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राष्ट्रवाद की अवधारणा

राष्ट्रवाद की अवधारणा

राष्ट्रवाद पर विवेचना करने से पूर्व हमें यह जानना आवश्यक है कि राष्ट्र की परिभाषा क्या है। राष्ट्र का शाब्दिक अर्थ है दातियों का संगम स्थल। दाति का अर्थ है देना अर्थात राष्ट्रजन, वहां के निवासी अपनी जन्मभूमि को अर्पण कर देते हैं राजते शोभते इति राष्ट्रम – राजधातु+ष्ट्रन प्रत्यय से बना है। राष्ट्र, शब्द सार्थक संज्ञा वाला सिद्ध होता है।

भारत के सर्वाधिक ग्रन्थों वेदों में राष्ट्र की अवधारणा बहुत समय पूर्व कर दी गई थी। युजुर्वेद (10। 2। 9) में इस प्रकार कहा गया है- तुम राष्ट्रदाता हो मुझे राष्ट्र दो। तुम ओजस्वी हो, मुझे राष्ट्र दो तुम जनता के पालक हो राष्ट्रदाता हो, मुझे राष्ट्र दो। तुम बलिष्ठ और सेना वाले हो मुझे राष्ट्र दो। तुम तेजस्वी और राष्ट्रदाता हो, मुझे राष्ट्र दो।

युजुर्वेद (9। 23) में कहा गया है- ‘वंदे राष्ट्रे जाग्रयाम पुरोहिता’ अर्थात हम राष्ट्र को जाग्रत एवं जीवंत बनाए रखेंगे।

अथर्ववेद (6। 128। 1 ) में कहा गया है- ‘भद्राहमस्में प्रायच्छन इदं राष्ट्रमसदिति’ अर्थात यह राष्ट्र उन्नतिशील हो हम इसकी कामना करते हैं।

‘इदं राष्ट्र पिपृहि सौभाग्य’- अर्थववेद 7/ 35/ 1 अर्थात श्रीवृद्धि के लिए राष्ट्र को पुष्ट करो।

”सत्य वृहदतमुग्र दीक्षा तपो ब्रम्ह यज्ञ पृथिवी द्यारियन्ति। सा नो भूतस्य भवयस्य पल्युरू लोक पृथिवी न: कृणोतु।।’’

(अर्थववेद 12। 1।1) अर्थात सत्य निष्ठा, विस्तृत यथार्थ बोध उग्रता दीक्षा तपश्चर्या ब्रम्हाशक्ति यज्ञ ये सात भाव मातृभूमि का पालन पोषण तथा संरक्षण करते हैं। भूतकालीन एवं भविष्य में होनेवाले सभी जीवों का पालन करने वाली मातृभूमि हमें विस्तृत स्थान प्रदान करें। बृहद राष्ट्र संवेश्य दधातु अर्थववेद 3। 8। 1 में कहा गया है हे सर्वशक्तिमान हमें विशाल, महान एवं आदर्श राष्ट्र प्रदान करें।

सत्वा राष्ट्राय सुभृत विमर्तु अर्थववेद 13। 1। 1 के अनुसार राष्ट्ररक्षा के लिए भगवान तुम्हारा कल्याण करें।

राष्ट्र च रोह द्राविण च रोह, अर्थववेद 13। 1। 34, अर्थात राष्ट्र की उन्नति करो औैर धन सम्पत्ति बढ़ाओ। राष्ट्रमृत्याय पर्यूहामि शतशारदाय, अर्थववेद 19। 37। 3, अर्थात राष्ट्र की सेवा के लिए मैं स्वंय को दृढ़ बनाता हूं।

ततो राष्ट्र बलमोजश्च जातम, अर्थववेद 19। 41। 1, में कहा गया है: ऋषियों के तप एवं दीक्षा से राष्ट्र का बल एवं ओज बना।

उपरोक्त तथ्यों से यह बात स्वत: प्रकट होती है कि प्राचीन काल से ही हम राष्ट्र के महत्त्व को समझते आए हैं। राष्ट्रहित ही सर्वोपरि है। भारतीय संस्कृति में राष्ट्र एक सांस्कृति शब्द रहा है। पश्चिमी देशों में राष्ट्र को नेशन/ स्टेट या राज्य के रूप में जाना जाता है। वहां राष्ट्र एवं राज्य को एक समान माना जाता है। उसका अस्तित्व राज्य सत्ता पर निर्भर करता है। भारतीय मनीषियों ने राष्ट्र की जो अवधारणा प्रकट की है उसमें तीन बिन्दु स्पष्ट रूप से रखे हैं- 1. भूखंड 2. निवासी 3. संस्कृति

