ब्रेकिंग न्यूज़ 

दुष्प्रचार के खतरनाक अंजाम से सावधान!

दुष्प्रचार के खतरनाक अंजाम से सावधान!

मशहूर अमेरिकी पत्रिका ‘फॉरेन अफेयर्स’ में हाल ही में एक विचारोत्तेजक लेख छपा है, जिसका शीर्षक ‘डीपफेक्स ऐंड द न्यू डिसइन्फार्मेशन वार’ (भारी फर्जीवाड़ा और नया दुष्प्रचार युद्ध) है। यह लेख न सिर्फ मौजू है, बल्कि यह ऐसे कई मुद्दों को समझने के लिए प्रासंगिक है, जो खासकर मोदी सरकार के राज में ”ज्वलंत’’ बताए जा रहे हैं। इसके लेखक रॉबर्ट चेस्ने और डैनियल सिरटन चेताते हैं ”डीपफेक्स यानी बहुत हद तक वास्तविक-सा लगने वाले ऑडियो या वीडियो छेड़छाड़ से किसी के बारे में वह बताना या उसे उस रूप में पेश करना आसान हो गया है, जो उसने कहा नहीं या जो उसने किया नहीं। बदतर, तो यह है कि डीपफेक्स तैयार करने के तरीके तेजी से बढ़ते जा सकते हैं। अनेक तरह के तत्व राजनैतिक फायदे के लिए इसमें सक्षम हैं। बेशक, दुष्प्रचार प्राचीन समय से होता आया है और मौजूदा दौर में उसकी प्रासंगिकता नए सिरे से बढ़ गई है। लेकिन डीपफेक तैयार करने की टेक्नोलॉजी जैसे विकसित और प्रसारित हो रही है, दुष्प्रचार का मौजूदा युद्ध जल्दी ही वैसा ही हो सकता है जब तलवार और ढाल से लड़ाईयां हुआ करती थीं।’’

डीपफेक तैयार करने की सेवाओं के पहले से ही खुले बाजार में मौजूद होने से चिंतित होकर लेखक द्वय का कहना है कि इन सेवाओं के प्रसार से कुछ सकारात्मक तो कई नकारात्मक चीजें पैदा होंगी। इसके सकारात्मक प्रयोग शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बहुत उपयोगी हो सकते हैं जबकि नकारात्मक प्रयोग गलत मकसदों के लिए मुफीद होंगे। मसलन, डीपफेक टेक्नोलॉजी के जरिए किसी व्याक्ति का चेहरा बिना उसकी जानकारी या सहमति के पोर्नोग्राफी के दृश्यें में फिट किया जा सकता है और फेक ऑडियो और वीडियो तैयार करने में आसानी की वजह से ब्लैकमेलिंग, धौंस-धमकी और नुकसान पंहुचाने के मौके काफी बढ़ेंगे।’’

रॉबर्ट चिस्ने और डैनियल सरटन डीपफेक टेक्नोलॉजी का राजनीति और अंतररराष्ट्रीय मामलों में संभावित इस्तेमाल को सबसे ”डरावना’’ मानते हैं। उनका कहना है, ”डीपफेक्स का इस्तेमाल हिंसा भड़काने, नेताओं और संस्थाओं की छवि बिगाडऩे या चुनाव को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है।’’

