ब्रेकिंग न्यूज़ 

आतंक का अंत आक्रमण

आतंक का अंत आक्रमण

आखिर वर्षों से जिहादियों की दिनचर्या से भयभीत व पीडि़त राष्ट्रवादी समाज को जैश-ए-मोहम्मद के गढ़ पाकिस्तान स्थित बालाकोट पर विनाशकारी हवाई स्ट्राइक के बाद अब जिहाद से मुक्ति की कुछ आशा बंधी है। जिहादियों के कारण नित्य अपमानित होने वाले अब अपने स्वाभिमान के प्रति जागरूक हो रहें हैं। नि:संदेह वर्षो बाद भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति का परिचय दिया गया है। देश की सशक्त सेना का अवसरानुसार सदुपयोग करके समस्त शत्रुओं सहित विश्व को भी अब भारत ने अपने आक्रामक रूप के दर्शन करा दिये हैं।

आज देश को समझना होगा कि राजनैतिक अदूरदर्शिता के कारण सैन्य रणनीति अपने शौर्य प्रदर्शन से वंचित हो रही थी। उदारता, सहिष्णुता, अहिंसा व क्षमा आदि मानवीय गुणों की महत्ता बनाये रखने के कारण हमारी वीरता व रणनीतिज्ञ कौशल प्रभावित होता रहा। जिससे हम अत्याचार सहने को विवश होते रहे। ध्यान रहे कि हिंदुत्व सहिष्णुता का प्रतीक है परंतु इसकी भी एक सीमा होती है। सहिष्णुता अंतहीन नहीं होती। स्मरण रहना चाहिए कि भगवान श्री कष्ण ने भी शिशुपाल के निर्धारित सीमा लांघते ही उसका वध कर दिया था। हमारे देवी देवताओं का स्वरूप जहां रुद्र के समान रौद्र है, वहीं सरस्वती व लक्ष्मी के रूप में शान्त और सौम्य भी है। यदि देवता अमृत की वर्षा कर सकते हैं तो काली के रूप में नरमुंड धारण कर खप्पर से शत्रुओं का रक्तपान भी कर सकते हैं। अत: सत्य सनातन हिन्दू धर्म व संस्कृति की रक्षार्थ राष्ट्र में सक्षम, प्रेरणादायक व आक्रामक नेतृत्व आवश्यक हो गया है। आज देश के स्वर्णिम काल व परतंत्रता काल के इतिहास की सत्यता देश के युवाओं को स्पष्ट होनी चाहिये। उनका ऐसा उत्साहवर्धन हो कि उनकी बाहें अत्याचारियों व धर्मांधों को कुचलने के लिए अधीर होकर फड़कने लगें। विचार करना होगा कि समझदार व सभ्य बुद्धिजीवी युद्ध का विकल्प ढूंढते हैं परंतु यदि ‘युद्ध पिपासु’ जिहादी आक्रमणकारी ही बना रहें तो उनकी हत्या ही एकमात्र विकल्प होता है। हमें ‘जैसे को तैसा’ व ‘भय बिन होत न प्रीत’ की रीत को पुन: स्थापित करना होगा।

यह ऐतिहासिक सत्य है कि मुस्लिम आक्रांताओं की सेनाओं को हिन्दू राजाओं ने अनेक बार पराजित किया था। किन्तु हमारे हिन्दू राजाओं ने न तो ‘विजय का लाभ’ लिया और न ही इन ‘जिहादियों के आक्रमणों’ को समाप्त कर पाए। महापराक्रमी माने जानेवाले राजा पृथ्वीराज चौहान ने निरंतर 16 बार आक्रांता मोहम्मद गौरी को पराजित किया था। परंतु वे भी इन इस्लामी आक्रांताओं की बार-बार आक्रमण करने की जिहादी मनोवृत्ति को न समझने के कारण समाप्त नहीं कर पाये। आक्रामक नेतृत्व के अभाव में सैकड़ों वर्षों की पराजय से हिन्दू संघर्षहीन होकर आत्मसमर्पण को विवश होते रहे। इसलिये उस काल में भी शांति स्थापित न हो सकी। हमने इस ऐतिहासिक सत्य को भूला दिया और अपने अस्तित्व व स्वाभिमान की रक्षार्थ सजग ही नहीं हुए। जिसके दुष्परिणाम से मुगलकालीन मानसिकता का भयावह रूप अभी भी नियंत्रित नहीं हो पाया। क्या यह सत्य नहीं है कि इस्लामिक शिक्षाएं व विद्याएं अत्याचार और आतंकवाद को उकसाती है? जिससे बढ़ते हुए जिहाद के कारण विश्व में इस्लाम का झंडा लहरा कर ‘दारुल-इस्लाम’ की स्थापना हो सकें।

