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मोदी बनाम मनमानी

मोदी बनाम मनमानी

जैसे-जैसे आम चुनाव नजदीक आता जा रहा है, वैसे-वैसे मोदी बनाम राहुल की जंग की धार को तेज करने की मीडिया की कोशिशें तेज होती जा रही हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनावी हार के बाद भारतीय जनता पार्टी जिस बेचैनी में थी, उससे वह पार पाते दिख रही है। हालांकि इन तीनों राज्यों में जीत हासिल कर चुकी कांग्रेस अब भी उत्साह में है। इसलिए कांग्रेसियों को लगता है कि अगले आम चुनाव के बाद ईवीएम की स्क्रीन खुलेगी तो 2004 जैसे ही हालात होंगे। कांग्रेसियों को लगता है कि जिस तरह 2004 में पूरा देश अजेय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जीत उम्मीद कर रहा था, लेकिन नतीजों में कांग्रेस भारतीय जनता पार्टी की तुलना में आगे निकल गई। लेकिन इस बार कहा नहीं जा सकता कि राजनीतिक हालात ठीक वैसे ही हैं। खुद राहुल गांधी की अगुआई को विपक्ष स्वीकार नहीं कर पाया है। जिस तरह उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने राज्य की 80 लोकसभा सीटों पर समझौता किया है,जिसमें उन्होंने खुद के लिए 38-38 सीटें और बाकी चार सीटें राष्ट्रीय लोकदल और कांग्रेस के लिए छोड़ दी हैं, उसके संकेत साफ हैं। संकेत यह कि वे राहुल गांधी की अगुआई और वर्चस्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। इसलिए यह सवाल उठना लाजिमी है कि अगले आम चुनाव में मोदी के खिलाफ कौन होगा?

वैसे भी भारतीय जनता पार्टी जानती है कि व्यक्तिगत लोकप्रियता में मोदी के सामने अभी कोई बड़ा नेता नहीं है। हाल में आए कुछ सर्वेक्षणों ने भले ही मोदी सरकार को अगले चुनाव में पूर्ण बहुमत मिलते नहीं दिखाया हो, लेकिन व्यक्तिगत लोकप्रियता में प्रधानमंत्री मोदी इन्हीं सर्वेक्षणों में काफी आगे हैं। इसका अंदाजा हाल ही में प्रमुख हिंदी चैनल आजतक के एक कार्यक्रम में भी नजर आया। प्रियंका गांधी के राजनीति में औपचारिक प्रवेश के बाद क्या होगा बदलाव, इस विषय पर चर्चा के लिए बिना किसी पूर्व तैयारी के चैनल की टीम 27 जनवरी को बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा और कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी के साथ दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस में पहुंच गई। कैमरा जब जनता के बीच पहुंचा और चैनल की एंकर माइक लेकर जनता से यह सवाल पूछने लगी कि प्रियंका के आने से कांग्रेस की सेहत पर कितना असर पड़ेगा तो वहां अचानक से जुटी जनता ने मोदी-मोदी के नारे लगाने शुरू कर दिए और यहां तक कहना शुरू कर दिया कि प्रियंका के आने से भारतीय जनता पार्टी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा और प्रियंका कुछ खास नहीं कर पाएंगी।