उनका यह भी कहना है कि ”डीपफेक्स के जरिए खासकर ऐसे दौर में भारी नुकसान पंहुचाया जा सकता है जब झूठ और सच को साफ-साफ अलग करना बेहद मुश्किल होता जा रहा है। लगभग पूरी 20वीं सदी में अखबार, पत्रिकाएं और टीवी चैनल लोगों तक खबर पहु़ंचाने का काम करते रहे हैं। पत्रकार खबर की गुणवत्ता को कड़े पेशेवर मानकों की कसौटी पर कसा करते थे और जन प्रसार के माध्यम थोड़े ही थे इसलिए कुछ ही व्यक्ति और संगठन खबर का व्यापक प्रसार कर सकते थे। हालांकि पिछले दशक भर से ज्यादा से ज्यादा लोग फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से खबरें प्राप्त करने लगे, जिसमें ढेरों लोग अपुष्ट खबरें डालते हैं। ये प्लेटफॉर्म ऐसी सूचनाओं के प्रसार का भी माध्यम हैं जो दुष्प्रचार के लिए किए जाते हैं और लोग इन सूचनाओं की पुष्टि की चिंता किए बगैर एक-दूसरे को भेज देते हैं। नतीजा यह होता है कि झूठ और फर्जीवाड़े का प्रसार पहले के मुकाबले तेजी से हो सकता है।’’

हम सभी जानते हैं कि 2016 में अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने के लिए रूस पर गंभीर आरोप हैं कि उसने फेसबुक और ट्विटर पर विभाजनकारी और राजनैतिक विद्वेष जैसे मैसेज प्रसारित किए। फ्रांस के चुनाव की पूर्व संध्या पर भी ऐसे ही आरोप उछले कि रूसी हैकरों ने कई चुराए गए दस्तावेजों को प्रसारित करके इमैनुअल मैकरां के चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश की। कई दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ भी की गई थी।

PAGE 22-272 copy

 

यहां मुद्दा यह उठता है कि सोशल मीडिया डीपफेक या झूठी खबरों को प्रसारित करने का बड़ा माध्यम बनता जा रहा है, जो राजनीति में विस्फोटक हालात पैदा कर सकते हैं। डीपफेक्स अलगाववादी और आतंकवादी संगठनों के लिए उपयोगी साबित हो रहे हैं। जैसा कि इन दिनों हम कश्मीर में देख रहे हैं। वहां आतंकवादी सोशल मीडिया में नफरत भरे शब्दों के जरिए सरकारी अधिकारियों सहित दुश्मनों को चिन्हित कर रहे हैं, उस पर हिंसा फैलाने या किसी मस्जिद को बम से उड़ाने की बातें करते हैं, नए रंगरूटों की भर्ती करते हैं और अपने लक्षित समूह तक संदेश पहुंचाते हैं।

इससे भी चिंता की बात है कि हमारे अपने देश भारत में आम चुनाव सिर पर हैं जिसमें डीपफेक्स का इस्तेमाल दिख सकता है। इसके लिए तीन ही मिसालें काफी होंगी।

विवादास्पद पृष्ठभूमि वाले स्वयंभू साइबर विशेषज्ञ अमेरिकी हैकर सैयद शुजा के हाल में किए दावे पर ही गौर करें। पिछले हफ्ते लंदन में कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की मौजूदगी में शुजा ने दावा किया कि  भाजपा नेता तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री गोपीनाथ मुंडे की हत्या की गई क्योंकि उन्हें 2014 में ”ईवीएम में छेड़छाड़ किए जाने’’ की जानकारी थी। शुजा ने यह भी दावा किया कि यह उसके बाद महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और गुजरात के विधानसभा चुनावों में किया गया।

ईवीएम हैकिंग का मुद्दा वक्त-वक्त पर चुनाव में हार के बाद राजनैतिक पार्टियां भी उठाती रही हैं। इसलिए यह समझा जा सकता है कि इससे क्षुब्ध होकर मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने शुजा के खिलाफ एफआइआर दर्ज किया और कहा कि चुनाव आयोग ईवीएम को छोड़कर बैलेट बॉक्स का इस्तेमाल करने से नहीं घबड़ाएगा। उनके दो पूर्ववर्तियों नवीन चावला और शहाबुद्दीन याकुब कुरैशी पिछले हफ्ते दो राष्ट्रीय अखबारों में लेख लिख चुके हैं कि 2017 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी के बुलावे पर कैसे ईवीएम को चुनौती देने वाले यह ”साबित’’ करने में नाकाम रहे हैं कि ईवीएम मशीनों को हैक किया जा सकता है।

