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ममता के कदमों से उठे कुछ यक्ष प्रश्न

ममता के कदमों से उठे कुछ यक्ष प्रश्न

पश्चिम बंगाल में जब वाममोर्चे की सरकार थी, तब एक किस्सा बंगाल में खूब चलता था। वाममोर्चे के शासन के दौरान मुख्यमंत्री रहे ज्योति बसु बाल कटाने नाई के पास गए थे। लेकिन नाई की तमाम कोशिशों के बावजूद ज्योति बसु के बाल खड़े ही नहीं हो पा रहे थे। परेशानी में उसे उपाय सूझा, और झट से वह बोल पड़ा मोमता बांग्ला में ममता का उच्चारण ममता ही होता है। यह सुनते ही ज्योति बसु के बाल खड़े हो गए और तैयार बैठे नाई ने ज्योति दा के बाल छांट दिए थे।

कभी पश्चिम बंगाल की राजनीति में वाममोर्चे के लिए खौफनाक हस्ती बनकर उभरी ममता की राजनीति को हो सकता है कि पश्चिम बंगाल की एक जनता पसंद कर रही हो। क्योंकि बीती तीन फरवरी को अपने अधीनस्थ पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार को सीबीआई से बचाने के लिए वे जिस तरह प्रोटोकॉल तोड़कर कमिश्नर के घर पहुंची और सीबीआई की टीम को ही हिरासत में भिजवाया, उसे संविधान के जानकार सही नहीं मानते। सीबीआई ने अगले दिन सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में बड़ी उम्मीद से अर्जी डाली थी। लेकिन उसकी उम्मीद का एक हिस्सा ही पूरा हो पाया। केंद्र सरकार और सीबीआई को उम्मीद रही होगी कि सुप्रीम कोर्ट राज्य में कानून और संवैधानिक व्यवस्था पर भी टिप्पणी कर सकता है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि राजीव कुमार की गिरफ्तारी नहीं हो सकती है, लेकिन तीसरी जगह उनसे पूछताछ की अनुमति दे दी। इसके चलते राजीव कुमार और तृणमूल कांग्रेस नेता कुणाल घोष से लगातार दो दिनों तक पूछताछ हुई।

भारतीय राजनीति चूंकि चुनावी मुहाने पर है, इसलिए इसने सामान्य और सहज राजनीतिक शिष्टाचार तक को ताक पर रख दिया है। भारतीय राजनीति पूरी तरह दो हिस्सों में बंट गई है, एक तरह नरेंद्र मोदी हैं तो दूसरी तरफ उनके विरोधी। विरोधियों में अगले आम चुनाव के बाद सत्ता तंत्र पर काबिज होने की बलवती आकांक्षा पल रही है। उनके अंदर भी इसे लेकर खासा अंतरविरोध है। लेकिन मोदी से लड़ाई में उन्होंने एक साथ रहने का फैसला किया है। विपक्षी खेमे में अब तक यह फैसला नहीं हो पाया है कि आम चुनावों के बाद अगर विपक्षी दलों के पास सरकार बनाने की नौबत आई तो उनका नेतृत्व कौन करेगा? कभी इस दौड़ में राहुल गांधी आगे निकलते दिखते हैं तो कभी ममता तो कभी मायावती। वैसे मायावती और ममता में राहुल गांधी से एक विचार पर समानता है। समानता का वह मुद्दा है, भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी को सत्ता से उखाड़ फेंकना। लेकिन चाहे ममता हों या माया, दोनों ने कभी राहुल गांधी को अपना नेता नहीं माना।

बहरहाल वे काफी समय से ताक में थी कि विपक्ष की नेता के तौर पर वे उभरें। उन्हें सीबीआई द्वारा अपने पुलिस कमिश्नर पर छापेमारी इसके लिए उचित मौका नजर आया। उन्होंने सारे प्रोटोकॉल तोड़ दिए और अपने अधीनस्थ अफसर के घर खुद पहुंच गईं और उन्होंने केंद्रीय जांच एजेंसी पर हमला बोल दिया। इस मामले में कायदे से दूसरे दलों को झटका लगना चाहिए था, लेकिन राहुल गांधी से लेकर तमाम विपक्षी नेताओं ने ममता के कदम को जायज ठहरा दिया। एन. चंद्रबाबू नायडू तो नरेंद्र मोदी से इतने खफा हैं कि वे हर मौके पर उनके खिलाफ खड़े हो जाते हैं। ममता का साथ आमतौर पर ऐसे मामलों में किनारे रहने वाले उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक तक ने दिया। हालांकि बाद में उनके बीजू जनता दल ने इस मामले में सफाई भी दी कि इसे दो दलों के संबंध के तौर पर जोड़कर ना देखा जाय। बहरहाल इस एक कदम के जरिए ममता ने देश को यह संदेश दे दिया कि अगर विपक्ष में कोई दमदार नेता है तो वे ही हैं, जो नरेंद्र मोदी को चुनौती दे सकती हैं।

वैसे भारतीय जनता पार्टी की ओर से ममता के कदम पर ऐसे सवाल उठाए जा रहे हैं, जिन पर भरोसा किया जाय तो उनके कदम के प्रति संदेह उमड़ता है। सवाल यह है कि चालीस हजार करोड़ को शारदा चिट फंड घोटाले से परेशान लाखों लोगों के आंसू पोंछने के बजाय उन्होंने अपने पुलिस कमिश्नर का साथ क्यों दिया? सवाल यह भी है कि उनके मंत्री मदन मित्र, उनके सहयोगी सुदीप बंदोपाध्याय और मुकुल रॉय गिरफ्तार किए गए, उस दौरान ममता चुप रहीं। उन्हें अपने पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं की गिरफ्तारी के दौरान गुस्सा नहीं आया, लेकिन एक पुलिस अफसर पर कार्रवाई होते ही आखिर क्या वजह रही कि उन्हें इतना गुस्सा आ गया। ममता विरोधी दल इस कदम के पीछे दाल में काला जैसे मुहावरे को सही साबित होते देख रहे हैं।

