-1. वे विदेशी जो बिना वैध पासपोर्ट या अन्य यात्रा दस्तावेजों के भारत आए हैं; 2. वे विदेशी जो वीजा अवधि समाप्त होने या अनुमत समय बीतने के बाद भी भारत में रूके हुए हैं।

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क्या है इस संशोधन विधेयक-2016 में?

  •  नागरिकता अधिनियम-1955 में संशोधन करने वाले इस नागरिकता संशोधन विधेयक-2016 में पड़ोसी देशों (बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान) से आए हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी तथा ईसाई अल्पसंख्यकों (मुस्लिम शामिल नहीं) को नागरिकता प्रदान करने की बात कही गई है, चाहे उनके पास जरूरी दस्तावेज हों या नहीं। विधेयक के कारण और उद्देश्यों में कहा गया है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के कई भारतीय मूल के लोगों ने नागरिकता के लिये आवेदन किया है, लेकिन उनके पास भारतीय मूल के होने का प्रमाण उपलब्ध नहीं है। फिलहाल जो नागरिकता कानून लागू है, उसके तहत नैसर्गिक नागरिकता के लिये अप्रवासी को तभी आवेदन करने की अनुमति है, जब वह आवेदन से ठीक पहले 12 महीने से भारत में रह रहा हो और पिछले 14 वर्षों में से 11 वर्ष भारत में रहा हो।
  •  प्रस्तावित विधेयक के माध्यम से अधिनियम की अनुसूची 3 में संशोधन का प्रस्ताव किया गया है ताकि वे 11 वर्ष के बजाय 6 वर्ष पूरे होने पर नागरिकता के पात्र हो सकें। इससे वे ‘अवैध प्रवासी’ की परिभाषा से बाहर हो जाएंगे। यह प्रस्तावित संशोधन ‘अवैध प्रवासी’ की इस परिभाषा में बदलाव करते हुए कहता है कि अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पकिस्तान से आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई लोगों को ‘अवैध प्रवासी’ नहीं माना जाएगा। यह संशोधन पड़ोसी देशों से आने वाले मुस्लिम लोगों को ही ‘अवैध प्रवासी’ मानता है, जबकि लगभग अन्य सभी लोगों को इस परिभाषा के दायरे से बाहर कर देता है।

भाजपा के इस मास्टरस्ट्रोक से सभी विपक्षी पार्टियां बौखलायीं हुयी हैं। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस इस तर्क पर इस बिल का विरोध कर रही है की भारतीय संविधान के अंतर्गत किसी की नागरिकता तय करने का मानक धर्म नहीं हो सकता। अपने हर कार्य में धर्म और जाती को प्रमुखता देने वाले कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस का यह कहना असल में उसके डर को प्रतिबिंबित करता है। उन्हें डर है की इस बिल को पास करवाने से पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों में बंगाली हिंदुओं के बीच भाजपा की स्थिति मजबूत होगी और मुसलमानों के लिए असहज स्थिति पैदा हो जाएगी, खासकर पूर्वी बांग्ला मूल के लोगों की, जिनकी आबादी अच्छी-खासी है। जबकि लोकसभा में  विधेयक पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए केंद्रीय गृहमंत्री  राजनाथ सिंह ने कहा कि इस विधेयक के बारे में विपक्षी दलों की आशंकाएं आधारहीन हैं। उन्होंने कहा कि यह विधेयक पड़ोसी देशों से धार्मिक रूप से प्रताडि़त होकर आए अल्पसंख्यकों को सुरक्षा एवं भारतीय नागरिकता की पेशकश करेगा। हालांकि, सरकार के इस कदम का विपक्ष सहित एनडीए के घटक दलों ने विरोध किया।

नागरिकता संशोधन विधेयक पर केंद्र सरकार के कदम का विरोध पूर्वोत्तर क्षेत्र के कई संगठन और राजनीतिक दल कर रहे हैं। असम के कुछ संगठनों ने संसद के बाहर प्रदर्शन भी किया था। कांग्रेस, टीएमसी, सपा, शिवसेना और अगप का कहना है कि यह विधेयक असम की क्षेत्रीयता, संस्कृति एवं अस्मिता का उल्लंघन करने वाला है।

वैसे देखा जाये तो उनकी आशंकाए निराधार भी नहीं है। भाजपा 1985 के असम समझौते के खंड छह को लागू करके इसके प्रतिकूल प्रभाव को खत्म करने की कोशिश कर रही है। ऐसा करने का मतलब असम में छह अन्य पिछड़ा वर्ग समुदायों (ओबीसी)-चाय जनजाति/आदिवासी, ताई-अहोम, चुटिया, मोरन, मोटोक और कोच-राजबोंगशी की स्थिति अनुसूचित जनजातियों (एसटी) जैसी हो जाएगी। पूर्वोत्तर के अपने एजेंडे  में भाजपा लम्बे समय से इसका वादा करती आयी भी है। भाजपा इस कदम से पूर्वोत्तर के स्वदेशियों के बीच अपनी स्थिति मजबूत करने में कामयाब भी हो सकती है। 2011 की जनगणना के अनुसार, असम में लगभग चालीस लाख आदिवासी हैं, जो राज्य की 3.1 करोड़ आबादी का 13 प्रतिशत हिस्सा हैं। जब इन छह ओबीसी को एसटी का दर्जा दे दिया जाएगा, तो राज्य में एसटी की आबादी बढ़कर कुल आबादी का 54 फीसदी हो जाने की संभावना है। हालांकि अभी एसटी के रूप में जो समुदाय सूचीबद्ध हैं, वे केंद्र के इस फैसले को सहजता से नहीं ले रहे हैं, लेकिन भाजपा को उम्मीद है कि ये समुदाय उनके फैसले का जबर्दस्त स्वागत करेंगे।

नागरिकता संसोधन विधेयक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भयंकर राजनितिक सूझ बुझ का परिचायक है। उन्होंने 2014 में सत्ता संभालते  ही कहा था की अगले साढ़े चार साल तक वह देश की भलाई के लिए काम करेंगे और बांकी के 6 महीने विशुद्ध राजनीति। नागरिक संसोधन विधेयक, सवर्ण आरक्षण जैसे मास्टरस्ट्रोक तो झांकी हैं, अभी 2 महीने और बांकी हैं। आगे-आगे देखिये होता है क्या!

 

नीलाभ कृष्ण

 

 

 

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