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एक महिला होने का अर्थ

एक महिला होने का अर्थ

शैलजा पाठक की कविताएं किसी एक स्त्री की कविताएं नहीं हैं। ये कविताएं उन सब स्त्रियों की तरफ से हैं जो कविता नहीं लिखती लेकिन जिनके पास हर दिन, हर लम्हें की एक कहानी है, कहानियों के उस ढेर में कहीं कुछ ठोस है, तो कहीं बस कुछ कविता जैसा जो रिसता है, टीसता है। इस तरह वे हर दिन एक लम्बी कविता से होकर गुजऱती हैं। ये स्त्रियां किसी भी कस्बे में हो सकती हैं, किसी शहर में, किसी भी महानगर में। जहां भी हैं, कस्बे, शहर या महानगर का सबसे उपेक्षित कोना ही उनके हिस्से आया है। वहां भी उनके पास सोचने के लिए घर है, परिवार है, समाज और दुनिया है। वह जो उपेक्षित कोने में रही हैं, किसी की भी उपेक्षा नहीं कर पाती। सब कुछ निभाते-निभाते सिर्फ खुद की उपेक्षा करती जाती हैं।

शैलजा की कविताएं स्त्री-विमर्श की रचनाएं नहीं हैं। ये विमर्शों के शुरू होने से पहले और खत्म हो जाने के बाद की कविताएं है। इनमें ना विरोध है, ना विद्रोह का कोई स्वर, ना कोई नारा, ना झंडा उठाये कोई संगठन। बस घुटी-घुटी सी चीखें है, जिनमें आवाज कम है, सासों की घरघराहट ज्यादा है। कभी-कभी रिरियाहट जैसी भी लग सकती हैं पर कोई रिरिया रहा है, तो क्या उसे सुना ही न जाए?

ये कविताएं सवालों की कविताएं हैं, जबाब तलाशने का अवकाश देती हुईं। पाठक को अपने साथ करके अकेला छोड़ देती। वह अकेलापन जो कविताओं में बसी स्त्रियों ने सदियों झेला हैं। इन स्त्रियों का अकेलापन उस अकेलेपन से कुछ अलग है जो सबकुछ भींग लेने के बाद अवसाद के कारण आता है। यह अकेलापन कुछ न पा सकने के बाद, जो था- उस छूटे हुए को याद करने से उपजी बेचैनी जैसा है।

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शैलजा पाठक की ये कविताएं स्त्रियों के झुण्ड की कविताएं हैं। एक समूह में जीती, चलती और गाती स्त्रियां जो सब अकेली हैं, अपने साथ हैं, सबके साथ। इस विडंबना और विरोधाभास को इन रचनाओं में जो पढ़ पायें, वह शैलजा की स्त्री को भी पढ़ पाएंगे अन्यथा ये हमें बहुत अजनबी लग सकती हैं। खास बात यह कि ये कविताएं कोई नई स्त्री नहीं गढ़ती, पहले से गढ़ी गईं सब स्त्रियों के साथ जाकर खड़ी हो जाती हैं। अगर आप अपनी आंख में कोई माप पहले से लेकर निकले हैं तो ये स्त्रियां आपको बेहद पिछड़ी हुईं, रूढि़वादी, अतीतजीवी और ढर्रे की महसूस होगी। इसलिए बेहतर है आप जरा आंख खोलकर पढ़ें इनको, तब शायद आपको अपने आसपास की हर स्त्री में ऐसी ही कोई स्त्री दिखाई देगी; तमाम मेकअप की परतें उघड़ी हुई होगी और एक असल कस्बाई स्त्री आपसे बतिया रही होगी। आपने अब तक उसे बतियाने का मौका ही नहीं दिया और हमेशा कहा कि बहुत बातूनी होती हैं स्त्रियां।

लेखिका शैलेजा पाठक की ‘जहां चुप्पी टूटती है’ नामक पुस्तक महिलाओं के जिवन को दर्शाती है, जो पाठको के मन को भायेंगी।

उदय इंडिया ब्यूरो

 

 

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