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जीवन ही मृत्यु का कारण है…

जीवन ही मृत्यु का कारण है…

काल के अश्वरथ पर आसीन भगवान भास्कर क्षिप्रता से पल प्रति पल भागते जा रहे हैं। संसार भी अबाध गति से चलता जा रहा है।  दुनिया की तमाम शै अपने रफ्तार से गतिमान हैं। आशय यह है कि वक्त कभी और किसी के लिए भी ठहरता नहीं है। और तिस पर जैसे – जैसे वक्त गुजरता जाता है, मानव और इस कायनात की सभी चीजें अपने अस्तित्व के अंत के करीब पहुंचता जाता है।

एक व्यक्ति एक दिन अपने गुरु के साथ किसी नदी पर बने एक पुल पर खड़ा था। शिष्य ने कहा, ‘गुरुवर, देखिये पुल के नीचे का जल कितनी तेज धारा  से बह रहा है’। गुरु बोले, ‘शिष्य, केवल पुल के नीचे का जल नहीं बह रहा है, प्रत्युत पुल भी बह रहा है, पुल के साथ-साथ हम बह रहे हैं, नदी बह रही है और इस दुनिया की सारी चीजें बह रही है।’ गुरु की इन बातों को सुनकर शिष्य बड़ी दुविधा में पड़ गया और जिज्ञाशावश अपने गुरु से पूछ ही लिया, ‘गुरुवर, पुल बहने, मानव बहने या सांसारिक चीजों के बहने के गूढ़ अर्थ क्या हैं? कृपा करके मेरा मार्गदर्शन कीजिये।’

‘पुत्र, देखो, जिस समय इस पुल का निर्माण हुआ होगा, तब से यह पुल प्रति दिन लम्हा-दर-लम्हा पुराना और कमजोर होता जा रहा है। और एक वक्त वह भी आयेगा जबकि नदी की बहती हुई जलधारा भी सुख जाएगी, और मनुष्य का क्या? वह आज है, कल नहीं। अभी है पल भर के बाद नहीं। आखिर सब कुछ बहता जा रहा है या नहीं? सब कुछ नष्ट होता जा रहा है या नहीं? ‘

गुरु की बातें सुनकर गोया शिष्य के विवेक – चक्षु खुल गये हों। उसे एक विचित्र और समयातीत दिव्यज्ञान की अनुभूति हुई। गुरु की बातों को सुनकर उसे इस संसार की सभी खुबसूरत चीजों से वितृष्णा उत्पन्न हो गयी। लौकिक संसार उसे मायावी और मिथ्या प्रतीत होने लगा। वह खुद को हारा हुआ और डरा हुआ महसूस करने लगा। जीवन और संसार के बारे में गुरु की कड़वी हकीकतों और अप्रत्याशित रहस्योद्घाटन से शिष्य के जीवन में जो आंधी आई थी उसकी गिरफ्त में उसे एक विचित्र घुटन का ऐहसास होने लगा था और वह परेशान हो उठा था।

महाभारत के एक प्रसंग में यक्ष ने युधिष्ठिर से एक प्रश्न पूछा, ‘इस दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?’ युधिष्ठिर ने जवाब दिया, ‘इस दुनिया में प्रति दिन अनगिनत प्राणी मृत्यु को प्राप्त करते हैं। फिर भी जो लोग यहां जीवित हैं, उन्हें ऐसा लगता है कि वे सभी अजर और अमर हैं और उनकी कभी भी मृत्यु नहीं होगी। इस दुनिया में इससे बढ़कर और आश्चर्य क्या हो सकता है!’

जीवन और संसार की नश्वरता के प्रति मानव की यह अनदेखी, अज्ञानता और भ्रान्ति इस धरती पर उसके समस्त शारीरिक दुखों और मानसिक वेदनाओं के मूल कारण के रूप में शुमार किया जाता है। इस सत्य से कदाचित ही कोई इनकार कर पाए कि जीवन के प्रत्येक पल के साथ हम मृत्यु के करीब पहुंचते जाते हैं और हमें यह भ्रम होता रहता है कि हम समय के साथ आगे बढ़ रहे हैं और बड़े हो रहे हैं।

सच पूछिए तो हम पल-पल जी नहीं रहे होते हैं, प्रत्युत मर रहे होते हैं। वक्त की गति में इंसान के जीवन लीला के अवसान का सन्देश छुपा हुआ होता है। सांसों के उच्छ्वास में जीवन तिल-तिल कर पुराना पड़ता जाता है। तो क्या यह लाजिमी नहीं है कि मनुष्य समय के गुजरते हर क्षण की अहमियत और संजीदिगी को शिद्दत से महसूस करे और आत्मज्ञान तथा साधना की राह पर चलते हुए परम पिता परमेश्वर की प्राप्ति में खुद को समर्पित कर दे?

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