लेकिन वर्तमान विकट परिस्थितियों का एक कारण अगर स्व. मोहनदास करमचंद गांधी के तीन बंदरों वाले दर्शन व विशेष मुस्लिम प्रेम को माना जाय तो अनुचित नहीं होगा। आज स्व. नेहरू जी, स्व. वाजपेयी जी व डॉ. मनमोहन सिंह जैसे उदार नेतृत्व को भूलना होगा। इन्हीं के ढुलमुल नेतृत्व के कारण स्वतंत्रता के पश्चात मुगलकालीन जिहाद पुन: भयावह व घिनौने रूप में उभर रहा है। मुस्लिम जगत की अन्य सभ्यताओं व संस्कृतियों वाले समाज को इस्लाम बनाने की अनियंत्रित व अनुचित इच्छाओं के कारण संकट बढ़ रहा है। लेकिन अगर गैर-मुस्लिम समाज इस इस्लामिक संकट को समझ लें और मुसलमान अपनी इस जिहादी सोच को नियंत्रित कर लें तो संघर्ष से बचा जा सकता है। परंतु जब कोई सद्भाव व सौहार्द की भाषा न समझे तो उन्हें उन्हीं की भाषा में समझाना होगा, नहीं तो एक मरता रहेगा और दूसरा मारता रहेगा। यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं कि आज धर्मनिर्पेक्षता, मानवाधिकारवाद, अल्पसंख्यकवाद व मुस्लिम सशक्तिकरण ‘इस्लामिक आतंकवाद’ (जिहाद) का सबसे बड़ा पोषक बन चुका है? जिससे जिहादियों की दूषित मानसिकता ‘इस्लामिक कानून’ (शरिया) से चलें दुनिया बलवती हो रही है। आज राष्ट्रीय, सामाजिक व व्यक्तिगत जीवन दांव पर लगा हुआ है। बहुत क्षोभ की बात है कि हम अपनी संस्कृति, आस्था स्थलों, सरकारी संस्थानों, निर्दोष हिन्दू भाई-बहनों के इस्लामिक आतंकवाद से पीडि़त होने पर भी मौन रहते हैं, क्यों? क्या हम केवल मार खाने और घाव सहलाने के लिए बने हैं? इस जिहादी सोच को समझना और समझाना होगा आखिर हिन्दू मन-मस्तिष्क कब तक सत्य के आचरण से बचेगा?

मौलाना मसूद अजहर जैसे दुर्दांत आतंकी सरगना को (दिसम्बर 1999) प्लेन हाईजेक कांड (जनवरी 2000) में कंधार सकुशल पहुंचा कर हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री से अवश्य भयंकर भूल हुई थी। लगभग 189 लोगों की मौत के बदले मसूद सहित 3 खूंखार आतंकियों को छोडऩा उस समय यात्रियों के परिजन व कुछ नेताओं के असहयोग के कारण तत्कालीन शासन विवश था। जिहाद के सामने कुछ नागरिकों की सुरक्षा के लिए आत्मसमर्पण किया गया। इसी मौलाना मसूद ने इन 18-19 वर्षों में जिहाद के लिए भारत के सैकड़ों-हजारों निर्दोषों का रक्त बहाया व अरबों रुपयों की भारतीय संपत्ति को नष्ट किया है। 14 फरवरी पुलवामा (कश्मीर) में सीआरपीएफ के काफिले पर हुए कारबम द्वारा हुआ आत्मघाती हमले का उत्तरदायी मसूद अजहर व उसके संगठन जैश-ए-मोहम्मद को अब भारत सरकार चैन नहीं लेने देंगी।

वर्षो से जिहादियों के अत्याचारों से पीडि़त राष्ट्रवादी समाज की पीड़ा पुलवामा कांड से ज्वलंत हो उठी है। इससे उपजे जनमानस के विराट आक्रोश ने देश के शासन-प्रशासन को झकझोर दिया। इस असहनीय संकट में जब 40 से अधिक हमारे सैनिक हताहत हुए तो प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पाकिस्तान के विरूद्ध कुछ बहुप्रतीक्षित आवश्यक निर्णय निसंकोच लिए गए। तत्पश्चात सेनाओं को भी स्वतंत्र रूप से शत्रु के प्रति आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश देकर श्री नरेंद्र मोदी ने अपने आक्रामक तेवर दर्शा दिये। परिणामस्वरूप समाचारों के अनुसार  26 फरवरी की भोर में हमारी वायुसेना ने वीरता का अद्भूत परिचय देते हुए जैश-ए-मोहम्मद के कई ठिकानों को विंध्वस करके उनके 200-300 आतंकियों को भी ढेर करने में सफल हुए।

आज दशकों बात भारत की जनता इस सफल प्रतिशोध पर अपने प्रधानमंत्री के साहसिक निर्णय के प्रति कृतज्ञ हो रही है। देशवासी मोदी जी के विचार व कथन को किर्यान्वित करने की कुशलता, दृढ़ता व सफलता पर अभिभूत है। ऐसे आक्रामक नेतृत्व के कारण आज भारतीय जनमानस में राष्ट्रभक्ति का प्रवाह चरम पर है। सम्भवत: राष्ट्रभक्ति का ऐसा स्वरूप स्वतंत्रता के बाद अब देखा जा रहा है। नगर हो या गांव सभी देशभक्त सड़कों पर तिरंगा लेकर आंदोलित हो रहे हंै। नि:संदेह आक्रामक नेतृत्व ही युवाओं व देशभक्तों को प्रभावित करता है। आज देश-विदेश में रहने वाले समस्त भारत भक्तों का हृदय गौरवान्वित हो रहा है।

 

विनोद कुमार सर्वोदय

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.