7 दरअसल, अब वीवीपैट के साथ ईवीएम सही मायने में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव आश्वस्त करता है। अगर कोई ईवीएम का विरोधी है तो उसके निहितस्वार्थ ये है कि वैलेट पेपर होने पर ही जाति, धर्म और बाहुबल के इस्तेमाल से बूथ लूट कर आसानी से चुनाव जीत सकते हैं।

डीपफेक का राष्ट्रीय राजनैतिक परिदृश्य में दूसरा उदाहरण मोदी सरकार से फ्रांस से राफेल विमान सौदे का मामला है। ढेरों आरोप हैं कि सौदे के लिए काफी ऊंची कीमत अदा की गई और क्रोनी कैपटलिज्म या याराना पूंजीवाद को शह दिया गया। अक्सर कहा जाता है कि नाजियों का सिद्धांत था कि ”किसी झूठ को बार-बार कहो तो वह सच हो जाता है।’’ तथाकथित राफेल घोटाले का अब यही मामला है। दरअसल मैं अब देख पा रहा हूं कि मोदी सरकार के कई कट्टर समर्थक और भाजपा के कई वफादार सांसद भी यह मानने लगे हैं कि मोदी सरकार ने राफेल सौदे में ”कुछ गड़बड़’’ किया है।

असली मामला यह है कि 36 मध्यम दर्जे के लड़ाकू विमान (एमएमआरसीए) दस्सों राफेल जंगी जेट का सौदा मोदी सरकार ने 2015 में तब किया जब यह तय हो गया कि हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) और राफेल की निर्माता कंपनी दस्सां एविएशन के बीच ”सौदा को अंतिम मुकाम तक पहुंचाना’’ संभव नहीं है। दस्सां यूपीए राज में सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी थी। 2012 में दोनों के बीच सहमति सबसे कम बोली एल1 के प्रावधानों के तहत बनी थी, जो 2007 में कभी पेशकश की गई थी। लेकिन उसके बाद एचएएल और दस्सां अंति सौदे पर राजी नहीं हुए, जिसमें कीमत और दूसरी शर्तों की बात थी।

दरअसल दस्सां इस बात से सहमत नहीं थी कि एचएएल में राफेल की टेक्नोलॉजी के मुताबिक काम करने की काबिलियत है और इसलिए वह 108 राफेल विमानों के निर्माण की गुणवत्ता की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं थी, जो एचएएल में बनने थे। इसके अलावा दस्सां एचएएल की मजदूरी की कीमत से राजी नहीं थी जो उसके मुताबिक फ्रांस से भी अधिक पड़ रही थी। दरअसल दस्सां अगर एचएएल की कीमत पर राजी हो जाती तो उसे एल1 या सबसे कम बोली से भी हाथ धोना पड़ता। इसलिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी का यह दावा बेतुका है कि उनकी सरकार के तहत तय हुई कीमत मोदी सरकार की तय कीमत से काफी कम थी। मनमोहन सिंह सरकार के तहत विमान की अंतिम कीमत पर रजामंदी नहीं हुई थी। इसलिए तुलना का आधार क्या है?