बेशक कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में ममता बनर्जी ने 22 दलों को जुटा लिया, इस रैली में इस बात पर एकमत भी रही कि केंद्र से मोदी को हटाना है, लेकिन यह तय नहीं हो पाया कि केंद्र में मोदी विरोधी चेहरा कौन होगा। यह भी कहा गया कि पहले हम मोदी को हटाएंगे और फिर बाद में तय करेंगे कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा। जाहिर है कि इससे विपक्ष के बीच भावी प्रधानमंत्री पद को लेकर मची उथल-पुथल का ही संकेत मिलता है। वैसे भी यह छिपा नहीं है कि खुद ममता बनर्जी अगला प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं। इसलिए उन्होंने अपने हरावल दस्ते के हर घोड़े खोल रखे हैं। प्रियंका के राजनीति में औपचारिक प्रवेश के बाद बेशक बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती के सपनों को थोड़ा झटका लगा है, लेकिन उत्तर प्रदेश में गठबंधन बनाने की घोषणा के बाद एक तरह से उन्होंने खुद को प्रधानमंत्री पद के बड़े दावेदार के लिए स्थापित कर लिया था। लेकिन प्रियंका के राजनीति में आने के बाद उनका दांव कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। दक्षिणी राज्य तेलंगाना के प्रमुख के चंद्रशेखर राव की भी मंशा छुपी नहीं है। लेकिन उनके पास सांसदों की वैसी संख्या आ भी नहीं सकती, क्योंकि राज्य से सिर्फ 17 लोकसभा सीटें ही आती हैं। विपक्षी गठबंधन में उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक भी नहीं है। हालांकि प्रधानमंत्री पद की दौड़ में उनका भी शामिल होना राजनीतिक आधार की बजाय किसी चमत्कार पर ही निर्भर करेगा, क्योंकि राज्य में लोकसभा की सिर्फ 21 सीटें ही आती हैं। रही बात दक्षिण के बड़े राज्य तमिलनाडु की तो वहां के सक्रिय दोनों बड़े दलों मसलन द्रमुक और अन्नाद्रमुक का कोई बड़ा नेता प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल होने लायक कद नहीं रखता। वैसे भी द्रमुक प्रमुख स्टालिन राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बता चुके हैं, जबकि अन्ना द्रमुक ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं।

कांग्रेस की कुल जमा ताकत अगर देखें तो मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, हिमाचल, उत्तराखंड, उड़ीसा और असम में ही नजर आ रही हैं। बाकी राज्यों में वह किसी न किसी बैसाखी के सहारे है। देश की सबसे पुरानी पार्टी की यह स्थिति उसकी मौजूदा ताकत को बताने के लिए काफी है। जबकि 1984 में सिर्फ दो लोकसभा सीटों पर जीत हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी अब सही मायने में राष्ट्रीय पार्टी बन गई है। दक्षिण भारतीय कुछ राज्यों को छोड़ दें तो अब हालत यह है कि हर जगह समूचा विपक्ष उसके खिलाफ मोर्चाबंदी कर रहा है। यानी 1989 तक लड़ाई होती थी, कांग्रेस बनाम अन्य। अब यह लड़ाई भारतीय जनता पार्टी बनाम अन्य हो गई है। इन संदर्भों में देखें तो यह भारतीय जनता पार्टी की बड़ी कामयाबी है।

बड़ा संगठन और बड़ी पार्टी बनने के बाद कुछ कमियां जो राजनीतिक तंत्र में आती हैं, दुर्भाग्य यह है कि उसका शिकार कैडर आधार वाली भारतीय जनता पार्टी भी बन गई। भारतीय जनता पार्टी में शीर्ष स्तर पर भले ही भ्रष्टाचार नजर नहीं आया, लेकिन भारत जैसे जटिल सामाजिक आधार वाले देश में मुद्दों से निबटने का रणनीतिक कौशल उसके कार्यकर्ता नहीं सीख पाए। फिर लगातार विपक्ष में रही पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती यह रही कि उसने अपने यहां शासन करने की कला अपने प्रथम पंक्ति के कार्यकर्ताओं को नहीं सिखाई। इसके चलते सरकार चला रहे उसके कार्यकर्ता और नेता विपक्षी गुगलियों में फंसते रहे, बेवजह की बयानबाजी करते रहे। भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने एक और गलती की। आम चुनावों में मिले उद्दाम जनसमर्थन के आवरण में वह ऐसे डूब गया, मानो जनता उसके पीछे दौड़ती ही आएगी। जटिल सामाजिक और आर्थिक समीकरण वाले देश में सिर्फ कठोर फैसले से ही काम नहीं चलते। यह सही है कि कठोर फैसलों का नतीजा देर से ही मिलता है, लेकिन तब तक भारत जैसे देश की जनता अधीर होने लगती है। वह अतीत की दूसरे दलों की गलतियों को भूलने लगती है और तात्कालिक तौर पर अपने लिए राहत भरे नतीजे चाहती है। जनता यह भूल जाती है कि कांग्रेस आपातकाल लाने वाली, सिख दंगों को भड़काने वाली, देश में मुस्लिम तुष्टिकरण का बीज बोने वाली पार्टी है और भारतीय जनता पार्टी की तुलना में कहीं ज्यादा पाक-साफ है और लोग कांग्रेस में अपनी भावी खुशहाल जिंदगी के अक्स देखने लगते हैं।