  1. भूखंड- किसी राष्ट्र के लिए एक भूखंड आवश्यक है जो प्राकृतिक सीमाओं से बंधा हुआ हो।
  2. निवासी- उस भूखंड में रहने वाला समाज जो उस भूखंड के प्रति पूज्य भाव रखे उससे मातृभूमि के रूप में प्रेम करे और वह समाज स्वंय को उस भूखंड के पुत्ररूप में स्वीकार करे।
  3. संस्कृति- व्यक्ति एवं समुदाय की उसके जीवन की एक विशिष्ट पद्धति होनी चाहिए, समुदाय की सम्मलित परम्परा आदर्श भावना एवं विश्वास एक होना चाहिए जिनके सभी हित एक रूप हो गए हो। वे सुव्यववस्थिति रूप से संगठित हो और वे समभाव से निवास करते हों तो उसे एक राष्ट्र कहा जाता है। महान विचारक एवं राष्ट्रीयता के प्रबल उद्घोषक श्री अरविन्द जी के अनुसार राष्ट्र हमारी जन्मभूमि है यह मात्र भूखंड नहीं है यह एक विराट शक्ति है जो करोड़ों लोगों का समूच्चय है। यह केवल शाब्दिक नाम नहीं है। राष्ट्र एक ऐसी मनोवैज्ञानिक इकाई है जिसे प्रकृति संसार भर में अत्यंत विभिन्न रूपों में भौतिक तथा राजनैतिक एकता के लिए शिक्षित करने में संलंग्न रही है। राष्ट्र मानव जाति के लिए विकसित होते हुए आत्मा की विशिष्ट शक्ति है। राष्ट्र एक सांस्कृतिक इकाई है, राजनैतिक एकता भले ही मिट जाए परंतु राष्ट्र तब भी बना है। राष्ट्र एक चेतना सत्ता हैं ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ है, यह तप शक्ति एवं सद्भावनाओं को धारण करने में समर्थ हैं।

श्री दीनदयाल उपाध्याय ने भी इसी प्रकार का मत व्यक्त किया है। उनके अनुसार जब एक मानव समुदाय के समक्ष एक लक्ष्य उद्येश्य विचार एवं आदर्श रहता है और समुदाय किसी भूमि विशेष का मातृभाव है तो वह राष्ट्र कहलाता है।

सम्पूर्णानन्द ने राष्ट्र को इस प्रकार परिभाषित किया-जब यह कहा यह कहा जाता है कि राष्ट्र को किसी निश्चित जीवन दर्शन को अंगीकार कर लेना चाहिए तो उसका अभिप्राय होता है कि राष्ट्र के सामने कोई निश्चित लक्ष्य एवं आदर्श होना चाहिए जिसकी प्राप्ति के लिए वह प्रयत्न करे।

साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में जो राष्ट्र जीवन रस से भरा है वह प्रभावों से डरता नहीं वह खुली आंखो से इस संसार को समस्त पदार्थो को समस्त धर्मो को मतो को समस्त काव्यों को देखता है और उसके जीवन की पूर्ति के लिए ऐश्वर्य आलोकित हो उठता है।

भारत का राष्ट्रवाद पश्चिमी देशों के राष्ट्रवाद से अलग है। जिसे हम राष्ट्र कहते हैं पश्चिमी देश उसे नेशन / स्टेट या राज्य कहते हैं। राज्य और राष्ट्र में बहुत अन्तर है। आजादी से पूर्व 1947 से पूर्व हमारे देश में अलग-अलग राज्य होते थे और वे अपने-अपने राज्य के प्रति वफादार होते थ,े भारत के प्रति नहीं जैसे जयपुर, जोधपुर, हैदराबाद, जुनागढ़ आदि रियासते थी और वे अपनी-अपनी रियासत के प्रति राजभक्ति रखते थे। परंतु एक राष्ट्र था- भारत और इसीलिए रियासते/ राज्य अलग-अलग होते हुए भी उनका राष्ट्रवाद एक ही था और वह था भारतीय राष्ट्रवाद। भारत केवल एक शब्द नहीं है, भारत का राष्ट्रवाद, भारत की सम्पूर्णता उसके भूगोल, उसके इतिहास, उसकी परंपरा, धर्म तथा यहां के लोगों में निहित है, यही कारण है कि भारत का राष्ट्रवाद एक धर्म, भाषा, संस्कृति में सम्माहित है। भारत के राष्ट्रवाद को जर्मनी की तरह एक दल नेता की तर्ज पर परिभाषित करना गलत होगा। भारत के राष्ट्रवादी विमर्श में भारत के लोग आधारभूत स्तम्भ हैं और भारत विविधता में एकता का बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करता है। भारत की विभिन्नताओं को ध्यान में रखकर राष्ट्रवाद की परिभाषा देने की जरूरत है जिसे हम अपने देशहित में उपयोग कर सकें लेकिन दुर्भाग्य यह है कि राष्ट्रवाद की परिभाषा हमें पश्चिमी विद्वानों से सीखनी पड़ रही है और हमारे विश्वविद्यालयों में बैठे शिक्षक उन उधार की परिभाषाओं और परिकल्पनाओं का प्रयोग करके महान भारत की एकता को छिन्न-भिन्न करने के सपने देख रहे हैं। जेएनयु नई दिल्ली में 9 फरवरी 2016 में घटित घटना इसका ज्वंलत प्रमाण है।