सार-संक्षेप यह है कि मौजूदा सौदे के विरोधी इससे जुड़े पांच मुद्दे उठाते हैं। मौजूदा सौदे पर 23 सितंबर 2016 को औपचारिक दस्तखत हुए जबकि उसका ऐलान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अप्रैल 2015 में अपने फ्रांस दौरे के दौरान पेरिस में कर दिया था। एक, सौदे में स्थापित औपचारिक रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) का पालन नहीं किया गया। दूसरे, मोदी सरकार ने एचएएल के हित को दरकिनार कर दिया जो 2012 में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के दौरान हुए मूल सौदे के मुताबिक विमानों का साझा निर्माण करता। तीसरे, मोदी सरकार के 8.7 अरब डॉलर सौदे से एक विमान की कीमत 1570 करोड़ रु. पड़ती है जबकि यूपीए सरकार के दौरान कीमत 526.1 करोड़ रु. पड़ रही थी। चौथे, यह सौदा भारतीय वायु सेना के हक में नहीं, बल्कि अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस को फायदा पहुंचाती है। राहुल गांधी को यह अजीब लगता है कि ”23 सितंबर को 8.7 अरब डॉलर का सौदा तय होने के महज 10 दिन बाद 3 अक्टूबर 2016 को रिलायंस डिफेंस लिमिटेड फ्रांसीसी लड़ाकू विमान निर्माता दस्सां के साथ साझा वेंचर में शामिल हो गई’’ और इसकी सरकार से मंजूरी भी नहीं ली गई थी।

इन सभी आशंकाओं को सुप्रीम कोर्ट ही नकार चुका है। प्रक्रिया के मामले में सरकार की बात में दम है जब वह यह साफ करती है कि सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी (सीसीएस) से सितंबर 2016 में सौदे पर दस्तखत करने से पहले मंजूरी ली गई। बतौर प्रधानमंत्री मोदी को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर की सहमति से इस पर पहले फैसला करने का अधिकार था। बहरहाल, दोनों सरकारों के पांच दौर के बाद केंद्रीय कैबिनेट ने प्रधानमंत्री के पेरिस में लिए फैसले को मंजूरी दे दी। यहां यह बात भी गौर करने लायक है कि यह फैसला दो सरकारों के बीच है जबकि पहले का सौदा एचएएल और दस्सां के बीच व्यावसायिक सौदा था। जब सौदा दो सरकारों के बीच है कि उसमें भ्रष्टाचार या घोटाले की गुंजाइश नहीं है (यह कहना बेमानी है कि तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति  ओलांद ने मोदी को सौदा पटाने के लिए रिश्वत दी)।

जहां तक रिलायंस डिफेंस की भूमिका है तो तथ्य यह है कि मौजूदा सौदे से असामान्य ढंग से फ्रांसीसी कंपनी को सौदे की 49 फीसदी रकम ऑफसेट प्रावधानों के तहत भारतीय रक्षा उद्योग में निवेश करना पड़ेगा जबकि मानक स्थिति 30 फीसदी निवेश की है। और इस मामले में दस्सां खुद रिलायंस की साझेदार है जो तकनीकी पहलू को आश्वस्त करेगी। साझा उद्यम रिलायंस डिफेंस और दससां के बीच है और रिलायंस डिफेंस ने कहा है कि मोदी सरकार की कोई भूमिका नहीं है। ”24 जून 2016 को जारी सरकारी नीति बिना किसी मंजूरी के 49 फीसदी एफडीआइ के रक्षा क्षेत्र में निवेश की बात करती है। इसके तहत साझा उपक्रम स्थापित करने के लिए किसी सरकारी या सीसीएस से मंजूरी की दरकार नहीं है।’’ बेशक, कोई पूछ सकता है कि दस्सां ने भारत में रिलायंस को ही पार्टनर क्यों चुना लेकिन यह तो अभी अटकल ही है कि मोदी सरकार ने पार्टनर चुनने का ”दबाव’’ डाला।

अब असली मसले 2012 और 2016 के सौदों में कीमत के फर्क की बात की जाए। नए सौदे के मुताबिक 36 पूरी तरह तैयार चौथी पीढ़ी के बहुआयामी लड़ाकू विमान दो इंजन वाले दस्सां राफेल की कीमत तकरीबन 58,000 करोड़ रु. (7.8 अरब यूरो) पड़ेगी, जिसमें 15 फीसदी रकम एडवांस में अदा करनी होगी। फ्रांस का एमबीडीए मिसाइल सिस्टम्स अस्त्र-शस्त्र की आपूर्ति करेगा और उसी देश का थेल्स ग्रुप लड़ाकू जेट के उड़ान संबंधी तकनीक का जिम्मेदार होगा। यह भी समझा जाता है कि करार पर अंतिम दस्तखत के मोटे तौर पर 18 महीने के भीतर पहला विमान आ जाएगा और इस दौरान वायु सेना की विशेष जरूरत के हिसाब से इसमें कुछ फेरबदल भी कर लिया जाएगा।

