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राजनीति में धर्म का दुरूपयोग

राजनीति में धर्म का दुरूपयोग

”जो कहते हैं कि धर्म का राजनीति से कोई लेनादेना नहीं है, उन्हें धर्म के बारे में पता नहीं है।’’-महात्मा गांधी

लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया अपने शबाब पर है और राजनैतिक पार्टियां जाति, समुदाय और धर्म के आधार पर अपना पंख फैलाने में लगी हैं। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दोनों तरह की पार्टियां एक-दूसरे पर आरोप मढ़ रही हैं, टीवी चैनलों पर एक-दूसरे पर आग उगल रही हैं। सरेआम कीचड़ उछाले जा रहे हैं और गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं। पार्टियां जिताऊ उम्मीदवारों के नाम पर बिना नाम लिए जाति और धर्म का कार्ड धड़ल्ले से खेल रही है। बीजू जनता दल और तृणमूल कांग्रेस जैसी क्षेत्रीय पार्टियां तो महिला वोटरों को लुभाने के लिए अधिक से अधिक महिला उम्मीदवार उतार रही हैं।

सभी पार्टियों के ज्यादातर फैसले वोट बैंक की राजनीति से तय हो रहे हैं। हर पार्टी आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवार उतार रही है। हालांकि चुनाव आयोग का निर्देश है कि ऐसे उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि को भाषायी और अंग्रेजी अखबारों में विज्ञापन के जरिए प्रकाशित करना होगा और उसके साथ संबंधित पार्टी की वेबसाइट पर जारी करना होगा। आपराधिक पृष्ठभूमि के ये नेता हालात देखकर सुविधानुसार एक से दूसरी पार्टी में छलांग लगाते रहते हैं। ऐसे में जो अलग-सी विचारधारा किसी पार्टी के चरित्र और पहचान की परिचायक होती है, वह पीछे धकेल दी जाती है।

जो आलोचक कल तक विपक्षी पार्टियों की आलोचना करते रहे हैं, वे उसी पार्टी से पूरी निर्लज्जता के साथ जा मिलते हैं। ऐसी अवसरवादियों के लिए सिर्फ चुनाव जीतना ही मायने रखता है। लेकिन देश का आम मतदाता भी तो उसका विरोध न करके मौन समर्थन दे बैठता है। यह सब कुछ इस पैमाने पर हो रहा है, जैसा पहले कभी नहीं देखा गया। मतदाता भी उदासीन हो गया है।

हम सभी जानते हैं कि जनता के असली मुद्दों पर मीडिया में कभी चर्चा नहीं होती, इसके बदले मीडिया चुनाव के दौरान राजनैतिक पार्टियों के एजेंडा और हित साधने वाले मुद्दों पर फोकस करता है, जिसे हम ‘पेड न्यूज’ कहते हैं। मीडिया में नकारात्मक खबरों को अत्यधिक तवज्जो मिल रहा है, सकारात्मक खबरों की जगह सिकुड़ गई है। हमारे लोकतंत्र के लिए यह बेहद खतरनाक है कि सभी कारोबारी घराने और क्षेत्रीय पार्टियां राजनीति में पिछले दरवाजे से जगह बनाने के लिए मीडिया हाउस खोल लिए हैं। राजनीति अब किसी तरह की प्रतिबद्धता के साथ सामाजिक सेवा का जरिया नहीं रह गई है। राजनैतिक नेता अब राजधर्म का पालन नहीं कर रहे हैं, इसके बदले वे लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांत पर ही चोट कर रहे हैं।

धर्मनिरपेक्षता के नाम पर राजनैतिक नेता वोट बैंक के लिए समाज को बांट रहे हैं। किसी राजनैतिक पार्टी ने किसी जाति या धर्म का कल्याण नहीं किया है। किसी जाति या धर्म को आरक्षण देने से समस्या का समाधान नहीं होता। अगर गरीब और पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने से उनका जीवन स्तर सुधर सकता है तो आरक्षण को आर्थिक आधार पर क्यों नहीं लागू किया गया? भारत में हम इस नीति में विश्वास करते हैं कि सभी का कल्याण हो मगर किसी का तुष्टीकरण न हो। सत्ता में पहुंचे सभी नेताओं का धर्म है कि वे देश की सीमा में रहने वाले सभी के कल्याण के बारे में सोचें।

सभी राजनैतिक पार्टियों को स्वच्छ राजनीति करनी चाहिए और ईमानदार प्रतिनिधियों को आगे बढ़ाना चाहिए। आज समाज सेवा में सक्षम व्यक्तियों को मुख्यधारा की राजनीति में कोई अवसर नहीं मिलता, बशर्ते उसमें किसी तरह के सुर्खाब के पर न लगे हों। सबसे आसान तो यह है कि अपने या किसी पार्टी के प्रचार के लिए किसी धर्म का सहारा ले लिया जाए या राजनीति और मीडिया में उछलने वाले किसी भावनात्मक मुद्दे का दोहन किया जाए।

आज डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में जब समाचारों के प्रवाह में तेजी आ गई है, तब भी आम आदमी सही बटन दबाने में क्यों नाकाम हो जाता है। अब तो नोटा का विकल्प भी मौजूद है। हम भारत के लोग सनातन धर्म के सिद्धांतों में यकीन करते हैं जो (जाति और धर्म से ऊपर उठकर) सभी की सुरक्षा और समृद्धि की बात करता है, हम किसी राजनैतिक पार्टी के विभाजनकारी एजेंडे में यकीन नहीं करते। जो लोग धर्मनिरपेक्षता के नाम पर देश को बांटने में लगे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि हम रिलिजन या मजहब या पंथ और धर्म के फर्क को बखूबी समझते हैं। धर्म के नाम पर कई राजनैतिक नेता और धर्मगुरु अपनी राजनीति की दुकान चला रहे हैं। कश्मीर में अशांति का माहौल मजहब के नाम पर कुछ हाशिए के तत्वों ने फैला रखा है। वैश्विक आतंकवादी आम लोगों के कत्लेआम में मशगूल हैं। फिर भी उन्हें भारत विरोध के नाम पर समर्थन मिल जाता है। मसूद अजहर का कौन समर्थन कर रहा है? हम सभी जानते हैं। इसलिए अब वक्त आ गया है कि देश के लोग बेहतर राष्ट्र के लिए सही पार्टी से सही लोगों का चुनाव करें। किसी को जाति, धर्म या समुदाय की राजनीति करने की इजाजत नहीं होनी चाहिए। धर्म का अर्थ रिलिजन या पंथ नहीं है, धर्म तो सबके कल्याण की बात करता है।

Deepak Kumar Rath

   दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

 

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