ग्लोबल ट्रेंड का असर भारत में भी है और राष्ट्रवाद पर राजनीति करना और इसे विचारधारा की मुख्यधारा में लाना केवल भारत नहीं बल्कि पूरे विश्व का राजनैतिक ट्रेंड है। यह दक्षिणपंथी या वामपंथी नजरिए वाली राजनीति के उभरने का समय है। राष्ट्रवाद के नाम पर रानीति करने का राइट विंग नजरिया रखनेवाले या गरीब दलितों के नाम पर राजनीति करनेवाले लेफ्ट विंग वाले आगे बढ़ रहे हैं। इन मुद्दों पर लोग एकजूट हैं। जे.एन.यू में उपजे विवाद को हम इसी रूप में देख रहे हैं। भारत में मौजुदा बहस हो या जापान में शिंजे अबे या अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रवादी सोच को सेंटर थीम बनाकर उनकी राजनीति न केवल लोकप्रिय हो रही है बल्कि लोगों पर इसका गहरा असर भी पड़ रहा है। यही कारण है कि कांग्रेस को इस मुद्दे पर बैकफुट पर आना पड़ा और उसे ऐसी कोशिश करनी पड़ी की लगे वे राष्ट्रवाद के साथ है। प्रसिद्ध चुनाव विश्लेषक यशवंत देशमुख का मानना है कि राष्ट्रवाद ऐसा मुद्दा है जो लोगों के दिलो-दिमाग को छूता है और वे इसको खुद को सीधे तौर पर जोड़कर देखते हैं लेकिन इसकी सीमा भी है। यदि राजनीतिक दल यह सोचेंगे और समझेंगे कि इससे लोगों की भावनाओं का लाभ उठाकर उसका उपयोग किया जा सकता है तो इसका उल्टा असर भी पड़ सकता है। भारत विविध रंगो, धर्मो, मजहबों, पंथों, जातियों से मिलकर बना है और राष्ट्रवाद का मतलब सबको साथ लेकर चलना है, राष्ट्रवाद में नफरत का कोई स्थान नहीं है। भारतीय राष्ट्रवाद पश्चिमी राष्ट्रवाद से अलग है। पश्चिमी देशों में राष्ट्रवाद एक भाषा, एक धर्म आदि पर आधारित है। इसके विपरित भारतीय उपमहाद्वीप में हजारों वर्षों की अवधि में विकसित हजारों भाषाओं/ धर्मों / पंथों / जातियों / समुदायों से विकसित हुई है। यह विभिन्नता में एकता का अद्भुत प्रणाम है।

नागरिक समूहों के बीच राष्ट्रवाद के नाम पर संकीर्णता आ जाएगी तो वह देश के लिए दुर्भाग्य होगा और उस देश के टुकड़े-टुकड़े करने से कोई नहीं रोक सकता और जे.एन.यू में जो नारे लगे उसके साकार होने में देर नहीं लगेगी इसका अंजाम हम भुगत चुके हैं। आजादी से पूर्व 1947 से पूर्व वर्तमान पाकिस्तानी एवं बांगला देश भारत का एक भू-भाग था। वहां के निवासियों का राष्ट्रवाद भारतीय राष्ट्रवाद था। वे भारत माता की जय वन्दे मातरम् तथा जय हिंद के नारे लगाते थे परंतु भारत का विभाजन होने के बाद पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान निवासी पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने लगे। उल्लेखनीय है कि उनके पूर्वजों ने कभी भारत माता की जय के नारे लगा कर अपने आपको गौरवान्वित करते थे और वर्तमान में वहीं पूर्वी पाकिस्तान बांग्ला देश बनने के बाद जय बांग्ला देश के नारे लगाते हैं और जय बांग्ला के उद्घोष से अपनी राष्ट्रभक्ति की अभिव्यक्ति ढूंढ रहा होगा। इसी प्रकार यही हाल सोवियत संघ में शामिल राज्यों का हुआ। इसलिए नागरिकों के समूहों के बीच राष्ट्रवाद को लेकर ज्यादा हठधर्मिता नहीं दिखनी चाहिए, उनमें मतभेद ज्यादा गहरे नहीं होने चाहिए। जो ऐसा कर रहा है वह स्वार्थवश अपना हित साधने के लिए कर रहा है परंतु राष्ट्र के लिए ऐसा करना घातक है और वह भविष्य के लिए कंाटे बो रहा है। पूर्वी पाकिस्तान की राष्ट्रवादी आकांक्षाओं को न समझ पानेवाली पश्चिमी पाकिस्तान की जिद ने इतिहास का रास्ता ही बदल दिया। राष्ट्रवाद का ऐसा संघर्ष राष्ट्र की एकता को ध्वस्त कर देता है, अत: ऐसी परिस्थियों में हमें बड़ी सूझबूझ से काम लेना होगा।

 

श्रीकृष्ण मुदगिल

 

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