बंगाल की शेरनी के तौर पर ममता इसीलिए विख्यात हुईं, क्योंकि उन्होंने वाममोर्चा का सड़क पर उतर संघर्ष किया। इस संघर्ष में उन्हें जब सहयोग की जरूरत पड़ी तो भारतीय जनता पार्टी का साथ भी लिया और 1998 से लेकर 2004 तक भारतीय जनता पार्टी के साथ रहीं। केंद्र में रेलमंत्री का पद भी संभाला। लेकिन अब वे उसी भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ मैदान में है, जिसका साथ लेकर उन्होंने पश्चिम बंगाल की सत्ता तक का सफर तय किया। प्रधानमंत्री रहते अटल बिहारी वाजपेयी ने कोलकाता में उनके कालीघाट स्थित घर की यात्रा की थी, तब उन्होंने ममता की मां से कहा था कि आपकी बेटी मुझे बहुत तंग करती है। हास-परिहास में कही गई वाजपेयी की बात अब भारतीय जनता पार्टी को भी सच साबित होते नजर आ रही है। भारतीय जनता पार्टी के नेता मानते है कि ममता राज्य में प्रधानमंत्री की रैलियों में उमड़ रही भीड़ को देखकर परेशान हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के हेलीकॉप्टर कई जगह नहीं उतरने दिए। योगी आदित्यनाथ को तो झारखंड के बोकारो में अपना हेलीकॉप्टर उतारकर सड़क मार्ग से 28 किलोमीटर दूर पुलिसिया में जाकर अपनी सभा करनी पड़ी। जाहिर है कि ममता बौखला गई हैं। हालांकि तीन फरवरी को कोलकाता में सीबीआई कार्रवाई के खिलाफ मेट्रो चैनल पर धरना देते वक्त उन्होंने इस बात से इनकार किया था कि वे बदले की भावना से कार्रवाई नहीं कर रही हैं। हालांकि वे इस सवाल का वे ठोस जवाब नहीं दे पाईं कि आखिर सरकारी हेलीपैड का इस्तेमाल वे भाजपा नेताओं को क्यों नहीं करने दे रहीं?

ममता ने एक बात और की। चालीस हजार करोड़ रूपए के शारदा चिट फंड घोटाले की सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जांच कर रही सीबीआई को कोलकाता पुलिस कमिश्नर से पूछताछ की अनुमति देने को भी अपनी नैतिक जीत बताया। जबकि यह उनकी नैतिक जीत नहीं थी। गरीबों और मजलूमों के हक-हकूड़ की लड़ाई के लिए विख्यात ममता ने कम से कम सीबीआई के मामले पर वह छाप छोडऩे में कामयाब नहीं हो पाई हैं। बेशक इस मौके का उन्होंने इस्तेमाल बंगाली अस्मिता को उभारने के लिए किया, और एक हद तक इसमें वे कामयाब भी रहीं। इसकी बड़ी वजह यह है कि भारत में तमिल, बांग्ला, मराठी आदि उपराष्ट्रीयताएं हिंदीभाषी प्रदेशों की तरह सिर्फ राष्ट्रीय अस्मिता की सोच नहीं रखतीं, बल्कि वे अपनी उपराष्ट्रीयताओं का भी ख्याल करती हैं। इसलिए पश्चिम बंगाल में वे नरेंद्र मोदी के खिलाफ बांग्ला अस्मिता को उभारने में एक हद तक कामयाब भी रहीं।

नरेंद्र मोदी के अंध विरोध के बहाने सीबीआई के खिलाफ कार्रवाई करके उन्होंने कुछ यक्ष प्रश्न भी इस देश के सामने छोड़े हैं। कल को मान लीजिए कि ममता केंद्र में सरकार बनाती हैं और वे सर्वोच्च पद पर पहुंचती हैं और संयोग से पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी या कोई दूसरी पार्टी सरकार बनाती है तो क्या वह ममता के किसी कृत्य के उनके बंगाल पहुंचने पर उन्हें गिरफ्तार इस बिना पर कर लेगी, क्योंकि कानून और व्यवस्था राज्य सूची का विषय है। क्या तब राज्य सरकार को संघवाद के नाम पर केंद्र सरकार के प्रशासनिक कदमों को संवैधानिक परंपाराओं को किनारे पर रखने की शर्त पर विरोध करने की अनुमति दी जाएगी? अगर ऐसा हुआ तो निश्चित तौर पर राष्ट्रीय एकता को लेकर गंभीर परिणाम होंगे। तब हर राज्य सरकार आने वाले दिनों में अपने कदमों के लिए स्वायत्त नहीं आजाद होगी। दिलचस्प यह है कि ममता ने ये कदम संविधान बचाने के नाम पर उठाए।

अगले आम चुनाव में जनता चाहे जिसे चुने, लेकिन यह तय है कि ममता के जरिए उठे कुछ यक्ष प्रश्नों पर भी जरूर विचार होना चाहिए। क्योंकि राजनीतिक दलों से ज्यादा जरूरी देश है।

उमेश चतुर्वेदी

 

 

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