सौदे के साथ ऑफसेट करार पर भी अमल होगा जिसके मुताबिक फ्रांस सौदे की रकम 7.8 अरब यूरो का 30 फीसदी राशि भारत के सैन्य वैमानिकी से संबंधित शोध कार्यक्रमों में निवेश करेगा और 20 फीसदी अपने भारतीय पार्टनर के साथ विमान उपकरणों (जरूरी नहीं कि राफेल के ही) के स्थानीय उत्पादन में निवेश करेगा। इसके अलावा फ्रांस के रक्षा कंट्राक्टर राडार और मिसाइल टेक्नोलॉजी की आपूर्ति करेंगे।

इसके अलावा मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक फ्रांस से 1 अरब डॉलर यूरो कावेरी इंजन प्रोजेक्ट में भी निवेश करने की उम्मीद है। वे प्रधानमंत्री मोदी के ”मेक इन इंडिया’’ मिशन को ध्यान में रखकर इंजन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए भी तैयार हैं। इससे हल्के लड़ाकू विमान तेजस की परियोजना को काफी मदद मिलेगी। दस्सां ने अपने फॉल्कन एक्जुक्युटिव जेट के कुछ हिस्से बनाने के लिए किसी निजी भारतीय कंपनी से साझेदारी को भी तैयार है।

दूसरे शब्दों में यह सौदा पूरे एक पैकेज का है, न कि इसकी कीमत एक विमान की कीमत पर आधारित है। सैन्य सूत्रों के मुताबिक मौजूदा कीमत पर 2012 के दाम में 5 फीसदी मुद्रास्फीति भी जुड़ी हुई है (दरअसल वह कीमत भी 2007 में सबसे कम बोली के नाते जाहिर की गई थी) और उसमें बाकी साज-सज्जा और उपकरणों की कीमत भी साथ है। 2007 की कीमत सभी 126 विमानों के आधार पर तय की गई थी जिसमें ज्यादातर (108) एचएएल में तैयार होनी थी, इसलिए कीमत पहली नजर में कम होनी ही थी। लेकिन गहरी छानबीन में स्थितियां अलग होती।

यूपीए सरकार के तहत 2012 का सौदा मोदी सरकार के 2014 में सत्ता में आने के समय तक पूरी तरह अंतिम नहीं हो पाया था तो उसकी वजह यह थी कि दस्सां कुछ शर्तों के पूरा होने तक एचएएल में निर्मित होने वाले जेट के प्रमुख उपकरणों पर अपनी मुहर लगाने को तैयार नहीं था। पहले ही बताया जा चुका है कि दोनों का झगड़ा मजदूरी को लेकर भी था। कथित तौर एचएएल का कहना था कि मजदूरी भारत में तीना गुना ज्यादा होगी और इसलिए यहां राफेल तैयार करने में ज्यादा कीमत आएगी जिसे फ्रांसीसी कंपनी मानने को तैयार नहीं थी। इस तरह वे किसी करार पर नहीं पहुंच पाए।

जैसा कि मेरे दोस्त प्रमुख रक्षा विशेषज्ञ अभिजित भट्टाचार्य कहते हैं, ”लंबी टलती सौदेबाजी का खामियाजा वायु सेना को दूसरे मोर्चे पर उठाना पड़ता था। राफेल की खरीद में देरी से उसे पहले से ही पुराने पड़ गए विमानों को चलाए रखना पड़ रहा था। इससे रक्षा तैयारी प्रभावित हो रही थी और प्रशिक्षण पर भी असर पड़ रहा था। यह एक दु:स्वप्र सरीखा बनता जा रहा था।