राजनीतिक तंत्र को यह समझना होगा कि भारत जैसे बहुसांस्कृतिक और विविधरंगी देश में, जहां जनता की सोच का स्तर पर विविधवर्णी है, वहां कठोर के साथ ही लोकलुभावन फैसलों की जरूरत होती है। लोकलुभावन फैसले ही वोट की फसल को मजबूत बनाते हैं। अगर लोकलुभावन फैसले नहीं होंगे तो सरकार नहीं लौटेगी और अगर सरकार नहीं लौटेगी तो कठोर फैसलों के दीर्घकालिक फायदे भी नहीं हो सकते। क्योंकि सत्ता बदलते ही नीतियां बदलने लगती हैं और बदलती नीतियों की वजह से कई बार अर्थव्यवस्था बेपटरी हो जाती है। इस तरह विकास की बात सिर्फ सपना ही रह जाती है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने इसी मुद्दे पर गड़बड़ी की।

अपने लंबे सत्ता संचालन के साथ कांग्रेस ने जो राजनीतिक संस्कृति विकसित कर दी है, उससे इतर किसी भी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता सोचना नहीं चाहता। वैसे भी पूरी दुनिया में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता अपने दल की सरकार के दौरान वाजिब ही सही फायदे पाने की उम्मीद लगाए रखते हैं। भारतीय जनता पार्टी इस मोर्चे पर नाकाम रही। उसने अपने कार्यकर्ताओं का ध्यान नहीं रखा। पार्टी के लोग कार्यकर्ताओं को नैतिकता का पाठ ही पढ़ाते रहे, इसका नतीजा ही रहा कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में कार्यकर्ता निराश रहा। उसने जमकर काम नहीं किया और मध्य प्रदेश में तो कांग्रेस से ज्यादा वोट हासिल करके भी पार्टी हार गई। कांग्रेसी राज में चूंकि उसके कार्यकर्ताओं का खास ध्यान रखा जाता है, इसलिए उसके कार्यकर्ताओं ने जोरदार तैयारी की और राजनीतिक क्षितिज पर मोदी की तुलना में कमजोर दिखने वाले राहुल बाजी मार ले गए।

कर्नाटक में जनता दल एस के साथ खट्टे-मीठे कांग्रेसी संबंध आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन उन्हें बहुत गहरा नहीं माना जा सकता। कश्मीर में कांग्रेस के साथ महबूबा हैं या उमर या दोनों, अभी तक साफ नहीं हो पाया है। बिहार में आरजेडी नेता तेजस्वी यादव भी अभी तक उन्हें नेता मानने का खुला ऐलान नहीं कर पाए हैं और ना ही उपेंद्र कुशवाहा। फिर बिहार में भी कांग्रेस को महागठबंधन में चार से ज्यादा सीटें मिलती नजर नहीं आ रही हैं। निस्तेज पड़े वामपंथी दलों ने भी अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं। सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी का कहना है कि नेता कौन होगा, इसका फैसला चुनाव नतीजों के बाद होगा।

बहरहाल मोदी बनाम कौन की जंग में राहुल को तवज्जो मिलती दिख रही है तो इसकी वजह यह है कि मीडिया और विपक्षी दल मोदी से खार खाए बैठे हैं और उनकी एक मात्र कोशिश मोदी को हटाने की है।

 

उमेश चतुर्वेदी

 

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