”ऐसे में भारत के पास क्या विकल्प था, जब 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रतिनिधिमंडल को पेरिस में हकीकत से पाला पड़ा? राफेल का चयन हो चुका था लेकिन अंतिम करार पर संदेह था। वायु सेना के बेड़े में 30 प्रतिशत विमान काम लायक नहीं बचे थे। कीमतों में इजाफा भारी हो चुका था। सौदा करने में चूक गई कंपनियां राफेल का करार तोडऩे की कोशिश में लगी थीं। विदेशी राजदूत आशंकाएं जाहिर करने लगे थे कि भारत एक कमतर विमान खरीद रहा है।

”राफेल सौदा रद्द होने से मामला वहीं का वहीं पहुंच जाता! दूसरे विमान की खरीद प्रक्रिया और चयन में 4-5 साल लग जाते! और तब तक भारतीय वायु सेना सिर्फ ”कागजी ताकत’’ बनकर रह जाएगी और इतिहास की किताबों के फुटनोट में यही लिखा जाएगा कि ”कभी यह शानदार फौज हुआ करती थी’’? ये हालात विदेश दौरे पर पूंजी निवेश, व्यापार सहयोग, अनुकूल निवेश माहौल और साझा औद्योगिक विकास के मकसद से गए भारतीय प्रधानमंत्री के लिए सुखद नहीं थे। सो, भारतीय वायु सेना की ‘करो या मरो’ जैसी हालत में सौदा किया गया जिस पर आलोचकों की नजर उठनी ही थी। फिर, 2007 के मूल सौदे के जारी रहने में जिनके हित थे, वे तो तीखे होते ही। फिर भी 36 विमान (दो स्क्वाड्रन) की खरीद रणनीतिक  और तकनीकी रूप से गलत नहीं कहला सकता, मगर और खरीद भी की जानी चाहिए।’’

यह सही है कि कमी को पूरा करने के लिए 36 राफेल काफी नहीं हैं। इसी वजह से पहले 126 विमानों की मांग थी। मोदी के आलोचक यही दलील जोरदार ढंग से लिखते हैं। लेकिन तथ्य यह भी है कि 36 तो तत्काल जरूरी था। इसी वजह से मोदी सरकार ने हाल में 110 एमएमआरसीए लड़ाकू विमानों के लिए नई निविदा जारी की है।

सब के बावजूद डीपफेक्स के जरिए सबसे बड़ा दुष्प्रचार बड़े करीने से फैलाया जा रहा है कि अनिल अंबानी समूह ने एचएएल को किनारे लगा दिया और अंबानी की कंपनी को इस करारा से 30,000 करोड़ रु. मिलने जा रहे हैं। लेकिन रणनीतिक विशेषज्ञ पथिकृत पाइन बताते हैं, ”एक तो रिलायंस डिफेंस ने एचएएल को किनारे नहीं लगाया। मोदी सरकार के खरीदे राफेल विमान फ्रांस में बनेंगे, भारत में नहीं। दूसरे, 30,000 करोड़ रु. मूल्य के ऑफसेट और दस्सां तथा उसके वेंडर सफरान और थेल्स के स्थानीय उपकरण खरीदने की शर्त से सबसे अधिक लाभ डीआरडीओ को होने जा रहा है।

9

”हाल में एक टीवी चैनल ने बाकायदा ग्राफ के साथ समझाया कि सफरान के साथ सहयोग से डीआरडीओ को 9,000 करोड़ रु. का ऑफसेट लाभ होगा, जो उसके कावेरी इंजन काय्रक्रम में जान फूंकने की कोशिश करेगी। बाकी 21,000 करोड़ रु.दस्सां, थेल्स और सफरान के ऑफसेट पाटर्नर करीब 90 कंपनियों में बंटेंगे। इन कंपनियों में सयरकारी उपक्रम बीईएल के अलावा सैमअेल, एचसीएल, महिंद्रा एयरोस्ट्रक्चर्स, एलऐंडटी, आइबीएम इंडिया, टीसीएस, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, गोदरेज ऐंड बॉयस और विप्रो जैसी कंपनियां हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कुल ऑफसेट करार के 30,000 करोड़ रु. में से महज तीन प्रतिशत से कुछ ऊपर रिलायंस डिफेंस के जिम्मे आएगा।

”संयोग से यूपीए के दौर में ही यह नीति स्थापित हुई कि ”ओवीएम/वेंडर/टायर 1 सब वेंडर ऑफसेट दायित्व को पूरा करने के लिए भारतीय ऑफसेट पार्टनर चुनने को स्वतंत्र होगा, बशर्ते भारतीय ऑफसेट पार्टनर पर कारोबार करने से रक्षा मंत्रालय की पाबंदी न लगी हो।’’ 23 जुलाई 2012 को रक्षा मंत्रालय से मंजूर ‘रक्षा खरीद प्रक्रिया-रक्षा ऑफसेट दिशा-निर्देश में संशोधन’ के प्रावधान की धारा 4.3 में यह कहा गया है। तो फिर राहुल गांधी को अगर यूपीए राज में इस नीति से दिक्कत नहीं थी तो आश्चर्य है कि दस्सां के पार्टनर चयन में आपत्ति क्यों है?’’

तीसरा बड़ा मुद्दा डीपफेक्स का यह है कि कथित तौर पर गोरक्षकों द्वारा मॉब लिंचिंग की अपुष्ट खबरों के जरिए देश की छवि को भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है। ऑनलाइन पोर्टल के आंकड़ों के आधार पर यह दावा किया जाता है कि 2010 से अब तक 63 भारतीय बीफ से जुड़े मॉब लिचिंग में मारे गए। सरकारी रिकॉर्ड के अभाव में ये आंकड़े बेहद अपुष्ट हैं। यह कहने का मतलब यह नहीं है कि गाय से जुड़ी मॉब लिचिंग की घटनाएं नहीं हुई हैं। लेकिन डीपफेक्स के जरिए उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर और सांप्रदायिक रंग देना बेहद खतरनाक है। अमूमन कहा जाता है कि इन घटनाओं के शिकार मुसलमान होते हैं और मोदी राज में मुसलमानों को उनके मुख्य धंधे बीफ निर्यात से वंचित कर दिया गया है। लेकिन इनमें सगााई कुछ कम है। मसलन, झारखंड में 18 मई 2018 को दो अलग-अलग घटनाओं में सात लोग मारे गए लेकिन ये घटनाएं गाय के नाम पर नहीं, बल्कि बगो चुराने की आशंका के चलते हुईं। इनमें चार मुसलमान और तीन हिंदू मारे गए। इसी तरह ओईसीडी-एफएओ एग्रीकल्चर आउटलुक की रिपोर्ट बताती है कि मोदी सरकार के तहत विकसित देशों को भारत से बीफ निर्यात दूना हो गया है। रिपोर्ट के मुताबिक ”भारत से 2017 में 15.6 लाख टन बीफ का निर्यात हुआ।’’

ऐसे ही यह अफवाह फैलाई जाती है कि हिंदू पर्व-त्यौहारों के दौरान मुसलमानों को बीफ खाने से रोक दिया जाता है। एक तो त्यौहारों के दौरान मांस की खपत पर पाबंदी मोदी राज में नहीं शुरू हुई। दूसरे ऐसी पाबंदियों के लिए मोदी को दोष देना बेमानी है क्योंकि पाबंदियां राज्य सरकारें या नगर निगम या नगरपालिकाएं लगाती हैं जबकि मोदी सरकार तो केंद्र में है। फिर यह देखिए कि मुंबई में जैन त्यौहारों के दौरान मांस की बिक्री पर रोक 1964 में लगी थी। तब तो वहां न भाजपा थी, न शिवसेना।

तभी से यह बार-बार जारी होता रहा है। दिलचस्प यह भी है कि प्रतिबंध का आदेश 2003 और 2005 में फिर जारी किए गए जब महाराष्ट्र में कांग्रेस-राकांपा की सरकार थी। यह भी गौर किया जा सकता है कि कांग्रेस के राज में भी बेंगलूरू नगरपालिका हर साल गणेश-उत्सव के दौरान दो दिनों तक मांस की बिक्री पर रोक लगाती है। दूसरे, इस दलील में भी तारतम्यता नहीं है कि लोगों के खान-पान की आदतों पर कोई पाबंदी नहीं होनी चाहिए। अगर यह सिद्धांत सबके लिए एक समान लागू हो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन हकीकत कुछ और है। मोदी विरोधी आंदोलन चलाने वाली ढेरों संस्थाएं अपने परिसर में सिर्फ शाकाहारी भोजन कीे ही इजाजत देती हैं। ऐसे लोग हरिद्वार या ऋषिकेश में मांस की बिक्री पर रोक पर तो हगा नहीं करते? फिर क्या वे प्रसिद्ध मस्जिदों के सामने रेस्तरां में पोर्क परोसने की इजाजत देंगे?

इसी तरह कई मौकों पर नरेंद्र मोदी और केंद्र के मंत्रियों के बयानों को देखेंगे तो कई बयानों को ऐसे तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है कि अर्थ ही बदल जाता है। मसलन, नरेंद्र मोदी के 2013 में एक विदेशी समाचार एजेंसी को दिए इंटरव्यू को ही लें। सवाल था कि क्या उन्हें 2002 में गुजरात दंगों का दुख है? मोदी ने कहा, ”ऐसे समझिए कि आप कार चला रहे हैं या कोई और कार चला रहा है और आप पिछली सीट पर बैठे हैं तब भी कोई कुत्ते का बच्चा भी पहिए के नीचे आ जाए तो वह दर्दनाक होगा कि नहीं? बेशक होगा। मैं मुख्यमंत्री हूं या नहीं, मैं एक मनुष्य हूं। अगर कहीं कुछ बुरा होता है तो स्वाभाविक दु:ख होता है।’’

लेकिन इसकी मोदी के विरोधियों और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने ऐसे व्याख्या की मोदी मुसलमानों की तुलना कुत्ते से करते हैं। दूसरा उदाहरण केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री जनरल वी.के. सिंह का है। फरीदाबाद के एक गांव में अक्टूबर 2015 में दो दलित बच्चों की हत्या हो गई थी। एक टीवी चैनल के सवालों के जवाब में मंत्री ने कहा कि मामला संपत्ति विवाद का है इसमें जाति को नहीं लाना चाहिए। लेकिन इससे चैनल पत्रकार संतुष्ट नहीं हुआ और उसने इसमें केंद्र की भूमिका के बारे में पूछा। दस पर जनरल वी.के. सिंह ने कहा, ”कोई किसी कुत्ते पर पत्थर फेंक दे तो क्या केंद्र को ही दोषी ठहराया जाएगा?’’ लेकिन विपक्ष ने मांग कर दी कि जनरल के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा चलना चाहिए क्योंकि उन्होंने दलितों को कुत्ता कहा है!

इन सब बातों के मद्देनजर रॉबर्ट चिस्ने और डैनियल सरटन की इस बात से सहमत होना ही पड़ता है कि डीपफेक्स लोकतंत्र पर गहरा खतरा बन चुके हैं। इसका इस्तेमाल सामजिक और वैचारिक खाइयों को चौड़ी करने और झूठ का फल चखने के लिए किया जा रहा है।

Mr.-Prakash-Nanda 

   प्रकाश नंदा

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.